सत्रहवा गुण धर्मपरायण

।। सत्रहवा गुण धर्मपरायण ।।

इस कथा में महाराज विक्रमादित्य की मदद माँ काली के सेवक मुंजा करेंगे जिन्हे माँ काली ने विक्रमादित्य की सेवा के लिए उन्हे उपहार में दिया था ।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हर रोज की तरह अपने राज दरबार में बैठे थे तभी मुंजा आते है ।
मुंजा - महाराज आप कैसे है । चलिए कही चलते है ?
विक्रमादित्य - हम ठीक है । आप बहुत दिन बाद आए है । चलिए आज हम आपको अपने विद्यालय के मित्र मरू प्रदेश के राजा कर्ण सिंह से मिलवाकर आते है ।
मुंजा - महाराज हम उन से मिलने चले ।
विक्रमादित्य- वैसे तो हर वर्ष उनका संदेश आता ही है वह वे मिलने भी हमसे आते है किंतु इस वर्ष वे नही आए हमसे मिलने हो सकता है वे किसी समस्या में हो या यह हो सकता है की वे कई व्यस्त हो । इस वर्ष हम उनसे मिल आते है ।
मुंजा - जी महाराज चलिए ।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य मरू प्रदेश पहुंचते है तभी देखते है वहाँ सभी लोग एक ही जगह रुके हुए है ।
विक्रमादित्य- मुंजा यह सभी मृत तो दिख नही रहे है फिर यह सब एक ही जगह क्यो रूक गए है चलो हम राजा कर्ण सिंह से ही पूछ कर आते है ।

सम्राट विक्रमादित्य महल पहुंचते है और पुकारते है कर्ण सिंह कर्ण सिंह । तभी कर्ण सिंह और उनकी पत्नी भी एक ही जगह मूर्ति के रूक में नजर आते है ।

मुंजा- महाराज यह भी प्रजा की तरह हो गए है ।
विक्रमादित्य- मुंजा यह किसी श्राप का प्रभाव है हमें माँ काली से पूछना होगा ।

सम्राट विक्रमादित्य माँ काली का ध्यान करते है उनका तप इस प्रकार था की उनके मात्र पूकारते ही माँ काली प्रकट हो जाती है । 

विक्रमादित्य- माँ भद्रकाली प्रणाम ।
माँ काली - उज्जैनी नरेश विक्रमादित्य आपने कैसे याद किया हमें । 
विक्रमादित्य- माँ आप तो सर्वज्ञानी है माँ कर्ण सिंह और उसकी प्रजा एक ही जगह ठहर गई है ।
माँ काली - पुत्र विक्रमादित्य यह कर्ण सिंह का पाप है जिस वजह से वो और उसकी प्रजा को यह श्राप मिला है ।
विक्रमादित्य- माँ कैसा पाप आप हमें बताए ।
माँ काली- यह आप कर्ण सिंह के मुंह से ही सुने हो सकता है उसका पाप थोडा कम हो जाए । जिसने यह श्राप दिया है इसका असर वो ही कम कर सकता है । आप सूर्योदय से पहले जाए कर्ण सिंह खुद बताएंगे आपको ।
विक्रमादित्य  - धन्यवाद माँ । चलो मुंजा हमें सूर्योदय से पहले महल जाना होगा । 

महल पहुंचते ही विक्रमादित्य को देखकर कर्ण सिंह कहते है ।
कर्ण सिंह  - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप प्रणाम महाराजा ।
विक्रमादित्य  - कर्ण सिंह तुम । तुम और तुम्हारी प्रजा को यह क्या हो गया है ।
कर्ण सिंह  - लगता है आप दिन को आए होंगे ।
विक्रमादित्य  - तुम हमें पूरी बात बताओ कर्ण सिंह ।
कर्ण सिंह  - महाराज में एक दिन शिकार खेलने गया था तभी हिरन को देखकर मैंने तीर छोड़ा तो वो तीर हिरन को ना लगकर ऋषि पुत्र को लग गया । तभी महर्षि की धर्म पत्नी ने मुझे श्राप दे दिया और हम सभी का यह हाल हो गया सूर्योदय के होते ही हम सभी फिर मूर्ति की तरह हो जाएंगे । फिर एक दिन एक राक्षस हमारी पुत्री कोमलांगी को ले गया ।
विक्रमादित्य  - तो यह बात है । इसलिए हमने कभी शिकार नही किया क्योकि हम किसी बेकसूर को मारेंगे तो यही होगा कर्ण सिंह । तुम पाप भुगत रहे हो ।
कर्ण सिंह- मुझे क्षमा करे महाराज ।
विक्रमादित्य  - क्षमा तुम्हे वो ऋषि पत्नी ही कर सकती है । तुम मुझे यह बताओ की वो ऋषि पत्नी कहां मिलेगी ।
कर्ण सिंह- उज्जैनी नरेश वो आपको हमारे राज्य के दक्षिण दिशा में तालाब किनारे मिलेगी वही पर उनकी कुटिया है ।
विक्रमादित्य  -ठीक है हम वहां जाते है चलो मुंजा ।
विक्रमादित्य वहां पहुच कर कहते है प्रणाम देवी ।
ऋषि पत्नी  - आप तो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ना ।
विक्रमादित्य- आपने सही समझी । देवी हम आपको कुछ कहना चाहते है पाप कर्ण सिंह ने किया तो सजा सम्पूर्ण प्रजा को क्यो देवी । बच्चे बुढे सभी उस श्राप से ग्रसित है । आप कृपया समझे ।
ऋषि पत्नी  - महाराज आपने सही कहा पाप राजा ने किया कर्ण सिंह की सजा सम्पूर्ण प्रजा क्यो भूगते हमसे गलती हो गई हम अपना श्राप वापस लेते है और कर्ण सिंह को क्षमा करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य  - धन्यवाद देवी हम यही सोच कर आपसे मिलने आए थे की आप ऋषि पत्नी है आप मानवता जरूर दिखाएंगी आपको कोटि कोटि धन्यवाद ।
ऋषि पत्नी  - सम्राट धन्यवाद के हकदार आप है आपके मन में कितनी धर्मपरायणता है की आपको दूसरो की प्रजा की भी इतनी चिंता रहती है आप धन्य है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य  - देवी हमने अपना जीवन धर्म को समर्पित किया है । मानवता की सेवा करना ही हमारा उदेश्य है । धन्यवाद देवी हम चलते है ।

विक्रमादित्य- मुंजा हमने श्राप से तो मुक्ति दिलवा दी है ।
मुंजा- महाराज अब हमें कोमलांगी को छुडाना होगा ना जाने वो किस स्थति में होगी । 
विक्रमादित्य- सही कहा तुमने । मुंजा क्या तुम कुछ पता लगा सकते हो ।
मुंजा - महाराजा श्राप से मुक्त कोमलांगी भी हुई होगी तो अब हम पता लगा सकते है । महाराज वो कुछ दूर एक गुफा में है ।
विक्रमादित्य  - चलो वही चलते है ।
विक्रमादित्य गुफा में पहुंचते है ।
मुंजा - महाराजा लगता है वो राक्षस गुफा में नही है । 
विक्रमादित्य- यह तो अच्छी बात है हम अंदर चलते है ।
कोमलांगी घबरा जाती है ।
विक्रमादित्य- घबराओ नही में विक्रमादित्य हूं ।
कोमलांगी - आप चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ना हमारे पिताजी के मित्र ।
विक्रमादित्य  - हां में ही हूं । में तुम्हे छुड़वाने आया हूं ।
कोमलांगी - महाराज विक्रमादित्य जी हम अगर बाहर निकले तो हमारा सिर फूट जाएगा । आपको पहले राक्षस को मारना पढेगा उसके बाद ही हम जा पाएंगे ।
विक्रमादित्य- ठीक है हम उसे मारेंगे । 
कोमलांगी- नही महाराज यह इतना आसान नही है क्योकि उसकी जान उसके शरीर में नही अपितु कही ओर है ।
विक्रमादित्य- तो फिर मेरी बात सुनो तुम उसे बहलाओ फूसलाओ और यह पता करो में यही थोडा दूर खडा हो जाता हूं ।
तभी वो राक्षस आता है भोजन लेकर ।
कोमलांगी - तुम हमारी कितनी चिंता करते हो ।
राक्षस - फिर भी तुम हमसे प्रेम नही करती हो ।
कोमलांगी -ठीक है हम तुमसे प्रेम करेंगे किंतु हमें यकीन दिलाओ की तुम हमसे ही प्रेम करते हो । हमें अपना रहस्य बताओ की तुम्हारी जान कहां बस्ती है तब ही हम तुम पर यकीन कर पाएंगे ।
राक्षस - तुमने हमें दुविधा में डाल दिया है । 
कोमलांगी - हमें पता था तुम हमसे प्रेम नही करते ।
राक्षस - अरे नाराज मत हो चलो हम बताते है । यहां से बहुत दूर मल्लिकार्जुन पर्वत है वहां एक मंदिर है उसके नीचे एक तालाब है तालाब में एक कछुआ रहता है उसके सर में हमारी जान है ।
कोमलांगी  - अभी कोई शुभ कार्य नही होता है हम पूर्णिमा पर शादी करेंगे इतने तुम भी अपने सगे संबंधियों को बुला लो हम अपना भव्य विवाह करेंगे ।

विक्रमादित्य - कोमलांगी तुमने अच्छा किया अब हम चलते है तुम चिंता मत करना हम तुम्हे जल्द छुडवाएंगे हम पर्वत पर जा रहे है ।

विक्रमादित्य और मुंजा मल्लिकार्जुन पर्वत पर जाते है । 
मुंजा - महाराज हम आ तो गए है अब कहां जाना है ।
विक्रमादित्य  - मंदिर तो यही है चलो उस ओर चलते है ।
मुंजा - महाराजा हम कब से ढूंढ रहे है कही ऐसा तो नही की उस राक्षस ने झूठमूठ ही कहा हो राजकुमार से ।
विक्रमादित्य - हो सकता है किंतु हम इतना दूर आए है तो अच्छे से सब देखकर ही जाएंगे ।

विक्रमादित्य मंदिर को अच्छे से देखते तब उन्हे मंदिर के पत्थर पर एक यंत्र दिखता है वे उसे पढने की कोशिश करते है किंतु उसकी भाषा वहां की कोई क्षेत्रीय भाषा होती है चुकि विक्रमादित्य मालवा ( मध्य प्रदेश ) से आते थे तो उनके लिए यह कठिन था । 
तभी मुंजा मंदिर की घंटी बजाते है तभी घंटी खुलकर उस यंत्र पर जा गिरती है और नीचे तालाब का द्वार खुल जाता है और सम्राट विक्रमादित्य तालाब में जाते है । तालाब में बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें वो कछुआ दिखता है किंतु वो कछुआ एक सांप के मुह में रहता है । विक्रमादित्य उस सांप से कछुआ निकालते है तभी सांप उन पर हमला कर देता है विक्रमादित्य सांप को घायत कर कछुए के सिर पर हमला करते है तभी राक्षस को अहसास होता है की उसकी जान खतरे में है । वो विक्रमादित्य से लडने आता है विक्रमादित्य उसे हरा देते है और युद्ध होते समय मुंजा कछुए के सिर पर हमला कर देते है और राक्षस मर जाता है । विक्रमादित्य तुरंत गुफा की ओर निकलते है कोमलांगी को बचाकर वे कर्ण सिंह को सोंप देते है । विक्रमादित्य ना केवल एक राजकुमारी को बचाते है अपितु एक विराट नगर को भी बसा देते है एक ऋषि पत्नी के सम्मान का महत्व भी सिखा देते है कर्णसिंह जैसे राजाओं को ।

तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य 
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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