पंद्रवा गुण बलिदान

।। पंद्रवा गुण बलिदान ।।
             
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपने राज्य में अक्सर राज्य भ्रमण पर निकलते थे यह देखने के लिए की राज्य में क्या चल रहा प्रजा क्या सोचती है अपने राजा के बारे में या किसी को कोई दुख या दर्द तो नही । ऐसे ही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य भ्रमण करते करते आधी रात को एक कुटिया के करीब पहुंचते है जहां एक बुजुर्ग व्यक्ति ताप रहे थे । वो सम्राट विक्रमादित्य को देखकर अत्यंत खुश गया मानो उसके घर साक्षात श्री हरि या महादेव आए हो । वो हाथ जोड़कर कर उनका स्वागत करते हुए कहता है ।
बुजुर्ग - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपका स्वागत है ।
विक्रमादित्य - कैसे है आप । अभी तक जाग रहे है कोई पीढा तो नही । 
बुजुर्ग - नही महाराज हम तो ताप रहे थे आप पधारे है हम आपके लिए कुछ भोजन लाते है ।
विक्रमादित्य- नही नही आप कष्ट ना करे , हम तो बस अपनी प्रजा को देखने आए है ।
बुजुर्ग- महाराज आप हमारी सेहत हमारी सुरक्षा के लिए नगर भ्रमण पर है आपका कुछ तो स्वागत करूंगा ही में ।
विक्रमादित्य- ठीक है जैसा आप उचित समझें ।
बुजुर्ग जब तक भोजन लाते है महाराज विक्रमादित्य को हल्की आखं लग जाती है । बुजुर्ग उनके पास भोजन रख कर चले जाते है की महाराज थक गए होंगे जब वे उठेंगे तब भोजन ग्रहण कर लेंगे ।
उसी बीच एक बुढी औरत सम्राट के पास आती है उसी पल सम्राट विक्रमादित्य की आंख खुल जाती है सम्राट तुरंत कहते है माता आप कौन ।

सम्राट विक्रमादित्य - आप कौन है माता ।
माता - मुझे माता माता क्यो कह रहे है मुझे कोई माता नही मानता मुझ जैसे बुढ़िया को तो उज्जैनी में खाना तक नहो मिला ।
विक्रमादित्य - हमारी उज्जैनी में किसी को भोजन ना मिले यह संभव ही नही किंतु आपको अगर भोजन नही मिला है तो में आपके लिए उचित व्यवस्था करता हूं कल और अभी तो आप यह भोजन कीजिए हमारे लिए एक बुजुर्ग भोजन देकर गए है । इतने आप इस भोजन को गृहण करे तत्पश्चात हम आपके लिए भोजन की स्थायी व्यवस्था करते है । आप इस भोजन को गृहण करे ।
माता - हम यह नही खा सकते सम्राट यह भोजन तो हमें उज्जैनी में जगह जगह मिला हमारी भूख इससे समाप्त नही होगी । हमें रक्त चाहिए ताजा मांस चाहिए जो हमें पूरे मालवा राज्य में नही मिला ।
सम्राट विक्रमादित्य - माता वो तो आपको नही मिल पाएगा हम और हमारे राज्य के लोग शुद्ध शाकाहारी है हम लोग अपने पेठ के लिए किसी मासूम की हत्या नही करते हमारे मालवा में हमने यह स्थापित किया है । आप चाहे तो 56 पकवान खाए अपनी भूख शांत करे ।
माता - हमें मास चाहिए । 
सम्राट विक्रमादित्य -यह संभव नही है माता ।
माता -तो फिर क्यो माता माता कहते हो जब मां की भूख शांत नही कर सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको सिर्फ मांस ही खाना है ना जरूरी तो नही किसी जानवर का ही हो मनुष्य का मांस चलेगा ।
माता - हां हमें मनुष्य का मांस भी चलेगा ।

सम्राट विक्रमादित्य अपनी तलवार निकालते है और कहते है माता हमारी गर्दन काट दीजिए और हमारा मांस खाइए और अपनी भूख शांत कीजिए ।
माता - यह आप क्या कह रहे है हम आपको नही मार सकते । आप राजा है इस राज्य के यहां की प्रजा का क्या होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य  - आपने उचित ही कहा की में राजा हूं किंतु में अपना धर्म  निभा रहा हूं में अपना जीवन बचा कर किसी मासूम पशु की जान नही ले सकता हमनें तो कभी जीवन में शिकार तक नही किया । और हम किसी बेकसूर पशु को मारेंगे तो वैसे भी हम राजा रहने योग्य नही रहेंगे क्योकि पशु हो या मनुष्य हम सभी के सेवक अथवा राजा है । हम इस पृथ्वी पर धर्म के प्रतिनिधि बने है और धर्म किसी पशु की हत्या नही बताता । आप हमारी हत्या करे और हमारा मांस गृहण करे और अपनी भूख शांत करे । इससे आपकी भूख भी शांत हो जाएगी और हमारा भी धर्म बच जाएगा ।
माता - ठीक है आपकी तलवार दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - जय मालवा जय उज्जैनी हे महाकाल मेरे भारत वर्ष को सुरक्षित रखना । चलाओ तलवार माता ।
तभी वो माता तलवार निकालती है किंतु वो माता और कोई नही स्वंय माता दुर्गा थी ।
मां दुर्गा - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य सर्वत्र विजय भव आपके जैसा राजा इस पृथ्वी पर नही हुआ एक पशु के लिए अपने प्राण देने तक की परवाह नही की वास्तव में धर्म के प्रतिनिधि है आप । आपकी सदा जय हो विजय हो । कलयुग में लोग हमारे नाम पर छल कपट कर मांस गृहण करेंगे किंतु उन लोगों के समक्ष आपका उदाहरण रहेगा की कोई भी देवी अथवा देवता मांस से प्रसन्न नही होता अपितु बलिदान देना ही है तो स्वंय के अहंकार अधर्म का दे । आप महान है सम्राट । 
सम्राट विक्रमादित्य  - मां हमारे लिए हमारी सम्पूर्ण प्रजा बराबर है । 
मां दुर्गा - सम्राट यह मेरी तलवार में आपको भेंट करती हूँ आपकी सदैव जय हो । में आपको यह भी वर देती हूं जहां आपका सम्मान होगा वहां मेरी पूजा करने वालो पर मेरी विशेष कृपा होगी ।

तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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