पचीसवा गुण नीतिनिपुण

।। पचीसवा गुण नीतिनिपुण ।।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठे थे । उस समय उनके साथ सभी मंत्री बैठे थे तभी खाद्य मंत्री उनसे कहते है सम्राट आपकी आज्ञा हो तो हम आपसे सभा के बाद मिलना चाहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप यहाँ भी कह सकते है मंत्री जी ।
मंत्री - नही महाराज ऐसा कुछ भी नही है हम आपसे सिर्फ भेंट करना चाहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक है ।

" सम्राट विक्रमादित्य बगीचे में पहुंच कर कहते है बताइए मंत्री जी क्या समस्या आ गई है देश में "
मंत्री - महाराज आपको प्रणाम । आपको कैसे पता की समस्या है क्योकि हमने अभी आपको बताया भी नही और समस्या देश पर है राज्य पर नही आपने कैसे जाना ।
सम्राट विक्रमादित्य - वो इसलिए क्योकि हमने आपके शब्दो में चिंता अनुभव की । और देश का इसलिए पता चला क्योकि जिसने मालवा को समझ लिया उसका जीवन सफल हो गया और जो मालवा को समझ नहीं पाया उसका जीवन निरर्थक है । यह मालवा है मंत्री जी यहां के कण कण में विक्रमादित्य है । इस राज्य को विक्रमादित्य ने अपने खून पसीने से सींचा है इस राज्य में कब क्या होगा यह हमारी अंतरात्मा बता देती है । 
मंत्री - मालवा धन्य है सम्राट जहां आपके जैसा वीर त्यागी पुरूष हुआ ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्य तो हम है मालवा की पवित्र भूमि में जन्म लेकर । मंत्री जी हमारे अन्न भंडार में भंडार तो पर्याप्त है ।
मंत्री - हां सम्राट किंतु इस पास के सभी राज्यों में स्थति खराब हो सकती है ।

" इतने में वहां रतनगढ़ के राजा सोमदत्त आते है "

सम्राट विक्रमादित्य - रतनगढ़ के राजा सोमदत्त कैसे आना हूं आपका ।
सोमदत्त - प्रणाम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । हमारे राज्य में भयानक सूखा पढा है । हमारे यहां स्थति बड़ी भयानक है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर आपके राज्य में तो तीन नदियां और छ तालाब है ।
सोमदत्त - सम्राट इस बार ऐसा सूखा पढा की सब सुख गए । अन्न के सभी भंडार समाप्त होने को है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप निश्चिंत रहिए जब तक हम है किसी का अन्न भंडार खत्म नही होगा । मालवा राज्य का भंडार सभी के लिए खोल दिया जाए मंत्री जी ।
सोम दत्त - धन्यवाद सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - सोम दत्त तुम चिंता मत करो जब तक हम है एक भी राज्य और उसका नागरिक भूखा नही सोएगा ।
मंत्री - जी सम्राट । आप तो नीतिनिपुण है आप हमें मार्ग दर्शन दे दिजिए हम व्यवस्था करवाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें इस संकट की घड़ी में नीति बनाकर काम करना होगा । अभी तो आप सभी एस पास और भारतवर्ष के सभी राज्यो के मंत्रीयों को निर्देश दे या मेरा आदेश ही समझे की जिस राज्य में सुखा है वहां मालवा राज्य अन्न का भंडार भेजने में मदद करेगा । और अभी सूखा कई राज्य में है इसलिए अभी इतना ही अन्न दिया जाए जो 15 दिन तक सभी हर एक व्यक्ति को मिल जाए । उसके पहले ही हम इसका स्थायी हल निकाल लेंगे । 

" सम्राट विक्रमादित्य मुंजा को बुलाते है " 
सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा तुम मुझे यह बताओ की आस पास के राज्य में कितने समय से वर्षा नही हुई । हमारे मालवा में जहां इंद्र देव का वरदान है यहां भी दो माह से वर्षा नही हुई जबकि सभी राज्य हमारे निर्देश पर इंद्र देव की पूजा करते है फिर इंद्र देव ने वर्षा क्यो नही की ।
मुंजा - सम्राट सभी जगह यही हाल है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर वर्षा क्यो नही हुई हमें इंद्रदेव से मिलने जाना होगा ।

" सम्राट विक्रमादित्य और मुंजा स्वर्ग लोक जाते है "

मुंजा - सम्राट आज यहां इतना सन्नाटा क्यों है ? और आप आए और कोई स्वागत नही जबकि स्वंय देवराज इंद्र आपका स्वागत करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुछ तो समस्या है ।

" देवी रंभा दौड कर आती है । सम्राट विक्रमादित्य आइए में अभी उज्जैनी ही आने वाली थी आपसे मिलने अच्छा हुआ आप ही आ गए " 

सम्राट विक्रमादित्य - देवी रंभा स्वर्ग की रोनक कहां चली गई और आप इतनी चिंतित क्यो है ?
देवी रंभा - चक्रवर्ती सम्राट , देवराज इंद्र पिछले दो माह से स्वर्ग नही आए ।
सम्राट विक्रमादित्य - अचानक क्या हुआ हमें विस्तार से बताए । 
देवी रंभा - आप मेरे साथ चलिए ।

" देवी रंभा सम्राट विक्रमादित्य को देव राज इंद्र की पत्नी इंद्राणी के पास ले जाते है " 

देवी इंद्राणी - प्रणाम महाराज विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम देवी ।
देवी इंद्राणी - महाराज हम आपका स्वागत कैसे करे , देवराज इंद्र भी नही है यहां हमने रंभा से कहा तो उन्होंने की देवराज को आप ही ढूंढ सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी स्वागत तो होता रहेगा । आप हमें यह बताए की इंद्र देव गए कहां वह भी दो माह से । 
देवी इंद्राणी - सम्राट देवराज अपने एक भक्त को दर्शन देने गए थे तब से वे लौटकर नही आए ।
सम्राट विक्रमादित्य - अपने भक्त के पास वो भी दो माह से । इतना तो वे कभी उज्जैनी भी नही आए । शायद इंद्र देव किसी समस्या में है ।
देवी इंद्राणी - कैसे समस्या में महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी वो अपने किस भक्त के पास गए थे ।
देवी इंद्राणी - महाराज वे अपने किसी तांत्रिक भक्त को दर्शन देने गए थे । 
सम्राट विक्रमादित्य - बस वही समस्या हुई है । आप लोग चलिए हमारे साथ । देवी आप मुझे उस गुफा तक ले चलिए ।
देवी इंद्राणी - जी सम्राट । और आप और हम सभी देवराज इंद्र के रथ से चलते है शीघ्र पहुंच जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां यह उचित रहेगा ।

" रथ आता है । सारथी - आज्ञा महारानी । देवी इंद्राणी - सारथी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और हम सभी को उस गुफा में ले चलो " 

" सम्राट विक्रमादित्य और सभी उस गुफा के बाहर आते है वहीं पर बाहर एक राक्षस पहरा दे रहा होता है "
सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा अब तुम ही कुछ कर सकते हो । में उस राक्षस को मार दूंगा किंतु उस तांत्रिक को पता चल जाएगा । 
मुंजा - सम्राट में उस तांत्रिक का वेश धारण करता हूं और राक्षस के पास जाता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां यह उचित रहेगा । 

" मुंजा भेस बदलकर राक्षस के पास जाते है "
राक्षस - अरे तांत्रिक जी आप यहां कैसे आप तो अंदर थे बाहर कैसे ।
मुंजा - हम मायावी है कुछ भी कर सकते है कभी अंदर कभी बाहर । हम तुम्हारी परीक्षा लेने आए थे ।
राक्षस - हम आपकी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए ।
मुंजा - वो हम तुम्हे कल बताएंगे अब तुम जाकर फल ले आओ हमें भूख लग रही है ।
राक्षस - जी आप अंदर जाइए में लेकर आता हूं ।

" जैसे ही मुंजा तांत्रिक के रूप में अंदर जाते है वही तांत्रिक अपने असली रूप में खडा रहता है " 
तांत्रिक - मुंजा तुम्हे क्या लगा तुम मुझे चकमा दे दोगे । बाहर कोई राक्षस नही है में ही था । अब में तुझे छोडूंगा नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - इतनी भी क्या जल्दी है तांत्रिक जरा मुझ से भी मिल लो ।
तांत्रिक - आओ विक्रमादित्य आओ । देवराज को बचाने आए हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - कहां है देवराज इंद्र ।
तांत्रिक - नही बताऊंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य तलवार निकाल लेते है और तांत्रिक अपनी आखों की दृष्टी से तलवार पिघला देता है । 
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या माया है ।
मुंजा - सम्राट इसके पास असाधारण शक्ति है हमें सावधानी बरतनी होगी ।
तांत्रिक - विक्रमादित्य देवराज इंद्र मेरे सामने नही टीके तो तुम किस खेत की मूली हो । तुम उनसे ज्यादा शक्तिशाली तो हो नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - तांत्रिक तुम्हारी यह भूल भी आज सुधर जाएगी । में इंद्रदेव को लेकर जाऊंगा यहां से ।
" तांत्रिक अपनी दृष्टी से सम्राट विक्रमादित्य , मुंजा , देवी इंद्राणी और देवी रंभा को अपनी केद में ले लेता है " 
सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा यह भयानक जंगल कहां से आ गया अचानक ।
मुंजा - हां महाराज ।

सम्राट विक्रमादित्य - देवी इंद्राणी और देवी रंभा आप दोनो मेरी नजर से बिल्कुल भी दूर मत जाना यह स्थान बहुत मायावी है ।
देवी इंद्राणी - हां सम्राट ।

" तभी देवराज इंद्र को सम्राट विक्रमादित्य दिख गए "

देवराज इंद्र - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आइए यहां । 
सम्राट विक्रमादित्य - इंद्रदेव आप यहां कैसे और क्यो । और यह स्थान कौन सा है ।
देवराज इन्द्र - सम्राट विक्रमादित्य यह तांत्रिक की जटा है जहां आप और हम सभी बंदी बनाए गए है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी इंद्राणी ने बताया आप अपने भक्त को दर्शन देने आए थे फिर यह क्या है ।
देवराज इंद्र - इंद्राणी सही कह रही है हम आए दर्शन देने ही थे पर इस तांत्रिक ने हमें कहां की में अपना हाथ उसके सिर पर रखकर आशीर्वाद दूं । किंतु मैने जैसे ही हाथ लगाया हम यही बंदी हो गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपने हमें बताया क्यो नही देवराज ।
देवराज इन्द्र - आपने यहां आकर सही नही किया सम्राट विक्रमादित्य । हमने आपको इसलिए नही बताया की यह तांत्रिक आज हमारी बलि देगा जिससे यह सदैव के लिए अमर हो जाएगा हमारी शक्तियां इसके पास चली गई । और यह मूर्ख तांत्रिक जानता नही है की आपके पास हमसे ज्यादा शक्ति है यह तांत्रिक और शक्तिशाली बन जाएगा । इसलिए आपको यहां नही आना चाहिए था ।
सम्राट विक्रमादित्य - बात मित्रता की है और अब यह बात धर्म अधर्म की भी हो गई है । देवराज पूरी पृथ्वी पर अकाल पढा है । हमने प्रजा को वचन दिया था कि हमें सूखे से निपटने के लिए 4 दिन का समय दे हम नीति बनाएंगे सूखे से निपटने के लिए । मगर अब लगता है सूखा तो खत्म हो जाएगा आपके छूटते ही हमें नीति इसके खिलाफ बनाना है । आप हमें यह बताए यह कब बलि देगा हम सभी की ।
देवराज इंद्र - आज शाम को मंत्र बोलकर ।
देवी इंद्राणी - देवराज क्या हम सदैव के लिए दूर हो जाएंगे । 
देवराज इंद्र - हां देवी ।
देवी रंभा - स्वर्ग पर उस दुष्ट तांत्रिक का राज हो जाएगा ।
देवराज इन्द्र - लग यही रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऐसा नही होगा हम है अभी । 
मुंजा - जो कोई नही कर सकता वो हमारे सम्राट अवश्य करेंगे । 
देवराज इंद्र - हा देवियों यह सम्राट विक्रमादित्य है अगर इन्होंने ठान लिया है तो यह हमें काल के मुह से भी बचा लेंगे । तांत्रिक को लगता है उसने मुझे बंदी बना लिया तो वो वीर विक्रमादित्य को हरा देगा किंतु विक्रमादित्य हम सभी देवो से भी ज्यादा गुणवान है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देव राज में और मुंजा अभी आते है इसकी हलचल देखकर ।

" सम्राट विक्रमादित्य देखते है की तांत्रिक मन लगाकर मंत्र शुरू करता है " 

सम्राट विक्रमादित्य - देव राज हमें शीघ्रता करनी होगी इसके बाल उखाडना शुरू करे इसे दर्द होगा तो यह मन नही लगा पाएगा । 
देवराज इंद्र और सभी उसके बाल उखाडाते है । तांत्रिक का ध्यान टूटता है । तांत्रिक अपने बाल निकालकर फेंकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य आदि सभी स्वतंत्र हो जाते है ।
देवराज इंद्र - सम्राट आपकी नीति देख कर हम मान गए आप नीतिनिपुण में सबसे माहिर है ।

" तांत्रिक हमला शुरू कर देता है । सम्राट विक्रमादित्य सबसे आगे आ जाते है और तांत्रिक से युद्ध करते है । तांत्रिक तंत्र विद्या से हमला करता है और फिर विक्रमादित्य उसे अपनी देवी शक्ति से तुरंत भस्म कर देते है " 

देवराज इंद्र - सम्राट विक्रमादित्य आप सच में हमसे भी महान और वीर है हम यहां दो माह से बंदी थे । आपका यह उपकार हम कभी नही चुंका पाएंगे इसलिए आपको वर मांगने का भी नही कहूंगा में क्योकि वर भी आपके सामने बोना साबित होगा । 
सम्राट विक्रमादित्य - यह तो हमारा कर्तव्य था । आप बस पृथ्वी पर बरसात करे ।
देवराज इंद्र - जो आज्ञा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । 

और पूरी पृथ्वी पर वर्षा हो जाती है प्रजा खुशहाल होती है सभी राज्य के राजा महाराजा उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की जय जय कार करते है सभी कहते है सम्राट के लिए पूरी पृथ्वी एक समान है उन्होंने अपने राज्य से अन्न का भंडार खोला हम सभी धन्य है जो उनके राज में रहते है ।

देवी इंद्राणी वह देवी रंभा विशेष आग्रह करती है श्री चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप हमारे स्वर्ग लोक में भोजन करके जाए यही हमारी और से आपका स्वागत होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी देवी हमारी पृथ्वी पर वर्षा हो गई अब हम भोजन कर सकते है ।

।। तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिनके लिए प्रजा का सुख पहले था ।।

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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