105. विक्रम बैताल || कहानी 05 || व्यवहार पारखी || .
105. विक्रम बैताल || कहानी 05 || व्यवहार पारखी || .
उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”
योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”
यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया।
जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।
उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?”
"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।
राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, और तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका।
राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"
राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”
राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।
नीचे उतर कर राजा ने उसक दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है? अब तू आराम से मेरे प्रश्नों का जवाब दे सकता है।”
राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”
बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा कि तू रास्ते में अब के बाद कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।
राजन! जिसने तुम्हें मेरे पीछे लगाया है वह एक धूर्त तांत्रिक है, परंतु तुम अपने प्राण से डिगने वालों में नहीं हो। अतः तुम मुझे उसके पास लेजाकर कर ही मानोगे। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”
राजा के दरबार मे चतुर नामक एक आदमी नौकरी मांगने के लिए आया और उसने राजा से नौकरी मांगी, " महाराज ! मैं बेकार हूं । मुझे कोई काम दे दीजिए।"
राजा ने अपने महामंत्री की तरफ देखा तो महामंत्री ने उस व्यक्ति से प्रश्न पूछा, " हमारे दरबार में वैसे तो कोई नौकरी खाली नहीं है, अगर तुम्हारे अंदर कोई काबिलियत है, तो तुम उसके बल पर अपनी नौकरी पा सकते हो। "
चतुर बोला, "मैं इंसान हो, चाहे जानवर, उसका चेहरा देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ,,😇
राजा ने उसे अपने खास घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज बना दिया।
कुछ ही दिन बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा, "चतुर ! तुम्हारा मेरे इस खास घोड़े के बारे में कैसा विचार है?"
चतुर ने उत्तर दिया, "महाराज ! आपका यह खास घोड़ा नस्ली नहीं है।"
राजा को बहुत हैरानी हुई। उसने तुरंत ही घोड़ों के व्यापारी को बुला कर पूछा, " आश्वपाल ! तुमने तो घोड़े को नस्ली बताया था। परंतु यह पाखी व्यक्ति कहता है की यह घोड़ा नस्ली नहीं हैं।"
अश्वपाल बोला, " महाराज ! घोड़ा तो नस्ली ही है। पर इसके पैदा होते ही इसकी मां मर गई थी, इसलिए यह एक गाय का दूध पी कर और उस गाय के साथ पला बढ़ा है।"
राजा बहुत खुश हुआ उसने चतुर को बुलाया और पूछा, " चतुर! तुम्हे कैसे पता चला कि घोड़ा नस्ली नहीं हैं?
"च तोड़ने चतुर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, महाराज ! जब यह घोड़ा घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सिर उठा लेता है।"
राजा उसकी काबलियत पर बहुत खुश हुआ। उसने चतुर के घर अनाज, घी, मुर्गे, ढेर सारी भेड़ और बकरियां बतौर इनाम में भिजवा दी।
राजा ने पशुओं की परख की परीक्षा तो ले ली। इसके बाद इंसान की परख की परीक्षा लेनी थी इसलिए उसने इस बार चतुर को रानी के महल में तैनात कर दिया।
कुछ दिनो बाद राजा ने चतुर से रानी के बारे में राय मांगी, " चतुर ! तुम्हारा महारानी के बारे में कैसा विचार है?"
चतुर ने कहा, " महाराज माफ करना । आपको बुरा लग सकता है, महारानी जी के तौर तरीके तो रानी जैसे हैं, लेकिन पैदाइशी नहीं हैं।"
राजा के पैरों तले जमीन निकल गई। उसने अपनी सास को बुलाया तो सास ने कहा
"बेटा ! क्या बताऊं? हक़ीक़त यह है कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था। लेकिन हमारी बेटी 6 महीने की होकर मर गई, हमने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को गोद ले कर अपनी बेटी बना लिया।
राजा ने फिर चतुर से पूछा, " चतुर ! तुम्हे कैसे पता चला?"
चतुर ने कहा, " महारानी जी का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों जैसा है। एक अच्छे इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक विशेष तरीका होता है, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही है।"
राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ,😇
और फिर से बहुत अनाज, घी, मुर्गे, ढेर सारी भेड़ और बकरियां बतौर इनाम में भिजवा दीं। साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर लिया।
कुछ समय बीता, राजा ने चतुर को एक बार फिर से बुलाया और बोला, "चतुर ! तुम बहुत अच्छे चेहरे को पढ़ने वाले हो। अब मेरे बारे में बताओ,
"महाराज ! रहने दो।" चतुर ने बात टालते हुए कहा।
राजा को बड़ा बुरा लगा उसने कहा, " चतुर ! यदि मेरी बात नहीं मानी तो कल तुम्हें मेरी बात की अवमानना करने पर मृत्युदंड दे दिया जाएगा।"
चतुर ने कहा, "महाराज ! मैं बहुत बड़ी दुविधा में फंस गया हूं। यदि मैं आपके बारे में नहीं बताता हूं तो भी मुझे मृत्युदंड मिलेगा और यदि मैं बताता तो भी मुझे मृत्युदंड मिलेगा। अब आप ही बताइए मैं क्या करूं?"
"चतुर ! तुम्हें जवाब तो देना ही पड़ेगा।" राजा ने कहा।
चटनी हाथ जोड़कर राजा से कहा, " महाराज ! जान की सलामती हो तो कहूँ।"
राजा ने कहा, "ठीक है चतुर, मैं तुम्हें अभय दान देता हूं । तुम्हारी जान की सलामती का वचन देता हूं।"
जब राजा ने वचन दे दिया तो चतुर ने कहा, " महाराज ! न तो आप राजा के बेटे हो, और न ही आपका चलन राजाओं वाला है।" कहकर चतुर हाथ जोड़कर घुटनों के बल नीचे बैठ गया।
"चतुर.....!" किशोर के उच्चारण के साथ राजा चीख पड़ा। उसने अपनी तलवार खींच ली। राजा को बहुत गुस्सा आया। मगर राजा जान की सलामती का वचन दे चुका था।
वह राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा और मां से पूछने लगा, " राजमाता जी ! सच-सच बताइए कि मैं आपका पुत्र हूं या नहीं।"
राजमाता जी ने पहले तो हंस कर कहा, " हां, तुम मेरे ही पुत्र हो।"
"राजमाता जी ! आपके गलत उत्तर से किसी की जान जा सकती है और आपके सही उत्तर से किसी की जान बच भी सकती है।" राजा के गुस्सा भरे शब्दों से राजमाता प्रश्न की गंभीरता को समझ गईं।
उन्होंने गंभीर होकर उत्तर दिया, " यह सच है, कि तुम हमारी औलाद नहीं हो। परंतु हमने, अपनी औलाद से भी बढ़कर तुम्हारा लालन-पालन क्या है। "
बेताल ने आश्चर्य से राजा के मुख को देखा और अपनी कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य, चतुर के प्रश्न सुनकर राजा बहुत नाराज हुआ, उसने अपनी तलवार खींच ली। अब चतुर का क्या होगा? चतुर की बात सही है या गलत।
सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा।"
तब विक्रमादित्य ने जवाब देते हुए कहा कि बेताल ! राजा यह सुनकर एकदम सन्न रह गया होगा। उसने राजमाता के पैर पकड़ लिए होंगे। वह एक प्रश्नवाचक दृष्टि से राजमाता को देखने लगा होगा। तब राजमाता ने अपने उत्तर को आगे बढ़ाया, " तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी कोई औलाद नहीं थी।"
"महाराज एक दिन जंगल में शिकार खेलने गए तो शेर की दहाड़ और बचाओ, बचाओ की आवाज सुनकर उसी दिशा में हो लिए। शेर, शोर सुनकर कर वहां से भाग गया। परंतु वह तुम्हारे माता-पिता को बहुत बुरी तरह से घायल कर गया। तुम्हारी माता पहले ही मर चुकी थी। तुम्हारे पिता ने तुम्हें महाराज के हाथों में सौंपा और दम तोड़ दिया। उस वक्त तुम मात्र 6 महीने के रहे होगे। राज महल में आकर राजकीय रीति रिवाज के अनुसार हमने तुम्हें गोद लेकर अपना पुत्र बना लिया। बेटा ! सच्चाई बस इतनी ही है। हम तो यही चाहते थे कि तुम्हें इस बात का कभी पता ही न चले।"
जब राजा ने चतुर को बुलाया और पूछा होगा, " चतुर ! यह बता कि तुझे यह सब कैसे पता चला?"
उसने कहा, " महाराज! जब राजा किसी को इनाम दिया करते हैं, तो हीरे, मोती और जवाहरात, सोने-चांदी के आभूषण आदि के रूप में देते हैं। लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं। महाराज आप समझ ही गए होंगे कि ऐसा व्यवहार किसका होता है।"
राजा एक टक चतुर का मुंह देख रहा था और चतुर ने अपनी बात आगे बढ़ाई।
" महाराज! यह व्यवहार किसी राजा का नही,
किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है। अतः आपको अब अपना व्यवहार बदलना चाहिए।"
बेताल ! राजा बहुत खुश हुआ और उसने इस बार चतुर को धन दौलत हीरे जवाहरात और आभूषणों से पुरस्कृत किया।
चतुर के साथ पूरे दरबार ने जयकारा लगाया, " महाराज की जय हो । महाराज की जय हो।"
राजा का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन ! तुम बहुत बड़े ज्ञानी हो। बिल्कुल सही। तुमने एक एक बात को अच्छे से समझा दिया। तुम्हें आगे की कहानी भी पता लग गई । तुम बहुत समझदार हो। परंतु, राजन ! शर्त के मुताबिक आपको चुप रहना था। अपने मुंह खोल दिया, अब मैं चला।”
इतना कहकर बेताल एक बार फिर से उड़ जाता है। इतना कहकर बेताल तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया। और विक्रम उसे उतारने के लिए पुनः चल दिया।

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