तीसवा गुण संचालक

।। तीसवा गुण संचालक ।।

सम्राट विक्रमादित्य वन में सैर पर जा रहे थे उन्हे चीखने की आवाज आती है । सम्राट विक्रमादित्य और मुंजा उस ओर जाते है । सम्राट देखते है की दो साध्वी की ओर राक्षस बढता है । सम्राट विक्रमादित्य उनकी रक्षा के लिए आ जाते है । 
सम्राट विक्रमादित्य - राक्षस हम तुम्हे मौका दे रहे है चले जाओ यहां से वरना मारे जाओगे ।
राक्षस - देखते है कौन मरता है ।

" सम्राट विक्रमादित्य और राक्षस की लडाई होती है सम्राट विक्रमादित्य अपनी तलवार फेक कर उस राक्षस का वध कर देते है "

सम्राट विक्रमादित्य - आप दोनों कौन है ।
दोनों साध्वी अपने असली रूप अप्सरा के रूप में आ जाती है ।
रंभा - सम्राट विक्रमादित्य प्रणाम । में रंभा और यह उर्वशी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप दोनों यहा कैसे ।
मुंजा - हां आप दोनों उज्जैनी में क्या कर रही है ।
उर्वशी - सम्राट हम देवराज इन्द्र से रूट कर आए थे सोचा वनों को देख आए पृथ्वी लोक पर अब स्वर्ग जा ही रहे थे और यह राक्षस आ गया धन्यवाद आपका आपने हमारे प्राण बचाए ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसमे आभार केसा ।
उर्वशी - सम्राट हमारी ओर से आपको उपहार लेने होंगे । यह मेरी अंगूठी लिजिए । इस से आपका यौवन सदैव रहेगा 
रंभा - मेरी ओर से भी यह अंगुठी आपको भेंट इस अंगुठी के प्रभाव से आपका तेज आप स्वंय परिस्तिथि के अनुसार कर पाएंगे इस अंगुठी के प्रभाव से आपका तेज सूर्य की तरह तेजस्वी रहेगा । 
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद आप दोनों का । 
रंभा - उर्वशी - सम्राट विक्रमादित्य आप स्वर्ग चलिए हमारे साथ । हम समझेंगे आपने हमारा आतिथ्य स्वीकार किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - चलिए इस बहाने मित्र देव राज इंद्र से मिल लेंगे हम । 

स्वर्ग लोक से रथ आता है । सभी जाते है ।
उर्वशी - आइए सम्राट आपका स्वागत है इंद्र लोक में । रंभा आज स्वर्ग में इतना सन्नाटा क्यो है ।

" सैनिक दोडकर आता है देवी आप दोनों यहां नही थी नकटासूर नाम के असूर ने देवराज पर आक्रमण कर दिया तीन दिन तक युद्ध चला तथा देवराज को युद्ध बीच में छोडना पढा क्योकि नकटासूर को ब्रह्मा जी और शिव जी का आशीर्वाद है की उसे कोई देव अथवा भगवान नही भार सकता उसे वही मार सकता है जो मनुष्य सत्य धर्म का पालन करने वाला और तीनों लोक जिसकी वीरता में समा जाए वही मनुष्य उसे मार सकता है । 
सम्राट विक्रमादित्य - प्रिय सैनिक क्या आप बता सकते हो वो राक्षस किस ओर गया होगा ।
सैनिक - राजन् वह दक्षिण की ओर गया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक हम जाएंगे ।
उर्वशी - क्या आप जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हा देवी यह करेंगे देवताओं की सहायता ।
उर्वशी - सम्राट आप इसी रथ से जाए यह आपको सीधे वही ले जाएगा यह मन की गति से चलता है । हे ईश्वर सम्राट की सहायता करना ।

सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा दक्षिण में तो बहुत सारे पर्वत है क्या पता राक्षस किस पर्वत पर ले गए होंगे ।
मुंजा - सम्राट वह देखिए उस पहाडी पर राक्षसों की टोली है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वही होंगे इंद्रदेव चलो । 

सम्राट विक्रमादित्य - चलो मुंजा तुम एक काम करो तुम उन गुफा में देखो इतने में इस नकटासूर को मारने का प्रयास करता हूं । 
मुंजा - जी महाराज ।

" सम्राट विक्रमादित्य नकटासूर से युद्ध का कहते है । नकटासूर कद काठी में बहुत बडा था वह वरदान से सम्पन्न भी । फिर भी सम्राट विक्रमादित्य उस से युद्ध लडते है " 
" वही मुंजा कई सारी गुफा खोजने के बाद भी इंद्र देव को नही खोज पाते है फिर उनहे एक गुफा से इंद्र देव की आवाज आती है " 
मुंजा - महाराज इंद्र ।
इंद्र देव - कौन हो तुम ।
मुंजा - महाराज इंद्र घबराईए मत में सम्राट विक्रमादित्य का दूत हूं ।
इंद्र देव - क्या सम्राट विक्रमादित्य आए है । हमें घराने की जरूरत नही चलो हम भी उनकी सहायता करते है ।

सम्राट विक्रमादित्य नकटासूर से युद्ध लडते है इतने में नकटासूर की सेना भी आ जाती है सम्राट विक्रमादित्य अब अपने दिव्य शस्त्र का उपयोग करते है वे अपना चक्र चलाते है सभी राक्षस मारे जाते है वे पुनः तलवार से युद्ध लडते है । देवराज इंद्र भी आते है नकटासूर उन पर फिर आक्रमण कर देता है ।

सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा तुम देव राज इंद्र को सुरक्षित जगह ले जाओ हम अकेले लड़ेगे । इंद्र देव के प्राणों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है ।
मुंजा - जी महाराज ।

" भीषण युद्ध में सम्राट विक्रमादित्य नकटासूर को मारने देते है । मुंजा और देवराज इंद्र विमान से उन्हे लेने आते है वह सभी स्वर्ग जाते है ।

देवराज इंद्र - सम्राट हम आपके ऋणी रहेंगे हमेशा ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही नही इंद्र देव ।
देवराज इंद्र - सम्राट विक्रमादित्य आपने आज दो महान कार्य किए है एक स्वर्ग लोक को बचाकर हमें ऋणी कर दिया और नकटासूर को मार राक्षस कूल के आखिरी वंशज को खत्म कर राक्षस प्रजाति का अंत कर दिया और पाताल भी विजय कर लिया । यह सही समय है जब आपको त्रिलोक विजेता की उपाधि से सुशोभित किया जाए । वह संचालक का प्रभार आपको सोंप जाए चूंकि आपने पाताल और स्वर्ग जीत लिया है पृथ्वी पर पहले से चक्रवर्ती विश्व विजेता है तो अब आपको ही तीनों लोकों का संचालक नियुक्त किया जाता है । अब आप ही तीनों लोकों के रक्षक का उत्तरदायित्व निभाएंगे । आपकी विश्व विजय उज्जैनी धर्म ध्वजा जो अब तक सम्पूर्ण पृथ्वी पर लहराती थी वह अब स्वर्ग और पाताल में भी फहराइ जाएगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - बहुत बहुत आभार देवराज इंद्र । आपने हमें इस लायक समझा आपका सहृदय से धन्यवाद ।
देवराज इंद्र - संचालक सम्राट विक्रमादित्य की जय ।
सभी देवता और चारो अप्सराएँ चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य पर पुष्पो की वर्षा करती है वह विशेष विमान से उज्जैनी भेजती है ।

तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने देवताओं तक की रक्षा की थी । उन्होंने अपने प्रताप से आम जन के ह्दय में जगह बनाई । उन्होंने अपने संचालक का प्रभार भी भली भांति निभाया । हम हर पोस्ट ऐतिहासिकता देखकर ही पोस्ट करते है किंतु एक किंवदंती भी है कि सम्राट विक्रमादित्य हर माह देवराज इंद्र की बैठक में जाते थे जहां वे पृथ्वी पर शांति सदैव रहे उसके लिए प्रयत्न करते थे । हमने यह बात आपको नोट के माध्यम से इसलिए बताई क्योकि यह किंवदंती है किंतु हम तो इसे सत्य मानते है क्योकि जिन चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की महानता आज भी है उनकी तो किंवदंती भी सत्य ही होगी ।

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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