106. विक्रम बैताल || कहानी 06 || *परहित का चिंतन*
106. विक्रम बैताल
|| कहानी 06 ||
*परहित का चिंतन*
उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”
योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”
यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया।
जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।
उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?”
"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।
राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, और तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका।
राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"
राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”
राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।
नीचे उतर कर राजा ने उसक दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है? अब तू आराम से मेरे प्रश्नों का जवाब दे सकता है।”
राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”
बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा कि तू रास्ते में अब के बाद कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।
राजन! जिसने तुम्हें मेरे पीछे लगाया है वह एक धूर्त तांत्रिक है, परंतु तुम अपने प्राण से डिगने वालों में नहीं हो। अतः तुम मुझे उसके पास लेजाकर कर ही मानोगे। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”
विक्रम इस कहानी में मृत्युदंड मिला हुआ एक सेवक बिना कुछ कहे राजा से के मृत्युदंड को सहर्ष स्वीकार कर लेता है क्यों चल यह कहानी सुनाता हूं।
सैनिकों से घिरे हुए सेवक ने बताया, " राजन ! आप तो जानते ही हैं कि मैं एक अमीर सेठ के घर में नौकरी किया करता था, जिसने मुझे आपकी सेवा में समर्पित किया है। मेरा सेठ मुझसे तो बहुत खुश रहता था लेकिन उसे जब भी कोई कटु अनुभव होता तो वह ईश्वर को बहुत गालियाँ देता था। एक दिन सेठ चाकू से फल काट रहा था कि चाकू की तेज धार से फल के साथ-साथ उसकी एक उंगली पूरी की पूरी कट गई।
सेठ स्वभाव के मुताबिक भगवान को गालियां देने लगा। तभी सेठानी अंदर से आई और बोली, "चाकू का स्वभाव तो काटना है फिर आपने अपनी उंगली को सुरक्षित क्यों नहीं रखा? इसमें भगवान का क्या दोष ? जब वह तुम्हें अच्छा-अच्छा देता है तो आप उसको अच्छा कहते हैं। कुछ गलत हो जाए तो उसे गालियां देते हैं।"
सेठ ने सेठानी को गुस्से में कहा, " अपने उपदेश अपने पास रखो।"
सेठानी जी मुस्कुराई और बोली, "जो होता है। अच्छे के लिए ही होता है। इसे स्वीकार करना सीखो।" कहकर अंदर चली गई।
कुछ दिन बीते, बात आई-गई हो गई। सेठ जी मूर्तियों के व्यापार के सिलसिले में बाहर गए कि उन्हें कुछ आदिवासी लोगों ने पकड़ लिया। वे उनकी बलि देने लगे। तभी उनके नेता ने देखा कि सेठ की एक उंगली कम है। तो उन्होंने उसे छोड़ दिया। अब राजा को सेठानी की बातें याद आई और सेठ को अपनी गलती का एहसास हो गया। उस दिन से वह सभी अच्छे बुरे को भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करने लगा।
एक दिन सेठ ककड़ी खा रहे था। जब सेठ ने ककड़ी चखी तो पाया कि वह ककड़ी कड़वी है। सेठ ने वह ककड़ी मुझे दे दी। पहले तो मुझे बुरा लगा फिर सेठानी जी की बात याद आ गई इसलिए मैंने उसे बड़े चाव से खाया जैसे वह बहुत स्वादिष्ट हो।
सेठ ने पूछा, “ ककड़ी तो बहुत कड़वी थी । भला तुम ऐसे कैसे खा गये ?”
तो मैने कहा, “ सेठ जी ! आप मेरे मालिक है। आप रोज ही मुझे स्वादिष्ट भोजन देते है। अगर आपने एक दिन कुछ कड़वा दे भी दिया तो उसे स्वीकार करने में क्या हर्ज है।"
बेताल बोला राजन सेवर को मृत्युदंड क्यों मिला चल अब इसके बारे में मैं बताता हूं। जिस राजा के दरबार में वह सेवक खड़ा हुआ है उस राजा को मूर्तिशिल्प अत्यंत प्रिय थी। उसे जो भी मूर्ति पसंद आती, वह उसके मुंह मांगे दान देकर खरीद लेता था। वह अच्छी मूर्तियों की खोज में देसी-विदेश जाया करता था। इस प्रकार राजा ने अपने राज महल को अनेक मूर्तियों से सजा लिया। वह स्वयं अपनी आंखों के सामने उनकी देख रेख करवाते। इतना लगाव था उसे मूर्तियों से।
इन मूर्तियों में से पांच मूर्तियां तो उन्हें जान से भी ज्यादा प्यारी थी। उन मूर्तियों से इतना अधिक लगाव था कि यदि उसका बस चलता तो हर वक्त अपनी आंखों के सामने रखता। सभी को पता था कि राजा को उनसे अत्यंत लगाव हैं इसीलिए कोई भी उन मूर्तियों के पास जाने से कतराता था।
एक दिन जब जब राजा एक सेवक द्वारा इन मूर्तियों की सफाई कर रहा था कि तभी राजा ने कुछ बोला उधर सेवक का ध्यान भंग हुआ और गलती से उसके हाथों से उनमें से एक मूर्ति टूट गई। जब राजा ने देखा कि उनकी सबसे प्यारी मूर्तियों में से एक मूर्ति सेवक द्वारा टूट गई है तो उसके क्रोध की सीमा न रही उसने तुरंत सैनिकों को आदेश दिया, " सैनिक इसको सेवक को बंदी बना लो, कल सुबह चौराहे पर इसे मृत्युदण्ड दे दिया जाए।"
सेवक हाथ जोड़कर विनती करता रहा परंतु राजा ने एक न सुनी। सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। जब वह सेवकों को ले जाने लगे तो सेवक चिल्लाया," महाराज ! यदि आपने मेरी बात नहीं मानी तो चारों मूर्तियां भी कल तक टूट जाएंगी। देखो उनके पैरों पर भी वैसे ही निशान लगने लगे हैं जिन्हें मैं छुड़ाने का प्रयास कर रहा था। "
राजा ने सैनिकों को आदेश दिया, "ठहरो! बताओ वह निशान कहां हैं?"
"क्या आपको दिखाई नहीं दे रहे?"
"नहीं"
" महाराज! जल्दी करो उन्हें मिटाओ वरना एक-एक कर बाकी मूर्तियां भी टूट जाएंगी।" सेवक बोला।
" महाराज ! निशान लगने लगे हैं वह निशान उन पर रह गए तो यह मूर्तियां अपने आप टूट जाएंगी तब किसे मृत्युदंड दोगे।"
सजा सुनने के बाद सेवक ने तुरन्त अन्य दो मूर्तियों को भी तोड़ दिया। यह देख कर सभी को हतप्रभ रह गए। गुस्से में राजा ने तलवार खींच ली।
सेवक हाथ जोड़कर, गर्दन झुका कर, घुटनों के बल राजा के सामने बैठ गया। इसी बीच सेनापति बोल उठा, "महाराज ! यह आपका स्वामी भक्त सेवक है। इसने ऐसा क्यों किया यह जानने के बाद ही इसे दंड दीजिएगा। "
बेताल ने आश्चर्य से राजा के मुख को देखा और अपनी कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य, ऐसा कैसे हो सकता है कि निशान केवल सेवक को ही दिखाई दे राजा और अन्य को नहीं? मृत्यु दंड पा कर भी क्या सेवक राजा से झूठ बोल रहा था? राजा ने एक मूर्ति के टूटने पर ही उसे मृत्युदंड दे डाला तो क्या वह बाकी दो मूर्तियों के टूटने के बाद उसे माफ कर देगा? "
सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा।"
तब विक्रमादित्य ने जवाब देते हुए कहा कि बेताल ! सेवक ने बाकी दो मूर्तियों के पास जाने के लिए झूठ बोला था और वह अपने झूठ में कामयाब भी रहा। और उसे मूर्तियों के पास जाने का मौका मिला जैसी मूर्तियों के पास पहुंचा उसने वह दोनों मूर्तियां भी तोड़ डाली। राजा को गुस्सा तो बहुत आया परंतु सेनापति के रोकने पर वह कुछ शांत हुआ तब उसने सेवक से पूछा होगा.....
सेवक तुमसे एक मूर्ति टूटने का अपराध तो हुआ और तुमने दो अन्य मूर्तियां तोड़कर अपराध को 3 गुना कर दिया ऐसा तुमने क्यों किया?
तब उस सेवक ने कहा, "महाराज ! क्षमा कीजियेगा, ये मूर्तियाँ मिट्टी की बनी थीं जिसके कारण ये अत्यंत नाजुक थीं। इन्हें अमरता का वरदान तो नहीं था। आज नहीं तो कल टूट ही जाती। कोई ना कोई तो मेरे बाद इनकी देखभाल करता और जिससे भी यह टूटती वह अकारण ही मृत्युदंड का भागी बनता।"
इसके उपरांत उसने एक लंबी श्वास भरें और फिर बोला, " महाराज ! मुझे तो मृत्यु दंड मिल ही चुका हैं। इसलिए मैंने ही अन्य दो मूर्तियों को तोड़कर दो अन्य व्यक्तियों की जान बचा ली है। आपको कलंकित होने से भी बचा लिया।"
राजा बोला, " वह कैसे? सेवक ।"
विक्रम बोला, " बेताल ! यह तो मानोगे ही कि सेवक ने राजा को साँसों का मूल्य सिखाया, साथ ही सिखाया कि सिंहासन न्यायाधीश का आसन होता है। उस पर बैठकर अपने निजी स्वार्थ के चलते छोटे से अपराध के लिए मृत्युदंड देना उस आसन का अपमान हैं। एक उच्च आसन पर बैठकर हमेशा उसका आदर करना चाहिये। राजा हो या कोई भी अगर उसे न्याय करने के लिए चुना गया हैं तो उसे न्याय के महत्व को समझना चाहिये। आप गुस्से में वही सब करने जा रहे थे। मेरी मृत्यु के बाद अन्य दो लोगों की भी मृत्युदंड मिलता, तो आपको भी अपयश मिलता। आप कलंकित हो जाते। जिससे आप अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाते।"
" बेताल! सेवक ने यही जवाब दिया होगा। जवाब सुनकर राजा को अपनी गलती का एहसास भी हो गया होगा और उसने सेवक का दंड भी माफ कर दिया होगा।"
जवाब सुनकर बेताल बोला, "हां विक्रम ! तूने बिल्कुल सच कहा। सेवक की बातें सुनकर राजा की आँखे खुली की खुली रह गई। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सेवक को मृत्युदडस की सज़ा से मुक्त कर दिया।"
बेताल फिर बोला "मूर्ति से राजा को प्रेम था लेकिन उसके लिए सेवक को मृत्युदंड देना न्याय के विरुद्ध था। न्याय की कुर्सी पर बैठकर किसी को भी अपनी भावनाओं को दरकिनार करके फैसला देना चाहिये।"
" राजा को समझ आ गया कि मुझसे कई गुना अच्छा तो वो यह सेवक है जिसने मृत्यु के इतना समीप होते हुए भी परहित का सोचा..! परंतु राजा को एक चिंता और खाए जा रही थी उसने उसे दूर करने के लिए सेवक से पूछा, " सेवक ! अकारण मृत्यु को सामने पाकर भी तुमने ईश्वर को नही कोसा, तुम्हें डर नहीं लगा, इस संयमित स्वस्भाव तथा दूरदृष्टि क्या कारण है।"
सेवक ने राजा की तरफ देखा और कहा, "राजन ! हमें ईश्वर ने इतनी सुख सुविधाएं दी है, और यदि वह कभी कोई असुविधा दे भी दे तो उसकी भावना पर संदेह नहीं करना चाहिए। जन्म, जीवन तथा मृत्यु सब उसी की देन है। और आप मेरे लिए उसी ईश्वर के समान है। जब से सेठ के यहां से आप मुझे लाए हैं। आप ही ने मेरा लालन-पालन किया है। इसलिए आप जो भी देंगे मुझे शहर्ष स्वीकार है।"
बेताल ! राजा सेवक के वचन सुनकर बहुत खुश हुआ और उसने सेवक को मृत्युदंड से मुक्त कर दिया और सेवक को धन दौलत हीरे जवाहरात और आभूषणों से पुरस्कृत किया।
राजा विक्रमादित्य पपंका जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन ! तुम बहुत बड़े ज्ञानी हो। बिल्कुल सही। तुमने एक एक बात को अच्छे से समझा दिया। तुम्हें आगे की कहानी भी पता लग गई । तुम बहुत समझदार हो। परंतु, राजन ! शर्त के मुताबिक आपको चुप रहना था। अपने मुंह खोल दिया, अब मैं चला।”
इतना कहकर बेताल एक बार फिर से उड़ जाता है। इतना कहकर बेताल तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया। और विक्रम उसे उतारने के लिए पुनः चल दिया।

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