छबीसवा गुण उदारता
।। छबीसवा गुण उदारता ।।
" सम्राट विक्रमादित्य अपना घोडा तेज दोडा रहे थे । तभी उन्हे शेर की दहाड की आवाज आती है "
सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा तुमने सुना इस आवाज को ।
मुंजा - हां महाराज यह आवाज तो उस ओर से आ रही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - चलो चलते है उधर ।
" सम्राट विक्रमादित्य देखते है एक युवक के हाथ में भेढ का बच्चा है । और वह युवक शेर के सामने खडा है "
सम्राट विक्रमादित्य - हमें इस युवक को बचाना होगा ।
" शेर उस युवक पर हमला कर देता है । वह युवक भयभीत हो जाता है उसे लगता है अब वो नही बचेगा । किंतु उतने में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आकर उस शेर के पंजे पकड लेते है और उसे धका देते है । सम्राट विक्रमादित्य अपनी तलवार निकाल लेते है शेर उस तलवार को देखकर भाग जाता है "
युवक - धन्यवाद महाराज ।
मुंजा - तुम इन्हे जानते हो ।
युवक - हां इन्हे कौन नही चाहता । सम्राट विक्रमादित्य जी ।
सम्राट विक्रमादित्य - युवक आपका नाम क्या है ।
युवक - मृदुल ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम बहुत ही वीर हो । यहां क्या कर रहे थे ।
मृदुल - सम्राट इस भेड के बच्चे को देखा तो बचाने का निर्णय लिया किंतु शेर हमें मार देता आपने हमें बचा लिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह तो मेरा कर्तव्य है । तुम कहां जा रहे थे ।
मृदुल - महाराज मुझे एक राजकुमारी से प्रेम हो गया है किंतु उन्होंने हमें कहा की हम उसे स्वर्णपुरी का पता बताए तभी वो हमसे विवाह करेंगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - मृदुल हम तुम्हारी मदद करेंगे । तुम वीर हो दया का भाव है तुममें इसलिए हम तुम्हारे मदद करेंगे ।
मृदुल - सम्राट आप हमारे लिए कष्ट मत करिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - कोई बात नही में तुम्हारी मदद करूँगा ।
मृदुल - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप बहुत उदार है । आपकी उदारता ब्रह्मांड में उदाहरण है किसी अंजान की मदद करना ।
सम्राट विक्रमादित्य - युवक तुम अब घर जाओ हम तुम्हे सुचित कर देंगे स्वर्ण पुरी का रहस्य जानने पर । और तुम चिंता मत करना तुम्हारी शादी उस राजकुमारी से ही होगी ।
" सम्राट विक्रमादित्य और मुंजा स्वर्ण पुरी की खोज में निकल जाते है । सम्राट विक्रमादित्य लगातार यात्रा करके समुद्र किनारे पहुचते है "
सम्राट विक्रमादित्य - हम यहां तो आ गए मगर अब इसके आगे कहां जाना होगा मुंजा ।
मुंजा - हां महाराज अब इसके आगे कैसे जाना है यह हमें पता करना होगा । महाराज वो देखिए पक्षी के बच्चे गिर रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - चलो उन्हे बचाते है ।
" सम्राट विक्रमादित्य चील के बच्चो को घोसले से गिरते हुए देख उन्हे बचाते है वह उन्हे घोसले पर सुरक्षित रखते है । इतने में दोनों चीले आकर सम्राट विक्रमादित्य पर हमला कर देती है "
सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा यह हम प क्यो हमला करने लग गई ।
मुंजा - सम्राट आप रूकिए हम इन दोनों खो बंदी बना लेते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम हमें क्यो मारना चाहते हो ।
चील - क्योकि तुम हमारे बच्चो को मारने वाले हो ।
मुंजा - तुम गलत समझ रहे हो सम्राट ने तो तुम्हारे बच्चो के प्राणों की रक्षा की है अगर यह ना होता तो तुम्हारे बच्चे नीचे गिरकर मर जाते ।
चील - हमें क्षमा कर दिजिए महाराज हमसे गलती हो गई ।
सम्राट विक्रमादित्य - कोई बात नही ।
चील - सम्राट आप कहां जा रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम स्वर्ण पुरी की खोज में है ।
चील - स्वर्ण पुरी वो तो बहुत दूर है ।
मुंजा - क्या तुम जानते हो तुम बताओगे हमें ।
चील - जरूर स्वर्ण पूरी बीच समुद्र में है आप लोग 200 मील दूर बीच समुद्र में जाइए आपको दिख जाएगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद । मुंजा तुम हमें लेकर चलो वहां ।
मुंजा - जो आज्ञा महाराज आप बैठिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - चलो ।
मुंजा - महाराज वो देखिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - चील के कहे अनुसार तो यही स्वर्ण पुरी है क्योकि चील ने कहा था बीच समुद्र में ।
" सम्राट विक्रमादित्य द्वीप पर पहुंच जाते है "
सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा यहाँ तो पत्थर ही पत्थर है । चलो देखते है चल कर ।
मुंजा - हां महाराज पत्थर ही पत्थर है यहां तो ।
सम्राट विक्रमादित्य - आओ चलकर देखते है ।
" सम्राट विक्रमादित्य जैसे ही द्वीप पर पहुचते है द्वीप पर समुद्र का पानी चढने लगता है "
मुंजा - महाराज यह क्या रहस्य है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस द्वीप पर कुछ रहस्य अवश्य है वह देखो समुद्र में से राक्षस निकल रहे है । हम इनका वध अभी नही कर पाएंगे क्योकि जल का स्तर लगातार बढ रहा है । हम अपनी योगशक्ति से आकाश में जाएंगे ।
" सम्राट विक्रमादित्य और मुंजा आकाश की ओर जाते है और जैसे ही शाम होती है जल का स्तर कम हो जाता है और वही पत्थरों का खंडर स्वर्ण पुरी में बदल जाता है "
मुंजा - सम्राट यह तो बहुत सुंदर नगरी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां सही कहा तुमने । पूरा नगर सुंदर है और स्वर्ण से बना है ।
मुंजा - सम्राट वहां चलिए वह मंदिर देखिए कितना भव्य है ।
सम्राट विक्रमादित्य - भव्य भी और रहस्यमयी भी , इतना सुंदर नगर होने के बावजूद भी यहां पर जीवन का कोई निशान नहीं है ।
मुंजा - सम्राट वहां देखिए वह सुंदर स्त्री अश्व पर सवार होकर आकाश से इसी ओर आ रही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - चलो वहां छुप जाते है ।
" सम्राट विक्रमादित्य मंदिर के पीछे छुप जाते है । वह सुंदर स्त्री आती है माता के मंदिर में दर्शन करके चली जाती है अश्व पर बैठकर आकाश की ओर "
मुंजा - महाराज जीतना सुना था उससे कई अधिक रहस्यमयी है यह नगरी ।
सम्राट विक्रमादित्य - यही रहस्यमयी तो है यह स्वर्ण पुरी । चलो हमें इतना तो पता चला यहां आकर । अब उस युवक का विवाह करवा सकते है हम ।
" सम्राट विक्रमादित्य उज्जैन आते है । उस युवक को बुलवाते है " सम्राट विक्रमादित्य उस युवक को बताते है सबकुछ । युवक मृदुल - सम्राट मुझे सबकुछ याद आ गया है आप हमारे साथ राजकुमारी के राज्य चलिए "
मृदुल - महाराज हमने आपके प्रश्न का उत्तर दे दिया है स्वर्ण पुरी का पता लगा लिया है ।
महाराज - इस युवक को बंदी बना लो ।
" तभी सम्राट विक्रमादित्य अपनी तलवार निकाल लेते है वह उन्हे डरा देते है वह सीधे महाराज के पास जाकर तलवार रख देते है उनकी गर्दन पर "
" तभी वह स्त्री आ जाती है । पिताजी यह जो कुछ भी कह रहे है सब सत्य है और यह नवयुवक मृदुल हमारे पूर्व जन्म के पति है हमारे पुण्य की वजह से हमें सब याद रहा इस जीवन में भी और इन्हे ढूंढने के लिए और इन्हे याद दिलाने के लिए ही हमने स्वर्ण पुरी को ढूंढने की शर्त रखी थी "
महाराज - ठीक है पुत्री हम आपका विवाह इनसे ही करते है ।
" सम्राट विक्रमादित्य दोनों का विवाह करवाते है और उज्जैन लौट आते है ।
मुंजा - सम्राट विक्रमादित्य आप खोए हुए हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां मुंजा हम स्वर्ण पुरी का रहस्य सुलझा नही पाए बस वहीं रह गया मन में ।
" इतने में न्याय का घंटा बजता है "
सम्राट विक्रमादित्य - इस समय कौन होगा चलो देखते है ।
राजकुमारी - महाराज हमारी सहायता किजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - राजकुमार तुम ।
मुंजा - आप तो मृदुल के साथ विवाह करके स्वर्णपुरी में रहने चली गई थी ना क्या हो गया अचानक ।
राजकुमारी - महाराज हम जैसे ही वहां रहने गए पहले ही दिन मेरे पति वहां से गायब हो गए और अब तक नही मिले इसलिए हम यहां आए है हमारी सहायता कीजिए महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम रोना बंद करो और चलो हमारे साथ हम देखते है स्वर्णपुरी चलो ।
" सम्राट विक्रमादित्य स्वर्णपुरी जाते है "
सम्राट विक्रमादित्य - चलिए राजकुमारी आपकी स्वर्णपुरी आ गई ।
मुंजा - महाराज वो देखिए मृदुल तो सही सलामत खडा है ।
राजकुमारी - कहां चले गए थे आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - कहां गए थे तुम ।
मृदुल - सम्राट प्रणाम । सम्राट हम विवाह करके आए उसी दिन समुद्री दैत्य ने मेरा अपहरण कर लिया । वह पिछले जन्म में हमारा प्रधानमंत्री था , वह उसने मेरी हत्या की थी मरते वक्त मैने कहा था उसे की दैत्य राक्षस बन जाओ । और वो मुझ से बदला लेने आया था ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो तुम बचकर कैसे आए ।
मृदुल - हमने उस दैत्य को मारा बड़ी बहादुरी से और हम यहां आए ।
राजकुमारी - सम्राट विक्रमादित्य आप हमारे अतिथि है आप आज रात्री भोजन करके ही जाइएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक है राजकुमारी ।
मुंजा - सम्राट आपने आज भोगने के लिए हामी कैसे भर दी क्योकि आप भोजन का अकसर मना करते है क्योकि आपका मानना है की आप किसी को तकलीफ नही देना चाहते ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुमने नही कहा और हमने भोजन का इसलिए हां किया क्योकि हमें संदेह है । याद करो मृदुल जो शेर को नही भार पाया वो दैत्य राक्षस को कैसे मारेगा ।
मुंजा - हां महाराजा और उसे एक खरोंच तक नही आई ।
सम्राट विक्रमादित्य - यही तो सोचने वाली बात है । जरूर कुछ तो गडबड है । वो देखो मुंजा मृदुल इतनी रात को कहां जा रहा है । चलो देखते है ।
" सम्राट विक्रमादित्य और मुंजा बाहर आते है किंतु वहां उन्हे कोई नही दिखता "
मुंजा - सम्राट यहां तो कोई नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - बाहर तो केवल समुद्र है चलो समुद्र के अंदर ही कुछ पता चलेगा ।
" समुद्र के भीतर जाते ही उन्हे एक अजीब सा जानवर पकड लेता है "
मुंजा - सम्राट इसकी पकड तो बहुत मजबूत है हम कैसे छुटेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम चिंता मत करो हम प्रयास कर रहे है ।
" सम्राट विक्रमादित्य बमुश्किल छूटते है वह मुंजा को छुडवाते है तभी वो जानवर उन पर हमला कर देता है हमले के बाद विक्रमादित्य उसे तलवार से मार देते है किंतु उसका शरीर फिर जुड जाता है "
मुंजा - महाराज यह सब मायावी है आप अपने चक्र का उपयोग करें ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां अब करना ही होगा ।
" सम्राट विक्रमादित्य अपने चक्र से उस जानवर का अंत कर देते है वह उस गुफा का द्वार भी तोड देते है " तभी उन्हे वहां मृदुल दिखता है । सम्राट उसे छुडवाते है । मृदुल - अच्छा हुआ सम्राट आप आ गए वो राक्षस मुझे बंदी बनाकर मेरा रूप धारण करके गया है "
" उधर बहरूपिया मृदुल राजकुमारी के पास जाता है तभी असली मृदुल और सम्राट विक्रमादित्य आ जाते है "
राजकुमारी - कौन हो तुम ।
राक्षस - अच्छा हुआ तुम सब आ गए अब में तुम सबको मार कर राजकुमारी से विवाह करूंगा और इस स्वर्णपुरी का राजा बनूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - विवाह तो तेरा हम करवाएंगे वो भी मृत्यु से ।
" सम्राट विक्रमादित्य और राक्षस का युद्ध होता है । सम्राट विक्रमादित्य उस पर भारी पढते है तभी राक्षस छल का उपयोग करके आकाश से वार करता है । फिर सम्राट विक्रमादित्य ना चाहते हुए भी अपना इच्छा शक्ति धनुष का उपयोग करके उस राक्षस का वध कर देते है "
मृदुल - सम्राट एक बार फिर आपने हमारी रक्षा की आपका ऋण तो जीवन भर नही उतार पाएंगे हम दोनों । हमारा तो विवाह भी आपकी कृपा से ही हुआ था ।
राजकुमारी - हां महाराज । हम आपको उपहार में यह स्वर्णपुरी भेंट करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही राजकुमारी यह आप दोनो की है और आप दोनो की ही रहेगी ।
मृदुल और राजकुमारी - सम्राट विक्रमादित्य आपका विश्व विजय उज्जैनी धर्म ध्वजा हमारी स्वर्णपुरी पर लगाएंगे और आपके राज्य में शामिल होना चाहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य । मुंजा इन्हे हमारा परम प्रताप ध्वज देकर इनके स्वर्णपुरी के हर गुंबज पर लगा दो और इस स्वर्णपुरी को मालवा साम्राज्य में शामिल कर लो । किंतु यह स्वर्णपुरी आपकी ही रहेगी हम आप दोनो को यहां का राजा रानी घोषित करते है ।
मृदुल और राजकुमारी - धन्यवाद सम्राट आपके अतिरिक्त कोई और होता तो स्वर्णपुरी ले ही लेता । किंतु महाराज आप बहुत उदार है । आपको प्रणाम महाराज आपकी जय हो सदैव जय हो ।
तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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