109. विक्रम बैताल || कहानी 09 || सेनापति का चुनाव ||
109. विक्रम बैताल || कहानी 09 || सेनापति का चुनाव ||
उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”
योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”
यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपट जाते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया।
जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात योगी ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।
उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?”
"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।
राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, और तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका।
राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"
राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे को बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”
राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।
नीचे उतर कर राजा ने उसके दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है? अब तू आराम से मेरे प्रश्नों का जवाब दे सकता है। मैं अब कहीं नहीं जाऊंगा।”
राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”
बेताल बोला, “राजन ! जब तू मुझे ले ही जा रहा है तो मैं एक शर्त पर तेरे साथ चलूँगा कि तू रास्ते में अब के बाद कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।"
कुछ देर चुप रहने के उपरांत बेताल फिर बोला, "राजन! जिसने तुम्हें मेरे पीछे लगाया है वह एक धूर्त तांत्रिक है, परंतु तुम अपने प्रण से डिगने वालों में नहीं हो। अतः तुम मुझे उसके पास लेजाकर कर ही मानोगे। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”
एक बड़े राज्य में तेरे ही समान एक बलशाली राजा राज्य करता था। उसके सेनापति अब वृद्ध हो चुके थे इसलिए नए सेनापति की आवश्यकता थी। जो ईमानदार और देशभक्त हो।
इसके लिए राजा ने पूरे देश में घोषणा कराई, " सभी देशवासियों को सूचना दी जाती हैं कि वर्तमान सेनापति अब वृद्ध हो चुके हैं और वे ही नए सेनापति का चुनाव करेंगे उनकी राय के अनुसार सेनापति के चुनाव के लिए एक प्रतियोगिता है जो इस प्रतियोगिता को जीत लेगा वही हमारे राज्य का सेनापति बनेगा।"
घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी आदि अनेक प्रकार की प्रतियोगिताओं के उपरांत अंतिम प्रतियोगिता रह गई इस प्रतियोगी में कुछ ही प्रतियोगी ही बचे थे।
आज राजा ने घोषणा की कि कल दौड़ प्रतियोगिता होगी इस दौड़ में जो सबसे पहले राज महल का चक्कर लगाकर हमारी सभा में पहुंचेगा। उसे ही सेनापति चुन लिया जाएगा।
प्रतियोगिता के दौरान एक व्यक्ति दौड़ में सबसे आगे चल रहा था। इसमें दौड़ते वक्त वह अंतिम लाइन से कुछ ही दूर थे और उनके सभी प्रतिस्पर्धी पीछे थे। वह व्यक्ति सेनापति पद लगभग जीत ही लिया था। सभी दर्शक तालियों से अपने होने वाले नए सेनापति का हौसला बढ़ा रहे और स्वागत कर रहे थे।
लेकिन लोगों को लगा कि उसे कुछ गलतफहमी हो गई है और वह अंतिम रेखा अंतिम रेखा से कुछ एक कदम पहले ही रुक गया।
उनके पीछे दूसरे नंबर पर आने वाले प्रतिस्पर्धी ने जब प्रथम आने वाले को द्वंद में रुके हुए देखा तो वह समझ गया कि हमारे होने वाले सेनापति एक छोटी सी गलती के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
तो उसने चिल्लाकर प्रथम आने वाले प्रतियोगी को आगे जाने के लिए कहा लेकिन आंतरिक द्वंद में होने के कारण वह वहीं खड़ा रहा। आखिर में पीछे आने वाले प्रतियोगी ने पहले प्रतियोगी को धकेल कर अंतिम रेखा तक पहुंचा दिया। इस प्रकाश पहला प्रतियोगी प्रथम तथा दूसरा प्रतियोगी दूसरे स्थान पर आया।
खेल समाप्त होने के बाद जब सेनापति ने दूसरे नंबर पर आने वाले प्रतियोगी से पूछा, "तुमने ऐसा क्यों किया? मौका मिलने के बावजूद तुमने प्रथम स्थान क्यों गंवाया ? तुम जानते हो सेनापति का पद कितना महत्वपूर्ण होता है।"
दूसरे प्रतियोगी ने कहा, "सेनापति जी ! मेरा सपना है कि हम एक ऐसा राज्य बनाएं जिसमें लोग एक-दूसरे की मदद करे। मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ है मुझे खुशी है, सेनापति जी ! मैंने प्रथम स्थान नहीं गंवाया।"
सेनापति ने फिर कहा, "लेकिन तुम दूसरे प्रतिस्पर्धी को धकेल कर आगे ले गए।"
इस पर दूसरे प्रतिस्पर्धी ने कहा, " वास्तव में ही वह प्रथम था। यह प्रतियोगिता उसी की थी।"
पत्रकार ने पुनः पूछा, "लेकिन तुम स्वर्ण पदक जीत सकते थे।"
इतना सुनते ही दूसरा प्रतिस्पर्धी बोला, “इस प्रकार की जीत का क्या अर्थ होता ? क्या मेरी जीत को सम्मान मिलता ? दूसरों की अज्ञानता, दुर्बलता या मानसिक बंद का फायदा न उठाते हुए इनकी मदद करने की सीख मेरी मां ने मुझे दी है। "
दूसरी प्रति स्वर देन सेनापति की ओर देखा और कहा, "मुझे दूसरे नंबर पर आने का कोई दुख नहीं है।" प्रथम आया प्रतियोगी कभी दूसरे प्रतियोगी को तो कभी सेनापति को देखता। अब दूसरा प्रतिस्पर्धी सेनापति को प्रणाम करके राजदरबार से बाहर की तरफ चल दिया।
यह कहते हुए बेताल भी चुप हो गया और विक्रम के मुख की ओर देखने लगा। विक्रम मुस्कराया और इशारों में ही बेताल से कहा, 'क्यों प्रश्न पूछना चाहते हो? लेकिन मैं जवाब नहीं दूंगा ।' कहकर विक्रम आगे की तरफ चलता रहा।
बेताल ने आश्चर्य से राजा के मुख को देखा और बोला, 'मैंने अपनी कहानी बीच में ही रोक दी और तुझे असर ही नहीं पड़ा। विक्रमादित्य हर बार की तरह आज फिर तुझसे सवाल करता हूं कि बता कि इन दोनों प्रतियोगियों में सेनापति बनने की योग्य कौन है ? और इस वक्त राजा कहां है?"
सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बेताल को कंधे पर लादे आगे बढ़ता रहा। इस पर गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा। फिर तू मुझे उस धूर्त के पास कभी नहीं ले जा पाएगा।"
तब विक्रमादित्य समझ गए कि अब उत्तर देना ही होगा तो विक्रमादित्य ने जवाब देते हुए कहा, ' सुन, बेताल ! दूसरे प्रतियोगी में सेनापति होने के सभी गुण मौजूद हैं और वास्तव में वही प्रथम आया है। बेताल जिस चीज को तू मुझसे छिपा गया है उसे मैं जान गया हूं।"
विक्रम रुक गए और बेताल की तरफ देख कर बोले, 'बेताल ! बेताल मुझे अपने पहले सवालों का जवाब मिल गया और शायद तुझे भी।'
बेताल बोला, " राजन ! दूसरा प्रतियोगिता राज्य सभा छोड़कर जा चुका है फिर वह सेनापति कैसे बनेगा इसी के साथ दूसरे प्रश्न का उत्तर बाकी है कि जब यह प्रतियोगिता हो रही थी तो राजा कहां था?"
विक्रमादित्य मुस्कुराए और बोले मेरे विचार के अनुसार सेनापति ने दूसरे प्रतियोगी को रोक लिया।
सेनापति बोलो, " ऐ बहादुर युवक ! तुम कहां जाते हो ? जब तक सेनापति का चुनाव नहीं हो जाता तुम कहीं नहीं जाओगे।"
"सेनापति जी ! प्रथम आने वाले व्यक्ति आपके सामने है । वास्तव में वही सेनापति बनने का अधिकारी है। मैं उसकी इस अधिकार को नहीं छीन सकता।" दूसरा प्रतियोगी बोला।
प्रथम प्रतिस्पर्धा बोला, "मेर शुभचिंतक भाई तुमने मेरे ऊपर बहुत बड़ा उपकार किया है, तुम ही इस पद के वास्तविक सेनापति हो।"
"नहीं सेनापति जी ! मैं आपकी बात को नहीं मानूंगा क्योंकि मैं अपनी मां के कहे को झूठा साबित नहीं कर सकता इसलिए मैं जा रहा हूं आप चाहे तो मुझे अपनी सेना में भर्ती कर सकते हैं।" दूसरा प्रतिस्पर्धी बोला।
इसी बीच पहला प्रतिस्पर्धी उठा और सीधा राजा के सिंहासन पर जा बैठा उसने अपने वस्त्र उतार दिए और बोला, " मेरे शुभचिंतक भाई तुम्हें सेना में तो भर्ती होना ही है लेकिन सैनिक बनकर नहीं एक सेनापति बनकर।"
दूसरा प्रतिस्पर्धा सोच भी नहीं पाया था कि यह सब क्या हो गया तभी राजा की पुनः आवाज आई, "जो अपनी माता से इतना प्यार करता है। वह अपनी मातृभूमि को कितना प्यार करेगा। मैं जान सकता हूं इसलिए तुम्हें अपने राज्य का सेनापति नियुक्त करता हूं।"
विक्रम बोला, "बेताब तुम्हें अपने दूसरे प्रश्न का उत्तर भी मिल गया होगा।"
विक्रम का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन ! तुम बहुत बड़े ज्ञानी हो। बिल्कुल सही। तुमने एक एक बात को अच्छे से समझा दिया। तुम्हें आगे की कहानी भी पता लग गई । तुम बहुत समझदार हो। परंतु, राजन ! शर्त के मुताबिक आपको चुप रहना था। आपने मुंह खोल दिया, और अब मैं चला।”
इतना कहकर बेताल तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटकने के लिए चल दिया।
'बेताल तू अगर जिद्दी है तो मैं भी वचनबद्ध हूं तुझे लेकर ही जाऊंगा।' और विक्रम तलवार हाथ में लिए पुनः उसे पेड़ से उतारने के लिए श्मशान की ओर चल दिए।
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