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श्री विक्रमादित्य के विक्रम संवत का प्रारंभ

श्री विक्रमादित्य [श्री विक्रमादित्य (आयु 26 वर्ष) की न्याय-सभा का बाहरी कक्ष । एक सिंहासन है, जिसके दोनों ओर सिंह की दो विशाल प्रतिमाएँ हैं। सिंहासन के पीछे एक मेहराब है, जिसके मध्य में सूर्य मण्डल है। शिल्प-कला से सजाये गए पत्थरों पर बेल-बूटेदार आकृतियाँ हैं, जिनमें कमल और उसके चारों ओर मृणाल की जाली है। फर्श भी रंगीन पत्थरों का है और उसमें सरोवर की लहरों का आभास है। मेहराब से हटकर एक वातायन है, जिससे कुछ दूर पर शिप्रा का प्रवाह दीख रहा है। कमरे में सुगन्धित द्रव्य का धूम है और चारों ओर रंगीन प्रकाश की शलाकाएँ हैं। द्वार के समीप काठ का एक त्रिभुज है, जिसमें एक घण्टा लटक रहा है। सिहासन पर श्री विक्रमादित्य श्रासीन हैं। देवतुल्य शरीर, घुटने तक लम्बी बाँहें, प्रशस्त ललाट, चौड़ा और ऊँचा वक्षःस्थल, कटि प्रदेश पुष्ट जैसे 'विश्वकर्मा ने अपने चक्र यन्त्र पर चढ़ाकर उनकी आकृति और शोमा को और भी चमका दिया।' उनकी कमर में अपराजित खड्ग कसा हुआ है, जो 'उनके पुरुषार्थ-रूपी सागर की उच्छल तरंग' है। वह राजेसी वस्त्र पहने हुए हैं। सिर पर रत्न-जटित मुकुट है। मंच को सीढ़ियों पर दाहिनी ओर एक...

VB 01 “त्याग की परीक्षा” मिथिलावती की महागाथा

“त्याग की परीक्षा” मिथिलावती की महागाथा बहुत अच्छा प्रश्न 🙏 किसी भी महाकथा का शीर्षक ऐसा होना चाहिए, जो कथा की आत्मा और संदेश दोनों को एक साथ प्रकट करे। यह कथा तीन मुख्य आधारों पर टिकी है: राजा गुणाधिप का धर्मनिष्ठ आचरण राजकुमार का निःस्वार्थ त्याग सुंदर स्त्री / मायावी शक्ति का रहस्य और इसका मूल प्रश्न यही है कि “किसका त्याग श्रेष्ठ है?” संभावित शीर्षक (आप चुन सकते हैं): “त्याग की कसौटी” “राजा और सेवक का धर्म” “मिथिलावती की महाकथा” “श्रेष्ठ त्याग” “राजा गुणाधिप और सेवक-राजकुमार” “निःस्वार्थ सेवा की गाथा” 👉 यदि इसे पौराणिक कथा के रूप में प्रस्तुत करना है, तो शीर्षक हो सकता है – “श्रेष्ठ त्याग : मिथिलावती की कथा” 👉 यदि इसे लोककथा / विक्रम-बेताल शैली में रखना है, तो शीर्षक होगा – “त्याग की परीक्षा” आप बताइए, क्या आप इसे गंभीर और शास्त्रीय अंदाज़ वाला शीर्षक पसंद करेंगे (जैसे श्रेष्ठ त्याग ) या लोकप्रिय और सरल अंदाज़ वाला (जैसे त्याग की परीक्षा )? बहुत अच्छा प्रश्न किया आपने 🙏 किसी भी महाकथा को शुरू और खत्म करने का तरीका ही उसे अमर और यादगार बना देत...