नौंवा गुण कर्तव्य
।। नौंवा गुण कर्तव्य ।।
राजा भोज जैसे ही आगे बडते है नौंवी सिडी पर तभी कर्तव्य की देवी उन्हें रोकती है और कहती है राजन् रूकिए । राजा भोज - देवी में सम्राट विक्रमादित्य के कर्तव्य की कथा सुनाए । देवी - अवश्य एक समय की बात है जब अर्ध रात्री का समय था सभी लोग शांति से निद्रा में थे तभी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के न्याय का घंटा बच उठा ।
सैनिक - आचार्य जी यही वो बालक है जिसने न्याय माँगा है ।
वराहमिहिर जी - बालक न्याय का घंटा बजाने का अर्थ पता है ।
बालक - हाँ जानता हूं इसलिए बजाया ।
वराहमिहिर जी - यानी तुम्हारे साथ किसी ने अन्याय किया है किसने किया है अन्याय ।
बालक - क्या आप ही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ।
वराहमिहिर जी - नहीं में सम्राट नही हूं में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का आचार्य हूं । बताओ मुझे क्या हुआ तुम्हारे साथ ।
बालक - नहीं में उन्हें ही बता पाऊंगा ।
वराहमिहिर जी - बालक सम्राट विक्रमादित्य अभी राज्य भ्रमण पर निकले है उनका कोई समय नही है की कब लौटे इसलिए तुम मुझे बताओ ।
बालक - यदि आप मेरी समस्या का समाधान कर सकते है तो सुनिए मेरी समस्या है मेरा जीवन ।
वराहमिहिर जी - में समझा नहीं बालक अभी तो तुम्हारा जीवन खेलने खाने का है ।
बालक - में अपना जीवन दान करना चाहता हूं में यहराज जी के पास जाने चाहता हूं में यहाँ वहाँ जाने का मार्ग खोजने आया था कृपया मुझे वहाँ जाने का मार्ग बताए ।
वराहमिहिर जी - में तुम्हारी समस्या सम्राट विक्रमादित्य को बताता हूं ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी एक बालक को मरना क्यों था । देवी - इसके लिए हमें सम्राट के दरबार की कथा सुनना होगी सम्राट को भी यहीं जानने की उत्सुकता थी ।।
सम्राट विक्रमादित्य - उस बालक को दरबार में लाया जाए । क्या सहायता कर सकते है हम आपकी ।
बालक - प्रणाम सम्राट मुझे लगता है मुझे पहले अपना परिचय देना चाहिए मेरा नाम गोपाल है मेरे पिता का नाम सेठ गंगा प्रसाद है हम देवगिरी के निवासी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो बताओ गोपाल क्या समस्या है आपकी ।
गोपाल - मुझे मृत्यु चाहिए मुझे मृत्यु का मार्ग चाहिए कृपया आप मुझे मृत्यु का मार्ग बताए मुझे मृत्यु का मार्ग नही मिल रहा है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - गोपाल तुम मासूम हो आप नही जानते कि मृत्यु क्या है मृत्यु का कष्ट क्याहोता है ।
गोपाल - में सब जानता हूं सम्राट मृत्यु के बाद जीवन समाप्त हो जाता है फिर हम कभी वापस नही आ सकते दुनिया में में जानता हूं सम्राट को ।
सम्राट विक्रमादित्य - अच्छा और फिर भी आप मृत्यु चाहते है ऐसा क्यों ।
गोपाल - क्योंकि में अपने पिता की आज्ञा का पालन कर रहा हूं सम्राट उन्होंने मुझे यमराज जी को दान देने का वचन दिया है इसलिए मुझे एक पुत्र होने का नाते उनकी सहायता करनी चाहिए वचन पूर्ति में ।
वराहमिहिर जी - कैसा है वो निष्ठुर पिता और कैसा है यह आज्ञाकारी पुत्र ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो आप अपने पिता के वचन में यमराज के पास जाना चाहते है। यह कैसा पिता है जो अपने बालक को यमराज को दान दे दिया ।
गोपाल - आप बोलिए ना सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - गोपाल यह समस्या का समाधान हम अवश्य निकालेंगे बस हमें थोडा समय दिजिए ।
गोपाल - जरूर सम्राट मगर थोडा सा ही क्योंकि मुझे अपने पिता की आज्ञा पालन में अब और देर नही करना है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी आप गोपाल को अतिथि कक्ष में ले जाइए ।
गोपाल - वराहमिहिर जी सारी दुनिया कहती है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य बहुत बुद्धिमान है उनके पास हर प्रशन का उत्तर है फिर उन्हें इतना समय क्यों लग रहा है ।
वराहमिहिर जी - क्योंकि गोपाल हमारे सम्राट विक्रमादित्य कुछ भी बिना सोचे समझे नही कहते वे हर चीज को समझ कर ही करते है ।
गोपाल - आचार्य जी मुझे लगता है सम्राट भी नही जानते ।
वराहमिहिर जी - नही गोपाल सम्राट विक्रमादित्य सबकुछ जानते है संसार में उनसे ज्यादा किसी को नही पता वे तुम्हारी समस्या का समाधान जल्द करेंगे तुम विश्राम करो ।
गोपाल - जरूर आचार्य जी ।
आचार्य वराहमिहिर जी सोचते है इस संसार में यह अधर्म है जिस बालक को हसना खेलना चाहिए वो मृत्यु प्राप्त करना चाहता है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट कोई पिता ऐसा कैसे कर सकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हाँ महारानी हमें उस समस्या का हल निकालना ही होगा वरना वो बालक कभी बचपन नहीं जी पाएगा ।
महारानी चित्रलेखा - यह तो सचमुच बहुत चिंता की बात है आप अब क्या करेंगे सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम अब अपने कर्तव्य का पालन करेंगे हम उसके पिता से पूछेंगे की उसने अपने बालक को मृत्यु के मुह में क्यों दखेला ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट यह तो अति उत्तम बात है आप जरूर करे यह वह हमें उसे प्रेम की निर्मलधार से उसके मन को बदलना होगा मृत्यु की जगह उसके मन में जीवन जीने की प्रेरणा भरनी होगी ।
उधर बालक गोपाल कहता है खुद से पिताजी हम आपके वचन का पालन अवश्य करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा उसकी यह बात सुनते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आप जाइए गोपाल के पास ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप भी चलिए हम दोनों का प्रेम उसके लिए अधिक प्रभावशाली रहेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम नहीं जा सकते वरना वो फिर हम से यमराज का पता पूछेगा ।
महारानी चित्रलेखा - गोपाल ।
गोपाल - आप कौन है ।
महारानी चित्रलेखा - सारे संसार के लिए हम महारानी है पर तुम्हारे लिए हम माँ है ।
गोपाल - महाराज नही आए वो मुझे मृत्यु का रास्ता बताने वाले थे ।
महारानी चित्रलेखा - वो बात आप अपने महाराज से करिएगा माँ के साथ कोई मृत्यु की बात नही करता ।
गोपाल - मुझे नही पता माँ से कैसे बात करते है ।
महारानी - क्यों ।
गोपाल - क्योंकि मैने कभी माँ को नही देखा पिताजी कहते है वो भगवान को प्यारी हो गई ।
महारानी - फिर कभी मत कहना ऐसा हम आपकी माँ है तो बताओ आपको भोजन में क्या क्या पंसद है ।
गोपाल - पंसदीदा भोजन तो पता नही जो मिला वो खा लिया ।
महारानी चित्रलेखा - तो आज हम अपने पुत्र की पंसद पता करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - इश्वर महारानी को सफल करना और उस बालक के मन से मृत्यु का ख्याल हटा देना तब तक हम वराहमिहिर जी इस समस्या का समाधान निकालते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या लिखा है शास्त्रों में वराहमिहिर जी क्या एक पिता को यह अधिकार है कि वो उसे दान कर दे ।
वराहमिहिर जी - हाँ सम्राट एक पिता को यह अधिकार होता है अपने पुत्र पर यह शास्त्र में लिखा है क्योंकि पुत्र का रचियता पिता ही होता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - किंतु यह दान अलग है गंगाप्रसाद अपने पुत्र को दान कर रहा है क्या यमराज इफ दान को लेंगे ।
वराहमिहिर जी - अवश्य लेंगे क्योंकि दान में जो भी मिला वो लेना चाहिए यही व्यवस्था है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसका मतलब ।
वराहमिहिर जी - मतलब यह कि यमराज व्यवस्था के विपरीत कभी जा ही नही सकते उन्हें यह दान लेना होगा कर्तव्य के पालन में उस बालक की मृत्यु होगी ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् एक तरफ सम्राट विक्रमादित्य का कर्तव्य था जो बालक को मरने नही देना चाहते थे और दूसरी तरफ धर्म था तो क्या करेंगे सम्राट । राजा भोज - देवी वो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य थे उन्होंने धर्म के लिए अपने भाग्य की संतान तक को दान कर दिया था वो उस बालक के प्राणों की रक्षा अवश्य करेंगे ।।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसे करे हम अपने कर्तव्य का पालन क्या इस दान को वापस नही लिया जा सकता वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - दान की यही व्यवस्था है सम्राट अतित में भी ऐसे दान दिए गए है दधीचि ने अपना शरीर दान किया था नचिकेता के पिता ने इसी तरह यहराज को अपना पुत्र दान किया था ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर हमें इस दान को रोकना होगा ।
वराहमिहिर जी - सम्राट एक विकल्प है यदि बालक गोपाल खुद अपना मन बदल ले तो यमराज उसका दान नहीं लेंगे मगर गोपाल अपना मन नही बदलेगा ।
महारानी चित्रलेखा गोपाल को भोजन करवाती है । महारानी चित्रलेखा - गोपाल हमने आपके लिए यह सब व्यंजन बनाए है जो आपको पंसद हो वो बताए ।
गोपाल - नही रानी माँ मुझे मेरे पिता ने दान किया है आप यमराज को बुला लिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - गोपाल भोजन को मना नही करते रानी माँ के लिए तो भोजन कर लो ।गोपाल - सम्राट आपने मेरी बात का कोई हल नही निकाला आप यमराज तक जाने का मार्ग बताए सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - उसके पहले हम आपको जीवन दर्शन बताएंगे क्या आप जानते है जीवन दर्शन क्या है ।
गोपाल - थोडा थोड़ा जानता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - गोपाल जीवन वो अस्त्र है जो जीवन रूपी युद्ध को लडने में हमारी सहायता करता है गोपाल जीवन बहुत भाग्यशाली लोगों को मिलता है देवता तक इस शरीर को पाने के लिए व्याकुल रहते है मगर वे हासिल नही कर पाते है ।
गोपाल - सम्राट में आपकी बात समझ रहा हूं पर मेरे पिता के वचन और उनकी इच्छा मेरे लिए सबकुछ है ।
सम्राट विक्रमादित्य - पुत्र इस संसार जीवन से जरूरी कुछ नही होता ।
गोपाल - अगर जीवन जरूरी है तो श्री राम ने पिता की आज्ञा मान कर 14 वर्ष का वनवास क्यों काटा ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् सम्राट भारी धर्म संकट में फस गए थे और गोपाल का हट अलग आपके अनुसार गोपाल सही था या गलत । राजा भोज - वो सही था देवी क्योंकि पिता की आज्ञा का पालन करना दुनिया का सबसे बडा धर्म है और वो बालक तो भगवान श्री राम का भक्त था तो वो गलत नही हो सकता । देवी - तो क्या सम्राट गलत थे । राजा भोज - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य तो कभी गलत हो ही नही सकते क्योंकि वो भगवान परशुराम के भक्त थे इसलिए वे भी धर्म की रक्षा करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देंगे ।
वराहमिहिर जी - सम्राट प्रशन कुंडली के अनुसार उस बालक की मृत्यु का योग बन रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी अब बस बहुत हुआ अब हम अपना कर्तव्य निभाएंगे ।
महारानी - तो क्या आप उस बालक को यमराज के पास भेजेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं महारानी ।
महारानी - फिर कैसे सम्राट ना वो बालक आपकी बात समझ रहा है ना अपना हट ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब हम उस बालक के पिता से मिलने स्वंय जाएंगे और उससे पूछेंगे की उसने अपने बालक को यमराज को क्यों दान किया ।
महारानी चित्रलेखा - बहुत उचित फैसला है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारे आने तक आप उसका ध्यान रखिएगा ।
महारानी चित्रलेखा - जरूर । हमें आप पर गर्व के सम्राट आप निश्चिंत होकर जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम इस बार समस्या को सुलझा कर आएंगे गंगाप्रसाद तुम दानी नहीं दरिद्र हो ।
उधर गंगा प्रसाद लोंगो को अनाज दान करता है किंतु खराब अनाज है एक व्यक्ति कहता है सेठ जी यह तो खराब अनाजहै ।
गंगाप्रसाद - अंधे दरिद्र तू अन्न को खराब कहता है चल जा यहां से मुझे पुण्य कमाने दे ।
गंगाप्रसाद एक को मुद्रा दान करता है ।
व्यक्ति - सेठ जी यह तो खोटी मुद्रा है ।
गंगाप्रसाद - अंधे चल जा यहा से ।
तभी एक व्यक्ति आकर कहता है गंगाप्रसाद सत्यानाश हो तेरा तू नर्क में जाए ।
गंगाप्रसाद - अरे अरे तुम एक दानी को नर्क में भेज रहे हो ।
व्यक्ति - अरे काहे का दानी कल तुने जो बिमार गाय दान की थी उसके दूध से मेरा बच्चा बिमार हो गया पहले गाय का इलाज तो करवाना था ।
गंगाप्रसाद - कल तो आगे खडा था दान के लिए ।
व्यक्ति - भाईयों इसका दान कोई मत लेना बाद में तुम सभी पछताओगे ।
सभी लोग यही कहते है
गंगाप्रसाद - अरे तुम दान नही ले रहे हो तो मत लो पर दूसरो को तो लेने दो मेरे स्वर्ग जाने का रास्ता क्यों रोकते हो ।
व्यक्ति - तू स्वर्ग नही नर्क में जाएगा ।
गंगाप्रसाद - मुझे स्वर्ग जाने से तोकेगा तू मारो इसे ।
उसके लोग उसे मारने लग जाते है फिर उसे छोड दिया जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य भैस बदल कर वहा जाते है कहते है भाईयों प्रणाम क्या सेठ गंगाप्रसाद यही रहते है ।
लो एक और आ गया दान लेने बंधू अगर दान लेने आए हो तो चले जाओ क्योंकि वो दानी नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगथ हमने तो सुना था वो बहुत बडे दानी है ।
अगर दानी है तो दान में यह खराब अनाज दान क्यों करता है यह देखिए हमें खोटी मुद्रा दी और उसने मुझे बिमार गाय दी जिसके दूध पिने से मेरा बच्चा बिमार हो गया ।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसा नीच व्यक्ति है यह गंगाप्रसाद जो दान जैसे पुण्य कर्म को अपमानित कर रहा है ।
महारानी चित्रलेखा - गोपाल को भोजन करवाती है ।
गोपाल - रानी माँ आप बहुत अच्छी है आपके पास आकर मैनें अपना भाग्य पाया क्योंकि मेरे भाग्य में माँ का सुख नहीं है जब जीवन था तब सुख नही था और आज जब माँ का सुख है तो जीवन नही है ।
महारानी चित्रलेखा - ऐसा नही कहते गोपाल। महारानी मन में कहती है सम्राट तुम्हे कुछ नही होने देंगे ।
उधर गंगाप्रसाद अपने क करने वालो को फटकार लगाता है और कहता है मूर्खो अगर लोग मेरी ऐसी ही आलोचना करते रहे तो लोग दान लेने नहीं आएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य आते है और कहते है गंगाप्रसाद तुम्हारा अगला जन्म तो वैसे भी सुधरने वाला नही है ।
गंगाप्रसाद - तुम कौन हो भाई कल आना दान लेने ।
सम्राट विक्रमादित्य - जिसे दान का अर्थ नही पता वो क्या दान देगा ।
गंगाप्रसाद - अब यह दरिद्र हमें दान का अर्थ सिखाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - दान वो होता है जिससे सामने वाले का भला हो मगर तुम्हारे दान से आज तक किसी का भला नही हुआ है सबका अहित हुआ है ।
गंगाप्रसाद - महा पंडित हमें ज्ञान मत दो ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम तुम्हे यह बताना चाहते है कि ऐसे दान का पाप गऊ हत्या से भी बडा होता है ।
गंगाप्रसाद - निकालो इसे ।
गंगाप्रसाद के लोग - चल जा यहा से ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही जाएंगे ।
वे सम्राट पर वार करते है पर सम्राट उनकी धुलाई कर देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - गंगाप्रसाद कैसे इंसान हो तुम अपने पुत्र को दान कर दिया ।
उधर गोपाल सोचता है सम्राट अब तक नही आए लगता है उन्हें भी नही मिला मार्ग अब में ही खोजता हूं यमराज जी के पास जाने का रास्ता । मगर वो महारानी को देखता है वे निद्रा में रहती है गोपाल कहता है क्षमा करना माँ मगर मुझे जाना होगा क्योंकि मुझे आज्ञा का पालन करना है बस इसना ही साथ था हमारा ।
गंगाप्रसाद - महा पंडित तुम मेरे पुत्र को नही जानते इसलिए उसका पक्ष ले रहे हो । मेरा पुत्र मेरे दान के कार्य में विघ्न डालता था उसे वो अधर्म कहता था उसे वो पाप लगता था ।
सम्राट विक्रमादित्य - वो सही कहता था यह वही स्थान है जहाँ एक दिन में बैठा था तुम्हें उस दिन का वाक्या बताता हूं ।
में पंडित जी से कह रहा था पंडित जी आज मैने चार गाय दान की और अनाज भी मेरे चार जन्म तो सुधर जाएगे ना आप मेरे पुण्य कर्म देख कर बताए तभी गोपाल आकरकहता है पिता जी आप पुण्य कर्म नही अपितु पाप का घडा भर रहे है यह लिजिए भगवान श्री राम का प्रसाद इस से आपके पाप कम हो जाएंगे ।
गंगाप्रसाद - मूर्ख बालक प्रसाद बाटने से पुण्य नही बडता ।
गोपाल - पिता जी आप पुण्य कमाने के इतने प्यासे है अगर ऐसा है तो मुझे दान कर दिजिए ।
गंगाप्रसाद - तो जा में तेरा दान करता हूं में तुझे यमराज को दान करता हूं ।
गोपाल - जो आज्ञा पिता जी ।
पूरी बात सुनकर सम्राट विक्रमादित्य कहते है आश्चर्य की बात तो यह है गंगाप्रसाद की तुम्हारा पुत्र तुम्हारी आज्ञा का पालन करने के लिए यमराज तक को जाने के लिए तैयार हो गया ।
गंगाप्रसाद - वो बालक नही है वो बालक ही क्या जो अपने पिता की आज्ञा का पालन ना करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - गोपाल जैसा बालक भाग्यशाली को मिलता है उसे अपना लो ।
गंगाप्रसाद - में ऐसा नही करूंगा अपना यह लोक और परलोक नही बिगाडूंगा में अपना दान वापस नही लूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसे दान नही कहते है पिता तो ब्रह्मदेव का स्वरूप होता है पिता का कर्तव्य है कि वो संतान के जीवन की रक्षा करना होता है ।
उधर गोपाल यमराज के पास जाने का रास्ता ढूंढता है एक व्यक्ति से पूछता है भईया यमराज के पास जाने का रास्ता बताए । व्यक्ति - अरे पागल हो गए हो गए हो क्या ।
उधर महारानी चित्रलेखा और वराहमिहिर जी पुरे महल में गोपाल को ढूंढ ते है ।
वहाँ गंगाप्रसाद कहता है महा पंडित सबसे पहले विधि का विधान बदलो ।
सम्राट विक्रमादित्य - विधि का विधान विधाता स्वंय नही बदल सकते तो हम क्या बदलेंगे ।
गंगाप्रसाद - अरे तम कौन हो भाई क्यों इतने सवाल जवाब कर रहे हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हूं अगर तुमने अपना निर्णय नही बदला तो हमें राजधर्म अपनाना होगा ।
गंगाप्रसाद - आप राजधर्म अपनाएंगे क्यों क्या सिद्ध करेंगे आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - एक बालक की हत्या का दण्ड देंगे आपको और सिद्ध करेंगे आप गोपाल की माँ के पास हमें ले चलिए ।
गंगाप्रसाद - मुझे नही पता वो कहा है मैने बहुत पहले उसका त्याग र दिया था ।
सम्राट विक्रमादित्य - कितने घटीया तो तुम ।
सम्राट विक्रमादित्य कहते है हमें अपना कर्तव्य निभाने के लिए गोपाल की माँ को ढूंढना ही होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य लोंगो से पूछते है गंगाप्रसाद की पत्नी का ।
व्यक्ति - अरे भाई क्यों गडे मुर्दे उखाड रहे हो क्या पता कहा हैवो जिंदा भी है या मर गई ।
तभी वहाँ एक वृद्धा कहती है नही वो मरी नही जीवित है ।
सम्राट विक्रमादित्य - माता क्या आप हमें बताएंगे ।
वृद्धा - वो संयासी के रूप में अपना जीवन बिता रही है कावेरी नदी के तट पर ।
उधर पुरे महल में गोपाल को ढूंढा जाता है किंतु वो नही मिलता है ।
सेनापति - महारानी आप चिंता ना करे में नगर में ढूंढता हूं शायद वहाँ मिल जाए गोपाल ।
महारानी - क्या हुआ सेनापति जी मिला गोपाल ।
सेनापति - नही महारानी वो कही नही है ।
महारानी - नही सेनापति जी वो मिलेगा हम स्वंय जाएंगे उसे ढूंढने ।
सम्राट विक्रमादित्य गोपाल की माता से मिलते है देवी हम आपसे गंगाप्रसाद के विषय में बात करना चाहते है ।
देवी - हम उस अहंकारी के सम्बन्ध में कोई बात नही करना चाहते है हमने सबकुछ त्याग दिया है हारे संबन्ध सबकुछ ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपने अपनी ममता भी त्याग दी है अपने पुत्र को भी ।
देवी - महाराज आपके यहाँ आने का कारण बताइए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपके पुत्र का जीवन संकट में है गंगाप्रसाद ने आपके पुत्र को मृत्यु के देवता यमराज को दान कर दिया है ।
उधय गोपाल आकाश की ओर देख कर यमराज के दर्शन की माँग करता है तभी वहाँ से एक सन्यासी जाते हुए कहता है बालक तुम किसे याद कर रहे हो राम राम यमराज से लोग दूर भागते है ।
गोपाल - ऋषिवर मेरे पिता ने मुझे यमराज को दान कर दिया है आप मुझे उन तक पहुंचने का रास्ता बताए ।
ऋषिवर - बालक तुम यमराज की मिट्टी की प्रतिमा बनाओ पर यमराज का मंत्र जाप करो और अपनी अभिलाषा करो पुरी ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी आप अपने पुत्र के प्राण बचा लिजिए ।
देवी - में क्या कर पाऊँगी महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप अपनी असहमति दिखाए ।
देवी - इस पुरूष प्रधान समाज में मेरी कहा चलेगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - किसने कहा पुरूष प्रधान समाज जबसे हम शासक बने है तब से हमने पुरूष और महिला दोनो को बराबरी का अधिकार दिया है वह इसका पालन सख्ती से हो ऐसे निर्देश दिए है । गंगाप्रसाद ने इस निर्णय का उल्लंघन किया है आप असहमति दर्शाए हम फिर उसे उसके अपराध का दण्ड देंगे और आपके पुत्र के प्राण बच जाएंगे देवी ।
देवी - आप सच में महान है चक्रवर्ती सम्राट महाराज विक्रमादित्य में इस बात से अनभिज्ञ थी में आपके साथ चलूंगी ओर बचाऊंगी अपने पुत्र के प्राण ।
सम्राट विक्रमादित्य - गंगाप्रसाद ।
गंगाप्रसाद - में यहा हूं क्षत्रिय कम महा पंडित सम्राट विक्रमादित्य और में अकेला नही हूं मेरे साथ आए है धर्म के प्रचारक ऋषि गण । और तुम मेरे द्वारा पर क्या कथ रही हो ।
देवी - में अपने पुत्र के प्राण बचाने आइ हूं ।
गंगाप्रसाद - देखो स्त्री में तुम्हे पहले ही त्याग चूका हूं फिर तुम यहा क्यों आइ हो ।
देवी - में यहा निवास करने नही आइ हूं उस फेसला का विरोध करने आइ हूं तुम्हारे इस दान को में असहमत करती हूं ।
गंगाप्रसाद - महा पंडित यह क्या कह रही है यह स्त्री ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह सही कह रही है विवाह के उपरांत पति पत्नी दोनो मिलकर कोई भी निर्णय ले सकते है तुम अकेले नहीं ।
गंगाप्रसाद - ऋषि गण आप यहाँ सिर्फ सुन क्या रहे है कुछ कहीए ।
ऋषि गण - क्षमा करिएगा सम्राट पर इस स्त्री ने माता होना का अधिकार खो दिया है शास्त्रो में लिखा है कि 5 वर्षो तक यदि पति पत्नी दूर रहे तो विवाह गठबंधन टूट जाता है इसलिए गोपाल पर पिता का अधिकार है माता का नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऐसा नही हो सकता ।
ऋषि गण - यही व्यवस्था है सम्राट हम भी कुछ नही कर सकते ।
देवी - सम्राट विक्रमादित्य में तो अपना धर्म नही निभा पाई आप कर्तव्य धर्म बल किस भी तरीके से मेरे पुत्र को बचा लिजिए सम्राट किंतु मेरे पुत्र को बचा लिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी हम बचाएंगे उसे ।
सम्राट विक्रमादित्य वहाँ से निकलते है उन्हें जंगल में महारानी की आवाज आती है गोपाल गोपाल की ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानीठीक तो है आप यहाँ क्या कर रही है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट गोपाल महल से कही चला गया है अगर उसे कुछ हुआ तो हम खुद को कभी माफ नही कर पाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपकी इसमें कुछ गलती नही है आप निश्चिंत रहे ।
उधर गोपाल यमदेव की भक्ति करता है और उन्हें बुलाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा दोनों मिलकर गोपाल को ढूंढते है ।
यमदेव के लगाता उचारण से यमदेव प्रकट हो जाते है ।
यमराज - आखें खोल बालक ।
गोपाल - आप ही यमराज है ।
यमराज - हाँ हम है मृत्यु के देवता यमराज बोलो बालक कैसे याद किया ।
गोपाल - में दान की हुई वस्तु हूं मेरे पिता ने मुझे आपको दान दिया है यमराज आप मौन क्यों है क्या आप मेरा दान नही ले सकते ।
यमराज - व्यवस्था के अनुसार में इस दान को अस्वीकार नही कर सकता मुझे यह दान स्वीकार है ।
गोपाल - में आपके साथ चलता हूं दान की हुई वस्तु साथ में ले जाते है ऐसा मैने सुना है ।
यमराज - में तुम्हें ऐसे नही ले जा सकता मुझे 90 वर्ष बाद होने वाली घटना अभी करनी होगी ।
गोपाल - में कुछ समझा नही प्रभु ।
यमराज - तुम 100 वर्ष जिने वाले थे और तुम्हारी मृत्यु भगवान विष्णु के भजन गाते वक्त होनी थी किन्तु मुझे उस दृश्य को अभी करना होगा उसका नायक तुम्हे बनना होगा ।
गोपाल - मुझे क्या करना होगा प्रभु ।
यमराज - यहाँ से 100 कोस दूर लक्ष्मीपुर है वहाँ भगवान विष्णु का मंदिर है तुम्हें वहा पर आज से सात दिन बाद एकादशी के दिन उसी तरह भगवान विष्णु का भजन गाना होगा जैसा तुम 90 वर्ष बाद गाते ।
उधय सम्राट विक्रमादित्य को एक ब्राह्मण देव मिलते है सम्राट - ब्राह्मण देव आपने किसी बच्चे को देखा है ।
ब्राह्मण देव - हाँ देखा है वो यमराज को खोज रहा था ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या आप हमें बता सकते है कि वो किस ओर गया है ।
ब्राह्मण देव - सम्राट वो बालक उस ओर गया है एक वृक्ष के नीचे वो यमराज की पूजा कर रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद ब्राह्मण देव ।
यमराज गोपाल से कहते है बालक में एक सप्ताह बाद तुम्हें वहाँ मिलूंगा काल के रूप में ।
सम्राट विक्रमादित्य की आवाज सुनकर गोपाल वहाँ जाता है और कहता सम्राट आप ।
महारानी - गोपाल कहा चले गए थे तुम ।
गोपाल - रानी माँ में यमराज का पता लगाने गया था और सबसे बडी बात तो यह है कि वो मुझे मिल गए है उन्होने मेरा दान स्वीकार कर लिया है और उन्होने मुझे अपने पासआने का मार्ग भी बता दिया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या कह रहे हो गोपाल ।
गोपाल - हाँ सम्राट मेरी मृत्यु 90 वर्षो बाद होने वाली थी वो एक सप्ताह बाद होगी । उन्होंने मुझे बताया की एक सप्ताह में मेरे साथ क्या क्या होगा में लक्ष्मीपुर पहुँचूंगा वहा काल बैस के रूप में रहेंगे और मुझे मारेंगे में अपनी यात्रा शुरू करने ही वाला हूं ।
महारानी - आप अपनी यात्रा कल से शुरू करना आज आप हमारे साथ रहिए ।
गोपाल - में आने ही वाला था आप लोगो के पास पर भगवान की कृपा देखिए आप स्वंय आ गए मेरा भी मन है आपके साथ एक दिन बिताने का ।
महारानी - हमारे साथ महल चलो ।
सम्राट विक्रमादित्य मन में कहते है मुझे कुछ निवारण करना ही होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी इस बालक की कुंडली में देखिए और बताए की हम कैसे इसे बचाए ।
वराहमिहिर जी - सम्राट इस बालक को बचाना असंभव है बालक की कुंडली में मृत्यु योग चालू हो गया है उसकी मृत्यु निश्चित है उसे बचाने के सारे मार्ग बंद हो गए है ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब केवल एक ही विकल्प है वराहमिहिर जी की हम स्वंय यमलोक जाकर यमराज को रोके इस दान को लेने से ।
सम्राट विक्रमादित्य - यमराज महाराज चित्रगुप्त सत्य कह रहे है आप तो कभी भूल से भी गलती नही करते है फिर यमराज आप ऐसा कैसे कर सकते है ।
यमराज - सम्राट में कुछ नही कर सकता में व्यवस्था से बंधा हूं और उस बालक की मृत्यु निश्चित है एकादशी के दिन उससे पहले आप उसकी रक्षा के लिए कुछ भी कर सकते है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् पहली बाल सम्राट विक्रमादित्य अपने जीवन में हार चुके थे । राजा भोज - नही देवी में आपकी बातों पर विश्वास नही करता । देवी - आप विश्वास करे ना करे पर सच्चाई तो यही है सच्चाई नही बदलती । राजा भोज - सच्चाई को बदलना होगा सच्चाई को सम्राट विक्रमादित्य के लिए बदलना ही होगा सम्राट विक्रमादित्य कभी हार नही सकते । देवी - क्यों ऐसी क्या विशेषता है उन में । राजा भोज - विशेषता है देवी विशेषता की खान है सम्राट विक्रमादित्य तभी तो देवताओं ने उन्हें यह दिव्य सिंहासन बत्तीसी दिया था उनके अंदर 32 गुण थे आप सभी थी देवी महामाया थी भला वो हार कैसे सकते है । देवी - मगर राजन् इस बार हम भी उनकी मदद नही कर पा रहे थे । राजा भोज - नही देवी आज समस्त संसार देखेगा सिंहासन बत्तीसी की महानता वो सम्राट विक्रमादित्य को जीताएगा सम्राट विक्रमादित्य जीतेंगे । देवी - आपने बिल्कुल सत्य कहा राजन् आज पहली बाल सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन बत्तीसी के सामने आकर खडे हुए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे सिंहासन बत्तीसी न्याय के सिंहासन देवताओं ने आपको हमें इसलिए प्रदान किया था ताकि इस संसार में न्याय और धर्म की स्थापना कर सके मगर आज हम असमर्थ है धर्म के लिए मरने वाला चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आज कुछ नही कर पा रहा है इसलिए सिंहासन बत्तीसी की प्रधान रक्षिका महामाया देवी से निवेदन है हमारे सामने प्रकट होकर हमारा मार्गदर्शन करे ।
तभी अचानक तूफान आता है पायल की आवाज आती है देवी महामाया प्रकट होती है । महामाया - न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य प्रणाम निवेदन नही आदेश करिए हम आपकी क्या सहायता कर सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी महामाया देवताओं ने हमें यह सिंहासन इसलिए दिया था ताकि हम संसार में धर्म की रक्षा कर सके मगर आज हम धर्म की रक्षा में कुछ नही कर पा रहे है आप मुझे बताए में किस तरह से उस बालक गोपाल की रक्षा करके धर्म की रक्षा करसकता हूं ।
महामाया - सम्राट एक मात्र विकल्प है आपको यह व्यवस्था बदलनी होगी आपको त्रिदेव को उस रूप में लाना होगा जिस रूप में उन्होंने संसार की स्थापना की थी ।
सम्राट विक्रमादित्य - त्रिदेवों का वो कौन सा रूप है देवी ।
महामाया - ब्रहमा विष्णु महेश तीनों को एक साथ एक ही रूप में लाना होगा इनका एक रूप होना ही समस्या का निवारण है सम्राट ।
उधर महारानी चित्रलेखा महाकाल से प्रार्थना करती है महादेव आपने हमसे हमारी संतान छीन ली किंतु गोपाल को मत छीनना ।
गोपाल - रानी माँ प्रणाम रानी माँ अब मेरे जाने का समय हो गया है आप मुझे विदा करिए आप मुझे विदा नही करेंगी तो में नही जा पाऊंगा ।
महारानी चित्रलेखा - में आपको कैसे विदा कर सकती हूं ।
गोपाल - रानी माँ मुझे जाना होगा ।
महारानी चित्रलेखा गोपाल की आरती करती है । गोपाल - आज्ञा दिजिए रानी माँ ।
महारानी चित्रलेखा और वराहमिहिर जी को प्रणाम करता है गोपाल फिर उसे सम्राट दिखते है सम्राट को भी प्रणाम करता है गोपाल ।
गोपाल - सम्राट आपने मेरे प्राणों की रक्षा की है मगर मुझे मरना ही होगा पर में भगवान श्री राम ने प्रार्थना करता हूं अगले जन्म में मुझे आप और महारानी माता पिता के रूप में मिले ।
सम्राट विक्रमादित्य - गोपाल में यह व्यवस्था बदल दूंगा क्योंकि हमारा अगला जन्म नही होगा हमें मोक्ष मिल गया है । ऐसा कह कर सम्राट चले जाते है ।
महारानी चित्रलेखा और वराहमिहिर जी गोपाल को छोडने आते है महारानी गोपाल के साथ जाती है ।
गोपाल - नही रानी माँ आप तकलीफ मत लिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही गोपाल रानी माँ को आने दो वन का मार्ग बहुत कठीन होता है ।
गोपाल - ठीक है मुझे रानी माँ के साथ समय मिल जाएगा ।
महारानी चित्रलेखा और गोपाल जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य अब हमें जल्दी करनी होगी हमें त्रिदेव को प्रसन्न करना होगा अब वही गोपाल को बचा सकते है ।
उधर महल में कुछ ऋषि आते है ।
वराहमिहिर जी - रूकिए आचार्य जी आप सभी कहा जा रहे है ।
ऋषि - सम्राट विक्रमादित्य ने कहा है त्रिदेव को प्रसन्न करने के लिए एक अनुष्ठान करना है ।
वराहमिहिर जी - व्यर्थ जाएगा सबकुछ ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्यों वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - क्योंकि उसका जीवन में देख रहा हूं कुंडली में संसार में यह पहला होगा जब कोई काल के पास जा रहा हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - और यहीं अंतिम भी होगा वराहमिहिर जीहम यह अनुष्ठान इसलिए करवा रहे है ताकि त्रिदेवों को प्रसन्न करके हम यह व्यवस्था बदल देंगे ।
वराहमिहिर जी - सम्राट मात्र छह दिन शेष है ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् सम्राट के पास सबकुछ होते हुए भी समय कम था । राजा भोज - सम्राट के पास समय कम था लेकिन वो अपने कर्तव्य की कसौटी पर खरे उतरेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य ब्राह्मण देवों के साथ अनुष्ठान करना शुरू कर देते है ब्रहमा विष्णु शिव तीनों को प्रसन्न करने के लिए सम्राट यज्ञ शुरू कर देते है ।
महारानी चित्रलेखा गोपाल के लिए भोजन बनाती है उधर ब्राह्मण देवों के साथ सम्राट विक्रमादित्य अनुष्ठान करते है ।
ब्राह्मण देव - सम्राट यदि मत्रों के साथ साथ यदि हम त्रिदेव की प्रिय वस्तु भी अर्पित करे तो वे अधिक प्रसन्न हो जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य ब्राह्मण देव आट बताइए हमें हम क्या लाए ।
ब्राह्मण देव - सम्राट आप श्मशान से राख , स्वच्छ कमल और गंगा जल ले आइए ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य हम अभी आते है ब्राह्मण देव ।
सम्राट विक्रमादित्य कमल गंगा जल और राख को लेकर ब्राह्मण देवों के पास जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ब्राह्मण देव आपके आदेशानुसार हम सब ले आए ।
ब्राह्मण देव - सम्राट अब आट बैठिए और आहुति दिजिए इन सब वस्तुओं की ।
ब्रह्मा विष्णु शिव की प्रतिमाएं गायब हो जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - किसने किया ये दुस्साहस कौन है मायावी ।
तभी महामाया देवी प्रकट होती है और कहती है क्षमा कीजिएगा सम्राट किंतु हमने यह माया रचि है ।
सम्राट विक्रमादित्य - परंतु क्यों देवी महामाया आपने ऐसा क्यों किया आप जानती है ना कि यह अनुष्ठान कितना अवश्य है ।
महामाया - सम्राट में हृदय से चाहती हूं आप इस कार्य में सफल रहे । सम्राट संसार के रचयिता ब्रहमा विष्णु शिव तीनों एक रूप होकर सृष्टि की स्थापना करते है सम्राट यह विधान तभी बदलेगा जब तीनों एक होंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसलिए तो हम यह अनुष्ठान कर रहे थे ।
महामाया - क्षमा किजिए सम्राट पर किसी भी अनुष्ठान से यह तीनों देव एक नहीं होते ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो कैसे होते है ।
महामाया - सृष्टि के विनाश के समय होते है यह त्रिदेव तभी एक होते है जब सृष्टि का विनाश होता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - सृष्टि का विनाश ।
महामाया - हां सम्राट जब युग खत्म हो जाता है जब विनाश होता है तब यह त्रिदेव एक रूप होकर नई सृष्टि की स्थापना करते है उसी वक्त नई व्यवस्था बनती है इसलिए संसार की कोई भी व्यवस्था समय से पहले नही बदली जा सकती और यदि बदलना है आपको उस बालक की रक्षा करनी है तो आपको ऐसा कुछ करना होगा कि त्रिदेव एक रूप होकर प्रकट हो जाए ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी महामाया हम ऐसा कुछ करेंगे की सृष्टि को आंच भी ना आए और हमारा कर्तव्य भी पुरा हो जाए क्योंकि इस सृष्टि की रक्षा हमने ही की थी इसलिए हमइसे कुछ नही कर सकते हम अवश्य अब कुछ निर्णायक कार्य करेंगे आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
उधर भक्तो की एक टोली आती है और गोपाल से कहती है हम विष्णु मंदिर जा रहे है हम कुछ देर यहाँ विश्राम कर ले । तभी गोपाल को स्मरण होता है की उसकी मौत करीब है वो उत्साहित हो जाता है । टोली और गोपाल वह महारानी सभी साथ जाते है विष्णु मंदिर तभी उन्हें बीच में एक व्यक्ति मिलता है जिसके पास बैंसा होता है वह कहता है की हमें विष्णु मंदिर जाना है गोपाल सोचता है की यमराज जी उसे लेने आ गए है वह उन्हें कहता है हम सब भी वहीं जा रहे है आप भी साथ चलिए ।
महारानी सोचती है होनी किस प्रकार अपना रूप ले रही है ।
गोपाल - रानी माँ इस बैंसे की वजह से मेरे पिता का आदेश पुरा हो जाएगा ।
उधर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य तैयार हो जाते है ।
वहीं सभी लोग विष्णु मंदिर पहुंच जाते है ।
महारानी चित्रलेखा - हे पालन हार गोपाल की रक्षा करना ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य आकाश में पहुंच जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य कहते है हे धरती माँ अगर इस दान की व्यवस्था को बदलना नही होता तो हम कभी आपकी पुरातन काल से चली आ रही धरती की गति को रोकते नही हम क्षमा प्रार्थी है ।
धरती माँ प्रकट होती है कहती है हे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज आप कभी गलत नही हो सकते आप जरूर करिए यह कार्य हम सभी को आप पर गर्व है ।
सम्राट विक्रमादित्य धनुष बाण निकाल कर दैविक तीर छोड कर धरती की गति को रोक देते है ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् क्या एक मनुष्य के लिए धरती की गति को रोकना न्यायसंगत है । राजा भोज - बिल्कुल न्यायसंगत है क्योंकि बात केवल एक मनुष्य की नही है बात है व्यवस्था की अगर यह व्यवस्था नही बदली गई होती तो बहुत से निर्दोष व्यक्तियों का जीवन संकट में पढ जाता ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य धरती की गति को रोक देते है धरती थम जाती है ।
देवता गण - गुरू बृहस्पति सम्राट यह क्या कर रहे है इस तरह तो संसार का विनाश हो जाएगा ।
पुरी पृथ्वी हिल जाती है देवता भयभीत हो जाते है । त्रिदेव की आंखे खुल जाती है उनके लोक काँप उठते है ।
ब्रह्मा विष्णु शिव यह क्या हो रहा है लगता है कोई सृष्टि के साथ खिलवाड कर रहा है वो भी समय से पहले हमें उसका विनाश करना होगा ।
शिव जी का त्रिशुल ब्रहमा जी का ब्रह्मास्त्र और विष्णु जी का सुदर्शन चक्र तीनों के दिवयास्त्र एक होकर सम्राटकी और चल पढते है ।
महामाया - यह क्या त्रिदेव ने बिना जाने अपने अस्त्र सम्राट के विरूद्ध छोड दिए मुझे सम्राट के प्राण बचाने होंगे ।
महामाया - हे इंद्रदेव सम्राट के प्राण खतरे में है कृपया उन्हें बचाए ।
इंद्र देव - देवी महामाया आप यहाँ ।
महामाया - हां में देवराज आपने मुझे धर्म को रक्षा के लिए सिंहासन बत्तीसी की रक्षिका नियुक्त किया था इसी नाते में यहाँ आई हूं आप इन तीनों देवों के अस्त्र से सम्राट की रक्षा करिए अगर सम्राट का जीवन समाप्त हो जाएगा तो इस संसार से समस्त 32 गुणों का अंत हो जाएगा और सम्राट को किस बात का दण्ड मिल रहा है वो तो एक अनुचित व्यवस्था को ठीक करने जा रहे है और उसका परामर्श भी मैने ही उन्हें दिया था आप रोकिए वरना धरती के एकमात्र सर्वगुण सम्पन्न मनुष्य देवताओं के प्रतिनिधि और आपके मित्र चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का जीवन समाप्त होते ही संसार का भी विनाश हो जाएगा धर्म खत्म हो जाएगा ।
देवराज इंद्र - इसके लिए हमें त्रिदेव की शरण में जाना होगा वहीं सम्राट के प्राणों की रक्षा करेंगे ।
देवराज इंद्र सहीत सभी देवी देवता ब्रहमा विष्णु शिव को पुकारते है ।
त्रिदेव - क्या हुआ इंद्र ।
इंद्रदेव - हे परम पिता हे सृष्टि के रचियता ब्रहमा आप अपना ब्रह्मास्त्र हे संसार के पालनहार विष्णु आप अपना सुदर्शन चक्र हे संहार के देव महाकाल आप अपना त्रिशुल वापस भुला लिजिए ।
त्रिदेव - यह क्या कह रहे है आप आप संसार का विनाश करवाना चाहते है ।
इंद्र देव - नही परमपिता वो संसार का विनाश नही संसार के रक्षक है भगवान वे कोई और नही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है जो एक बालक के प्राणों की रक्षा के लिए आए है त्रिदेवों सम्राट विक्रमादित्य के अंत का मतलब है संसार से 32 गुणों का अंत ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य तीनों अस्त्रों को अपनी और आते देख कहते है हे परमपिता कर्तव्य के अधूरे रहने से तो अच्छा है हमारे प्राण चले जाए और हम कितने सौभाग्यशाली है जो हम आपके दिव्यासत्रों से मृत्यु को प्राप्त हो रहे है ।
त्रिदेव प्रकट हो जाते है अपने नेत्र खोलो महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हम आप पर प्रसन्न है आप जो कहेंगे हम वो देंगे पर उससे पहले आप हमें कुछ दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आदेश करिए भगवन् ।
त्रिदेव - अपनी अमोघ शक्ति को धरती से वापस बुलालो ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य ।
धरति पुनः चलने लग जाती है ।
त्रिदेव - कहो क्या चाहिए सम्राट विक्रमादित्य आपको ।सम्राट विक्रमादित्य - हे त्रिदेवो जब मनुष्य किसी को जीवन नही दे सकता तो उसे किसी की मृत्यु का क्या अधिकार है ।
त्रिदेव - सम्राट किसी को भी मृत्यु देने का अधिकार नही है अगर वो यह करता है तो अनुचित करता है केवल एक पिता को अधिकार होता है अपने पुत्र को दान करने का वो भी जन हित के लिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - इश्वर आज कल मनुष्य अपने निजी स्वार्थ को ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है ।
त्रिदेव - सम्राट अगर हमारी इस व्यवस्था से से समाज को हानी होती है तो हम त्रिदेव आज यह घोषणा करते है आज हम यह व्यवस्था को समाप्त करते है अब कोई भी प्राणी मृत्यु को जीवन दान नही कर सकता ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद देवो ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् देखा आपने सम्राट विक्रमादित्य ने अपना कर्तव्य निभा लिया । राजा भोज - नहीं देवी अभी उनका कर्तव्य पुरा नही हुआ था सम्राट ने जो व्यवस्था बंद करवाई वो अब से लागू होगी मगर गोपाल ने पहले अपने जीवन को दान दिया है इसका मतलब देवी अभी गोपाल सुरक्षित नहीं है उसके जीवन पर मृत्यु का साया अभी भी मंडरा रहा था । देवी - दात देती हूं आपकी बुद्धि की राजन् आपने बिल्कुल सच कहा है ।।
उधर भगवान विष्णु के मंदिर में गोपाल और सभी पूजा करते है । उधर कालदेव गोपाल के प्राण लेने के लिए आ जाते है सभी में अफरा तफरी मच जाती है । गोपाल हाथ जोड कर खडे हो जाता है ।
महारानी चित्रलेखा - गोपाल को हम कुछ नहीं होने देंगे हम सम्राट के कर्तव्य को आगे बढाएंगे ।
महारानी चित्रलेखा लाल कपडा लेकर भागती है काल बैंस के रूप में आते है तो वो उस कपड़े के पीछे भागते है ।
गोपाल - यह क्या मेरी वजह से रानी माँ का जीवन संकट में पड गया है ।
गोपाल - रूकिए यमराज आपको मेरे प्राण लेने है रानी माँ के नही ।
यमदेव का वाहन गोपाल को देख कर उसकी और दोड पढता है ।
महारानी चित्रलेखा - यह क्या हम कैसे रक्षा करे गोपाल की ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य आ जाते है और यमदेव के वाहन को रोक लेते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे यमदेव हमने यह व्यवस्था बदल दी है अब आप रूक जाइए ।
गोपाल - सम्राट आपने यह क्यों किया आपकी वजह से मेरे पिता की आज्ञा पालन में नही कर सका मुझे जाने दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - रूको पूछोगे नहीं यह हमने क्यों किया दान की नई व्यवस्था को स्थापित करने के लिए त्रिदेवो ने दान की व्यवस्था को बदल दिया है वरना हम आपको नही रोकते ।
गोपाल वहाँ से चले जाता है । गोपाल - हे यमदेव अब हम कैसे पुरा करे अपना कर्तव्य मुझे पता भी नही था की सम्राट जैसा धर्म का रक्षक हमारे साथ इतना बडा अधर्म करेगा ।
यमदेव - नहीं पुत्र गोपाल सम्राट ने तुम्हारे साथ कोई अधर्म नहीं किया अपितु उन्होने तो अपना धर्म और कर्तव्य निभाया है साथ ही मुझे भी धर्म संकट से बचा लिया । सम्राट ने यह व्यवस्था ही बदल दी है अब तुम्हारे पिता तुम्हें दान नही कर सकते ।
तभी सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा आ जाते है ।
यमदेव - यह दोनों विभूतिया धन्यवाद के पात्र है पुत्र जाओ इनके पास जाओ ।
गोपाल - मुझे क्षमा कर दिजिए सम्राट मैने आपको कटू वचन कहे ।
सम्राट विक्रमादित्य - कोई बात नही गोपाल ।
यमदेव - सम्राट अब हम चलते है हमें एक पापी को दण्ड देना है ।
उधर गंगाराम एक बैल को दान देने के लिए लोगों से पूछता है । तभी एक व्यक्ति कहता है वाह गंगाप्रसाद तब यह बैल जवान था तब तू किसी को इस पर हाथ भी नही रखने देता था और आज जब यह बुढा हो गया है तो इसके चारे पानी से बचने के लिए तू यह दान का नाम ले रहा है हमेंबुढे बैल से काम करवाकर नर्क में नही जाना है बहुत आदमी देखे पर तेरे जैसे घठीया आदमी नही देखा ।
यमदेव - गंगाप्रसाद तुमने धर्म के नाम पर बहुत अधर्म किया है आज तुम्हें दण्ड मिलेगा । यमदेव उस बुढी बैल से गंगाप्रसाद के उपर आक्रमण करवाते है ।
बैल गंगाप्रसाद को पटक देता बार बार उसे घसीटता है ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में गोपाल की माँ आयी है सम्राट कैसा है मेरा पुत्र ।
तभी महारानी के साथ गोपाल आता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - गोपाल यह तुम्हारी माता है ।
गोपाल अपनी माँ से मिलकर बहुत प्रसन्न होता है ।
गोपाल की माता - सम्राट अब हम चलते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको कही भी जाने की आवश्यकता नहीं है आप हमारे महल के पास आश्रम है वहां रहिए गोपाल के साथ ।
महारानी चित्रलेखा - हां इससे हम गोपाल से मिलते रहेंगे ।
गोपाल की माता - आप दोनों धन्य है ।
और सम्राट आप आपके जैसे कर्तव्यनिष्ठ सम्राट संसार में दीपक लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगा ।
उसी दिन शाम को सम्राट विक्रमादित्य महामाया देवी को धन्यवाद देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी यह सब आपकी वजह से हुआ है ।
महामाया - सम्राट यह आपकी महानता है की आप हमे श्रेय दे रहे है सच्चाई तो यह है कि आपने संसार पर एक और उपकार कर दिया है आपका यह उपकार संसार पर हमेशा रहेगा । सम्राट अब में आज्ञा चाहती हूं ।
देवी कहती है तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । राजा भोज - देवी सम्राट तो बहुत महान है उनके सामने किसी की तुलना मतलब सुर्य को दीपक दिखाने जैसा है । देवी गंगाप्रसाद के साथ क्या हुआ । देवी - गंगाप्रसाद को दण्ड मिलने के बाद वह एक दिन सम्राट के पास जा पहुंचा ।
गंगाप्रसाद - सम्राट मैने बहुत बडा अपराध किया है मुझे मृत्यु दण्ड दे दिजिए में इस धरती पर बोझ हूं सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - गंगाप्रसाद सुबह का भूला अगर शाम को लौट आए तो उसे भूला नही कहते आपको आपकी गलती का अहसास है आपने जो अब तक नही किया वो करिए अपने परिवार को सुख दो ।
गंगाप्रसाद गोपाल और उसकी माता तीनों प्रसन्न होते है और वहां से जाते है ।
देवी - सम्राट ने बिना दण्ड दिए गंगाप्रसाद को धर्म का मार्ग दिखा दिया ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । राजा भोज - आपने सही कहा ।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
Comments
Post a Comment