बेताल कथा
राजा विक्रम एक बार फिर बेताल को पेड़ से उतारकर लाते हैं। बेताल अपनी शर्त के अनुसार एक नई कहानी शुरू करता है
एक नगर में 'धर्मध्वज' नाम का एक राजा राज्य करता था। उसके पास 'सत्वशील' नाम का एक अत्यंत वफादार सेवक था। सत्वशील राजा के लिए अपना जीवन भी दांव पर लगाने को तैयार रहता था।
एक बार राज्य पर भारी विपत्ति आई। राज्य की कुलदेवी राजा के सपने में आईं और कहा, "राजन, यदि तुम अपने इकलौते पुत्र की बलि स्वयं अपने हाथों से दो, तभी यह राज्य और यहाँ की प्रजा महामारी से बच पाएगी।"
राजा धर्मध्वज गहरे संकट में पड़ गए। एक तरफ पुत्र मोह था और दूसरी तरफ प्रजा की रक्षा। सत्वशील को जब यह बात पता चली, तो उसने राजा से कहा, "महाराज, आप विचलित न हों। राजा का धर्म प्रजा की रक्षा है। यदि राज्य बचेगा, तो कई कुल बचेंगे।"
अगले दिन बलि की तैयारी हुई। राजा ने भारी मन से तलवार उठाई। जैसे ही वह वार करने वाले थे, सत्वशील ने आगे बढ़कर राजा का हाथ रोक दिया और कहा, "महाराज, आप रुकिए। यह पाप आपके हाथों न हो। मैं अपने प्राणों की आहुति देता हूँ ताकि देवी प्रसन्न हो जाएँ।" इतना कहकर सत्वशील ने स्वयं का गला काटकर अपना बलिदान दे दिया।
यह देखकर सत्वशील की पत्नी और उसका पुत्र, जो वहीं खड़े थे, उन्होंने भी वियोग में अपने प्राण त्याग दिए। अंत में, राजा ने जब यह देखा कि उसके एक कर्तव्य के कारण पूरा परिवार खत्म हो गया, तो उसने भी ग्लानि में आकर अपनी गर्दन पर तलवार रख ली। तभी कुलदेवी प्रकट हुईं और सबको जीवित कर दिया।
बेताल ने पूछा— "हे राजन! अब बताओ कि इस पूरी घटना में सबसे बड़ा त्यागी कौन था? राजा, सेवक सत्वशील, उसकी पत्नी या उसका पुत्र?"
राजा विक्रम ने बिना देर किए उत्तर दिया:
"बेताल, इस घटना में सबसे बड़ा त्यागी राजा धर्मध्वज ही था।"
बेताल ने टोका— "कैसे? सत्वशील ने तो बिना किसी स्वार्थ के अपना और अपने परिवार का बलिदान दे दिया था!"
विक्रम का तर्क:
"सत्वशील एक सेवक था, और स्वामी के लिए प्राण देना उसका कर्तव्य और स्वामिभक्ति थी। उसकी पत्नी और पुत्र ने मोहवश प्राण त्यागे। लेकिन राजा धर्मध्वज, जो स्वयं एक स्वामी था, उसने अपनी प्रजा (जो उसके अपने बच्चे नहीं थे) के लिए अपने सगे पुत्र की बलि देने का निर्णय लिया और अंत में अपनी सत्ता व जीवन का मोह छोड़कर खुद को समाप्त करने चला था। एक समर्थ व्यक्ति द्वारा निस्वार्थ भाव से किया गया त्याग ही सबसे महान होता है।"
उत्तर सुनते ही शर्त टूट गई और बेताल फिर से पेड़ की ओर उड़ गया।
जीवन में कई बार हमें 'भावुकता' और 'कर्तव्य' के बीच चुनाव करना पड़ता है। सही चुनाव वही है जो व्यापक हित में हो।
राजा विक्रम का बार-बार बेताल के पीछे जाना हमें 'निरंतरता' का पाठ पढ़ाता है।
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