100. विक्रम बैताल || कहानी 00 || बैताल की संपूर्ण कहानी ||

 00. विक्रम बैताल || कहानी 00 || बैताल की संपूर्ण कहानी ||


आपका प्यारा दोस्त ओम जितेंद्र सिंह तोमर आज लेकर आया है विक्रम बेताल की कहानी इससे पहले हम अपनी कहानी शुरू करें तो हम बता दें कि विक्रम बेताल की कहानियां से संबंधित एक और पुस्तक है, कहा यह भी जाता हैं कि इन कहानियों को बेताल भट्ट ने लिखा था, जो कि राजा विक्रमादित्य के खास पाँच लोगों में से एक थे और लेखक ने इसमे अपने राजा विक्रमादित्य के न्याय को कहानियों के रूप में संग्रहीत किया हैं।

विक्रम बेताल की कहानियां, जिसे बेताल पच्चीसी के नाम से भी जाना जाता है। यह 25 कहानियों का संग्रह है, जिसमें कई प्ररेणादायक और नेतृत्व क्षमता को बढ़ाने वाली कहानियां शामिल हैं। इन सभी कहानियों को बेताल (एक पिशाच) तब सुनाता है, जब राजा विक्रम उसे जंगल से पकड़कर एक योगी के पास ले जा रहे होते हैं। हर बार बेताल रास्ता लंबा होने के कारण राजा विक्रम को कहानी सुनाता है, जिन कहानियों का संग्रह विक्रम बेताल की कहानियों के नाम से प्रसिद्ध है। कहानी सुनाने से पहले बेताल, राजा के सामने एक शर्त भी रखता था कि अगर कहानी खत्म होने के बाद उसने मुंह से आवाज निकाली, तो वो वापस उड़कर पेड़ से लटक जाएगा। उधर, जब भी बेताल कहानी सुनाकर खत्म करता, तो राजा एक सवाल पूछता और कहता, राजन अगर तुमने जवाब पता होने पर भी नहीं दिया, तो मैं तुम्हारा सिर तोड़ दूंगा। इस वजह से राजा को मजबूर होकर जवाब देना पड़ता था और पहली शर्त के अनुसार राजा के बोलते ही बेताल वापस जाकर पेड़ से उल्टा लटक जाता था। ऐसा होते-होते बेताल ने राजा को 25 कहानियां सुनाई।

बैताल पच्चीसी - प्रारम्भ की कहानी । विक्रम -बैताल की कहानियाँ[Hindi Stories]

100. विक्रम बैताल || कहानी 00 || कहानी का प्रारंभ व तीन पुतले || 

बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेन नाम का एक राजा राज करते थे। उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। संयोग से एक दिन राजा की मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनका बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता गया और वह सारे जम्बूद्वीप का राजा बन बैठा। एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए और जिन देशों के नाम उसने सुने हैं, उन्हें देखना चाहिए। सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर, योगी बन कर, राज्य से निकल पड़ा।

उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। एक दिन देवता ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा कि इसे जो भी खायेगा, वह अमर हो जायेगा। ब्रह्मण ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की बात भी बता दी। ब्राह्मणी बोली, “हम अमर होकर क्या करेंगे? हमेशा भीख माँगते रहेंगें। इससे तो मरना ही अच्छा है। तुम इस फल को ले जाकर राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ।”

यह सुनकर ब्राह्मण फल लेकर राजा भर्तृहरि के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। भर्तृहरि ने फल ले लिया और ब्राह्मण को एक लाख रुपये देकर विदा कर दिया। भर्तृहरि अपनी एक रानी को बहुत चाहता था। उसने महल में जाकर वह फल उसी को दे दिया। रानी की मित्रता शहर-कोतवाल से थी। उसने वह फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह उस फल को उस वेश्या को दे आया। वेश्या ने सोचा कि यह फल तो राजा को खाना चाहिए। वह उसे लेकर राजा भर्तृहरि के पास गई और उसे दे दिया। 

भर्तृहरि ने उसे बहुत-सा धन दिया; लेकिन जब उसने फल को अच्छी तरह से देखा तो पहचान लिया। उसे बड़ी चोट लगी, पर उसने किसी से कुछ कहा नहीं। उसने महल में जाकर रानी से पूछा कि तुमने उस फल का क्या किया। रानी ने कहा, “मैंने उसे खा लिया।” राजा ने वह फल निकालकर दिखा दिया। रानी घबरा गयी और उसने सारी बात सच-सच कह दी। भर्तृहरि ने पता लगाया तो उसे पूरी बात ठीक-ठीक मालूम हो गयी। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने सोचा, यह दुनिया माया-जाल है। इसमें अपना कोई नहीं। वह फल लेकर बाहर आया और उसे धुलवाकर स्वयं खा लिया। फिर राजपाट छोड, योगी का भेस बना, जंगल में तपस्या करने चला गया।

भर्तृहरि के जंगल में चले जाने से विक्रम की गद्दी सूनी हो गयी। जब राजा इन्द्र को यह समाचार मिला तो उन्होंने एक देव को धारा नगरी की रखवाली के लिए भेज दिया। वह रात-दिन वहीं रहने लगा।

भर्तृहरि के राजपाट छोड़कर वन में चले जाने की बात विक्रम को मालूम हुई तो वह लौटकर अपने देश में आया। आधी रात का समय था। जब वह नगर में घुसने लगा तो देव ने उसे रोका। राजा ने कहा, “मैं विक्रम हूँ। यह मेरा राज है। तुम रोकने वाले कौन होते होते?”

देव बोला, “मुझे राजा इन्द्र ने इस नगर की चौकसी के लिए भेजा है। तुम सच्चे राजा विक्रम हो तो आओ, पहले मुझसे लड़ो।”

दोनों में लड़ाई हुई। राजा ने ज़रा-सी देर में देव को पछाड़ दिया। तब देव बोला, “हे राजन् ! तुमने मुझे हरा दिया। मैं तुम्हें जीवन-दान देता हूँ।”

इसके बाद देव ने कहा, “राजन्, एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए थे। तुमने राजा के घर में जन्म लिया, दूसरे ने तेली के और तीसरे ने कुम्हार के। 

तुम यहाँ का राज करते हो, तेली पाताल का राज करता था। कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शम्शान में पिशाच बना सिरस के पेड़ से लटका दिया है। अब वह तुम्हें मारने की फिराक में है। उससे सावधान रहना।”

इतना कहकर देव चला गया और राजा महल में आ गया। राजा को वापस आया देख सबको बड़ी खुशी हुई। नगर में आनन्द मनाया गया। राजा फिर राज करने लगा।

एक दिन की बात है कि शान्तिशील नाम का एक योगी राजा के पास दरबार में आया और उसे एक फल देकर चला गया। राजा को आशंका हुई कि देव ने जिस आदमी को बताया था, कहीं यह वही तो नहीं है! यह सोच उसने फल नहीं खाया, भण्डारी को दे दिया। योगी आता और राजा को एक फल दे जाता।

संयोग से एक दिन राजा अपना अस्तबल देखने गया था। योगी वहीं पहुँच और फल राजा के हाथ में दे दिया। राजा ने उसे उछाला तो वह हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़ा। उसी समय एक बन्दर ने झपटकर उसे उठा लिया और तोड़ डाला। उसमें से एक लाल निकला, जिसकी चमक से सबकी आँखें चौंधिया गयीं। राजा को बड़ा अचरज हुआ। उसने योगी से पूछा, “आप यह लाल मुझे रोज़ क्यों दे जाते हैं?”
योगी ने जवाब दिया, “महाराज! राजा, गुरु, ज्योतिषी, वैद्य और बेटी, इनके घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

राजा ने भण्डारी को बुलाकर पीछे के सब फल मँगवाये। तुड़वाने पर सबमें से एक-एक लाल निकला। इतने लाल देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। उसने जौहरी को बुलवाकर उनका मूल्य पूछा। जौहरी बोला, “महाराज, ये लाल इतने कीमती हैं कि इनका मोल करोड़ों रुपयों में भी नहीं आँका जा सकता। एक-एक लाल एक-एक राज्य के बराबर है।”

यह सुनकर राजा योगी का हाथ पकड़कर गद्दी पर ले गया। बोला, “योगीराज, आप सुनी हुई बुरी बातें, दूसरों के सामने नहीं कही जातीं।”

राजा उसे अकेले में ले गया। वहाँ जाकर योगी ने कहा, “महाराज, बात यह है कि गोदावरी नदी के किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ। उसके सिद्ध हो जाने पर मेरा मनोरथ पूरा हो जायेगा। तुम एक रात मेरे पास रहोगे तो मंत्र सिद्ध हो जायेगा। एक दिन रात को हथियार बाँधकर तुम अकेले मेरे पास आ जाना।”

राजा ने कहा “अच्छी बात है।”

इसके उपरान्त योगी दिन और समय बताकर अपने मठ में चला गया।

वह दिन आने पर राजा अकेला वहाँ पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, “यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा वहाँ से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ता गया। जब वह मसान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

राजा ने नीचे आकर पूछा, “तू कौन है?”

राजा का इतना कहना था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा। राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी वह मुर्दा फिर पेड़ पर जा लटका। राजा फिर चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। बोला, “बता, तू कौन है?”

मुर्दा चुप रहा।

तब राजा ने उसे एक चादर में बाँधा और योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है?”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा नहीं यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत बड़ा है आसानी से कटेगा नहीं। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं।"

राजा ने उसकी बात मान ली। फिर बेताल बोला, “पण्डित, चतुर और ज्ञानी, इनके दिन अच्छी-अच्छी बातों में बीतते हैं, जबकि मूर्खों के दिन कलह और नींद में। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत बड़ा है आसानी से कटेगा नहीं। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं। ले, सुन।” और बेताल जबरदस्ती कहानी सुनाने लगता।

इस प्रकार जब भी बेताल कहानी सुनाकर खत्म करता, तो राजा से एक सवाल पूछता और कहता, राजन अगर तुमने जवाब पता होने पर भी नहीं दिया, तो मैं तुम्हारा सिर के टुकड़े टुकड़े कर दूंगा। इस कारण राजा को मजबूर होकर जवाब देना पड़ता था और पहली शर्त के अनुसार राजा के बोलते ही बेताल वापस जाकर पेड़ से उल्टा लटक जाता था। ऐसा होते-होते बेताल ने राजा को 24 कहानियां सुनाई।

24 वीं कहानी के अंत में बेताल फिर से एक प्रश्न पूछता है। मगर इस सवाल से विक्रम भी सोच में पड़ जाता है। लाख सोचने के बाद भी उसे सही जवाब नहीं सूझता। इसलिए, वह चुपचाप आगे बढ़ता रहता है।

ये देखकर बेताल कहता है, “राजन, अगर तुम्हें इसका जवाब नहीं पता, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारे पराक्रम और धीरज से बहुत खुश हूं। मैं इस मुर्दे से निकल जाता हूं और तुम इस मुर्दे को अपने वादे के अनुसार योगी के पास ले जा सकते हो, लेकिन याद रहे जब योगी तुम्हें सिर झुकाकर इस मुर्दे को प्रणाम करने को कहेंगा, तुम उसे प्रणाम करने से पहले उससे कहना कि पहले आप करके दिखाएं कि कैसे करना है। 

जब योगी सिर झुकाएं, तो तभी अपनी तलवार से उसका सिर काट देना। उसका सिर काटकर तुम अमर हो जाओगे और संपूर्ण पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट बन जाओगे। वहीं, अगर तुमने उसका सिर नहीं काटा, तो योगी तुम्हारी बलि दे देगा और सिद्धि प्राप्त कर के अमर हो जाएगा। वह एक धूर्त और मक्कार व्यक्ति हैं। जो पूरे पृथ्वी को जीवन को संकट में डाल देगा । राजन ! आप समझदार हैं। क्या करना है ? आप अच्छे प्रकार जानते हैं।”

इतना कहते ही बेताल ने मुर्दे का शरीर छोड़ दिया और राजा विक्रम मुर्दे का शरीर लेकर योगी के पास पहुंच जाता है। 

इस प्रकार चौबीस बार लगातार प्रयास करने के बाद, आखिरकार 25वीं बार राजा विक्रमादित्य शव को श्मशान ले जाने में कामयाब हो जाते हैं। जब राजा विक्रमादित्य शव को लेकर योगी के पास पहुंचे तो राजा विक्रमादित्य और उसके कंधे पर शव को देखकर योगी बहुत खुश हुआ। उसने खुशी जताते हुए राजा से कहा, “हे राजन, आपने इस मुश्किल काम को करके यह साबित कर दिया कि आप सभी राजाओं में सबसे श्रेष्ठ हैं।” 

यह कहते हुए उसने राजा के कंधे से शव को उतारा और उसे तंत्र साधना के लिए तैयार करने लगा।

जब तंत्र साधना हो गई तो उसने राजा से कहा, “हे राजन, अब आप इसे लेटकर प्रणाम करें।” इतना सुनते ही राजा को बेताल की बात याद आ गई। 

उन्होंने योगी का मन रखने के लिए दंडवत के स्थान पर उलट-पुलट तरीके से प्रणाम करना शुरू कर दिया। 

जिस पर योगी का गुस्सा आ गया। वह बोला, "चक्रवर्ती राजा होने के उपरांत भी तुम्हें दंडवत प्रणाम करना नहीं आता।"

राजा ने योगी को कहा, “मुझे ऐसा करना नहीं आता, इसलिए आप मुझे पहले करके बता दें, फिर में ऐसा कर लूंगा।”

जैसे ही योगी प्रणाम करने के लिए झुका, राजा ने उसका सिर काट दिया। यह सब देखकर बेताल बहुत खुश हुआ और बोला, “राजन यह योगी विद्वानों का राजा बनना चाहता था, लेकिन अब तुम बनोगे विद्वानों के राजा। मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया, अब तुम्हें जो चाहिए मांग लो।”

बेताल ने यह सुनते ही कहा, “जैसी आपकी इच्छा, ऐसा ही होगा, ये कहानियां ‘बेताल-पच्चीसी’ के नाम से जानी जाएंगी और जो भी इन्हें ध्यान से पढ़ेगा या सुनेगा, उनके पाप खत्म हो जाएंगे।”

इतना कहकर बेताल चला गया और उसके जाने के बाद शिवजी ने राजा को दर्शन दिए। शिवजी ने प्रकट होकर राजा से कहा, “तुमने इस दुष्ट योगी को मारकर एक अच्छा काम किया है। अब तुम जल्द ही सात द्वीपों समेत पाताल और पृथ्वी पर राज करोगे। जब तुम्हारा इन सभी चीजों से मन भर जाए, तो तुम मेरे पास चले आना।” इतना कहकर शिवजी वहां से चले गए।


कहानी से सीख:

बुराई की कभी जीत नहीं होती है। अगर व्यक्ति का मन साफ हो और उसमें धैर्य हो, तो उसे हर जगह मान-सम्मान मिलता है।

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