बीसवां गुण दान

।। बीसवां गुण दान ।।
  
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ऐसे राजाओं में से नही थे जो सिर्फ सिंहासन पर बैठ कर नृत्य देखते हो । उन्हे तो दिन में चैन ना रात में , उन्हे ना बारिश से मतलब ना धूप से वे तो रात दिन प्रजा के सुख के बारे में कार्य करते थे वे रात को तो अक्सर निकलते थे प्रजा का हाल जानने के लिए क्योकि उनका मानना था दुखी व्यक्ति रात को चैन से सो ही नही सकता । मगर दिन में भी जब कभी वे प्रजा की समस्या महल से शीघ्र खत्म करके दरबारियों के कार्य देखकर जब उन्हे कुछ समय मिलता तब भी वे अकसर अपने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में जनता से मिलने जाते थे । ऐसे ही एक दिन वे दोपहर को निकले एक ग्राम की ओर । तभी उन्हे एक सुखे खेत में हल पर सर रखे एक किसान दिखा ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य - ऐ भाई ? यह मुह लटकाएं क्यो खडे हो । बोलो कुछ , देखो तुम भी मनुष्य हम भी मनुष्य , आदमी ही आदमी के काम नही आएगा तो यह दुनिया रसातल में चली जाएगी । बताओ हमें ।
किसान - क्या करोगे जान कर ,कोई राजा रहिस लगते हो सैर सपाटे पर जा रहे हो जाओ घुमने ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य - अरे भाई बताओ तो कर पाएंगे तो करेंगे नही तो हाथ जोड कर माफी मांग लेंगे ।
किसान - क्या बताए भईया । आकाश में बादल जाए हुए है थोडी दूर में बारिश शुरू हो जाएगी ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य - हा होगी तो जमकर होगी । 
किसान - अभी पूरा खेत जोतना बाकि है ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो जोतों जल्दी ऐसे बैठोगे तो क्या होगा ।
किसान - थोडे समय पहले बैल मर गया ।
सम्राट विक्रमादित्य - समझ गए हम सब समझ गए । तुम साहुकार के पास गए होंगे और उसने ऋण देने से मना कर दिया होगा । अब रोना बंद करो और खेत जोतों अगर किसान ही रोने लग जाएगा तो समझो इस देश की लुटिया डूब गई समझो ।
किसान - कैसे जोतू ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम कैसे रहेंगे ।
किसान - तुम जोतोगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम्हे संदेह है हमारी शक्ति पर देखो यह बड़ा पत्थर दिख रहा है देखो हम इसे उठाकर फेकते है ।
किसान - तुम लोहे के बने हो क्या । बहुत शक्ति है तुममें ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब खेत जोते लाओ तुम्हारा हल मुझे दो ।
किसान - मगर भईया हम कह देते है मजदूरी नही दे पाएंगे फसल आने पर देंगे आप को मजदूरी ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुमसे मांगा किसने है चलो खेत जोतते है ।
किसान - चलो भईया ।
सम्राट विक्रमादित्य - खेती सबसे बडा काम है इस जैसे तो कोई काम ही नही । धरती मईया की गोद नही फलेगी फुलेगी तो सभी भूखे रह जाएंगे इसलिए खेती सबसे पहले । 
" उसी वक्त सम्राट विक्रमादित्य के मंत्री गण उन्हे ढूंढ रहे होते है " 
मंत्री - ना जाने सम्राट आज कहां चले गए घोड़ा दोडाते दोडाते । 
दूसरे मंत्री - मिल जाएंगे सम्राट ।
सैनिक - वो देखिए सम्राट विक्रमादित्य उस खेत में ।

सम्राट विक्रमादित्य - देखो जुत गया खेत , व्यर्थ ही रो रहे थे तुम । 
किसान - धन्यवाद भईया ।
मंत्री गण - सम्राट । महाराज की जय हो । महाराज कहां चले गए थे आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - इनके साथ हल चला रहा था ।
मंत्री - क्या महाराज आप हल चला रहे थे । अरे मूर्ख तुमने सम्राट विक्रमादित्य से हल चला दिया ।
सम्राट विक्रमादित्य -कोई बात नही मंत्री जी । मंत्री जी आप स्वर्ण सिक्के की पोटली दिजिए । 
मंत्री - जी महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - ये लो इस धन से बीज खरीद लेना और बैल ले आना । और हमेशा उमंग से खेती करना रोकर नही अब हम चलते है ।
मंत्री - अरे धन्य हो गया तेरा खेत राजा विक्रमादित्य ने जोता है देखना इस बार कैसी फसल आती है ।

पंडित जी - सम्राट आपने चक्रवर्ती राजा होने के बावजूद खेती की ।
सम्राट विक्रमादित्य - पंडित जी धरती का असली राजा तो किसान ही होता है । और खेती करना हमारे लिए गर्व की बात रही ।
पंडित जी - ऐसा तो सिर्फ आप ही कह सकते है महाराज । महाराज हम आपसे कह रहे थे अभी की हम अच्छा लग्न देख रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - पंडित जी उससे क्या होगा हमें विस्तार से बताए ।
पंडित जी - सम्राट विक्रमादित्य कहते है तुला लग्न में बनाया हुआ घर , महल भाग्य लाता है अपार धन लाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन की तो हमें कोई कमी नही मगर हां आपकी बात को जांचना चाहेंगे हम । कब आ रहा है तुला लग्न ।
पंडित जी - महाराज आंठ दिन बाद । 
सम्राट विक्रमादित्य - जी ठीक है हम एक महल बनवाएंगे जो विश्व का सबसे भव्य महल होगा । मंत्री जी आप एक अच्छा स्थान ढूंढे । 
मंत्री - जी महाराज ।
मंत्रीयों ने क्षिप्रा नदी के पास बहुत ही अच्छा स्थान खोजा ।
मंत्री - महाराज हमें क्षिप्रा मैय्या के पास 1000 बीघा जमीन मिली है उसे हम महल के लिए उपयोग कर सकते है । वह खाली स्थान है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक है सभी कारीगरों को बुलाओ ।
" देश भर से बड़े बड़े कारीगर आए उज्जैन अपने अपने चित्र बताए महल के लिए । उसमें सम्राट विक्रमादित्य को एक चित्र अच्छा लगा उन्होंने कहा हम ऐसा ही महल बनवाएंगे । विक्रमादित्य का प्रताप और कारीगरों की महनत से महल तुला लग्न में ही बन गया । और सम्राट विक्रमादित्य उस नए महल में जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महल तो अत्यंत सुंदर बना है मेरे मित्र देव राज इंद्र के स्वर्ग लोक जैसा । मगर हम इस महल का करेंगे क्या मंत्री जी ।
मंत्री - महाराज अब आप इस महल में रहने आ जाईए ।
सम्राट विक्रमादित्य - मंत्री जी एक मनुष्य को रहने के लिए थोडा स्थान मिल जाए यही बहुत है । भोजन करने को , निंद्रा को बस । पंडित जी कल्पना कीजिए अगर आप इस महल में रहते तो क्या करते ।
पंडित जी - महाराज में ? यह महल तो बहुत ही अच्छा है । 
सम्राट विक्रमादित्य - पंडित जी कल्पना करने में क्या बुराई है ।
पंडित जी - महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य -क्या हुआ पंडित जी आप तो खो ही गए । मंत्री जी आरती की थाली लेकर आइए हम इस महल को ब्राह्मण देवता को दान करेंगें ।
पंडित जी - महाराज में नही महाराज में इस योग्य नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप ही इस योग्य है ब्राह्मण देवता । हमारे उज्जैनी राजवंश में ब्राह्मणों के लिए अपार सम्मान है आप इस महल में रहेंगे ।
मंत्री - सम्राट यह आप क्या कर रहे है करोडों मुद्राओं का यह महल है आप इसे दान करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य -अवश्य करेंगे ।
मंत्री - मगर महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - आदेश का पालन हो ।
मंत्री - जी महाराज ।

" मंत्री आरती की थाली लेकर आते है । सम्राट विक्रमादित्य उनकी आरती उतार कर ब्राह्मण देवता पर पुष्प अर्पित करके , उन्हे ह्दय से हाथ जोडकर उन्हे यह महल दान कर देते है "

पंडित जी - सम्राट आप सदैव खुश रहे आपने आज जो किया वो कोई नही कर सका । आपके जैसा दानी कोई नही आपके दान को देखकर तो इतिहास भी विचार करेगा की आप जैसे दानी कोई नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप प्रसन्नता से रहे ।

उधर पंडित जी के घर उनका भतीजे अपनी काकी से कहता है काकी जी काका जी को राजा विक्रमादित्य ने महल दान किया । काकी - क्या कह रहा है महल यह नही हो सकता । युगों युगों से ब्राह्मण को दाल चावल गेंहू मिल जाए दान में तो बडी बात है महल दान करे ऐसा कोई नही हुआ । काका - आप स्वंय पूछना यह लो काका जी आ गए । पंडित जी -चलो भाग्यवान राजा ने हमें महल दान किया है वहां रहने का मुहूर्त है । काकी - क्या सम्राट ने हमें महल दान किया , उनके जैसा कोई दानी नही भला विश्व का सबसे बड़ा महल कौन दान करता है वो भी जो उन्होंने अपने लिए बनवाया धन्य है वो । पंडित जी - वही तो उन जैसा कोई नही । अब चलो महल में । " 

ब्राह्मणी - इतना बड़ा महल ? आपको इतना बड़ा नही लेना चाहिए था । 
पंडित जी - अरे हमने मांगा थोडी उनसे उन्होंने दिया हमें । हम उनसे कैसे कहते छोटा महल दो ।

" राजा विक्रमादित्य ने महल बनाया और माँ लक्ष्मी ना आए ऐसा हो ही नही सकता " 

" ब्राह्मण परिवार अपना सामान जमा रहे होते है तभी ब्राह्मणी को पायल की आवाज आती है वो दीपक अपने हाथों में लेकर आते है उन्हे आकाश से एक अत्यंत सुंदर देवी उनकी महल की ओर आती दिखती है वो डर जाती है और अपने पति के पास आती है उठिए स्वामी " 
पंडित जी - क्या हुआ रामू की माता इतनी रात हो गई सो जाओ ।
ब्राह्मणी - आप आवाज सुनिए पायल की ।
पंडित जी - हां तुम सभी कह रही हो चलो सो जाओ कैसे भी सुबह महाराज के पास चलेंगे ।

" माँ लक्ष्मी महल आती है कहती यह महल कितना सुंदर है ब्रह्मांड में बिल्कुल ऐसा ही हमारे स्वामी श्री हरि के बैकुंड लोक जैसा दूसरा महल है यह । मगर यह इतना खाली खाली क्यो है । लगता है इन्ही का यह महल है हमें लगा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का महल होगा उज्जैनी में मगर शायद इन ब्राह्मण का है कितनी सादगी है इनमें नीचे सोए है में इन्हे पलंग देती हूं । ब्राह्मण का परिवार नीचे से पलंग पर आ जाता है वह डर कर खडे हो जाते है । उन्हे देखकर माँ लक्ष्मी कहती है इतने साधारण क्यो है यह लोग इन सभी के वस्त्र राजाओं की तरह होने चाहिए । सभी के वस्त्र नए हो जाते है । ब्राह्मण परिवार डर कर भाग जाता है ।
ब्राह्मणी - वह कौन थी ?
पंडित जी - लगता है कोई आत्मा थी लगता है प्रेत का साया है उस महल पर ।
पंडित जी सम्राट विक्रमादित्य के पास जाते है ।
पंडित जी - महाराज महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - अरे पंडित जी आज सुबह-सुबह आप हमें आशीश देने आए स्वागत है आपका । 
पंडित जी - महाराज हम उस महल में नही रहेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्यो क्या हो गया कोई कष्ट है वहां आपको तो हमें बताए ।
पंडित जी - महाराज उस महल में कोई देवी , यक्षिणी , चुडेल , जादुगरनी , अप्सरा कौन है हमें नही पता पर किसी का तो साया है वहां । हम उस महल में नही रहेंगे महाराज आप उसे ले लिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर मैने वो महल आपको दान कर दिया है हम दान में दी हुई चीज वापस नही लेते । 
पंडित जी - तो महाराज उस महल को खाली रहने दिजिए कौन रहेगा वहां ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप वो महल हमें बेच दिजिए हम रहेंगे वहां ।
पंडित जी - महाराज वो तो आपका ही महल है । 
सम्राट विक्रमादित्य - नही हमने आपको दान दिया है इसलिए हम उसे खरीदेंगे , मंत्री जी आप इस महल की लागत की मुद्रा पंडित जी को दे दिजिए ।
पंडित जी - धन्य है महाराज आप ।
और ऐसे सम्राट विक्रमादित्य मुद्रा देकर अब उस महल के मालिक बनकर वहां जाते है वह रात को सोते है । माँ लक्ष्मी फिर उस महल में आती है ।
माँ लक्ष्मी - राजा विक्रमादित्य गहरी नींद में लग रहे है उठो राजन् ।
सम्राट विक्रमादित्य - सोने दो आज ही तो शांति से नींद आई है ।
माँ लक्ष्मी - उठो राजन् में महालक्ष्मी हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ आप । महालक्ष्मी जी को प्रणाम स्वागत है आपका ।
माँ लक्ष्मी - विक्रमादित्य आपने महल बहुत ही भव्य बनवाया है । श्री हरि से आपके बारे में बहुत सुना है और जैसा सुना वैसा आपको पाया । मांगी हम आपको कुछ देना चाहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ आपका दिया हुआ सबकुछ है हमें कुछ नही चाहिए ।
माँ लक्ष्मी - हम बहुत प्रसन्न है और आज हम वो देंगे जो हमने कभी किसी को नही दिया । हम स्वर्ण की वर्षा करना चाहते है बताओ कहां करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ मेरे इस महल को छोड़कर पूरे मालवा राज्य में करिए । हर उस गरीब के घर जिसे धन की जरूरत है हर घर भर दो माँ । 
माँ लक्ष्मी - अवश्य और हम आपके राजकोष को आशीर्वाद देते है की आपका धन कभी खत्म नही होगा । खुश रहो विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद माँ ।
पूरे राज्य में धन की वर्षा होने के बाद एक संन्यासी कहते है प्रजा जनों यह हम सभी का भाग्य नही है हमारे महाराज विक्रमादित्य का भाग्य है । हमें इस धन को राजकोष में जमा करवाना चाहिए ।
सन्यासी - सम्राट यह सभी आप राजकोष में जमा कर दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही ऋषिवर आप सभी की ईमानदारी से हम प्रसन्न है । यह सभी आप सबका ही है हमने आपके लिए ही मांगा है । यह हमारी तरफ से आपको सप्रेम भेंट है । धन्यवाद प्रजा जनों ।
प्रजा जन - धन्यवाद महाराज आपका प्रताप युगों युगों तक रहेगा । 

" ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य उनके अतिरिक्त शायद ही कोई यह कर पाता , राजाओं के लिए उत्तम आदर्श है विक्रमादित्य । 

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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