इक्कीसवा गुण तेजस्वी

।। इक्कीसवा गुण तेजस्वी ।।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ऐसे ही एक दिन निकले थे प्राकृतिक सौंदर्य को देखने हरे भरे जंगल की ओर निकले । तभी एक वनवासी हिरण के पीछे - पीछे भाग रहा था उसका शिकार करने के लिए । तभी सम्राट विक्रमादित्य उस हिरण को बचाने के लिए निकलते है । वनवासी जैसे ही तीर छोड़ ता है सम्राट विक्रमादित्य उसी दिशा में तीर छोड़ कर उस तीर से तीर को काट देते है और हिरण के प्राण बचा लेते है । हिरण अपनी भाषा में विक्रमादित्य को आशीर्वाद देते है । सम्राट भी उनकी भाषा समझ जाते है । 
वनवासी - यह क्या किया तुमने ? हमारा शिकार ।
सम्राट विक्रमादित्य - जिसने किसी का कुछ नही बिगाड़ा उसे क्यो मार रहे हो हम ऐसा अधर्म नही होने देंगे । अगर शिकार का इतना शोक है तो अपने पत्नी और बच्चो को दोडाओ और उनका शिकार करो । तुम जिसे जीवित नही कर सकते उसे मारने का अधिकार नही है तुम्हारे पास ।
वनवासी - तुम कौन हो तेजस्वी युवक , समझाने का तरीका इतना सरल की मेरे जैसा मूर्ख भी समझ गया । कौन हो आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ।
वनवासी - महाराज क्षमा कर दो महाराज हमने आप पर शस्त्र उठाकर पाप किया है महाराज हमे दण्ड दिजिए । हमारा धनुष बाण आपके चरणों में अर्पित करते है । हमें दण्ड दे चक्रवर्ती सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम्हारा दण्ड यह है की अब से तुम कभी शिकार नही करोगे । जब हमने शिकार प्रतिबंधित कर दिया है तो कोई शिकार नही करेगा तुम भी नही । जाओ अब शिकार नही करना ।
वनवासी - जो आज्ञा महाराज , आपका तेज बना रहे ।

सम्राट विक्रमादित्य उस हिरण को बचाकर आगे बढते है । वे आगे बढते हुए आते है उन्हे एक पेड से लटका हुआ युवा मिलता है जो फांसी लगाने चा प्रयास कर रहा था ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन हो तुम और फांसी लगाते हुए तुम्हे लज्जा नही आई उतरो ।
राजकुमार - आप कौन हो मुझे फांसी लगाने दो ।
सम्राट विक्रमादित्य - में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हूं और यह मेरा आदेश है की नीचे उतरो । 
राजकुमार - जी महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या तुम जानते नही आत्महत्या करना कितना बड़ा पाप है । आत्म हत्या करने वाले की आत्मा सदैव भटकती रहती है । कौन हो तुम ओर क्यो आत्महत्या कर रहे थे ।
राजकुमार - सम्राट में वासू हूं कालिंजर राज्य का राजकुमार । 
सम्राट विक्रमादित्य - अब बताओ ।
राजकुमार - महाराज कुछ समय पहले में घने जंगल से निकल रहा था तभी वहां एक सुंदर कन्या देखी जो सुंदरता में अप्सराओं को भी मात दे दे । मैने जब उसे प्रणय निवेदन किया । तब उन्होंने कहा की उनका जन्म ऐसे नक्षत्र में हुआ है की वो किसी से प्रेम नही कर सकती , किसी से विवाह नही कर सकती । हमने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा की ज्योतिषी ने कहा है जो भी उनसे विवाह करना चाहता है उसे खोलते कडाई में सकुशल निकल पाएगा उसी से होगा तब से ही हमारे राजपरिवार ने ऐसे व्यक्ति को ढूंढना शुरू किया मगर कोई नही मिला ।

तब हमने उससे पूछा भी तो उसने कहा ज्योतिषी ने कहा की किसी ऋषि को लालन पालन के लिए सौप दो तब से हम एक ऋषि पुत्री के रूप में ही रह रहे है । 
सम्राट विक्रमादित्य - वासू तुमने उस स्त्री से पूछा नही की अगर कोई ऐसा ना करे तो क्या होगा ।
राजकुमार वासू - पूछा हमने तो कहा की अगर वह व्यक्ति खोलते हुए कडाई से सकुशल नही निकला तो उसके पति की पहले ही दिन मौत हो जाएगी । 
सम्राट विक्रमादित्य - फिर आगे क्या हुआ ।
राजकुमार वासू - सम्राट फिर हम उस स्त्री के साथ उनके पिता ऋषि के पास गए । तो वहां जाकर हमने उनसे विवाह का कहा तो वे कहने लग गए की तुम्हे शर्त पता है । हमने कहा हां फिर वो हमें उस कडाई की और ले जा रहे थे तब हमने बीच में कई सारे कंकाल देखे उन कंकालों को देखकर हमारी हिम्मत टूट गई और हम वापस आ गए किंतु महाराज तब हे हम उस स्त्री की याद में खोए हुए है एक माह बीत गया पर आज खुद को रोक ना सके इसलिए यह निर्णय लिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - वाकई शर्त तो बहुत कठिन है । तुम उस स्त्री को भूल जाओ क्योकि प्राण है तो सबकुछ है वह शर्त बहुत ही कठिन है तुम नही कर पाओगे तुम ही क्या कोई नही कर पाएगा ।
राजकुमार वासू - सम्राट हम उससे विवाह किए बगैर नही जींह पाएंगे । हम उससे प्रेम है ।
सम्राट विक्रमादित्य - अरे शांत हो जाओ तुम तो बच्चो की तरह जिद्द करने लग गए । हम तुम्हे वचन देते है की तुम्हारे विवाह कराने का प्रयास करेंगे । चलो हमें उन ऋषिवर के पास ले चलो ।
राजकुमार वासू - जी महाराज ।

" सम्राट विक्रमादित्य उन ऋषि के आश्रम जाते है "

सम्राट विक्रमादित्य - ऋषिवर प्रणाम । आपकी पुत्री राजकुमार का विवाह इस राजकुमार से करवाने के लिए हम आए है ।
ऋषिवर - हे तेजस्वी पुरूष आप कौन है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम राजा विक्रमादित्य है ।
ऋषिवर - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप स्वागत है सम्राट आपका हमारे आश्रम में ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऋषिवर इसकी तरफ से हम उस खोलते हुए कुएं में कुदेंगे । 
ऋषिवर - महाराज आप क्यो इनकी तरफ से आप स्वंय कीजिए हमारी पुत्री से विवाह । वो अप्सराओं से भी ज्यादा सुंदर है । आपके योग्य है । लो वो आ गई ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपकी पुत्री अत्यंत सुंदर और जैसा आपने कहा वैसी है अप्सराओं से भी सुंदर है क्योकि हमने कई बार स्वर्ग में हमारे मित्र देवराज इंद्र से मुलाकत की है । मगर ऋषिवर हम उन राजाओं में नही है जो सुंदरता के पुजारी हो । हमारी पत्नी है और हमारे लिए तो वो ही सबकुछ है ।
ऋषिवर - महाराज आपने दूसरा विवाह नही किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही हम चरित्रवान पुरूष है ।
ऋषिवर - ऐसा तो सिर्फ आप ही कह सकते है महाराज । किंतु महाराज आप इन राजकुमार के लिए अपने प्राण संकट में डाल रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्योकि यह आत्महत्या करने वाले थे । राजकुमारी आप भाग्य शाली है वासू आपसे प्रेम करते है ।
राजकुमारी - आप हमारे लिए प्राण दे रहे थे ।
राजकुमार वासू - हां राजकुमार हम आपसे बहुत प्रेम करते है । महाराज विक्रमादित्य ने हमें बचा लिया था ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम वासू की तरफ से जाएंगे ।

" राजकुमार वासू चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के चरण पकड लिए और कहता नही महाराज आप मेरे लिए यह मत करे आप अपने प्राण संकट में क्यो डाल रहे है "
सम्राट विक्रमादित्य - कोई बात नही चलो हम तुम दोनों को मिलवाकर ही रहेगें ।
सम्राट विक्रमादित्य खोलते हुए कुएं में कुद ने का प्रयास करते है वे जय माँ काली कह कर कुद जाते है ।

सम्राट विक्रमादित्य की चीखे सुनाई देती है । तभी माँ काली की साधना अचानक टुट जाती है । 
माँ काली - पुत्र विक्रमादित्य संकट में है हमें जाना होगा । 
" माँ काली सम्राट विक्रमादित्य के पास आती है विक्रमादित्य का शीश अपनी गोद में रखती है माँ काली अमृत की बुंदे विक्रमादित्य को पीला देती है विक्रमादित्य के प्राण लौट आते है " 
माँ काली - उठो पुत्र ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ आप आ गई आपने हमारे प्राण बचा लिए । 
माँ काली - आती कैसे नही अपने सबसे बड़े भक्त को बचाने । आपने ऐसा क्यो किया विक्रमादित्य अपने प्राणों को संकट में डाल देते हो प्रजा के लिए , मनुष्यता के लिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ सबका सुख ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है ।
माँ काली - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य में आपको वरदान देती हूं की आपकी मौत नही होगी आप 108 वर्ष के होने पर सशरीर स्वर्ग जाएंगे और वही से आप अपने सभी आराध्य भगवान के नाम जा सकेंगे । 
सम्राट विक्रमादित्य - माँ आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
माँ काली - जो सबके प्राणों को रक्षा करता हे अपने प्राण दाव पर लगा देता है उसे भला मौत कैसे आएगी । खुश रहो ।
सम्राट विक्रमादित्य - जय माँ काली ।

सम्राट विक्रमादित्य उस राजकुमार का विवाह राजकुमारी से करवाते है । दोनों वर वधु सम्राट विक्रमादित्य के चरण छूकर उनसे आशीर्वाद लेते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - चिरंजीवी भव । सौभाग्यवती भव । अब तुम दोनों अपने राज्य जाओ । और वहां नया जीवन शुरू करो । 

" आश्रम के बाहर आते ही राजकुमार का मित्र उन्हे दुख भरा समाचार सुनाता है की राज्य में विद्रोह हो गया और राज्य छिल लिया गया है " 
सम्राट विक्रमादित्य - वासू तुमने चिंता मत करो में हूं अभी । चलो तुम्हारा राज्य ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य उस राज्य का विद्रोह खत्म अनाचारियों को मार कर राजकुमार वासू का राज्यअभिषेक करवाते है ।
राजकुमारी - महाराज आप नही होते तो मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो जाता । आपका उपकार में जीवन भर नही भुलूंगी । सदैव ईश्वर से प्रार्थना करने पर आपकी मंगल कामना मांगूंगी ईश्वर आपका तेज इस पृथ्वी पर बनाए रखे सम्पूर्ण पृथ्वी पर आपके महान कार्यो का धर्म का आपका ऋण रहेगा ।
राजकुमार वासू - चक्रवर्ती सम्राट वीर विक्रमादित्य जी आप हम दोनों के लिए ईश्वर के समान है आपने ना केवल हमारा अपितु हमारे राज्य को भी दुष्टों से बचाया । आपकी भव्य प्रतिमा इस राज्य में हम लगाएंगे आपको समर्पित है महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - इन सब की कोई जरूरत नही वासू तुम ईश्वर की प्रतिमा बनाओ ।
राजकुमार वासू - उनकी तरह ही आप भी मेरे लिए पूजनीय है महाराज ।
राजकुमार वासू - ठीक है जैसा तुम्हे लगे । तुम दोनों खुश रहो अब हम चलते है ।
राजकुमार और राजकुमारी वह पूरी प्रजा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की जय के नारे लगाकर उन्हे विदा करती है ।

" ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य उनके अतिरिक्त अगर कोई इतना बड़ा जोखिम लेता तो खुद विवाह करता किंतु सम्राट विक्रमादित्य अपने धर्म और चरित्र के पक्के थे ।

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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