चोवीसवा गुण प्रेम
।। चोवीसवा गुण प्रेम ।।
" चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का यह गुण आज बहुत कुछ शिक्षा देगा सभी को , आज जहां प्रेम का मतलब ही विलासिता हो गया है वही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने विश्व को प्रेम का सत्य बताया था कि प्रेम क्या होता है किससे होता है क्यो करना चाहिए किससे ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य प्रजा को देखने निकले है वे बहुत आगे तक चले जाते है उन्हे एक कुटिया दिखती है विक्रमादित्य सोचते है यहां कोई संन्यासी अवश्य होंगे उनका आशीर्वाद लेकर ही आगे बढूंगा । किंतु वहां एक बंदरिया उन्हे इशारा करती है विक्रमादित्य समझ जाते है कि कुटिया में कोई नही है वे एक वृक्ष पर चढ़कर थोडा विश्राम करते है । तभी एक साधु महाराज आते है विक्रमादित्य उन्हे देखते है वे संत बंदरिया को ले जाते है और दो घडो के बीच रखते है एक से जल निकाल कर उस पर छिड़कते है वैसे ही वो सुंदर स्त्री बन जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य वही छुपकर देखते है वह कहते यह क्या चमत्कार है यह तो एक अत्यंत सुंदर स्त्री बन गई । हमें यहां रूकना पडेगा इस चमत्कार का रहस्य समझना ही है ।
सम्राट विक्रमादित्य रात भर देखते है वो स्त्री साधु महाराज को खाना बना कर खिलाते है । और सुबह होते ही वे साधु महाराज उसे दूसरे घडे से पानी छिडकर उसे फिर बंदरिया बना देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य उन साधु महाराज के जाते ही कहते है हमें इसे इस श्राप से मुक्त कराना होगा । आओ । सम्राट विक्रमादित्य उस स्त्री को श्राप से मुक्त करा देते है ।
कामिनी - हे महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपका यह ऋण हम जीवन भर नही उतार पाएंगे । आपने हमें श्राप से मुक्त कर दिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे सुंदरी आप कौन है और आप हमें कैसे जानती है ।
कामिनी - में कामदेव और अप्सरा पुष्पावती की पुत्री कामिनी हूं । में एक दिन काम लोक से पृथ्वी पर आई थी शिकार करने किंतु मेरा तीर एक पशु की जगह एक तपस्वी की बांह में लग गया और उन्होंने मुझे श्राप दिया की में आधे समय बंदरिया रहूंगी और आधे समय देवी । मैने उनसे क्षमा मांगी उन्होंने कहा जब राजा विक्रमादित्य आएंगे तब तुम्हारा कल्याण हो जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी शिकार सबके लिए बुरा ही साबित होगा किसी निर्दोष पशु की हत्या करना गलत है ।
कामिनी - सम्राट आज से आप मेरे पति है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही देवी यह संभव नहीं । ऋषिवर ने तुम्हे कहा की मेरे आने से श्राप खत्म होगा विवाह का नही कहा होगा ।
कामिनी - क्या में सुंदर नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऐसा नही है देवी आप तो अप्सराओं से भी सुंदर है और होंगी क्यो नही आप स्वंय सुंदरता के देव काम देव की पुत्री है । किंतु हम विवाहित है और हम अपनी पत्नी से ही प्रेम करते है । और हमारे लिए प्रेम का मतलब भोग विलास नही है हमारे लिए प्रेम वो सुंदर पल है जिसमे त्याग समर्पण और विश्वास की बात हो ।
कामिनी - धन्य है सम्राट आप और आपकी पत्नी परम सौभाग्य शाली आप ब्रह्मांड के एक मात्र चक्रवर्ती सम्राट है जो एक विवाह के सिद्धांत पर अडिग है । आप विवाह नही तो हमें श्राप से छुड़वाने के लिए हमारी और से यह पुष्प रख लिजिए हमारी तरफ से भेंट है आपके लिए इस पुष्प से आप अपनी दूसरी प्रेमी का अर्थात प्रजा के लिए राज कोष में रोज एक रत्न जमा कर पाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - बिल्कुल हम यह स्वीकार करते है धन्यवाद आपको ।
सम्राट विक्रमादित्य अपने महल लौट कर आते है वह गहरी निंद्रा में रहते है तभी उन्हे एक स्वप्न आता है जिसमें उन्हे एक बहुत सुंदर महल दिखता है ।
सम्राट विक्रमादित्य एक सुंदर महल सपने में देखते है वह कहते है खुद से कितना भव्य महल है और बाहर अत्यंत सुंदर बगीचा । अरे यह वृक्ष के नीचे कौन तपस्वी बैठा है जो तेजस्वी दिख रहा है शरीर से सुंदर , शक्तिशाली और चेहरे पर ऐसा तेज जो देवताओं के तेज को भी कम कर दे कौन है यह महापुरूष हमें देखना चाहिए । वे आगे बढते है तो खुद को ही पाते है । यह तो हम है मगर हम कैसे । और तुरंत सम्राट विक्रमादित्य की नींद खुल जाती है ।
महारानी चित्रलेखा - क्या हुआ सम्राट आप अचानक उठ गए क्या हुआ कोई सपना देखा आपने ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपकी कैसे पता ।
महारानी चित्रलेखा - आपकी अर्धांगनी है हम ,हम समझ जाते है आपको देखकर ।
" सम्राट विक्रमादित्य अपने सपने के बारे में बताते है । महारानी कहती है आप कल दरबार में यह बात बताईगा वहां कुछ पता हल निकलेगा "
सम्राट विक्रमादित्य - सही कहा आपने ।
" सम्राट विक्रमादित्य अपने सपने के बारे में सबको बताते है । वराहमिहिर जी उनसे कहते है सम्राट यह कोई संकेत है स्वर्ग से आपको पता लगाना चाहिए आप आज ही देवराज से मिलिए । दूसरों के लिए मुश्किल है किंतु आप जीते जी स्वर्ग जा सकते है आप वही से पता करिए आपको जरूर वही से संकेत मिले है सम्राट आप राज्य के राजपुरोहित जी को जरूर ले जाइए वे आपकी वहां इस रहस्य को सुलझाने में सहायता प्राप्त करेंगे वे दिन में अधिंकाश समय ईश्वर की आराधना में व्यतीत करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी वराहमिहिर जी । मंत्री जी राजपुरोहित जी को सम्मान से लाइए महल ।
राजपुरोहित जी के आने पर सम्राट विक्रमादित्य अपने सिंहासन से खडे होकर उनका अभिवादन करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम राजपुरोहित जी ।
राजपुरोहित जी - कल्याण अमसतु राजन् । कैसे याद किया आपने ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी बात को उनके सामने दोहराते है ।
राजपुरोहित जी - राजन् यह तो शुभ संकेत है आपको कुछ बड़ा मिलने वाला है । हम आपके साथ चलेंगे चलिए ।
सम्राट विक्रमादित्य और राजपुरोहित जी दोनों स्वर्ग की ओर जाते है तभी एक अश्व आता है और आकाशवाणी होती है सम्राट विक्रमादित्य हम आपसे बहुत प्रसन्न है इस अश्व पर विराजमान होकर आइए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारे साथ राजपुरोहित जी भी है ।
आकाशवाणी - वे तो मृत्यु के पश्चात आ ही जाएंगे स्वर्ग ।
राजपुरोहित जी - हां राजन् हम स्वर्ग आ ही जाएंगे अभी आप जाइए जल्द ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप यही रूकिएगा हम अभी आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य अश्व पर बैठकर स्वर्ग जाते है वह देवराज इंद्र की सभा में जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम इंद्र देव ।
इंद्र देव - आइए चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपका स्वागत है पधारिए ।
" सभी देवता सम्राट विक्रमादित्य के सम्मान में खडे हो जाते है "
सम्राट विक्रमादित्य - मित्र आपने हमें एक स्वंपन दिखाया है क्या प्रयोजन है उसका ।
इंद्र देव - सम्राट आइए आप हमारे सिंहासन पर बेठिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही इंद्र देव आपकी और हमारी बराबरी नही हो सकती है आप देवराज है ।
इंद्र देव - आपने सही कहा आपकी और हमारी बराबरी कैसे होगी । आप तो प्रजा के लिए हमें तक युद्ध की चुनौती दे चुके है । हम देवता कभी आकर्षण में बस जाए पर आप नही । महाराज विक्रमादित्य जो सिंहासन आपके पास है वह ब्रह्मांड में कभी किसी का नही हो सकता यह स्वर्ग का राज्य तो आता जाता रहेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह तो आपका बडप्पन है ।
इंद्रदेव - आइए हमारे सिंहासन पर बैठिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही देवराज इंद्र यह आपका सिंहासन है । हमारा नही हम नही बैठ सकते ।
इंद्रदेव - हम आपकी परीक्ष ले रहे थे राजन् और आप हर बार की तरह इस बार भी सफल हुए । हमारे स्वर्ग को पाने के लिए बडे बडे तपस्वी वह राक्षस तक तपस्या करते है इस स्वर्ग के सिंहासन के लिए और आपको मिल रहा है आप नही बैठे आप जैसा महान तो शायद दुर्लभ है इस पूरे संसार में । किंतु सम्राट विक्रमादित्य आपको हम से एक दो भेंट तो लेनी ही होगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या इंद्र देव ।
इंद्र देव - हमारी सभा में सतयुग त्रेता युग द्वापरयुग के सभी महापुरूष बैठे है चाहे वो ईकशवाकू हो या दिलिप या भागीरथ या अर्जुन हो या कर्ण या युधिष्ठिर सभी देवता हमारी सभा में बैठते है किंतु हमारे पास में कोई नही आज हम आपका अभिषेक करते है यही पर मित्र इसके लिए आप हमें मना नही कर सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - जैसा आप कहे ।
इंद्रदेव - में देवराज इंद्र यह घोषणा करता हूं की चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का पृथ्वी पर कार्यकाल पूर्ण होते ही जब वे स्वर्ग आएंगे तो उनके लिए हमारे पास में ही एक और सिंहासन होगा जिसमें सम्राट विक्रमादित्य महाराज विराजमान होंगे । यह स्थान आपके लिए आज से सुरक्षित है । हमारी दूसरी भेंट है यह मुकुट जो महादेव का है यह उन्होंने नही पहना यह आप पहनेंगे । यह आपके ही लिए है । जिस प्रकार ब्रह्मा जी विष्णु जी स्वर्ण मुकुट पहनते है वैसे ही महादेव जी को भी मिला था किंतु उन्होंने यह हमें दिया था और कहा था जो सभी देवो से भी महान हो जाए जिसके राज में कोई दुखी ना हो उसे ही यह मुकुट देना मेरी सतयुग की खोज आज कलयुग में आपके मध्यम से पूर्ण हुई आप यह पहने और आपका यह मुकुट इस सिंहासन पर रखे ताकि हमें हमेशा स्मरण होगा की मेरे मित्र मेरे पास ही सिंहासन पर बैठे है ।
सम्राट विक्रमादित्य वह मुकुट पहनकर उज्जैनी लौटते है ।
" तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिनके लिए प्रेम का मतलब अपनी प्रजा थी , वह उनकी पत्नी उनके अतिरिक्त उन्होंने किसी से विवाह नही किया वही जिस स्वर्ग के सिंहासन से हर किसी को प्रेम होता है विक्रमादित्य ने उज्जैनी और देश की प्रजा के प्रेम के लिए स्वर्ग के सिंहासन तक को छोड़ दिया "
तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
Comments
Post a Comment