श्री विक्रमादित्य के विक्रम संवत का प्रारंभ

श्री विक्रमादित्य

[श्री विक्रमादित्य (आयु 26 वर्ष) की न्याय-सभा का बाहरी कक्ष । एक सिंहासन है, जिसके दोनों ओर सिंह की दो विशाल प्रतिमाएँ हैं। सिंहासन के पीछे एक मेहराब है, जिसके मध्य में सूर्य मण्डल है। शिल्प-कला से सजाये गए पत्थरों पर बेल-बूटेदार आकृतियाँ हैं, जिनमें कमल और उसके चारों ओर मृणाल की जाली है। फर्श भी रंगीन पत्थरों का है और उसमें सरोवर की लहरों का आभास है। मेहराब से हटकर एक वातायन है, जिससे कुछ दूर पर शिप्रा का प्रवाह दीख रहा है। कमरे में सुगन्धित द्रव्य का धूम है और चारों ओर रंगीन प्रकाश की शलाकाएँ हैं। द्वार के समीप काठ का एक त्रिभुज है, जिसमें एक घण्टा लटक रहा है।

सिहासन पर श्री विक्रमादित्य श्रासीन हैं। देवतुल्य शरीर, घुटने तक लम्बी बाँहें, प्रशस्त ललाट, चौड़ा और ऊँचा वक्षःस्थल, कटि प्रदेश पुष्ट जैसे 'विश्वकर्मा ने अपने चक्र यन्त्र पर चढ़ाकर उनकी आकृति और शोमा को और भी चमका दिया।' उनकी कमर में अपराजित खड्ग कसा हुआ है, जो 'उनके पुरुषार्थ-रूपी सागर की उच्छल तरंग' है। वह राजेसी वस्त्र पहने हुए हैं। सिर पर रत्न-जटित मुकुट है।

मंच को सीढ़ियों पर दाहिनी ओर एक युवती विभावरी (आयु 22 वर्ष) खड़ी है। मोतियों से परिपूर्ण सीमान्त और वेणी में बन्धूक-पुष्प । कन्धों पर हरा उत्तरीय और कमर में पीले रेशम का कटिबन्ध । वक्ष पर मोतियों की माला और पुष्पहार । उसका शेष शृङ्गार फूलों का ही है।

कक्ष में इस समय केवल ये दोनों हो हैं। गम्भीर घोष से श्री विक्रमादित्य मौन भंग करते हैं।]

विक्रमादित्य - आश्चर्य है, उज्जयिनी में तुम्हारा अपमान हुआ ।

विभावरी - सम्राट्, उस अपमान की यन्त्रणा से आज दिन-भर रुदन करने के कारण मेरे कण्ठ की विकृति हो गई है।

विक्रमा दित्य - आर्य-नारियाँ रुदन नहीं करतीं। तुम्हारा नाम क्या है देवी ?

विभावरी- विभावरी, सम्राट् !

विक्रमादित्य - विभावरी, कहाँ की निवासिनी हो ?

विभावरी - विदिशा में मेरा निवास है, सम्राट् !

विक्रमादित्य- उज्जयिनी में कब से निवास कर रही हो ?

विभावरी- शरद्-पूर्णिमा के पर्व से। एक मास से कुछ ही अधिक समय हुआ ।

विक्रमादित्य - यहाँ तुम आयी किस लिए थीं ?

विभावरी - पुण्यतीर्था उज्जयिनी में शिप्रा स्नान के लिए।

विक्रमादित्य- कितने दिन से शिप्रा स्नान कर रही हो ?

विभावरी- पिछले तीन वर्षों से, सम्राट् !

विक्रमादित्य- प्रत्येक वर्ष तुम यहाँ एक मास से अधिक ठहरती हो ?

विभावरी - नहीं सम्राट्, जब से आपका शासन हुआ है तब से यहाँ अधिक ठहरने लगी हूँ।

विक्रमादित्य - क्यों ?

विमावरी- सम्राट्, आपके शासन में उज्जयिनी की पवित्रता नक्षत्रों की पवित्रता के समान है। यहाँ चारणों के भैरव राग में पुष्पों ने अपनी पंखुड़ियाँ खोलना सीखा है। जो नगरी अपने वैभव के स्तूपों में अपने हाथ फैलाकर आपके चरणों की वन्दना कर रही है, वह नगरी मेरे लिए इतना आकर्षण क्यों न रखे सम्राट् ?

विक्रमादित्य- इसे मैं कैसे सत्य समभू जब विभावरी-जैसी आर्य- नारी अभियोगिनी के रूप में मेरे सामने उपस्थित है ?

विभावरी - यह मेरा भाग्य-दोष है, सम्राट् ! सूर्य का आलोक कण-करण को प्रकाशित करता है, किन्तु पहाड़ की कन्दरा में अन्धकार ही रहता है। यह सूर्य का दोष नहीं है प्रभो, यह कन्दरा का दोष है जो पत्थरों को तोड़कर उनमें छिपकर बैठ गई है।

विक्रमादित्य - यदि तुम ऐसा समझती हो देवी, तो अभियोगिनी बनकर मेरे सामने क्यों खड़ी हो ? यदि यह स्वयं तुम्हारा दोष है तो तुमने राज-मर्यादा की शान्ति में बाधा क्यों डाली ? उस दोष के दण्ड को सहन करने की शक्ति तुममें होनी चाहिए ।

विभावरी- सम्राट्, यदि मैं दण्ड सहन कर लूंगी तो इस दण्ड का द्वार भविष्य में अन्य स्त्रियों के लिए भी खुल जाएगा। आज मैं अपमानित हुई हूँ, यदि इसकी सूचना मैं आपके बाहुबल को न दूँ तो कल दूसरी स्त्री भी अपमानित हो सकती है।

विक्रमादित्य- तुमसे पहले तो कोई स्त्री मेरे राज्य में अपमानित नहीं हुई ।

विभावरी - यह आपके राज्य-शासन का गौरव है, सम्राट् !

विक्रमादित्य - (दृढ़ता से) चुप रहो विभावरी, मैं ऐसे छद्मवेशी शब्द सुनना नहीं चाहता। ये मेरी यन्त्रणा को अधिक तीव्र करते हैं। मैं जानना चाहता हूँ, तुम्हारा अभियोग क्या है ?

विभावरी- सम्राट्, लज्जा मेरे शब्दों को रोक रही है।

विक्रमादित्य- मुझे आश्चर्य हो रहा है, तुम आर्य-नारी किस प्रकार हो ? तुमने इस अपमान पर आज दिन-भर रुदन किया, जो आर्य-नारी की मर्यादा के प्रतिकूल है। फिर उस अपमान के कहने में तुम्हें लज्जा हो रही है। आर्य-नारियाँ अपना अपमान ज्वालामय शब्दों में कहती हैं, लज्जा के स्वरों में नहीं ।

विभावरी - मैं बहुत दुःखी हूँ, सम्राट् !

विक्रमादित्य- तब तो तुम्हें और भी निर्भीक होना चाहिए। भारत की दुःखिनी नारी क्रान्ति की ज्वाला है, उसे कोई रोक नहीं सकता । वह उठती है तो सुगन्धिमय घूम की भाँति, और आकाश तक उसकी उदारता फैल जाती है; वह गिरती है तो बिजली की भाँति, और उससे पाताल का हृदय भी विदीर्ण हो जाता है।

विभावरी - सत्य है सम्राट् !

विक्रमादित्य - फिर तुमने यह याचना की थी कि तुम्हारा अभियोग न्याय-सभा के बाहरी कक्ष में एकान्त में सुना जाए। यह याचना भी तुम्हारी स्वीकार हुई। मैंने अपनी सभा के सदस्यों और मन्त्रियों को यहाँ से हटा दिया। इस समय हम लोग एकान्त में हैं। तुम निर्भीक होकर अपना अभियोग मुझे सुना सकती हो ।

विभावरी (हाथ जोड़कर) - मैं सम्राट् की कृतज्ञ हूँ।

विक्रमादित्य - कृतज्ञ होने की बात नहीं है। सम्राट् प्रजा का पिता है। यदि आवश्यकता होगी तो मैं इसी स्थल पर तुम्हारे अभियुक्त को दण्ड भी दे सकूंगा ।

विभावरी - यह आपकी कृपा है, प्रभो !

विक्रमादित्य- अपना अभियोग स्पष्ट करो। किसमें इतनी शक्ति है जो उज्जयिनी में नारी का अपमान करे ?

विभावरी- सम्राट्, आज प्रातःकाल उषा-वेला में मैं इसी शिप्रा (वातायन की ओर संकेत) के किनारे वायु-विहार के लिए गयी थी। वहाँ पुष्प् राग-उद्यान की सुगन्धि ने मुझे आकर्षित किया और मैंने उसमें प्रवेश किया । शीतल समीरण बह रहा था, अनेक भाँति के पुष्प खिले हुए थे...

विक्रमादित्य - (बीच में ही) मैं इस समय काव्य नहीं सुनना चाहता, अभियोग सुनना चाहता हूँ।

विभावरी - क्षमा चाहती हूँ सम्राट्, मैं संक्षेप में कहूँगी। पुष्पराग- उद्यान में पुष्पों की विविधता देखकर मेरे मन में इच्छा हुई कि मैं सूर्य भगवान् की पूजा के निमित्त कुछ पुष्प-चयन कर लूँ। जिस समय मैं पुष्प-चयन कर रही थी उसी समय एक दूसरी स्त्री मेरे समीप आयी ।

उसने प्रेम से मेरी ओर देखकर निवेदन किया, "क्या मैं आपकी सहायता कर सकती हूँ ?” उसका प्रेम-भाव देखकर मैंने उसकी सहायता स्वीकार कर ली। पुष्प-चयन के उपरान्त उसने मेरी वेणी में पुष्प गूंथने की इच्छा प्रकट की । सम्राट्, सौन्दर्य-प्रिय होने के कारण मैंने यह भी स्वीकार किया। जिस समय मेरी वेणी में वह पुष्प गूंथ रही थी, उस समय मेरे कण्ठ में उसका स्पर्श अस्वाभाविक ज्ञात हुआ ।

विक्रमादित्य-- (चौंककर) अस्वाभाविक ? (सिहासन से उतर पड़ते हैं।)

विभावरी - सम्राट्, उसके स्पर्श से मुझे पुरुष-स्पर्श का संकेत मिला।

विक्रमादित्य - (स्तम्भित होकर) पुरुष-स्पर्श ? तो क्या वह नारी-वेश में पुरुष था ?

विभावरी - मैं यही सोचती हूँ, सम्राट् !

विक्रमादित्य- तुमने उसी समय अपने अपमान का प्रतिकार किया ?

विभावरी- सम्राट्, मुझे भय था मैं कहीं अधिक अपमानित न हो जाऊँ ?

विक्रमादित्य-तुम्हारे पास कोई शस्त्र था ?

विभावरी - हाँ सम्राट्, मेरे पास शस्त्र था। वह अब भी है, देखिए, यह दन्तिका । (कटिबन्ध से दन्तिका निकालकर दिखलाती है ।)

विक्रमादित्य - तुमने इसका प्रयोग किया ?

विभावरी - सम्राट्, मुझे आपके न्याय में अधिक विश्वास है ।

विक्रमादित्य - विभावरी, तुम आर्य-नारी हो। तुमने अपने कुल को कलंकित किया है। साथ ही मुझे भी, अपने सम्राट् को। तुम इस प्रकार अपमानित हो जाओ और शक-स्त्रियों की भाँति रोने लगो ? तुम्हें अपनी असमर्थता पर लज्जा नहीं आई ? तुम्हारी माता को आत्म हत्या करनी चाहिए । तुम्हारे पिता को देश से भाग जाना चाहिए। शक्ति-हीना नारी, भारत के भविष्य की संरक्षिका को अपमान का प्रतिकार करना भी न आया ?
(अशान्ति से शीघ्र गति में टहलने लगते हैं।)

विभावरी - सम्राट्, मुझे क्षमा कीजिए। विदिशा में रहने वाली नारी को अभी उज्जयिनी की नारी से बहुत कुछ सीखना है। आपके व्यक्तित्व के प्रभाव से तो उज्जयिनी की नारी दुर्गा और सरस्वती दोनों का ही रूप धारण कर सकती है।

विक्रमादित्य - (घृणा से) अयोग्य नारी, इस तिल की ओट में तुम पर्वत को नहीं छिपा सकतीं। यह कारण तुम्हारी असमर्थता की रक्षा नहीं करेगा ।

विभावरी - (हाथ जोड़कर) सम्राट्, मैं भी दण्ड की पात्री हूँ।

विक्रमादित्य - निःसन्देह, नारी-अपमान के लिए मैं अभियुक्त को निर्वासित तो करूँगा ही, साथ-ही-साथ तुम्हें भी साधना की अग्नि में तपकर सच्ची नारी बनना होगा ।

विभावरी - मैं दण्ड सहन करने के लिए प्रस्तुत हूँ, प्रभो !

विक्रमादित्य - और तुम्हारा अभियुक्त कहाँ है ?

विभावरी - मैं उसे पुष्पराग-उद्यान की द्वार-रक्षिका से बन्दी करा-कर ले आई हूँ। वह इस समय द्वार-रक्षिका के साथ बाहर है।

विक्रमादित्य - (अशान्त होकर) उज्जयिनी में कभी ऐसा अभियोग मेरे सामने उपस्थित नहीं हुआ। विभावरी, तुमने आज मुझे यह सोचने के लिए बाध्य किया है कि इतने युद्ध करने के उपरान्त, इतने शत्रुओं को मालवा, सौराष्ट्र और गुर्जर से निर्वासित करने के उपरान्त, भी मैं उज्जयिनी की सामाजिक व्यवस्था ठीक करने में असमर्थ रहा। आज भी उज्जयिनी में नारी अपमानित हो सकती है।

विभावरी - हाँ, सम्राट् !

विक्रमादित्य - (तीव्र स्वर में) विभावरी !

विभावरी - (विह्वल होकर) सम्राट्, क्षमा हो। जिस नगरी की वाणी ने ही शिप्रा का रूप धारण कर लिया हो वहाँ मेरी वाणी में यदि कुछ भूल हो तो क्षमा कीजिए, किन्तु अपनी आत्मा का चीत्कार मैं किन शब्दों में व्यक्त करू, प्रभो ! मैं लांछित हुई हूँ, मेरे आत्म-सम्मान की अवहेलना..

विक्रमादित्य - (रोककर) बस, अब मैं अधिक नहीं सुन सकूंगा। तुम्हारे अभियोग ने मेरे पराक्रम की सहस्र भुजाओं को शक्तिहीन सिद्ध कर दिया है। मैं अब तक अपनी शक्ति का विश्वासी था। आज वह विश्वास तुम्हारे अभियोग में समाप्त हो रहा है। मेरे राज्य में नारी का अपमान हो, यह मेरे लिए अपमान की बात है।

विभावरी - आप सम्राट्-श्रेष्ठ हैं, प्रभो !

विक्रमादित्य - चुप रहो विभावरी, इन शब्दों से तुम मुझे पीड़ा पहुँचा रही हो। मैंने विक्रमादित्य का विरुद धारण किया था। क्या मेरे इस साहस की भावना पर तुम्हारा अभियोग हँस नहीं रहा है? मैं उस विरुद का परित्याग करूँगा। तुमने विक्रम की ऐसी पताका भी कहीं देखी है जो अन्याय और अव्यवस्था के दण्ड में सजी हो ? तुम ऐसे सूर्य की कल्पना कर सकती हो जिसकी किरणों से अन्धकार निकलता हो ? विक्रमादित्य अन्याय और अव्यवस्था का प्रतीक हो, यह असम्भव है, यह असम्भव है ।

विभावरी - सम्राट् ! शान्त हों ।

विक्रमादित्य- अयोग्य व्यक्ति कभी शान्त नहीं हो सकता। मैं अयोग्य हूँ। कालिदास ने व्यर्थ ही मेरी प्रशंसा की है। मुझे पहचानने में महाकवि ने भी भूल की ।

विभावरी - नहीं प्रभो, मैंने आपको कष्ट पहुँचाने में भूल की है।

विक्रमादित्य - नहीं, मैं विक्रमादित्य नाम का परित्याग करूँगा। मेरे लिए केवल यही मार्ग है, केवल यही। किन्तु इसके पूर्व मैं नारी के सम्मान की पूर्ण व्यवस्था कर जाऊँगा। हाँ, तुम्हारा अपराधी बाहर है ? मैं उस नर-पिचाश को देखना चाहता हूँ जो अपने छद्मवेश में नारियो का अपमान करता फिरता है; जो पुरुष होकर अपने पुरुषत्व को नारी के वस्त्रों में छिपाए हुए है; जिसने विक्रमादित्य की सत्ता को विला-सियों की श्रृंगार-शाला समझ रखा है।
(द्वार के समीप पहुँचकर घण्टे पर चोट करते हैं, फिर लौटकर विभावरी से) 
तुम्हें मेरे न्याय में अधिक विश्वास है ! मैं आज एकाकी न्याय करूँगा। न्याय-सभा का सारा अधिकार अपने बाहु-बल में केन्द्रित करके अपराधी को कठोर दण्ड दूंगा । (प्रहरी का प्रवेश; वह अपना भाला झुकाकर प्रणाम करता है ।)

विक्रमादित्य- प्रहरी, बाहर जो बन्दिनी द्वार-रक्षिका के अधिकार में है, उसे यहाँ उपस्थित होने की आज्ञा सुनाओ ।

प्रहरी - जो आज्ञा । (प्रणाम करके प्रस्थान)

विक्रमादित्य - (विभावरी से) तुम मेरा न्याय देखना चाहती हो ? किन्तु सुनो विभावरी, मैं ऐसी नारी से घृणा करता हूँ जो अपना सम्मान स्वयं सुरक्षित नहीं रख सकती। नदी पहाड़ से कहे कि तुम मेरे लिए किनारा बना दो, बिजली बादल से कहे कि मुझे तड़पना सिखला दो, और नारी राजा से कहे कि मेरा न्याय कर दो ! नारी, भारतवर्ष को संसार में लज्जित होने से बचाओ, विदेशियों से पद-दलित होने पर भी देश की मर्यादा सुरक्षित रहने दो ।

[द्वार-रक्षिका का अभियुक्त (आयु 24 वर्ष) के साथ प्रवेश । द्वार रक्षिका श्वेत वस्त्र धारण किये हुए है। काले रेशम का कटिबन्ध । कबरी में पुष्प-श्रृंगार और हाथ में शूल। अभियुक्त पाटल रंग का उत्तरीय और नीले रंग का कटिबन्ध पहने है। गले में स्वर्ण-माला । केशों में कुन्द-पुष्प । माथे में स्वस्तिक-तिलक । हाथों में पुष्प-वलय और पैरों में नूपुर धारण किए हुये है। दोनों का अभिवादन । द्वार-रक्षिका अभियुक्त को सामने उपस्थित करके द्वार पर जाकर खड़ी हो जाती है।]

विक्रमादित्य - (द्वार-रक्षिका से) तुम बाहर मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा करो ।

द्वार-रक्षिका - (सिर झुकाकर ) जो आज्ञा । (प्रस्थान)

विक्रमादित्य- (अभियुक्त को गहरी दृष्टि से देखकर विभावरी से) यही तुम्हारा अभियुक्त है ?

विभावरी - (उद्योग से) सम्राट, यही अभियुक्त है। इसी ने मेरा अपमान किया है, यही वह दुष्ट है, यही वह छद्मवेशी है जिसने...

विक्रमादित्य - (हाथ बढ़ाकर) रुको विभावरी, तुम मेरे न्याय-कक्ष में हो। (अभियुक्त से) अभियुक्त, तुम विक्रमादित्य की परीक्षा लेना चाहते हो कि वह अपनी व्यवस्था में सतर्क है या नहीं ? छद्मवेशी अभि-युक्त, तुम नारी-वेश में पुरुषत्व का अपमान और नारीत्व की अवहेलना करने वाले कौन हो ?

अभियुक्त- (हिचकते हए) सम्राट् !

विक्रमादित्य - (तीव्रता से) तुम्हारा नाम क्या है ?

अभियुक्त - (रुकते हुए शब्दों में) सम्राट्, मैं मैं पुरुष हूँ ।

विक्रमादित्य - मैं जानता हूँ कि तुम पुरुष हो - पुरुषत्व को लज्जित करने वाले पुरुष । तुम्हारा क्या नाम है ? विक्रमादित्य के सामने तुम असत्य भाषण नहीं कर सकोगे। मेरे अधिकार में अग्नि है, (तलवार पर हाथ रखकर) 'अपराजित' की तीक्ष्ण घार है और बधिक का तीक्ष्ण कृपाण । सत्य और धर्म के सोपान पर सुसज्जित पवित्र न्याय के सामने अपने नाम के अक्षर दुहराओ ।

अभियुक्त - (विह्वल होकर) सम्राट् सम्राट् मुझे क्षमा करें... मैं स्त्री हूँ।

विक्रमादित्य - तुम स्त्री हो ? यह तो सभी देखने वाले जान सकते हैं, किन्तु मैं तुम्हारे पुरुषत्व की परिभाषा जानना चाहता हूँ ।

अभियुक्त - सम्राट्, मैं स्त्री हूँ। मेरा नाम पुष्पिका है।

विभावरी - (तीव्रता से) यह झूठ बोलता है, इसका यह नाम नहीं है।

विक्रमादित्य - (मुस्कराकर) नाम तो बहुत सुन्दर है, किन्तु तुम्हारा वास्तविक नाम क्या है ? तुम विक्रमादित्य के न्याय के सामने हो, असत्य भाषण नहीं करोगे ।

अभियुक्त - सम्राट्, मैं क्या कहूँ, मेरी समझ में नहीं आता हाँ, मैं पुरुष हूँ।

विक्रमादित्य - दण्ड के भय से उद्भ्रान्त मत बनो अभियुक्त ! भगवान् महाकालेश्वर की आन पर तुम असत्य भाषण नहीं करोगे ।

अभियुक्त - सम्राट् के सामने यह साहस किसी का नहीं हो सकता ।

विक्रमादित्य - अभियोग कहता है कि तुम पुरुष हो। तुमने विभावरी का अपमान किया है। क्या यह सच है ?

अभियुक्त- हाँ सम्राट्, यह सच है। (रुककर) नहीं-नहीं, यह सत्य नहीं है।

विक्रमादित्य - (तीक्ष्णता से) स्थिर रहो अभियुक्त, तुम कहाँ के निवासी हो ?

अभियुक्त - सम्राट्, मैं उज्जयिनी में निवास करती हूँ।

विक्रमादित्य - (दृढ़ता से) तो तुम स्त्री हो ? अभियुक्त, असत्य भाषण करने पर कठोर दण्ड मिलेगा। अपनी वास्तविकता स्वीकार करो।

अभियुक्त - सम्राट्, मेरा नाम पुष्पिका है। मैं उज्जयिनी की निवासिनी हूँ।

विक्रमादित्य- इसका प्रमाण ?

अभियुक्त - मैं सम्राट् के राज्यारोहण के समय उपस्थित थी । उस समय सम्राट् ने उज्जयिनी की प्रत्येक नारी को जो स्वर्ण मुद्राएँ दी थीं, वे मेरे कण्ठहार में अब तक सुसज्जित हैं। देखिए । 
(अपना कण्ठहार दिखलाती है।)

विक्रमादित्य- किन्तु वे मुद्राएँ तुम्हारे द्वारा चुराई भी तो जा सकती हैं ?

अभियुक्त - सम्राट्, उज्जयिनी की प्रत्येक नारी आपकी मुद्रा को गौरव का चिह्न समझती है। वह उसे चोरी नहीं होने दे सकती और सम्राट्, उज्जयिनी में चोरों का निवास नहीं है।

विक्रमादित्य - मैं यह बात सुनकर प्रसन्न हूँ, किन्तु तुम पर श्रभि-योग है कि तुम पुरुष हो। क्या तुम पुरुष हो ?

अभियुक्त - (दृढ़ता से) सम्राट्, मैं पुरुष नहीं हूँ।

(विभावरी काँप जाती है।)

विक्रमादित्य - विभावरी, तुम काँप उठीं, इतना क्रोध करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अभी निर्णय करता हूँ। (अभियुक्त से) अभि-युक्त, क्या मैं प्रहरी को आज्ञा दूं कि वह तुम्हारा वेश-विन्यास परिवर्तित करे ?

अभियुक्त - सम्राट्, उज्जयिनी की नारी को प्रहरी द्वारा अपमानित होने से रोकने की कृपा कीजिए ।

विक्रमादित्य- क्या तुम पुरुष नहीं हो, अभियुक्त ?

अभियुक्त- नहीं सम्राट्, मैं वचन दे चुकी हूँ कि अपने सम्राट् के सामने असत्य भाषण नहीं करूँगी ।

विक्रमादित्य - (विभावरी से) विभावरी, क्या तुम्हारे कहने से अभियुक्त स्वीकार करेगा कि वह पुरुष है।

विभावरी - (अभियुक्त की ओर दृढ़ता से देखकर) अभियुक्त, तुम पुरुष हो, तुम्हारे स्पर्श में नारी का भाव नहीं था। तुमने मुझसे स्वीकार किया था कि तुम सम्राट् के सामने पुरुषत्व स्वीकार करोगे। मेरी लज्जा के लिए स्वीकार करो, अपने वचन की पूति के लिए स्वीकार करो । (अभियुक्त मौन है।) देखो अभियुक्त, तुम चुप क्यों हो ? तुम स्वीकार क्यों नहीं करते ?

विक्रमादित्य - (विभावरी से) तुम्हारा कथन भी रहस्यपूर्ण है, विभावरी !

विभावरी- कोई रहस्य नहीं सम्राट् ! (अभियुक्त से) अभियुक्त, मैं निश्चयपूर्वक कहती हूँ कि तुम पुरुष हो। मेरी ओर देखकर कहो कि मैं पुरुष हूँ।

अभियुक्त - (विभावरी को ओर देखकर) अच्छा तो मैं पुरुष हूँ।

विक्रमादित्य - (क्रुद्ध होकर 'अपराजित' म्यान से निकालकर) सावधान, तुम सत्य से खिलवाड़ कर रहे हो अभियुक्त ! राज-मर्यादा का अपमान करने के कारण तुम्हें कठोर दण्ड दिया जाएगा। ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर तुम अंजलि के जल से अपनी रक्षा करना चाहते हो (जोर से) प्रहरी !

अभियुक्त - (घुटने टेककर) सम्राट्, क्षमा करें। मैं अपराधिनी हूँ। मैं आपकी करुणा का दान चाहती हूँ। (प्रहरी का प्रवेश; वह प्रणाम करता है।)

विक्रमादित्य - (अभियुक्त से) तो तुम पुरुष नहीं हो ? अभी विभावरी की ओर देखकर तुमने कहा कि मैं पुरुष हूँ।

अभियुक्त - मैं स्त्री हूँ। अपने सम्राट् के सामने असत्य भाषण नहीं कर सकती ।

विक्रमादित्य- इसमें कुछ रहस्य है। अच्छा तुम स्त्री ही सही ।
(अकस्मात् दूसरी ओर नेपथ्य में देखकर) 
ओह इतना भयानक सर्प... ( प्रहरी उस ओर दौड़ता है; अभियुक्ता भागकर सिहासन के पीछे छिप जाती है ।)

विक्रमादित्य - अभियुक्ता वास्तव में स्त्री है; सर्प न होते हुए भी सर्प के नाम से वह विचलित हो गई। पुरुषों का यह लक्षण नहीं है। (विभावरी की ओर देखकर) तुम विचलित नहीं हुईं ? (खड्ङ्ग म्यान में रखते हैं।)

विभावरी - मैं साहसी हूँ, सम्राट् !

अभियुक्त - (आगे बढ़कर) सम्राट्, क्षमा-दान करें। विभावरी पुरुष है ।

विक्रमादित्य- ओह, यह रहस्य ! मैं भी अनुमान करता हूँ, विभावरी पुरुष है।

विभावरी - पुष्पिके, तुमने विश्वासघात किया ! (अभियुक्त की ओर दृष्टि करके ।)

पुष्पिका- क्षमा हो राजकुमार, प्रयत्न करने पर भी मैं सम्राट् के सामने असत्य भाषण नहीं कर सकी ।

विक्रमादित्य- (साश्चर्य) राजकुमार ! 

पुष्पिका - सम्राट्, क्षमा की भिक्षा मांगते हुए निवेदन करती हूँ कि यह विभावरी शक-राजकुमार क्षत्रप भूमक है।

विक्रमादित्य - (आश्चर्य और क्रोध से) शक राजकुमार भूमक !
(तलवार पर हाथ रखते हुए) 
बोलो राजकुमार भूमक, तुम सौराष्ट्र के युद्ध में कहाँ रहे? क्या इसी वेश में विदिशा की नारियों के बीच छिपे हुए थे ? तुम विभावरी हो ? क्यों कायर राजकुमार ? तुम्हें अपनी माता का स्तन्य लज्जित करते हुए संकोच नहीं हुआ ? स्त्री-वेश में तुम्हें अपने पुरुषत्व को कलंकित करते हुए क्षोभ नहीं हुआ ? और फिर तुम्हीं अभि-योग लाए थे ? स्वय अपराधी होते हुए अभियोग लगाने का साहस ! राज-मर्यादा में तुम्हें असत्य का अभिनय आत्म-हत्या करने से अच्छा ज्ञात हुआ ? कायरता की प्रतिमूर्ति राजकुमार भूमक !

भूमक - मैं कायर नहीं हूँ, सम्राट् !

विक्रमादित्य - तुम कायर नहीं हो ? तुम इतने तुच्छ हो कि तुम्हें आर्य-नारी बनने की योग्यता भी नहीं आई! आर्य-नारी ने रोदन किया ! उसके कण्ठ की विकृति हुई ! अपना पुरुष-स्वर छिपाने के लिए कण्ठ की विकृति ! उसने अपमान सहा, शस्त्र का प्रयोग नहीं किया, वह सम्मान के प्रतिशोध में सम्राट् के सामने अभियोगिनी बनी और उसे अभियोग के स्पष्ट करने में लज्जा हुई! ये सब क्या आर्य-नारियों के लक्षण हैं ? मुझे पहले ही सन्देह होने लगा था। शकों में आर्य-नारियों का धर्म पहचानने की क्षमता कहाँ ? तुम शक राजकुमार भूमक हो, तुम इन बातों को क्या समझो ? तुम केवल स्त्री-वेश धारण करना जानते हो ।

भूमक- सम्राट्, आप मेरा अपमान न कीजिए । स्त्री-वेश मैंने अपनी इच्छा से धारण किया। मैं कायर नहीं हूँ। यदि आपकी इच्छा युद्ध करने की है तो मेरे लिए भी एक तलवार लाने की आज्ञा दीजिए । मैं जानता हूँ कि मैं आप पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता, किन्तु शक राजकुमार मरने से डरता भी नहीं ।

विक्रमादित्य - (मुस्कराकर) मैं यह सुनकर प्रसन्न हूँ। (घण्टे पर चोट करते हैं।) किन्तु विभावरी और भूमक में क्या अन्तर है, यह मैं जानना चाहता हूँ। यह सब काण्ड रहस्य के रूप में मेरे सामने क्यों उपस्थित किया गया ? स्त्री और पुरुष, फिर पुरुष और स्त्री। मेरे राज्य में इस इन्द्रजाल के लिए स्थान नहीं है।
(प्रहरी का प्रवेश)

प्रहरी - (प्रणाम करके) सम्राट्, कोई सर्प नहीं दीख पड़ा ।

विक्रमादित्य- यह मैं जानता हूँ। (विभावरी की ओर संकेत करते हुए) इस स्त्री को शस्त्रागार में ले जाकर इसे सैनिक का वस्त्र-विन्यास दो और साथ ही इसकी रुचि के अनुसार एक तलवार भी ।

प्रहरी- जो आज्ञा ।

विक्रमादित्य- स्त्री-वेश में मेरे समक्ष तुम अपने पुरुषत्व को अधिक देर तक लज्जित मत करो क्षत्रप राजकुमार !
(भूमक का सैनिक के साथ प्रस्थान)

विक्रमादित्य - (घूमकर पुष्पिका से) पुष्पिके, जो पुरुष था वह स्त्री रूप में आया और जिसमें पुरुष की कल्पना थी वह स्त्री ही निकली । यह सब मेरे सामने किस षड्यन्त्र का रूप है ?

पुष्पिका - सम्राट् क्षमा करें। यह मेरी व्यक्तिगत जीवन-कथा है। परिस्थितवश मुझे यह कार्य करना पड़ा। मैं लाचार थी।

विक्रमादित्य- तो तुम इस घटना-चक्र की प्रधान पात्री हो ?

पुष्पिका- सम्राट्, मैं प्रधान पात्री नहीं हूँ।

विक्रमादित्य- तुम प्रधान पात्री नहीं हो ? तुमने यह क्यों कहा कि मैं पुरुष हूँ ?

पुष्पिका- उपकार-ऋण से मुक्त होने के लिए, सम्राट् !

विक्रमादित्य- उपकार-ऋण ? किसके उपकार-ऋण से मुक्त होने के लिए ?

पुष्पिका - राजकुमार भूमक ने मेरे प्रति उपकार किया था ।

विक्रमादित्य- कैसा उपकार ?

पुष्पिका- सम्राट्, मैं उज्जयिनी की निवासिनी हूँ। दो वर्ष पूर्व मैं एक कार्य से गुर्जर चली गई थी। अकस्मात् शकों ने गुर्जर पर आक्रमण किया । दुर्भाग्य से मैं भी शकों के हाथों में पड़ गई। जब अन्य बन्दियों के साथ मैं वध-स्थान को ले जाई जा रही थी, उस समय एकाएक इस शक राजकुमार ने आकर मेरी रक्षा की और मुझे स्वतन्त्र किया ।

विकमादित्य- तुम पर ही यह कृपा क्यों की ?

पुष्पिका - मैं नहीं जानती, सम्राट् !

विक्रमादित्य - सम्भवतः तुम्हारे सौन्दर्य के आकर्षण ने उससे यह कार्य कराया हो ।

पुष्पिका- जो भी हो, सम्राट् ! किन्तु उसने मेरे आत्म-सम्मान पर आँच नहीं आने दी और साथ ही मुझे जीवन-दान दिया। सम्राट्, मुझे इतने बड़े उपकार का बदला देना था ।

विक्रमादित्य- तो क्या उपकार का बदला तुम अन्याय-रूप से देतीं ?

पुष्पिका - क्षमा कीजिए, सम्राट् ! राजकुमार भूमक ने इसी बात की याचना की थी।

विक्रमादित्य- और इस क्षत्रप-राजकुमार ने स्त्री-वेश क्यों धारण किया ?

पुष्पिका - सम्राट्, जब आपने मालवा, गुर्जर और सौराष्ट्र से शकों को निर्वासित किया तो मेरे ऊपर अनुग्रह रखने वाले क्षत्रप को गुर्जर छोड़ने में कष्ट हुआ । उसने गुर्जर ही में रहना निश्चय किया, किन्तु पुरुष-वेश में रहना उसके जीवन के लिए संकट का कारण होता, इसलिए उसने स्त्री-वेश रखकर रहने में ही अपनी कुशल समझी ।

विक्रमादित्य - फिर वह गुर्जर ही में क्यों नहीं रहा ?

पुष्पिका - सम्राट्, दुर्भाग्य से गुर्जर में लोगों की सन्देह-दृष्टि उस पर पड़ ही गई। इस समय मुझे उज्जयिनी भी आना था। उसने मुझसे प्रार्थना की कि वह भी मेरे साथ उज्जयिनी चले। मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार की ।

विक्रमादित्य- क्या तुम उससे प्रेम करती हो ?

पुष्पिका- सम्राट्, उपकार का बदला देना प्रेम करना नहीं कहा जा सकता ।

विक्रमादित्य - क्या वह तुमसे प्रेम करता है ?

पुष्पिका- मैं कह नहीं सकती, सम्राट् ! किन्तु इस प्रकार के व्यवहार की मैंने सदैव अवहेलना की है। इस समय अधिक-से-अधिक वह मेरा भाई कहा जा सकता है।

विक्रमादित्य - यह सुनकर मैं प्रसन्न हूँ, किन्तु छद्मवेश रखने का अपराध करके भी उस राजकुमार को उज्जयिनी में आते हुए भय नहीं हुआ ?

पुष्पिका - उसे मेरे आश्रय का सबसे बड़ा बल था, सम्राट् ! वह समझता था कि मैं उसकी पूर्ण रक्षा कर सकूंगी ।

विक्रमादित्य - जो तुम राज्य के समक्ष अपराधिनी होते हुए भी उसकी रक्षा नहीं कर सकीं ?

पुष्पिका - आप रक्षा कर सकते हैं, सम्राट् !

विक्रमादित्य - तुम जानती हो पुष्पिके, शकों को मैं एक ही दण्ड दिया करता हूँ और वह है प्राण-दण्ड। किन्तु खेद है कि युद्ध में इस क्षत्रप ने मेरा सामना नहीं किया। फिर भी इससे उसके दण्ड की व्यवस्था में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती । अभी एक बात तुम्हें और स्पष्ट करनी है। वह यह कि स्वयं छद्मवेश में उपस्थित होकर और तुम पर अभियोग लगाकर उसने अपने किस कार्य की पूति करनी चाही ?

पुष्पिका- सम्राट्, कुछ ही दिनों में यहाँ उसे आपके आतंक और मर्यादापूर्ण शासन का ज्ञान हो गया। उसे भय था कि वह किसी समय भी न्याय-सभा के सामने उपस्थित कर दिया जाएगा। अतः उसे उज्जयिनी की प्रत्येक दिशा में सम्राट् विक्रमादित्य का कृपाण दीखने लगा। उसने निश्चय किया कि वह शीघ्र ही कपिशा चला जाएगा, किन्तु मार्ग में उसे प्राणों का भय था, इसलिए उसने सैनिकों के संरक्षण में जाना ही उचित समझा। इसी बात के लिए उसे इस अभियोग की कल्पना करनी पड़ी ।

विक्रमादित्य - (सिर हिलाकर) ठीक

पुष्पिका - और सम्राट्, राज्य का यह नियम तो आपने निर्धारित कर दिया है कि नारी के अपमान का दण्ड देश-निर्वासन है। मैं उस दण्ड के अनुसार निर्वासित होती, क्योंकि मैं स्वीकार करती कि मैं पुरुष हूँ। मेरे दण्डित होने पर वह विभावरी-रूप में आपसे यह प्रार्थना भी करता कि वह स्वयं पदाघात कर मुझे राज्य की सीमा से बाहर करता । इस-लिए वह भी मेरे साथ-ही-साथ सैनिकों के संरक्षण में सीमा तक पहुँच जाता और सीमा पर पहुँचकर वह आपके राज्य से निकल भागता ।

विक्रमादित्य - यह रहस्य है !

पुष्पिका- यही कारण है कि उसने मेरी आँखों में आँखें डालकर मुझसे अनुरोध किया था कि मैं आपके सामने यह स्वीकार कर लूं कि मैं पुरुष हूँ।

विक्रमादित्य- किन्तु, इससे अच्छा क्या यह न होता कि वह स्वयं किसी स्त्री को अपमानित करके निर्वासन का दण्ड प्राप्त करता ?

पुष्पिका- सत्य है सम्राट्, किन्तु आपसे प्राण-दान पाकर भी उसे भय था कि वह मार्ग में ही किसी सैनिक द्वारा न मार दिया जाए ।

विक्रमादित्य- तो इस अभियोग में तुम तो निर्वासित हो ही जातीं।

पुष्पिका - सम्राट्, एक उपकारी के लिए मैं यह भी करती, किन्तु बाद में मैं पुनः उज्जयिनी लौट आती, आपकी मुद्राओं से सुसज्जित अपना कण्ठहार दिखलाकर ।

विक्रमादित्य- तो तुमने अपराधी को छिपाकर और उसकी कूटनीति में भाग लेकर राज-द्रोह किया है। तुम दण्ड की अधिकारिणी हो ।

पुष्पिका - सम्राट् मैं दण्डित होने को प्रस्तुत हैं, किन्तु अपने ऊपर अनन्त उपकार करने वाले शक राजकुमार की केवल एक इच्छा की पूति करना मैंने अपना धर्म समझा ।

विक्रमादित्य - किन्तु तुम जानती हो कि शकों और आर्यों का परस्पर क्या सम्बन्ध है ? शकों ने आर्यों पर कितने अत्याचार किये हैं ? उन्होंने ब्राह्मणों का वध किया है। और वर्णाश्रम धर्म को जड़-मूल से उखाड़ने की चेष्टा की है। क्या शहानुशाही क्षत्रपों के शासन से तुम अपरिचित हो ?

पुष्पिका- नहीं सम्राट्, मुझे शकों के अत्याचार की कथा ज्ञात है, किन्तु शक राजकुमार भूमक बहुत दयावान् है। वह कोमल हृदय है, वह न्यायी है; अन्यथा वह मुझे मुक्त क्यों करता ? वह मेरे सम्मान की रक्षा क्यों करता ? वह जाति से शक है, किन्तु अपने विश्वास से वह पूर्ण आर्य है। जैन धर्म में उसका पूर्ण विश्वास है। वह हिंसा का विरोधी है, वह शक होकर भी शाकाहारी है।

विक्रमादित्य - तुम इस वक्तव्य से उसे निरपराध सिद्ध नहीं कर सकतीं। यदि आर्य-नारी की रक्षा के कारण उसे क्षमा भी कर दूँ तो कपटपूर्ण अभियोग के लिए उसे दण्डित तो करूँगा ही, और साथ ही तुम्हें भी ।

पुष्पिका- सम्राट्, मुझे दण्ड दीजिए, किन्तु मुझ पर उपकार करने वाले क्षत्रप-राजकुमार को क्षमा कर दीजिए ।

विक्रमादित्य - वह शक-क्षत्रप होने के कारण ही दण्ड का अधिकारी है। शासन का न्याय शक-क्षत्रप को शक्तिशाली नहीं रहने देगा । शकों ने जिस प्रकार आर्य-संस्कृति को कुचलने की चेष्टा की है उसके लिए उन्हें अनेक परम्पराओं तक प्रायश्चित की अग्नि में जलना होगा। फिर विक्रमादित्य के सामने आर्य-धर्म का विद्रोही संसार का सबसे बड़ा अपराधी है।

पुष्पिका- क्या राजकुमार किसी भाँति भी क्षमा नहीं किया जा सकेगा ?

विक्रमादित्य - मैं उसे क्षमा कर भी सकता हूँ, किन्तु केवल एक बात पर और वह यह कि वह आर्य-धर्म स्वीकार करे और सारे देश में उसका प्रचार करे। क्या वह यह प्रायश्चित स्वीकार करेगा ?

पुष्पिका- सम्राट्, मुझे आशा नहीं है।

विक्रमादित्य - तब वह अवश्य दण्डित होगा। उसने राज-धर्म की अवहेलना की है, उसने राज्य के प्रति षड्यन्त्र किया है, उसने एक झूठे अभियोग से अपनी मुक्ति की कुटिल युक्ति सोची है।

पुष्पिका - (शिथिल होकर) सम्राट् की जो इच्छा !

विक्रमादित्य - और सुनो पुष्पिके, तुम्हारे दण्ड की भी व्यवस्था है, और यद्यपि सत्य बोलकर और राज-धर्म की मर्यादा मानकर तुमने अपने अपराध की गुरुता कम कर ली है, फिर भी तुम्हें शक क्षत्रप के साथ गुप्त अभिसन्धि करने के कारण दो मास के कारावास का दण्ड मिलेगा ।

पुष्पिका- सम्राट्, मेरे कारावास का दण्ड बढ़ा दीजिए, किन्तु मेरे उपकारी क्षत्रप को क्षमा कर दीजिए ।

विक्रमादित्य - यह असम्भव है। राजनीति स्त्रियों की विनयशीलता से तरल नहीं हुआ करती। 
(प्रहरी के साथ भूमक सैनिक-वेष में आता है। उसके हाथ में तलवार है। वह एक सुन्दर शरीर का युवक दृष्टिगत होता है।)

विक्रमादित्य - (प्रहरी से) प्रहरी, तुम यहीं द्वार पर बाहर रहो, तुम्हारी आवश्यकता पड़ेगी ।

प्रहरी - (सिर झुकाकर ) जो आज्ञा । (प्रस्थान)

विक्रमादित्य - (भूमक से) आओ क्षत्रप-राजकुमार भूमक, मैं तुम्हारी गुप्त अभिसन्धि की सब बातें जान चुका हूँ। तुमने राज-मर्यादा का अप-मान भी किया है। कपटपूर्ण अभियोग लाकर तुमने न्याय को धोखा देने की चेष्टा भी की है। तुम कुछ और कहना चाहते हो ?

भूमक - जब उज्जयिनी की नारी ने भी मेरे साथ विश्वासघात किया तब मुझे और कुछ नहीं कहना । 

विक्रमादित्य- तुम इसे विश्वासघात क्यों कहते हो क्षत्रप ? यदि उसने तुम्हारे पवित्र विश्वास की अवहेलना की होती तो वह निश्चय ही विश्वासघातिनी होती, किन्तु उसने सत्यासत्य का निर्णय करते हुए पवित्र राजधर्म की मर्यादा रखी। क्या इस आचरण के लिए तुम उसकी सराहना नहीं करोगे ?

भूमक- सम्राट्, मैंने स्वयं अपने दल के सैनिकों से उसकी रक्षा की थी। मैं चाहता था कि वह भी आर्य-सम्राट् से मेरी रक्षा करती।

विक्रमादित्य - तो तुम उपकार का प्रतिदान चाहते हो ?

भूमक- नहीं, संकटकाल में केवल आत्म-रक्षा, और कुछ नहीं।

विक्रमादित्य - किन्तु यह आत्म-रक्षा कपटपूर्ण अभियोग से नही हो सकती । तुम द्वन्द्व के लिए प्रस्तुत होकर आए हो ? (तलवार हाथ में तोलते हैं।)

भूमक - मैं प्रस्तुत होकर आया हूँ सम्राट् ! 
(तलवार हाय में सँभालता है।)

विक्रमादित्य - किन्तु तुम्हें युद्ध-दान नहीं मिलेगा ।

भूमक- मैं कारण जानना चाहता हूँ ।

विक्रमादित्य - कारण यह है कि स्त्री-वेश धारण कर लेने वाले व्यक्ति मेरे द्वन्द्व के योग्य नहीं रह जाते। मेरे सामने विभावरी का रूप है, मैं उस पर कृपाण नहीं रख सकूंगा। तुम्हारे लिए बधिक का कृपाण हो सकता है, विक्रमादित्य का 'अपराजित' नहीं। तुम तलवार पृथ्वी पर रख दो।

भूमक - किन्तु मैं द्वन्द्व चाहता हूँ ।

विक्रमादित्य - (तीव्र स्वर में) तुम न्याय-सभा के सामने हो, क्षत्रप !

भूमक - (लज्जा और क्रोध से तलवार फेंक देता है।)

विक्रमादित्य- न्याय की आज्ञा पालन करने के कारण मैं प्रसन्न हुआ । भूमक, तुमने स्त्री-वेश धारण करके राज्य दृष्टि के प्रति छल किया, झूठा अभियोग लाकर तुमने राज्य-मर्यादा का अपमान किया इसलिए तुम कठोर दण्ड के पात्र हो। किन्तु भूमक किसी समय तुमने एक आर्य-नारी की प्राण-रक्षा की थी, इस कारण तुम्हें आंशिक रूप से क्षमा भी दी जा सकती है, यदि तुम राज्य के नियम के अनुसार प्राय-श्चित करो। तुम्हें प्रायश्चित करना स्वीकार है ?

भूमक- मुझे किसी प्रकार का भी प्रायश्चित करना स्वीकार नहीं है।

विक्रमादित्य- फिर झूठे अभियोग के लिए दण्ड निश्चित है।

भूमक- जो आपके समक्ष भूठा अभियोग है वह मेरे समक्ष मेरी राजनीति है।

विक्रमादित्य- किन्तु मैं तुम्हें अपनी राजनीति से दण्ड दे रहा हूं। सम्राट् के साथ कपट करने का दण्ड तुम जानते हो, भूमक?

भूमक- सम्राट्, मैंने कभी जानने की इच्छा नहीं की।

विक्रमादित्य- तो अब जान लो। तुम्हारे दोनों हाथ काट लिये जाएँगे ।

पुष्पिका - (शीघ्रता से घुटने टेककर) क्षमा सम्राट्, क्षमा !

विक्रमादित्य - उठो पुष्पिके, उठो, तुम पहले से ही दण्डित हो । अब तुम्हें कुछ कहने का अधिकार नहीं है। (भूमक से) और भूमक, तुम्हारे दण्ड की व्यवस्था मैं इसी समय करूँगा ।
(पुष्पिका उठती है।)

भूमक- सम्राट्, मैं हर समय प्रस्तुत हूँ ।
(विक्रमादित्य घण्टे पर चोट करते हैं।)

विक्रमादित्य - भूमक, मुझे दुःख केवल यही है कि तुम्हारे हाथों के न रहने से मैं कभी तुम्हारा युद्ध-कौशल न देख सकूंगा, किन्तु कोई चिन्ता की बात नहीं। हाँ, अपने शेष जीवन में तुम यह प्रयत्न करना कि अगले जन्म में तुम्हारे दोनों हाथ जीवन-भर काम दे सकें ।
(प्रहरी का प्रवेश)

विक्रमादित्य - (प्रहरी से) प्रहरी, वधिक को शीघ्र यहाँ आने की आज्ञा सुनाओ । आज फिर भगवान् ज्योतिलिङ्ग महाकालेश्वर का रक्त से अभिषक होगा ।

प्रहरी - (सिर झुकाकर) जो आज्ञा ।

विक्रमादित्य- पुष्पिके, अपने उपकारी के प्रति जो कुछ भी श्रद्धा वाक्य कहना है मेरे सामने ही कह लो। मुझे खेद है कि तुम्हारी क्षमा-प्रार्थना मुझे अस्वीकार करनी पड़ी। किन्तु शासन का न्याय सर्वोपरि है। वह शकों के सम्बन्ध में क्रूर है और अपराधियों के सम्बन्ध में दृढ़ । वह तुम्हें अन्याय के समर्थन की आज्ञा नहीं देगा और (भूमक से) राजकुमार भूमक, मुझे खेद है कि तुम यहाँ एकाकी आये। यदि तुम्हारे कुछ साथी और होते तो पारस्परिक सहानुभूति में तुम लोगों का दुःख कुछ कम होता ।

भूमक- सम्राट्, मुझे अपने दुर्भाग्य की चिन्ता नहीं है।

विक्रमादित्य- ठीक है, तुम्हें सन्तोष होगा। अब हाथों से रहित होने पर तुम कपट करने के पाप से बचे रहोगे ।

भूमक- यदि राजनीति ही कपट हो तो मैं उसमें पाप नहीं समझता । फिर भी मैं अपमानित होकर जीवित नहीं रहना चाहता। आप वधिक को आज्ञा दें कि वह हाथों के बदले मेरा सिर काट दे ।

विक्रमादित्य- नहीं, आज्ञा नहीं दी जा सकती, विक्रमादित्य द्वन्द्व और रण-स्थल के अतिरिक्त किसी अन्य स्थल पर प्राण-दण्ड नहीं देता । मैं केवल तुम्हारे हाथ काटने की आज्ञा दे सकूंगा। फिर तुम्हारे खण्डित शरीर से मुझे अन्याय रोकने में भी सहायता मिल सकेगी। तुम दण्ड के प्रतीक बनकर इस प्रकार की न्याय-सभा करने के अवसर कम आने दोगे ।
(वधिक का प्रवेश । अर्ध-नग्न, भयानक शरीर, कमर में जाँघिया, हाथों में कड़े, बाल खुले हुए, माथे पर त्रिपुण्ड और हाथ में कृपारण । वह प्रणाम करता है।)

विक्रमादित्य- वधिक, तुम्हारे सामने यह शक अपराधी है। न्याय की आज्ञा है कि तुम इसके दोनों हाथ काट दो ।

पुष्पिका - (आगे बढ़कर, हाथ जोड़कर) सम्राट्, यदि आप राजकुमार को क्षमा नहीं करते तो मेरे भी दोनों हाथों के काटे जाने की आज्ञा दीजिए । अपने ऊपर उपकार करने वाले को दण्डित होता हुआ देखकर मेरी आत्मा तिरस्कार कर रही है। सम्राट्, मेरी कुछ प्रार्थना है।

विक्रमादित्य - (तीक्ष्ण स्वर में) अपने स्थान पर ही रहो पुष्पिका, तुम्हारा न्याय हो चुका है। न्याय के आदेश में परिवर्तन के लिए कोई स्थान नहीं है, जब तक कि अपराधी राज-विधान के अनुसार प्रायश्चित न करे । मैं अपनी ओर से एक बार फिर अवसर दे सकता हूँ। क्षत्रप, तुम प्रायश्चित करने के लिए प्रस्तुत हो ?

भूमक - (दृढ़ता से) नहीं ।

विक्रमादित्य - (वधिक से) वधिक, तुम अपना कार्य करो ।

वधिक - (भूमक से) अपराधी घुटने टेको ।
(भूमक घुटने टेकता है।)

वधिक- दोनों हाथ जोड़कर आगे बढ़ाओ । 
(भूमक दोनों हाथ जोड़कर आगे बढ़ाता है ।)

विक्रमादित्य- शक राजकुमार, इन हाथों से एक बार भगवान् ज्योतिलिङ्ग महाकालेश्वर को प्रणाम करो, फिर प्रणाम करने वाले ये हाथ नहीं रहेंगे ।

भूमक- सम्राट्, क्षमा करें, मैंने तीर्थकरों और शक-सम्राटों के अतिरिक्त किसी को प्रणाम नहीं किया ।

विक्रमादित्य - अब उन्हें दूसरे जन्म में प्रणाम करना । राजकुमार, अब तुम प्रस्तुत हो ?

भूमक- मैं प्रस्तुत हूँ, सम्राट् !

विक्रमादित्य - (वधिक से) वधिक, अब तुम भी प्रस्तुत हो जाओ ।

वधिक- जो आज्ञा । (वह अपना कृपाण उठाता है।)

विक्रमादित्य - तुम और कुछ कहना चाहते हो, क्षत्रप ?

भूमक- कुछ नहीं सम्राट्। मैं केवल यही दुःख लेकर संसार में रहूँगा कि विक्रमादित्य सम्राट् माँगने पर भी मुझे मृत्यु नहीं दे सके। मुझे एक दुःख और रहेगा कि अब हाथों के न रहने से मैं अपने सम्मान की रक्षा भी न कर सकूंगा ।

पुष्पिका - (गहरी साँस लेकर) और समय पड़ने पर इन हाथों से किसी नारी की रक्षा भी नहीं हो सकेगी ।

विक्रमादित्य - दो दुःख तुम्हारे और एक दुःख पुष्पिका का, तीन दुःख हुए । मैं इसके लिए आर्य-धर्म के तीन स्मारक बनवाऊँगा। और कुछ ? (कुछ रुककर) कुछ नहीं ? (वधिक से) वधिक, महाकालेश्वर का अभिषेक हो ।

[वधिक तलवार उठाकर वार करता है। पुष्पिका शीघ्रता से आगे बढ़ जाती है और उसके माथे में चोट लग जाती है। वह गिर पड़ती है। विक्रमादित्य शीघ्रता से बढ़कर उसके समीप पहुँचते हैं ।]

विक्रमादित्य - (वधिक से) वधिक, ठहरो । (वधिक सहमकर पीछे हट जाता है। गहरी साँस लेकर पुष्पिका से) पुष्पिके, यह तुमने क्या किया ?

पुष्पिका - (टूटे स्वर से) अपने उपकारी की रक्षा, सम्राट् !

भूमक - (उठकर) सम्राट्, मैं प्रायश्चित करने के लिए प्रस्तुत हूँ ।

विक्रमादित्य - (उठकर) क्षत्रप, यदि तुम पहले ही प्रायश्चित करने के लिए प्रस्तुत हो जाते तो पृष्पिका को चोट न लगती ।

भूमक- सम्राट्, मुझे आपके शासन में उज्जयिनी की नारी की महानता ज्ञात नहीं थी। मैं नहीं जानता था कि आपने अपने शासन का आदर्श इतना ऊँचा रखा है, जिसमें नारियाँ उपकार का बदला देने के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग तक कर सकती हैं।

विक्रमादित्य - तो तुम प्रायश्चित करने के लिए प्रस्तुत हो ?

भूमक- हाँ सम्राट्, मैं प्रस्तुत हूँ।

विक्रमादित्य - (वधिक से) वधिक तुम जा सकते हो । (वधिक का सिर झुकाकर प्रस्थान ।)

विक्रमादित्य - (भूमक से) भूमक, मुझे प्रसन्नता है कि तुम प्राय-श्चित करने के लिए तैयार हो। प्रायश्चित की पहली व्यवस्था यह है कि तुम पुष्पिका को अपनी बहन समझकर - यदि वह जीवित रही तो-उसकी शुश्रुषा का भार लोगे ?

भूमक - (सिर झुकाकर) स्वीकार है सम्राट् ! 
(पुष्पिका के सिर को अपने घुटने पर रखता है।)

विक्रमादित्य - प्रायश्चित की दूसरी व्यवस्था यह है कि तुम जैन-धर्म को छोड़कर आर्य-धर्म का पालन करोगे और उसका प्रचार सौराष्ट्र के समीपवर्ती प्रदेश में करोगे। स्वीकार है ?

भूमक- (सिर झुकाकर) स्वीकार है, सम्राट् !

विक्रमादित्य- गौ-ब्राह्मण की रक्षा करने का पुनीत कर्त्तव्य तुम्हारे जीवन का प्रथम कर्तव्य होगा। स्वीकार है ?

भूमक - (सिर झुकाकर) मैं स्वीकार करता हूँ, सम्राट् !

विक्रमादित्य- तो आज अपनी सारी प्रतिज्ञाओं को भगवान् महा-कालेश्वर के मन्दिर में अभिमन्त्रित करो ।

भूमक - मुझे स्वीकार है, सम्राट् ! पुष्पिका के महान् उत्सर्ग में आपके चरित्र-बल की श्रेष्ठता छिपी हुई है। सुगन्धित पुष्प का विकास वसन्त ही में होता है। आपके शासन में मैं अनुभव करता हूँ कि जैसे आर्य-धर्म का सूर्य अपनी उज्ज्वल और प्रखर रश्मियों से भारतीय गगन-मण्डल में चमक रहा है और उसके सामने छल का कोई बादल नहीं आ सकता । मैंने स्वयं अपनी आँखों से देख लिया कि आपके राज्य में कोई षड्यन्त्र सफल नहीं हो सकता। आज मुझे गौरव है कि मैं आपका सेवक और आर्य-धर्म का सच्चा अनुयायी हूँ ।

विक्रमादित्य - (हाथ उठाकर) तब तुम मुक्त हो क्षत्रप राजकुमार !

पुष्पिका - सम्राट् (टूटे स्वर में) मेरी प्रार्थना पूरी हुई... मैं कृतज्ञ हूँ । औ और मेरी एक प्रार्थना और है । आज की अमर घटना की स्मृति में आपका... संवत्..प्रचलित हो ।

भूमक- हाँ सम्राट्, अभी तक के मान्य युधिष्ठिर-संवत् के स्थान पर विक्रम संवत् का प्रचलन हो, यह मेरी भी प्रार्थना है।

विक्रमादित्य - (हाथ उठाकर ) तथास्तु ! पुष्पिके, तुम आदर्श नारी हो, तुम्हारी शुश्रूषा में राज्य की विशेष सहायता रहेगी। तुम्हारे आदर्श आचरण के कारण तुम्हारा अपराध भी क्षमा कर दिया गया ।

भूमक और पुष्पिका - (सम्मिलित स्वर में) सम्राट् विक्रमादित्य की जय हो !

(सम्राट् विक्रमादित्य अभय मुद्रा में हाथ उठाते हैं ।)

(परदा गिर जाता है ।)

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