विक्रम बैताल || कहानी 604 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 4] अगली आठ कहानियां
विक्रम बैताल || कहानी 604 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 4] अगली आठ कहानियां
सिंहासन बत्तीसी की कहानी / The Thirty Two Tales of THE THRONE
चौथे भाग में आप सुनेंगे विक्रमादित्य के सिंहासन से संबंधित अगली आठ कहानियां।
25. विक्रमादित्य का करुण हृदय
राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :--
एक बार राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक महान ज्येतिषाचार्य पधारे, राजा ने उनका सत्कार किया और उत्सुक्ता वश पूछा की गृह नक्षत्र कैसे है?
ज्योतिषाचार्य कुछ गणना कर बोले हे राजन ! नक्षत्रों के हिसाब से अगले बारह वर्षो तक धरती पर वर्षा नहीं होगी।
राजा चिंतित होकर बोले इसे रोकने का कोई उपाय है आचार्य?
ज्येतिषाचार्य बोले राजन आपको वरुण देव को प्रसन्न करने के लिये अनुष्ठान करना होगा और इंद्र को प्रसन्न करने के लिए ब्राहमणो को भोज, दानादि करना होगा, राजा ने ऐसा ही किया परन्तु वर्षा नही हुई। राजा दुखी हो गए तभी आकाशवाणी हुई की जब तक 65 राक्षसियों को नर मांस से संतुष्ट नही किया जायेगा तब तक वर्षा नहीं होंगी।
राजन बोलें यदि एक जीवन के बलिदान से सम्पूर्ण जगत को जलामृत प्राप्त होता है तो इससे अधिक श्रेष्ठ क्या है ? वे तुरंत चण्डिका देवी के समक्ष तलवार लेकर प्राण त्यागने को तत्पर हो गए।
प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुई और बोली बोलो, वर मागों राजन।
राजा विक्रम बोले जलवृष्टि कर संसार के प्राणियों की रक्षा करे देवी। वर्षा हुई और धन धान्य से पृथ्वी लहलहा उठी।
पुतली बोली- हे राजन, इस सिंहासन पर आरूढ़ होने का वही अधिकारी है, जो ऐसे महान गुण का स्वामी हो।
26. गौ रक्षक राजा विक्रमादित्य
राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-
एक बार राजा विक्रमादित्य स्वर्ग में देवराज इंद्र की सभा में सम्मिलित थे, जहां अनेक देवता और गन्धर्व भी विद्धमान थे। सभा में चर्चा थी कि भू-मण्डल पर विक्रमादित्य से वीर और महान गुणों वाला कोई दूसरा मनुष्य नहीं है। तब क्यों न उनकी परीक्षा ली जाए।
इंद्र ने कामधेनु को विक्रम की परीक्षा लेने को कहा। कामधेनु ने भू-लोक को प्रस्थान किया। स्वर्ग से लौटते हुए विक्रम एक अरण्य में विश्राम के लिए रुके उन्होंने देखा कि वृद्ध गाय कीचड़ में फसी हुई है। वे उसे निकालने का प्रयत्न करने लगे परन्तु वृद्ध गाय कीचड़ से नही निकल सकी, सूर्यास्त हो गया, काले मेघ घिर आए, वर्षा होने लगी तभी एक बाघ भी वहां आ गया।
राजा विक्रम ने उस वृद्ध गाय को अपने वस्त्रों से ढक दिया और स्वयं नग्नावस्था में ही उसकी रक्षा करने लगे। अगले दिन सूर्योदय हुआ परन्तु राजन वही उस गाय की रक्षा में खड़े रहे।
राजा के दृढ़ निश्चय और करुण हृदय को देख कर कामधेनु बोली, राजन ! में तुमसे प्रसन्न हूँ। वर मांगो।
राजन बोले- देवी मेरी कोई इच्छा नहीं है। देवी कामधेनु बोली जब तक तुम हो, तब तक में तुम्हारे साथ तुम्हारी नगरी में ही रहूंगी।
राजन कामधेनु को लेकर अपने नगर की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्हें एक ब्राह्मण मिला और राजा से भोजन की याचना की। राजा विक्रमादित्य ने उसे कामधेनु गाय दान में दे दी।
पुतली बोली हे राजा भोज यदि ऐसी महानता और उदारता तुममे है, तब यह सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
27. विक्रमादित्य का समर्पण और साहस
राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-
एक बार जब महाराजा विक्रम भूमण्डल पर भ्रमण कर रहे थे तब उन्हें योगिनिपुर नामक स्थान दिखाई दिया जहां एक सुन्दर झील के किनारे महाकाली का अष्ट झरोखे युक्त भव्य मंदिर था। वे अनायास ही वहा रुके और तभी उन्होंने तीन भद्र पुरुषों को सुन्दर वेश भूषा में उस मंदिर से निकलते हुए देखा। राजन विस्मित होकर उन भद्र पुरुषों की प्रतीक्षा करने लगे।
सूर्यास्त तक उन भद्र पुरुषों में से एक वहां प्रकट हुआ परन्तु इस बार उनकी मुख मुद्रा मलिन दीन हीन और वेश भूषा दरिद्रता पूर्ण थी।
राजा द्वारा इसका कारण पूछने पर वह कहने लगा कि राजन यह मेरा भाग्य है। मैं एक जुआरी हूँ और बहुत अच्छा चौसर खेलया हूँ परन्तु मेरा भाग्य मुझसे रूठ गया है और मैं सब कुछ हार गया हूँ । राजन ! यदि आप मेरी मदद करे तो मुझे पुनः सौभाग्य प्राप्त हो सकता है।
तभी वहां दो भद्र पुरुष वार्तालाप करते हुए मंदिर में आए और कहने लगे कि यदि कोई नर अंगुलियों से अपना रक्त 'अष्ट भैरव' को चढ़ाए और गर्दन से रक्त 'कालिका' को चढ़ाए तो वे प्रसन्न होकर कोई भी वर दे सकते है।
ऐसा सुनते ही राजा विक्रम ने अपनी ८ उँगलियों से स्क्त अष्ट भैरव को और गर्दन से कालिका को रक्त चढ़ाया। देवी उनके समर्पण से प्रसन्न हुई और वर मांगने को कहा। राजा ने वर माँगा की इस जुआरी को हानि न हो। देवी ने वर दिया और राजा अपनी नगरी को लौट आए।
पुतली बोली हे राजा भोज यदि ऐसा साहस और समर्पण आप में है तो आप इस सिंहासन पर विराजमान हो सकते है।
28. विक्रमादित्य का समर्पण और साहस
राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-
एक बार एक अजनबी ने महाराजा विक्रमादित्य को अपनी कहानी सुनाई और कहने लगा, " हे राजन ! एक बार में रास्ता भटककर कोनितपुर नामक नगरी पहुंचा, इस नगर की देवी मासप्रिया है। यहाँ के लोग जब अपनी किसी कामना पूर्ति के लिए देवी की आराधना करते है। तब कामना पूर्ति होने पर देवी को प्रसन्न करने के लिए राहगीरों को पकड़कर नरबलि चढ़ा दी जाती है, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ परन्तु सौभाग्य से में बच निकला।
यह सुनने पर राजा विक्रमादित्य स्वंय उस नगरी की ओर चल पड़े और मंदिर में देवी के सम्मुख आराधना करने लगे। तभी उन्होंने ढोल नगाड़ो के साथ भीड़ को एक व्यक्ति की बलि चढ़ाने के लिए लाते हुए देखा। राजन करुणा से भरकर उस व्यक्ति के स्थान पर स्वयं अपनी बलि चढ़ाने को उद्धत हो गए और तलवार उठा कर अपना शीश काटने लगे।
देवी राजा के साहस से प्रसन्न होकर बोली राजन वर मांगो। राजा ने कहा, " देवी ! आप नरबलि स्वीकार न किया करे। देवी ने राजा को यह वर दिया और राजन अपनी नगरी को लौट गए।
पुतली बोली हे नरेश यदि ऐसा साहस आप में है, तो इस सिंहासन पर आपका स्वागत है।
29. विक्रमादित्य कि उदार दानवीरता
राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-
राजा विक्रमादित्य के समकालीन एक राजा था जिसका नाम वीरसेन था। उसके राजकवि ने राजा विक्रम के समक्ष आकर राजा वीरसेन की बहुत प्रशंशा करते हुए कहा कि राजा वीरसेन जितना महान कोई नहीं है। वे वसंत के महीने में एक करोड़ रुपये दान दे दिया करते है। वे एक गरीबी को दूर करने वाले राजा है।
यह सुनकर राजा विक्रम खुश हुए एवं उन्होंने अपने खजांची को निर्देशित किया कि वीरसेन के राजकवि को कोषालय तक लेकर जाये और तब तक धन प्रदान करें जब तक वह संतुष्ट न हो जाये।
निर्देशानुसार कार्य करके खजांची बोले कि राजा को उन तमाम खर्चे के बारे में सूचित कर दिया जाये जो दान के अतिरिक्त प्रजा के मनोरंजन आदि पर खर्च हुए।
यह कहते हुए खजांची ने हिसाब का एक कागज दिखाया जिसमे खर्च का आंकड़ा था “पचास करोड़" यह सारा खर्च केवल माघ महीने के सात दिनों का था।
इतना कह कर पुतली ने कहा है नरेश इस सिंहासन पर वही व्यक्ति बैठ सकता है जिसमे राजा विक्रमादित्य जैसी उदार दानवीरता हो।
30. विक्रमादित्य कि उदारता
राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-
एक बार एक जादूगर राजा विक्रम के समक्ष आया और बोला, 'हे नरेश ! मुझे अपनी कला का आपके समक्ष प्रदर्शन करने का मौका दिया जाये । राजा द्वारा आज्ञा प्राप्त होने पर जादूगर यह कह कर लौट गया की वह अपनी जादूगरी की बेजोड़ चाल दिखाने का सामान लेकर पुनः आएगा।
उसके जाते ही कीर्तिमान नामक एक और आदमी आया जिसके हाथ में तलवार व ढाल एंव उसकी पत्नी साथ थी। श्रद्धा प्रकट करते हुए उसने कहा देवताओ एवं देत्यो के बीच युद्ध छिड़ गया है और मुझे देवताओ द्वारा आपको बुलाने हेतु भेजा गया है परन्तु अब में देवताओ की मदद करने जाऊगा और चूंकी आप एक सच्चे राजा है, आप मेरे लौट आने तक मेरी पत्नी का ध्यान रखे में जल्द ही लौटूंगा।
यह कह कर वह स्वर्ग की ओर उड़ गया और कुछ ही पलो मे अदृश्य हो गया। उसे जाते हुए सभा में उपस्थित सभी लोगो ने देखा। कुछ ही क्षण बाद आसमान से चिल्लाने की आवाज आई। यहाँ, यहाँ, पकड़ लो इसे मार दो इसे और कीर्तिमान का घावों से क्षत विक्षत शरीर आसमान से सभा में आ गिरा।
यह देख उसकी पत्नी बोली, "राजा मेरे पति देवताओ की सेवा में अपनी जान गवां बैठे और अब में भी सती होकर उनके पास जाऊंगी।"
राजा ने पवित्र संस्कार पूरे किये, उसने आग में प्रवेश किया। यह देख सभी लोग दंग रह गए तभी हीरे जड़ित गहने और सुन्दर सी पोषाक पहने एक व्यक्ति सभा में आया और राजा का सम्मान करते हुए बोला नरेश देवताओ और दानवों का युद्ध समाप्त हुआ एवं देवताओं को जीत प्राप्त दे और में घर लौट जाउं '।
राजा कुछ समझ नही पाए और बोले' तुम तो अभी अभी मृत अवस्था में आसमान से गिरे थे, तुम्हारी पत्नी सती होकर अपने प्राण त्याग चुकी है।
यह सुन वह व्यक्ति हंसा और बोला- राजन ! आप समझदार व्यक्ति है'। आप ऐसा क्यों कह रहे है ? एक पत्नी सती कैसे हो सकती है जबकि उसका पति जीवित हो?
राजा के नौकर ने कहा-'हे वीर योद्धा ठीक ऐसा ही हुआ है, जैसा राजा कह रहे है। राजा को परेशान होता देख वह व्यक्ति अपने जादूगर के भेष में आ गया और बोला, नरेश मेने अभी अभी आपको अपनी जादूगरी की बेजोड़ चाल दिखाई।
राजा बहुत प्रभावित हुए और जादूगर को इनाम में आठ करोड़ के मूल्य का सोना, तिरानवे किलो मोती, पचास जोशीले हाथी, तीनसौ घोड़े एवं इत्र जिसकी गंध के लिये मधुमक्खियाँ भी बेचैन रहती हो, दिए गए।
इतना कहकर मूर्ति बोली-'हे राजा इस सिहांसन पर वही बैठे जिसमे राजा विक्रम जितनी उदारता हो।
31. विक्रमादित्य कि उदारता
राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-
एक बार शासन काल के दौरान राजा विक्रमादित्य एक तपस्वी से मिले, राजा ने कहा श्रद्धेय कहिये आप क्या चाहते है?
तपस्वी ने कहा, " राजन ! मैं एक यज्ञ कर रहा हूँ, क्या तुम मेरे सहयोगी बनोगे। तपस्वी ने कहा वहां शमशान के समीप एक वृक्ष में वेताल निवास करता है । उसे चुपचाप कृष्ण चतुर्दशी की रात को आहुति के समय लाना है।
राजा विक्रमादित्य उस भयानक रात्रि को वेताल को लाने के लिये गया। जब राजा वेताल को लेकर चला तो वेताल ने उसे एक कहानी सुनाना प्रारम्भ कि कहानी के अंत में राजा से एक प्रश्न पूछा और जैसे ही राजा ने उत्तर दिया। वेताल दोबारा वृक्ष पर जा बैठा। पच्चीस बार प्रयास करने पर भी ऐसे ही हुआ।
लेकिन राजा हतोउत्साहित नहीं हुए. यह देख वेताल अतिप्रसन्न हुआ और आठ महान जादुई शक्तियाँ राजा को प्रदान की।
वेताल ने राजा से कहा यदि आप मेरे पास नहीं आते तो वह योगी आपकी ही आहुति दे देता। जब तुम अग्नि कुंड की प्रदिक्षणा कर दंडवत प्रणाम के लिए झुकोगे तब वह खड्ग से तुम्हारा वध कर अग्नि कुंड में आहुति देगा और सिद्धि को प्राप्त कर लेगा। विक्रम ने पूछा, मुझे क्या करना चाहिए।
वेताल ने कहा जब योगी तुम्हे दंडवत प्रणाम करने को कहे तो उसे कहना कि प्रणाम किस प्रकार करना है आप मुझे बतलाये। मैं सार्वभौमिक शासक हुँ, दंडवत प्रणाम करना नहीं जनता।
जब वह योगी प्रणाम करने के लिये झुके तो उसका शीश काट कर हवन में आहुति देना और सिद्धि प्राप्त करना। तब विक्रम ने ऐसे ही किया और महासिद्धि प्राप्त की।
तब वेताल ने कहा में आप पर प्रसन्न हूँ वर मार्गो।
राजा ने कहा यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो योगी का उद्धार करो। वेताल ने कहाँ मैं आप पर प्रसन्न हूँ जिस समय भी तुम मेरा स्मरण करोगे उसी समय में उपस्थित हो जांऊगा। राजा उस योगी को अष्ट महासिद्धि देकर अपने नगर को आ गया।
इतना कहकर पुतलि ने कहा हे नरेश इस सिहांसन पर वही व्यक्ति बैठ सकता है जिसमे राजा विक्रमादित्य जैसी उदारता हो।
32. विक्रमादित्य कि उदारता एवं साहस
जैसे ही राजा भोज सिंहासन पर आरूढ़ होने को बढ़ा, तभी बत्तीसवीं पुतली ने कहा :-
विक्रम के समान इस भूमण्डल पर कोई राजा नहीं हुआ. उसने अपनी काष्ठमय खड्ग से पृथ्वी के मध्य जितने भी राजा थे उन्हें जीतकर एक छत्र शासन किया। उसने शकों को पराजित कर शकारि नाम धारण किया।
भूमण्डल पर सभी राजाओं को उसने अपने वश में किया और समस्त दुर्जनों का नाश किया। लोक के समस्त याचक, दरिद्रों का दुःख हरण किया। अकाल पीडितों को सहायता प्रदान की। विक्रम के समान ऐसा कोई राजा नही है।
इस प्रकार सत्व, साहस, धैर्य और दया गुण वाला व्यक्ति ही इस सिंहसन पर बैठने का अधिकारी है।
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