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Showing posts from June, 2023

विक्रम बैताल || कहानी 505 || भर्तहरी को राज्य और विक्रम को जीवनदान

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विक्रम बैताल || कहानी 505 ||  भर्तहरी को राज्य और विक्रम को जीवनदान पिछले एपिसोड में आपने देखा की वीरमति अपने पुत्रों के साथ जंगल में थी की तभी वहां पर विक्रम को विषधर ने डस लिया और भारधारी क्रिया का सामान लेने के लिए शहर की ओर चल दिया। भर्तहरी नाग के डसने से मृत हुए अपने छोटे भाई की अंतिम क्रिया के लिए सामान लेने के लिए विक्रम नगरी की ओर चल दिया और माता और रोती बिलखती विक्रम के शव की सुरक्षा हेतु वहीं रह गई। भर्तहरी अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण तो थे ही परंतु बहुत ही बुद्धिमान भी थे । वह अपने पिता से यह सारी विधाएं सीखे चुके थे। वह धीरे-धीरे नगरी की ओर बढ़ते जा रहे थे। उनके दिमाग में माता का रुद्र क्रंदन और भाई का शांत जमीन पर लेट होना और पास में नाग के दो टुकड़े बराबर दिमाग में कौंध रहे थे । लगातार कई घंटे तक नगरी की ओर चलकर भर्तहरी नगरी के द्वार पर पहुंचे जैसे ही भर्तहरी ने नगरी में प्रवेश किया नगर रक्षकों ने उसे बंदी बना लिया। भर्तहरी बोला मुझे छोड़ दो मेरा भाई जंगल में मृत पड़ा हुआ है मुझे उसकी क्रिया करनी है। उसके बाद मुझे आप चाहे तो पकड़ लेना। मैं एक क्षत्रिय बालक...

विक्रम बैताल || कहानी 504 || वन में नाग के डसने से विक्रम की मृत्यु।

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विक्रम बैताल || कहानी 504 || वन में नाग के डसने से विक्रम की मृत्यु। अभी तक आपने सुना कि गंधर्वसेन को चंपावती नगरी के शत्रुओं ने मार डाला। जिससे उनकी मुक्ति हो गई और वे इंद्रलोक चले गए । लेकिन रानी ने अपने पति और माता-पिता की निर्मम हत्या पर क्रुद्ध होकर पूरी चंपावती नगरी को श्राप दे दिया।  रानी के श्राप मुख से निकलते ही पूरी की पूरी नगरी पाषाण में बदल गई फिर यहाँ का हर व्यक्ति, पशु और पक्षी सभी शाप से पत्थर के हो गए थे। फिर एक 'धूकोट' (धूलभरी आँधी) चला, जिससे यह पूरी नगरी उस धूल के अंदर जमीन में दफन हो गई।  रानी ने अचानक से अपने पीछे बडी विचित्र सी आवाज सुनी तो उसने पीछे मुड़कर देखा, उसने देखा कि एक अंदर में पूरी की पूरी चंपावती नगरी जमीन के अंदर समा गई। लेकिन उनकी पत्नी वीरमति अपने दोनों पुत्र और एक पुत्री के साथ जंगल में आगे बढ़ गईं। इस वक्त भर्तहरि की उम्र 12 वर्ष मैनावती के उम्र 10 वर्ष तथा विक्रम की उम्र मात्र 4 वर्ष की थी। रास्ते में चलते चलत विक्रम बहुत बुरी तरीके से थक गए और बैठकर अपने पैरों से कांटे निकालने का झूटा प्रयास करने लगे यह देख कर भरथरी मन ही मन बड़े द...

भविष्य पुराण और बेताल कथाएं

भविष्य पुराण और बेताल कथाएं भूमिका लोक कथाएं किसी भी समाज की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा होती हैं। ये संसार को उस समाज के बारे में बताती हैं जिसकी वे लोक कथाएं हैं। आज से बहुत साल पहले, करीब 100 साल पहले, ये लोक कथाएं केवल जबानी ही कही जातीं थीं और कह सुन कर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती थीं इसलिये किसी भी लोक कथा का मूल रूप क्या रहा होगा यह कहना मुश्किल है। विक्रम बेताल का परिचय विक्रम वेताल की जो कहानियाँ' भारत में प्रचलित हैं और बच्चे जिन को बड़े शौक से सुनते हैं वे कहानियाँ - 1 क्योंकि वे 25 कहानियाँ हैं इसलिये वे वेताल पच्चीसी के नाम से मशहूर हैं । 2 ये सब कहानियाँ एक बड़े ही तनाव भरे वातावरण में कही गयीं हैं और ये सव कहानियाँ रास्ता काटने के लिये सुनायी गयीं हैं ।  3 इन कहानियों को कहने से पहले बेताल विक्रम से दो शर्ते रखता है - एक तो यह कि वह रास्ते में कुछ बोलेगा नहीं और अगर वह बोला तो उसका सिर टुकड़े टुकड़े हो कर बिखर जायेगा। दूसरी शर्त यह कि किसी भी वात का अगर वह जानते बूझते भी जवाव नहीं देगा तो विक्रम वेताल को जहाँ से लाया है बेताल फिर से वहीं चला जायेगा । 4 बेताल च...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 10

अध्याय १० कलियुगीय इतिहाससमुच्चय का वर्णन सूत जी बोले - महाभाग ! वैताल ने राजा से यह कहा कि - महाराज ! गौड़ देश में वर्धन नामक नगर हैं, उसमें ख्यातिप्राप्त एवं धार्मिक गुणशेखर नामक राजा राज करता था। जैन धर्मानुयायी निर्भयानन्द नामक उनका मंत्री था। किसी समय राजा ने शिव जी के मन्दिर में जाकर उस सर्वव्यापी एवं ईश्वर शंकर जी की अर्चना की। उसी समय एक बिच्छू ने क्रुद्ध होकर राजा को काट लिया। उस दुःख से दुःखी होकर राजा मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उस समय जैनधर्मी निर्भयानन्द ने उस विष का अपहरण करके राजा से कहा - महाभाग, राजन् ! इन छहों शत्रुओं का, जो मान संस्थित एवं अधम हैं, मैं वर्णन कर रहा हूँ, सुनो ! काम, क्रोध, लोभ, रति, हिंसा और तृष्णा ये छहों दोष रजोगुण से उत्पन्न होते है, इनका भेद पृथक्-पृथक् बताया गया है । १ ६ । मोह, दंभ, मद, ममता, तथा निन्दित आशा की जो जगत् में व्याप्त हैं, तमोगुण से उत्पत्ति हुई है । विष्णु कामी है, शिव क्रोधी, ब्रह्मा लोभी, इन्द्र दम्भी, यम मोही, और कुबेर अभिमानी हैं। इस प्रकार ये सभी देवगण माया के अधीन हैं अतः इनके पूजन करने से क्या लाभ हो सकता है । उपरोक्त छहों...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 09

अध्याय ९ कलियुग के इतिहाससमुच्चय का वर्णन सूतजी बोले - महाबुद्धे, शौनक ! उस महाकुशल राजा का सम्मान करता हुआ वैताल ने उनसे कहा--राजन् ! रमणीक कामपुर नामक नगर में राजा वीरसिंह न्याय और धर्म के अनुसार राज करता था। उसी नगर में धनी, मानी हिरण्यदत्त नामक वैश्य भी रहता था । रूप-यौवन सम्पन्न कामाला नामक उसकी पुत्री, जो सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी, कुसुमप्रिय होने के नाते वसंत के समय नित्य पुष्पों के लिए लालायित रहती थी । एक बार वह पुष्प-संचय के लिए भ्रमर गुंजित किसी उपवन में जा रही थी, उस समय उसे धर्मदत्त के पुत्र सोमदत्त ने देखकर बल प्रयोग करना चाहा कि उस निर्जन स्थान में उसने नम्रता पूर्वक कहा - महावीर ! अभी कन्या हूँ, अतः धर्मतः मुझे छोड़ दीजिये । १ ६ । विवाह हो जाने पर उसके दशवें दिन पहले आपकी ही सेवा करूँगी । अतः दयानिधे । दश दिन के लिए (मुझे मुक्त करने की ) आज्ञा प्रदान कीजिए। वह उसे स्वीकार करके अपने घर आया । उस कन्या के पिता ने उसी गाँव में मणिग्रीव वैश्य के पुत्र मदपाल के साथ उसका पाणिग्रहण कार्य सम्पन्न कर दिया । वह स्त्री अपने श्वसुर के घर जाकर अपने मित्र के प्रति चिंतित होने लगी । न...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 08

अध्याय ८ कलियुगीय इतिहाससमुच्चय का वर्णन सूत जी बोले- इसे सुनकर वैताल ने राजा से कहा- राजन् ! विदेह प्रदेश में मिथिला नामक नगरी है, धन-धान्य सम्पन्न गुणाधिप नामक राजा वहाँ राज कर रहा था । सेवावृत्ति के लिए चिरंदेव नामक एक राजपुत्र मिथिला पुरी में आकर रहने लगा। एक वर्ष के पश्चात् राजा गुणाधिप ने अपनी चतुरङ्गिणी सेना समेत आखेट के लिए जंगल में जाकर एक वाघ का शिकार किया । उसी क्रोध के आवेश में राजा उस बाघ के मार्ग से किसी जंगल में पहुँच गये । चिरंदेव भी उनके पश्चात् उसी गहन वन में पहुँच गये । क्षुधा के नाते राजा का कंठ सूख गया था, श्रम और संताप से पीडित होकर राजा ने ' चिरंदेव से कहा- आज मुझे शीघ्र भोजन दीजिये । १ ६ । इसे सुनकर उस राजा के पुत्र ने उत्तम हरिण का शिकार करके उसका मांस पकाकर राजा को अर्पित किया। उस प्रियमांस के भोजन से संतुष्ट होकर राजा ने उससे कहा -श्रेष्ठ ! इच्छित वर की याचना करो। उसने राजा से कहा- तुम्हारे यहाँ अवैतनिक कार्य करते हुए मैं (एक सेठ की ) सहस्र मुद्रा खा गया हूँ । अतः राजन् ! घर बुलवाकर उसे शीघ्र दे दीजिये और परिवार के पोषणार्थ मुझे सौ मुद्रा का मासिक वेतन प्...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 07

अध्याय ७ कलियुगीय इतिहास समुच्चय का वर्णन सूत जी बोले- उस समय वह वैताल प्रसन्न होकर राजा से एक उत्तम गाथा का वर्णन करने लगा । चम्पापुरी में चम्प नामक राजा, जो बलवान एवं धनुर्धारी था, राज कर रहा था। उसकी प्रधान रानी का नाम सुलोचना था। उनके त्रिलोक सुन्दरी नामक एक कन्या उत्पन्न हुई, चन्द्र के समान जिसका मुख, धनुष की भाँति भौहें, मृग के समान नेत्र एवं कोकिल की भाँति वाणी थी । नृप उस परम सुन्दरी कोमलाङ्गी को प्राप्त करने के लिए जब देवगण इच्छुक थे, तो मनुष्यों को क्या कहा जा सकता है । उसका स्वयम्बर हुआ, जिसमें पृथिवी के ख्यातिप्राप्त अनेक राजवृन्द उसके लिए लालायित होकर आये थे । देवश्रेष्ठ इन्द्र, यम, कुबेर, और वरुणदेव भी मनुष्य वेष मे उसकी प्राप्ति के लिए वहाँ उपस्थित थे । एक ने चम्पकेश से कहा- राजन् ! मेरी बात सुनो ! समस्त शास्त्रों में निपुण, रूपवान्, एवं सौन्दर्यपूर्ण मैं हूँ, मेरा नाम इन्द्रदत्त है । ऐसा जानकर मुझे अपनी कन्या प्रदान कीजिये । दूसरे ने कहा—मेरा नाम धर्मदत्त है, मैं मनोहर एवं धनुर्वेद में कुशल हूँ अतः मुझे अपनी कन्या देने की कृपा कीजिये । तीसरे ने कहा- राजन् ! मुझ धनपाल के...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 06

अध्याय ६ कलियुगीय इतिहास समुच्चय का वर्णन सूत जी बोले- पुनः वैताल ने कहा- राजन् ! इस कथा को सुनो ! उस धर्मपुर गाँव में जो रमणीक और अनेक जाति के मनुष्यों से सुसेवित था, महान् एवं उत्तम धर्मशील नामक राजा राज कर रहा था । भूपते ! उसकी प्रधान रानी का नाम लज्जा देवी, एवं मंत्री का नाम अंधक था, न्यायशास्त्र Sent froणात विद्वान् था। कुछ दिन के उपरांत राजा धर्मशील ने अपने सन्तानार्थ एक उत्तम मन्दिर का निर्माण कराकर उसमें भी दुर्गा जी की प्रतिष्ठा कराया । पश्चात् उस राजा ने वहाँ महान् उत्सव भी किया । उस दिन आधीरात के समय गौरी जी ने राजा से कहा कि- वरदान की याचना करो। इस अमृत वाणी को सुनकर राजा धर्मशील ने नम्रतापूर्वक इस प्रकार की स्तुति करना आरम्भ किया, जिससे दुर्गा जी प्रसन्न होती हैं । १-५ धर्मशील बोले- जो प्रकृति एक और नित्य है, समय पर सव वर्णों की स्वरूपिणी हो जाती है । साक्षात् भगवती वही आप हैं जिसने इस विश्व को विस्तृत किया । आप की ही आज्ञा शिरोधार्य कर श्रेष्ठ देवगण उत्तमलोक की रचना करके तुम्हारे महालक्ष्मी के साथ निर्मल सुख का उपभोग करते हैं । सनातनि ! तुम्हारी भक्ति द्वारा विष्णु ब्रह्म...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 05

अध्याय ५ कलीयुगीयेतिहाससमुच्चय का वर्णन सूत जी बोले- भृगुश्रेष्ठ, महाभाग ! प्रसन्न होकर उस वैताल ने ज्ञान-निधि उस राजा विक्रमादित्य से कहा- महाराज ! उज्जयिनी पुरी में चन्द्रवंश में उत्पन्न महाबल नामक एक राजा राज कर रहा था, जो वेद शास्त्रों में निष्णात था । हरिदास नामक उसका सेवक सदैद अपने स्वामी का कार्य करता था । भक्तिमाला उसकी पत्नी का नाम था, जो सदैव साधु-सेवा में निरत रहती थी । उस पत्नी से महादेवी नामक एक कन्या उत्पन्न हुई, जो कमल की भाँति नेत्रवाली, रूपवती, समस्त विद्याओं में निपुण थी । उसने हरिदास के कहा - तात ! मेरी एक बात सुनो ! मुझसे अधिक गुण सम्पन्न जो पुरुष हो, उसे ही मुझे समर्पित करना । पिता ने स्वीकार किया, किन्तु उसी समय राजा ने उन्हें बुलवाया, वे राजसभा में चले गये। राजा ने उन्हें प्रणाम करके कहा - विप्र हरिदास ! तैलङ्गाधीश्वर राजा हरिश्चन्द्र के यहाँ जाकर उनका कुशल क्षेम जानकर शीघ्र मुझे बताओ । १-७। यह सुनकर उस ब्राह्मण ने राजा हरिश्चन्द्र के यहाँ पहुँच कर राजा महाबल का कुशल मंगल वर्णन किया, जिसे सुनकर राजा हरिश्चन्द्र, जो 'महाबल राजा के श्वसुर थे, बार-बार हर्ष में न...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 04

अध्याय ४ कलियुगीय इतिहाससमुच्चय का वर्णन सूत उवाच -इसे सुनकर वैताल ने राजा से पुनः कहा- परम अद्भुत एक भोगावती नामक नग है, जिसमें रूपवर्मा नामक राजा राज करता था । उसके बुद्धिविशारद एक शुक (तोता ) था, जिसका नाम चूडामणि बताया गया है। वह उस राजा के यहाँ एक सुन्दर पिंजरे में रहता था । तीस वर्ष की अवस्था होने पर किसी समय उस रूपवर्मा ने उस शुक से पूँछा - शुक ! मेरे योग्य कोई सुन्दरी है ! यदि है, तो बताओ ! उसे सुनकर उस शुक ने कहा- राजन् ! मगध देश के राजा की पुत्री, जिसका नाम चन्द्रावती है, आप के योग्य है, इस समय उसी का ग्रहण कीजिये । ऐसा सुनकर उस राजा ने गणेश नामक किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को यथेच्छ धन देकर उससे कहा- जिस प्रकार उसके साथ विवाह हो सके, वही कीजियेगा । यह गणेश नामक ब्राह्मण भी शीघ्रतया मगध देश में पहुँचकर वहाँ महादेव जी की प्रार्थना करके प्रसन्नचित्त से उनकी स्तुति करने लगा। शिव, शान्त, एवं समस्त अभीष्ट के प्रदायक को नमस्कार है, भव, शंकर एवं रुद्र के लिए अनवरत नमस्कार है । मृड, आनन्दरूप, तथा सम्पूर्ण दुःख के अपहरण करने वाले को नमस्कार है । इस प्रकार उस ब्राह्मण के स्तुति करने के समय म...

विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 03

अध्याय ३ कलियुग के भूपाख्यानेतिहास समुच्चय का वर्णन शौनक ने कहा- महाभाग, श्रेष्ठ विप्रवृन्द ! सुन्दर गाथा कह रहा हूँ सुनो ! वैताल ने उस श्रेष्ठ राजा विक्रमादित्य से कहा- वर्द्धमान नामक नगर में, जो रमणीक एवं अनेक भाँति के मनुष्यों से सुसेवित था, महाबली रूपसेन नामक राजा राज्य करता था । उसकी स्त्री का नाम विद्युन्माला था, जो पति सेवा का ही पारायण करती थी । एक बार वीरवर नामक एक क्षत्री अपने पुत्र, कन्या और पत्नी समेत सेवावृत्ति (नौकरी) के लिए उस राजा के दरबार में उपस्थित हुआ और विनम्र होकर उसने राजा रूपसेन से कह कर नौकरी निश्चित करा लिया जिसमें राजा प्रतिदिन एक सहस्र सुवर्ण की मुद्रा उसे प्रतिदिन देने लगा । वीरसेन (वीरवर) उसे वेतन के रूप में ग्रहण कर अग्नि, तीर्थ, एवं द्विजातियों में व्यय करने से जो अवशिष्ट होता था, उसी से अपने परिवार समेत जीवन निर्वाह करता था । राजन् ! इस प्रकार एक वर्ष के व्यतीत होने के उपरांत भगवान् शिव की आज्ञा शिरोधार्यकर राजलक्ष्मी उस (वीरवर) की परीक्षा के लिए श्मशान में जाकर अत्यन्त रुदन करने लगी । आधी रात के समय राजा जागकर अपने सेवक से कहा- वीरवर ! जाओं इस ( रुदन क...