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Showing posts from May, 2023

नौंवा गुण कर्तव्य

।। नौंवा गुण कर्तव्य ।। राजा भोज जैसे ही आगे बडते है नौंवी सिडी पर तभी कर्तव्य की देवी उन्हें रोकती है और कहती है राजन् रूकिए । राजा भोज - देवी में सम्राट विक्रमादित्य के कर्तव्य की कथा सुनाए । देवी - अवश्य एक समय की बात है जब अर्ध रात्री का समय था सभी लोग शांति से निद्रा में थे तभी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के न्याय का घंटा बच उठा । सैनिक - आचार्य जी यही वो बालक है जिसने न्याय माँगा है । वराहमिहिर जी - बालक न्याय का घंटा बजाने का अर्थ पता है । बालक - हाँ जानता हूं इसलिए बजाया । वराहमिहिर जी - यानी तुम्हारे साथ किसी ने अन्याय किया है किसने किया है अन्याय । बालक - क्या आप ही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है । वराहमिहिर जी - नहीं में सम्राट नही हूं में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का आचार्य हूं । बताओ मुझे क्या हुआ तुम्हारे साथ । बालक - नहीं में उन्हें ही बता पाऊंगा । वराहमिहिर जी - बालक सम्राट विक्रमादित्य अभी राज्य भ्रमण पर निकले है उनका कोई समय नही है की कब लौटे इसलिए तुम मुझे बताओ । बालक - यदि आप मेरी समस्या का समाधान कर सकते है तो सुनिए मेरी समस्या है मेरा जीवन । वराहमिहिर जी -...

दसवा गुण विवेकशीलता

 ।। दसवा गुण विवेकशीलता ।। राजा भोज जैसे ही दसवी सीडी पर चढते है एक देवी प्रकट होती है । राजा भोज उनसे कहते है देवी आप इस सिंहासन में किस गुण की प्रतिक है । देवी - राजन् में वो हूं जो हर समस्या का निवारण कर सकती है जिससे मनुष्य का सम्मान बढता है तो बताइए कौन हूं में । राजा भोज - देवी आप विवेक गुण की प्रतिक है । देवी - हां राजन् आपने सही कहा में विवेकशीलता की प्रतिक हूं , राजन् में आपको चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के विवेकशीलता के गुण की कथा सुनाती हूं । राजा भोज - हां देवी आप मुझे सम्राट विक्रमादित्य की विवेकशीलता के गुण की कथा सुनाए । देवी - तो सुनिए राजन् सम्राट विक्रमादित्य की विवेकशीलता का ऐसा उदाहरण जो संसार में कभी नही हुआ होगा । एक दिन सम्राट अपनी पत्नी महारानी चित्रलेखा को उनके मायके सिंघल द्वीप छोड कर वापस उज्जैनी लौटे । वराहमिहिर जी - सम्राट । सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम ब्राह्मण देव । वराहमिहिर जी - कल्याण हो सम्राट । सम्राट महारानी जी नही आए । सम्राट विक्रमादित्य - वे कुछ दिन वहां रूक कर आएंगी । वराहमिहिर जी - मायके का यही बंधन है । सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी...

ग्यारहवा गुण मित्रता

।। ग्यारहवा गुण मित्रता ।। महाराजा भोज - देवी आपको मेरा प्रणाम । देवी - राजन् में इस सिंहासन में मित्रता की प्रतिक हूं , सच्चा मित्र वहीं जो एक दूसरे के हर मुश्किल में काम आए इस संसार में सर्वश्रेष्ठ मित्र चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ही थे अगर उनकी मित्रता की कथा नही सुनी तो क्या सुनी उनकी मित्रता इस संसार में कभी ना भूलने वाली मित्रता थी में आपको उनकी एक कथा सुनाती हूं ।  राजा भोज - जी देवी । एक दिन को बात है जब सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन बत्तीसी पर बैठे थे तभी दो मित्र उनसे न्याय मांगने आए एक का नाम था कर्मचंद एक का नाम था और दूसरे का नाम था धर्मचंद । धर्मचंद - सम्राट यह मेरा मित्र है कर्मचंद और यह युवती इनकी पत्नी है मगर यह इन्हें अपनी पत्नी मान ही नही रहा है । सम्राट विक्रमादित्य - क्यों कर्मचंद आप इन्हें अपनी पत्नी क्यों नही मान रहे हो । कर्मचंद - सम्राट क्योंकि यह मेरी पत्नी नही धर्मचंद की पत्नी है और इन्ही के साथ ही इनका विवाह हुआ । दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते है यह इसकी पत्नी है यह इसकी पत्नी है । सम्राट विक्रमादित्य - शांत हो जाइए आप दोनों तुम दोनो में से ही किसी ने इन...