श्री विक्रमादित्य के विक्रम संवत का प्रारंभ
श्री विक्रमादित्य [श्री विक्रमादित्य (आयु 26 वर्ष) की न्याय-सभा का बाहरी कक्ष । एक सिंहासन है, जिसके दोनों ओर सिंह की दो विशाल प्रतिमाएँ हैं। सिंहासन के पीछे एक मेहराब है, जिसके मध्य में सूर्य मण्डल है। शिल्प-कला से सजाये गए पत्थरों पर बेल-बूटेदार आकृतियाँ हैं, जिनमें कमल और उसके चारों ओर मृणाल की जाली है। फर्श भी रंगीन पत्थरों का है और उसमें सरोवर की लहरों का आभास है। मेहराब से हटकर एक वातायन है, जिससे कुछ दूर पर शिप्रा का प्रवाह दीख रहा है। कमरे में सुगन्धित द्रव्य का धूम है और चारों ओर रंगीन प्रकाश की शलाकाएँ हैं। द्वार के समीप काठ का एक त्रिभुज है, जिसमें एक घण्टा लटक रहा है। सिहासन पर श्री विक्रमादित्य श्रासीन हैं। देवतुल्य शरीर, घुटने तक लम्बी बाँहें, प्रशस्त ललाट, चौड़ा और ऊँचा वक्षःस्थल, कटि प्रदेश पुष्ट जैसे 'विश्वकर्मा ने अपने चक्र यन्त्र पर चढ़ाकर उनकी आकृति और शोमा को और भी चमका दिया।' उनकी कमर में अपराजित खड्ग कसा हुआ है, जो 'उनके पुरुषार्थ-रूपी सागर की उच्छल तरंग' है। वह राजेसी वस्त्र पहने हुए हैं। सिर पर रत्न-जटित मुकुट है। मंच को सीढ़ियों पर दाहिनी ओर एक...