दसवा गुण विवेकशीलता
।। दसवा गुण विवेकशीलता ।।
राजा भोज जैसे ही दसवी सीडी पर चढते है एक देवी प्रकट होती है । राजा भोज उनसे कहते है देवी आप इस सिंहासन में किस गुण की प्रतिक है । देवी - राजन् में वो हूं जो हर समस्या का निवारण कर सकती है जिससे मनुष्य का सम्मान बढता है तो बताइए कौन हूं में । राजा भोज - देवी आप विवेक गुण की प्रतिक है । देवी - हां राजन् आपने सही कहा में विवेकशीलता की प्रतिक हूं , राजन् में आपको चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के विवेकशीलता के गुण की कथा सुनाती हूं । राजा भोज - हां देवी आप मुझे सम्राट विक्रमादित्य की विवेकशीलता के गुण की कथा सुनाए । देवी - तो सुनिए राजन् सम्राट विक्रमादित्य की विवेकशीलता का ऐसा उदाहरण जो संसार में कभी नही हुआ होगा । एक दिन सम्राट अपनी पत्नी महारानी चित्रलेखा को उनके मायके सिंघल द्वीप छोड कर वापस उज्जैनी लौटे ।
वराहमिहिर जी - सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम ब्राह्मण देव ।
वराहमिहिर जी - कल्याण हो सम्राट । सम्राट महारानी जी नही आए ।
सम्राट विक्रमादित्य - वे कुछ दिन वहां रूक कर आएंगी ।
वराहमिहिर जी - मायके का यही बंधन है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी राज्य में सब कुशल मंगल तो है ।
वराहमिहिर जी - हां सम्राट राज्य में शांति है आप जैसे छोड कर गए थे वैसा ही है । किंतु सम्राट आप तो कल रात्री में ही आ गए थे तो क्या आप रात्री से ही राज्य भ्रमण पर है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं वराहमिहिर जी हम तो अभी आए है ।
वराहमिहिर जी - अभी ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या हुआ वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - नही वो कुछ सैनिक बता रहे थे की आप कल पास के गांव के सरपंच के विवाह में उपस्थित थे सैनिक यह भी बता रहे थे कि आपकी वजह से ही विवाह हो पाया ।
सम्राट विक्रमादित्य - असंभव वराहमिहिर जी हम तो अभी अभी आए है शायद सैनिको को कोई भ्रम हुआ होगा या कही आपका स्वास्थ्य तो खराब नही ।
वराहमिहिर जी - नही सम्राट मेरा स्वास्थ सही है । सीमा पर खडे सैनिक यह बता रहे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर हम तो कल सिंघल द्वीप पर ही थे ।
सैनिक - सम्राट आपसे कुछ लोग मिलने आए है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम अभी आते है । वराहमिहिर जी आप इस घठना की जांच करिए और पता लगाई आखिर यह हो क्या रहा है ।
वराहमिहिर जी -यदि सम्राट कल यहाँ नही थे तो कल कौन था उस गाँव में ।सम्राट विक्रमादित्य राज्य के दौरे पर होते है किंतु प्रजा उन्हें देखकर घबराती है ।
सम्राट विक्रमादित्य -प्रजा वासीयों क्या समस्या है आप इतने चिंतित क्यों है ।
प्रजा - सम्राट अभी कुछ देर पहले प्रजा ने आपको मंदिर में पुजा करके महल जाते हुए देखा और इतनी जल्दी आप राज्य के बाहर से कैसे आ सकते है ।
उधर महल में भी सम्राट विक्रमादित्य बैठे रहते है । राज्य में दो दो सम्राट विक्रमादित्य रहते है एक जैसे । तभी जो प्रजा से मिला वे सम्राट महल की और बढते है । तभी महल के सम्राट विक्रमादित्य और बाहर से आए सम्राट विक्रमादित्य आमने सामने होते है ।
वराहमिहिर जी सेनापति सभी आश्चर्यचकित रह जाते है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् महल में दो सम्राट विक्रमादित्य थे दोंनो एक जैसे बिल्कुल वहीं कद काठी वही चेहरा वहीं आवाज । राजा भोज - देवी चाहे कितनी भी समानता हो किंतु कोई ना कोई अंतर अवश्य था उन दोनों में से एक बहुरूपिया था । देवी - उसमें कोई दो राय नही किंतु राज्य के सामने एक प्रश्न खडा हो गया था कौन सत्य है कौन झूठ । ।।
बाहर से आए विक्रमादित्य महल के अंदर विक्रमादित्य से कहते है आपको न्याय का अधिकार किसने दिया । अंदर बैठे विक्रमादित्य कहते है आप बहुरूपिये है । बाहर से आए विक्रमादित्य कहते है बहरूपिये आप है और हमारा राज्य हडपने आए है । बाहर से आए विक्रमादित्य कहते है वराहमिहिर जी हम महारानी को छोड कर आए और आपको हमने जिम्मेदारी दी । दोनो विक्रमादित्य तलवार निकाल लेते है । तभी वराहमिहिर जी रोकते है ठहरिए रूक जाइए इस समस्या का समाधान विवेक से होगा ना कि शक्ति से जब तक यह समस्या सुलझ नही जाती तब तक कोई हमारा सम्राट नही होगा आप दोनो का न्याय नगर के पंच करेंगे ।
वराहमिहिर जी - सेनापति जी पहली बारर ऐसी समस्या देख रहा हूं ।
सेनापति जी - आप चिंता ना करे आपने समाधान तो निकाल ही दिया है आचार्य जी ।
वराहमिहिर जी - हां किंतु हमें पता लगाना होगा की उस बहरूपिये के आने का उद्देश्य क्या है ।
।। ( मित्रों आपको समझने में कठिनाई ना हो इसलिए हमने महल के अंदर और महल के बाहर वाले सम्राट विक्रमादित्य कह कर संबोधित कर रहे है ) ।।
वराहमिहिर जी महल के अंदर वाले विक्रमादित्य से कहते है सम्राट आप अपने हस्ताक्षर बदल दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी हम किसी छलिए के लिए अपने हस्ताक्षर नही बदलेंगे एक राजाकभी अपने हस्ताक्षर नही बदलता हम आपके अपने हस्ताक्षर करके देते है ।
वराहमिहिर जी दोनों हस्ताक्षर को देखते है और चौक जाते है दोनों के हस्ताक्षर भी एक जैसे और दोनो अपने हस्ताक्षर भी नही बदल रहे है ।
उधर महल के बाहर वाले सम्राट विक्रमादित्य कहते है हे विष्णु देव हमने सदैव सच्चे मन से आपको याद किया है कृपया हमारी सहायता करिए ।
तभी पक्षी के रोने की आवाज आती है सम्राट विक्रमादित्य सुनते है कि पक्षी को कोई दुख है लगता है वो रास्ता भटक चुका है हमें जाना होगा देखने ।
उधर वराहमिहिर जी कहते है उस पक्षी से धन्यवाद अब असली और नकली में अंतर पता चल जाएगा क्योंकि पक्षीयों की बोली केवल सम्राट विक्रमादित्य ही जानते है ।
वराहमिहिर जी मायावी पक्षी से कहते है आप अपने असली रूप में आ जाइए घोड़े की आवाज आ रही है लगता है सम्राट आ गए । किंतु यहाँ पर भी वहीं होता है दोनो विक्रमादित्य आ जाते है । दोंनो एक दूसरे से कहते है यहाँ क्यों आए हो दोनो कहते है हम एक पक्षी की आवाज सुनकर आए है ।
वराहमिहिर जी कहते है हे विधाता यह कैसा अजूबा रूप एक और गुण भी एक समान दरबारी पंचो को भी मुश्किल आएगी पहचान ने में ।
वराहमिहिर जी - सम्राट हम आप दोनो का निर्णय करेंगे ।
एक दरबारी पूछता है - सम्राट यह बताए की आप महारानी को सिंघल द्वीप किस घड़ी में यहाँ से निकले थे ।
महल के अंदर वाले विक्रमादित्य कहते है सिंह लग्न के अमृत योग में ।
महल से बाहर वाले विक्रमादित्य कहते है और उस घड़ी में वराहमिहिर जी आपने हमें विदा किया था ।
वराहमिहिर जी - यह तो दोनों सत्य बोल रहे है ।
पंच - हम एक गवाह बुलाएंगे सरपंज तुम बताओ कौन है असली सम्राट जिसने तुम्हें हार दिया और तुम्हारी बेटी का कल्याण दान किया था ।
सरपंच - मुझे क्षमा करे पंचो किंतु में ठहरा एक सरपंच जब आप सभी पहचान नही पा रहे तो में कैसे पहचान पाऊंगा किंतु जो भी असली सम्राट है उसका धन्यवाद ।
पंच - अब हम आप दोनों से सम्राट विक्रमादित्य के जीवन के प्रशन पूछेंगे बताइए सम्राट ने सबसे पहले काल को किस रूप में देखा ।
अंदर वाले विक्रमादित्य - अश्व रूप में ।
बाहर वाले विक्रमादित्य - काले रंग के ।
पंच - दोंनो ने ही सही उत्तर दिया ।
अंदर वाले विक्रमादित्य कहते है पंचो अगर आपकी आज्ञा हो तो में एक सवाल पूछना चाहता हूं जिसका उत्तर केवल असली विक्रमादित्य को ही पता होगा ।
पंच - आज्ञा है ।
अंदर वाले विक्रमादित्य - तो बताइए कि महारानी चित्रलेखा ने सम्राट को कभी देखा तक नही फिर वो उनका चित्र कैसे बनाती थी ।
बाहर से आए विक्रमादित्य - हमें नही पता इसका उत्तर ।
वराहमिहिर जी - तो क्या आप जानते है ।
अंदर वाले विक्रमादित्य - यह घठना हमारे पिछले जन्म की है हम तब चित्रकार थे नदी किनारे पक्षियों के चित्र बनाते थे और उस जन्म में महारानी चित्रलेखा हमारी पत्नी थी और हमारा सारा समय हम चित्र बनाने में निकाल देते थे उनके लिए समय नही निकाल पाते फलस्वरूप वो उन पक्षियों को अपना शत्रु समझ बैठी एक दिन की बात है जब हम पंछियों को बुला रहे थे चित्र बनाने केलिए तभी उन्होंने पंछी की तीर से हत्या कर दी । हमने कहा किसने की हत्या तभी वो आइ और कहने लगी हमने की है इनकी हत्या ताकि आप अपना अनमोल समय हमें दे सकेंगे तभी उस पक्षी की पत्नी आती भै और कहती स्त्री तुमने अपने पति के समय के लिए हमारे स्वामी को मार दिया हम तुम्हें श्राप देते है की तुम भी अपने पति के लिए तडपते रहोगी किंतु देवी चित्रलेखा की करूण विनती से पक्षीयों ने अपना श्राप कम कर दिया और कहा तुम अपने पति से बिछड़ोगी तो अवश्य किंतु उनके चित्र बनाते रहना तुम उन्हें वापस पा लोगी यह घठना थी इसलिए इस जन्म में महारानी ने हमें देखा तक नही फिर भी वो हमारा चित्र बना लेती थी ।
बाहर वाले विक्रमादित्य कहते है वराहमिहिर जी यह इतने झूठी और मंडगढंत कहानी बनाई है ।
अंदर वाले विक्रमादित्य - इस बात का निर्णय आप नही पंच करेंगे बताइ वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - यह सच कह रहे है हमने महाराज और महारानी की कुंडली देखी है वे पिछले जन्म में भी पति पत्नी थे और वे उस जन्म में चित्रकार भी थे ।
बाहर वाले विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी आपको कोई गलत फैमी हो रही है ।
पंच - न्याय हो चुका है पहला वाला ही हमारा सम्राट है यह बहरूपिया है ।
वराहमिहिर जी - सैनिको इस बहरूपिये को पकडों।
अंदर वाले विक्रमादित्य - सेनापति बंदी बना लो इसे ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है देखा राजन् ऐसा सुशाहन था सम्राट के राज में वह बहरूपिया पकड़ा गया और कारागार में डाल दिया गया । राजा भोज - क्षमा करिए देवी किंतु यह गलत है पिछले जन्म की एक एक घठना बताना असंभव है में नही जानता अपना पिछला जन्म इसका अर्थ यह तो नही की में मनुष्य नही में जाँच की इस विधि को सभी नही मानता हो सकता है पंच जिसे असली कह रहे है वो ही बहरूपिया निकले बताई देवी क्या में सही नही कह रहा । देवी - नही राजन् आपने बिल्कुल सही कहा है और वो पंच भी मनुष्य ही है मनुष्य गलती करता ही है अब समय आ गया था असली और नकली में भेद मिटाने का ।
जिसे सबने असली माना वो ही नकली था वो आकाश में जाकर कहता है ।
बहुरूपिया - हे द्वादश आकार गंगा में निवास करने वाले भद्रकाल सामने आओ हमारे ।
भद्रकाल - सुन रहा हूं में ।
बहुरूपिया - भद्रकाल हम यह कहना चाहते थे की हम है उज्जैनी नरेश विक्रमादित्य हमने असली चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को बंदी बना लिया है ।
भद्रकाल - नहीं नकली विक्रमादित्य जब तक हमअसली चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को मार नहीं देते तब तक तुम सफल नही हो सकता है याद है ना तुम्हें हमें सम्पूर्ण संसार पर से चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के धर्म के साम्राज्य को खत्म करके मेरे साम्राज्य का विस्तार करना है ।
नकली विक्रमादित्य - याद है हमें आप चिंता मत करिए हम वही करेंगे जो आपने कहा है ।
भद्रकाल - तुम जल्द से जल्द असली विक्रमादित्य की चिता जला दो ।
वराहमिहिर जी अपने कक्ष में चिंतित होकर कहते है जाने क्यों उस बहरूपिये को कारावास में डालने के बाद भी मन में वो भाव नही है लगता है निर्णय लेने में कोई गलती हुई है ।
तभी नकली विक्रमादित्य आता है वो कहता है आचार्य जी हम उस बहरूपिये को मृत्यु दंड देंगे ।
वराहमिहिर जी - नही सम्राट बिना जाने की वो यहाँ आया क्यों है इससे प्रजा में गलत संदेश जाएगा । सम्राट कहते है विवेकशील प्राणी हर चिज करने से पहले सो बार सोचते है ।
नकली विक्रमादित्य - ठीक है आप जाँच करिए ।
उधर असली सम्राट विक्रमादित्य जेल में कहते है चाहे कितनी यातनाएं भुगतनी हो हम राज्य को बचा कर रहेंगे ।
वराहमिहिर जी - बहरूपिये ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - एक बहुरूपिया समाज कल्याण में सोच रहा है उसकी जगह आप यह सोचिए की यहाँ क्यों है किसके कहने पर आए है यहाँ आने का उद्देश्य सच सच बताइए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपकी आखें कैसे धोखा खा सकती है वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - हमारे आखें धोखा नही खा सकती आप अपना उद्देश्य बताइए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप हमारा उद्देश्य जानना चाहते है तो सुनिए हमारा उद्देश्य है प्रजा का सुख , राज्य की रक्षा , संसार का कल्याण , पृथ्वी के कौने कौने से धर्म का स्वर सुनना और अधर्म का नाश करना यही है हमारा उद्देश्य यही उद्देश्य कल भी था आज भी है और सदैव रहेगा ।
वराहमिहिर जी - आपकी सोच हमारे सम्राट जैसी है किंतु इस बात से सच साबित नही होता ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो आप तुरंत एक संदेश सिंघल द्वीप भेजिए महारानी चित्रलेखा के आते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा । महारानी और मेरा प्रेम आत्मा से जुडा हुआ है केवल दो नही हजारो विक्रमादित्य में भी वो हमें तुरंत पहचान लेंगी ।
वराहमिहिर जी सोचते है कि सम्राट विक्रमादित्य ने अब तक एक भी बार महारानी को याद नही किया जबकि कारागृह में बंद विक्रमादित्य ने बडें विश्वास से महारानी को बुलाने के लिए कहा हमें जबतक पूर्ण सत्य पता ना चल जाए तब तक हमें कारागृह में बंद विक्रमादित्य को बचाना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी क्या कहा उस बहरूपिये ने ।
वराहमिहिर जी - सम्राट मुझे लगता है वो व्यक्ति निर्दोष है उद्देश्य से भटका हुआ है आपको उसे जीवन दान दे देना चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या कह रहे है आप ।
वराहमिहिर जी - हम जितना अपने सम्राट को जानते है वो कह रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप नही जानते कुछ भी हम उस बहरूपिये को छोड कर प्रजा का नुकसान नही होने देंगे ।
नकली विक्रमादित्य कारागृह में असली सम्राट विक्रमादित्य से मिलता है वह कहता है तो कैसा लग रहा है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य कारागृह में रहकर कल तक आप महल में रहते थे आज कैसा लग रहा है कारागृह में ।
असली विक्रमादित्य कहते है ऐसा मत समझो की एक जैसा समय हमेशा रहेगा हम तुम्हें दण्डित करेंगे और तुम कारागृह में होंगे और में अपने वास्तविक स्थान पर ।
नकली विक्रमादित्य - उचें स्वर में हमसे बात मत करो ।
असली सम्राट विक्रमादित्य - उचें स्वर में तुम हमसे बात मत करो यह मत भूलो हम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ।
नकली विक्रमादित्य सैनिको को आदेश देता है ही इसे लेकर चलो प्रजा के बीच वहिं इसे दण्डित करेंगे ।
नकली विक्रमादित्य मन में कहता है समय का खेल देखो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिस प्रजा ने आपको इश्वर से भी ज्यादा माना आज वहीं प्रजा तुम्हारे प्राण मांगेगी और फिर राज होगा हमारा फिर अधर्म राज करेगा ।
नकली विक्रमादित्य कहता है प्रजाजनों आप जिसे देख रहे है यह हम सबका दोषी है इसने हमारा रूप धारण करके हम सबके साथ छल किया है और अब इसे बताना ही पडेगा ही यह यहाँ क्यो आया है ।
असली सम्राट विक्रमादित्य - हम अपने राज्य में आए है अपने लोगों के पास आए है छली हम नही तुम हो ।
नकली विक्रमादित्य - लगता है यह ऐसे नही मानेंगा सेनापति इसे तब तक कोडे मारो जबतक यह सत्य ना कहे ।
।। कथा सुनाते हुए राजा भोज कहते है देवी इतना बड़ा अधर्म और सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने राऊ देव तक को रोक दिया था वो इतने लाचार क्यों है उन्हें तो विरोध करना था । देवी - राजन् हर बार पराक्रम का उपयोग नही होता है इसमें कोई संदेह नहीं है कि सम्राट के पास बहुत शक्ति थी वो मात्र कुछ छण में ही उसे मार देते । राजा भोज - तो फिर उन्होंने ऐसा क्यो नही किया । देवी - अगर वो ऐसा करते तो उस बहरूपिये द्वारा खोदी गई छल कपट की सुरंग को कैसे नापते । राजा भोज - अच्छा सम्राट ने इतनी यातना सहने के बाद भी उन्होंने अपना विवेक नही छोडा । देवी - हां क्योंकि वो जानते थे कि वो व्यक्ति ही गलत है इसलिए वह गलती अवश्य करेगा उसकी सोच ही गलत है।राजा भोज - एक बात में डंके की चोट पर कहता हूं कि सम्राट विक्रमादित्य को महानता को नमन है उनके चरणों में नमन है ।
उधर असली सम्राट विक्रमादित्य कोडे खाने के बाद भी पीछे नही हटते ।
नकली विक्रमादित्य बताओ कौन हो तुम रूको सेनापति यह व्यक्ति बहुत ही चतुर है ऐसे व्यक्ति मर कर भी सच नही कहते इसलिए हम घोषना करते है की कल इसी जगह पर हम इसे मृत्यु दंड देंगे ।
वराहमिहिर जी राज्य की कुंडली देखते है उसमे वो देखते है की गृह दिशा बदल रही है अर्थात राजा बदलने का योग हमें उस बहरूपिये की मृत्यु दंड की सजा रोकनी होगी कही वही तो हमारे वास्तविक सम्राट नही । जेल में बंद असली विक्रमादित्य की बात याद आती बै वराहमिहिर जी को की क्यो ना महारानी को बुला लिया जाए । वराहमिहिर जी पंछी के माध्यम से महारानी को संदेश भिजवाते है कि कल ही महारानी उज्जैनी लौट आए । नकली विक्रमादित्य पंछी को तीर मार देता है वराहमिहिर जी उसे देखने जाते है और देखते है कि यह तीर तो बिल्कुल अलग है हमने अपने पुरे जीवन में ऐसा तीर नही देखा ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् यह क्या सम्राट के लिए सारे मार्ग बंद हो गए थे । राजा भोज - हां देवी मगर जब सारे मार्ग बंद हो जाए जब आंखो के सामने अंधेरा छा जाए तब विवेक ही है जो सब समस्या से निकाल सकता है सम्राट विक्रमादित्य ने अवश्य विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाया होगा ।।
नकली विक्रमादित्य जेल में पहुंच कर कहता है सम्राट विक्रमादित्य कैसा लग रहा है आपको हमने तो आपसे सबकुछ छीन लिया आपकी प्रजा आपका राज आपका सम्मान आपको तो बहुत क्रोध हो रहा होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्रोध कैसा आपने तो हमें बार से मुक्त कर दिया जीवन में पहली बार हम निश्चिंत बैठे है ।
नकली विक्रमादित्य - हमें प्रसन्नता है की आप यह सब कह रहे है । इस बात से ऐसा लग रहा है कि आप भोजन नही करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं क्यो नही करेंगे अवश्य करेंगे भोजन गलत व्यक्ति के हाथ में आने से भोजन दूषित नही हो सकता आपने वो वाक्या तो सुना ही होगा चंदन का पेड़ सैकड़ो विषैले सर्पो से घिरा रहता है मगर फिर भी उसकी खुश्बू कम नही होती आप महनत करके भोजन लाए हो हम अवश्य करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य को भोजन करता देख नकली विक्रमादित्य क्रोध में पागल होकर उनका भोजन फेक देता है और कहता है किस मिट्टी के बने हो तुम इतना सबकुछ होने के बाद भी इतने गंभीर विचारवान जबकि तुम जानते हो असली सम्राट विक्रमादित्य हम नही तुम हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह सब हम पहले से जानते है ।
नकली विक्रमादित्य - तो फिर अब तक चुप क्यो बैठे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्योंकि यही बात हम तुम से सुनना चाहते थे ।
नकली विक्रमादित्य - तो अब यह भी सुन लो हमाराउद्देश्य भी जान लो हम यहाँ तुम्हारा विनाश करने आए है सम्राट विक्रमादित्य तुम्हारे द्वारा स्थापित सत्य धर्म को संसार से खत्म करके इस संसार में व्यभिचार अधर्म स्थापित करना चाहते है ।
उधय वराहमिहिर जी एक ऋषि को बुलाते है ।
आचार्य जी - वराहमिहिर जी आपने हमें यहाँ गुप्त मार्ग से मिलाया कुछ विशेष काम ।
वराहमिहिर जी - हाँ आचार्य जरा देख कर बताए यह तीर कहाँ का है किस राज्य का है ।
आचार्य जी - आइए मेरे बाथ ।
आचार्य जी उस तीर को पानी में डालते है । पानी में डालते ही तीर अध्र्य हो जाता है ।
वराहमिहिर जी - यह क्या यह तीर अध्र्य कैसे हो गया ।
आचार्य जी - क्योंकि यह तीर इस लोक का नही है पृथ्वी के किसी भी तत्व से यह तीर नही बना है इसलिए यह तीर अध्र्य हो गया है और जिसने यह तीर चलाया है वो भी हमारी धरती का नही है वह भी दूसरे लोक का है ।
उधर नकली विक्रमादित्य कहता है कल सूर्यास्त होते ही हम सम्राट विक्रमादित्य को खत्म कर देंगे और फिर इस संसार में हमारे द्वारा भद्रकाल का शासन शुरू होगा ।
उधर फाँसी के लिए सम्राट विक्रमादित्य को लाया जाता है तभी नकली विक्रमादित्य असली विक्रमादित्य से कहता है कि क्या संबोधन करू आपको सम्राट विक्रमादित्य या बहरूपिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य कहो हमें ।
नकली विक्रमादित्य - मृत्यु सामने खडी है पर मृत्यु का भय नही है आपको ।
सम्राट विक्रमादित्य - मृत्यु का भय कैसा मृत्यु को संगिनी है भय तुम जैसे बहरूपिये को होता है मुझ जैसे धर्मात्मा का नही एक बार धर्म का मार्ग अपनाओ ।
नकली विक्रमादित्य - सैनिको तीर चलाओ इस पर ।
सैनिक - नही सम्राट यह आपका प्रतिरूप है हम नही चला पाएंगे तीर ।
नकली विक्रमादित्य - हम चलाएंगे तीर ।
उधर वराहमिहिर जी मन में कहते है हे इश्वर सत्य की रक्षा करना ।
सम्राट विक्रमादित्य फाँसी के फंदे से नीचे खुद जाते है और अपनी जान बचा लेते है ।
सेनापति और सैनिक उस गुफा में ढूंढते है मगर वो नही मिलते है ।
उधर प्रजा के सामने नकली विक्रमादित्य कहता है कैसा भागा वह बहरूपिया ।
वराहमिहिर जी - हमें बस इतना पता है कि महल में एक गुप्त मार्ग है मगर यह नही पता कि कहा यह सिर्फ सम्राट विक्रमादित्य को पता है ।
नकली विक्रमादित्य - आपके कहने का मतलब है कि हम नही है सम्राट विक्रमादित्य ।
वराहमिहिर जी - नही हम यह कह रहे है कि जो आपको पता है वहीउस बहरूपिये को भी पता है ।
तभी वराहमिहिर जी की नजर जाती है कि सम्राट विक्रमादित्य की तो परछाई ही नजर नही आ रही है ।
वराहमिहिर जी मन में सोचते है किसी की छाया ना हो यह संभव ही नही है ।
वराहमिहिर जी आधी रात को सेनापति वह सभी मंत्रीयों वह नवरत्नो को बुलाते है ।
मंत्री - वराहमिहिर जी आपने हमें आधी रात को बुलाया वह भी नगर के बाहर क्या हुआ क्या बात है ।
वराहमिहिर जी - बात ही कुछ ऐसी है जो दिन के उजाले में कहना संभव नही ।
वराहमिहिर जी - दिन के उजाले में बस बात पर परीक्षण किया जा सकते है ।
मंत्री - हम आपकी बात समझे नही वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - हम सभी से एक बहुत बड़ी भूल हो गई है ।
सेनापति - कैसी भूल वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - जो महल में सम्राट है वो हमारे असली सम्राट नही है ।
सेनापति - क्या पर क्या आधार है आपकी इस बात का ।
वराहमिहिर जी - परछाई जो हर व्यक्ति की होती है मगर महल में बैठे सम्राट की नही है मतलब यह की धरती के सारे मनुष्य या पशु सबकी परछाई होती है मगर राजमहल वाले सम्राट की नही है ।
सेनापति - वराहमिहिर जी इसका मतलब यह है की हम सभी ने अपने सम्राट का जीवन संकट में डाल दिया है ।
वराहमिहिर जी - अब समय है परिस्थिति को समझ कर उचित फैसला लेने की ।
उधर नगर में नकली विक्रमादित्य जो सम्राट बन कर बैठा था उसने सम्राट विक्रमादित्य को पकडने के लिए प्रजा को धन का लालच दिया और कहा जो कोई भी उस घुसपैठिए को पकड कर लाएगा उसे धन मिलेगा ।
असली सम्राट विक्रमादित्य छुपते हुए देख कर सोचते है हमारे लिए सबसे मुश्किल समय है यह हमारी प्रजा हमें पहचान नही पा रही है हमें विवेक से काम लेना होगा । तभी प्रजा में से एक युवक असली सम्राट विक्रमादित्य को पहचान कय उनके पास जाता है वह कहता है सम्राट आप यहाँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां मगर आपने हमें पहचाना कैसे ।
प्रजा - आपको कैसे भूल सकते है सम्राट हम आप हमारे सुख दुख के साथी है हम तो आपका ही इंतजार कर रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य सोचते है इस पर विश्वास करे या नही पर सम्राट फिर भी उनके साथ उनके घर पर जाते है ।
सम्राट उसके घर पर बैठते है तभी उस युवक की पत्नी भोजन लेकर आती है सम्राट कहते है देवी आपके पति को आने दिजिए हम साथ में भोजन करेंगे ।
उधर वो युवक महल में बैठे नकली विक्रमादित्य के पास जाकर कहता है अगर आप मुझे सोने में तोल दे तो में आपको उसका पता बताता हूं वो मेरे घर पर ही है वो नकली विक्रमादित्य से कहता है में व्यापारी हूं आप मुझे धन दे में कुछ भी करने को तैयार हूं ।
उधर राज्य के मंत्री वराहमिहिर से कहते है आचार्य हमें नकली विक्रमादित्य पर कारवाई करके उसे बंदी बनाना चाहिए ।
वराहमिहिर जी - इतना आसान नही है राजमहल में बैठे नकली विक्रमादित्य को पकड़ना जिसने सम्राट विक्रमादित्य जैसे पराक्रमी वह32 गुणों के स्वामी के विरूद्ध इतनी बढी साजिश कर सकता है तो वो कुछ भी कर सकता है हमें रणनीति बनाकर हमें असली सम्राट विक्रमादित्य को ढूंढना होगा ।
मंत्री - वराहमिहिर जी आपने जो महारानी को बुलाने की रणनीति जो बनाई है उसका क्या हुआ ।
वराहमिहिर जी - महारानी जी खबर दे दी गई है वो बस कभी भी आती ही होंगी ।
सैनिक - वराहमिहिर जी सम्राट विक्रमादित्य का पता चल गया है ।
वराहमिहिर जी - यह तो खुशी की खबर है कहा है सम्राट विक्रमादित्य ।
सैनिक - सम्राट राज्य के एक बनिये के यहाँ है पर उसकी खबर महल में बैठे बहरूपिये को हो गई है ।
वराहमिहिर जी - हमे सम्राट विक्रमादित्य को वहां से बचाना ही होगा ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य बनिये की पत्नी से कहते है धन्यवाद देवी हमें भोजन करवाने के लिए अब हमें चलना होगा हम किसी भी जगह ज्यादा वक्त नही रूक सकते ।
देवी - सम्राट मेरे पति ईए आने तक रूक जाइए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें जाना होगा वह शायद किसी काम से गए है ।
तभी वो बनिया आ जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कहा गए थे आप ।
बनिया - आपके लिए कुछ व्यवस्था करने के लिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसी व्यवस्था ।
बनिया - आप आइए सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य के बाहर जाते ही उन्हें एक तीर मारा जाता है और सैनिक उन्हें घेर लेते है और नकली विक्रमादित्य तलवार लेकर बाहर खडा होता है ।
असली सम्राट विक्रमादित्य उस बनिये की तरफ देखते है और कहते है तुमने हमारे साथ गद्दारी की ।
नकली विक्रमादित्य - अब हम काल बनकर तुम्हे सबक सिखाएंगे ।
असली सम्राट विक्रमादित्य - अब हम तुम्हें बताएंगे की काल कौन बनेगा किसके लिए ।
दोनो युद्ध लडते है असली विक्रमादित्य नकली विक्रमादित्य को एक तलवार की मार देते है लेकिन लगती उन्ही को है ।
असली सम्राट विक्रमादित्य - यह कैसे माया है ।
नकली विक्रमादित्य - तुम्हारे अंत में ही हमारा अंत छुपा है विक्रमादित्य ।
असली सम्राट विक्रमादित्य - इसका मतलब हमें इसका सामना शक्ति से नही विवेक से ही करना होगा हमें यहा से निकल कर इसकी वास्तविक शक्ति का पता लगाना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी शक्ति से धुआ करके वहां से निकलते है अपने घोडे पर घोडा उन्हें लेने आ जाता है ।
असली सम्राट विक्रमादित्य रात होते होते एक स्थान पर रूकते है वहां उन्हें वराहमिहिर जी मिलते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी आप ।
वराहमिहिर जी - सम्राट मुझे क्षमा कर दिजिए कुछ समय के लिए में उस बहरूपिये की बात में आ गया था ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपकी गलती नही है वराहमिहिर जी परिस्थिति ही कुछ ऐसी थी आप दोष मुक्त है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट वो बहरूपिया इस सौरमंडल का भी नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - फिर कहा से आया है वो ।
वराहमिहिर जी - यह तो हमें पता नही सम्राट मगर वो यहां का नही है क्योंकि उसकी परछाई नही बन रही थी ।
सम्राट विक्रमादित्य - तभी हमारे वार करने पर चोट हमी को लग रही थी ।
वराहमिहिर जी - उसको रोकना असंभव है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही वराहमिहिर जी उसे रोकना आसान है आप उसकी गलतीयों पर नजर रखे वो क्रोध में कोई गलत फैसला लेगा ।
वराहमिहिर जी - अब हमें चलना होगा सम्राट वरना उस बहरूपिये को शक हो जाएगा ।
उधर नकली विक्रमादित्य 12 सौरमंडल से अपने लिए शक्ति मांगता है ।
भद्रकाल कहता है तुमसे नही होगा अब हमें ही आना होगा ।
नकली विक्रमादित्य - जरूर आप आए ।
भद्रकाल - हम ऐसे नही आ सकते तुम सभी पुजारीयों से कहो की भगवान और देवताओं को छोड़ कर मेरी पुजा करे उससे मुझे शक्ति मिलेगी फिर में धरती पर स्थान लेकर आ पाऊंगा ।
नकली विक्रमादित्य - हम अभी इसकी व्यवस्था करवाते है ।
वराहमिहिर जी यह सब सुन लेते है और वो तुरंत वहां से निकल पढते है भद्रकाल के रहस्य के लिए ।
उधर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य सोचते है की हमें कोई ऐसा चाहिए जिसके उपर नकली विक्रमादित्य विश्वास कर सके और उन्हें याद आता है कि महारानी चित्रलेखा यह कर सकती है वहीं सम्राट विक्रमादित्य सोचते है महारानी चित्रलेखा को यहां आने में दस दिन लग जाएंगे हमें उन्हें आत्म शरीर की विधि से बुलाना होगा केवल वहीं एक मार्ग है उन्हें यहां बुलाने का । सम्राट विक्रमादित्य तुरंत अपने आत्म रूप में महारानी चित्रलेखा के पास जाते है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप यहां वो भी आत्म रूप में ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां हमें किसी आवश्यक कार्य की वजह से आत्म रूप में आना पढा आप चलिए हमारे साथ हम आपको सब बताते है ।
महारानी चित्रलेखा - जैसी आपकी आज्ञा सम्राट ।
महारानी चित्रलेखा - मां पिताजी हमें आज्ञा दिजिए हमें जाना होगा ।
माता पिता - सौभाग्यवती भव पुत्री ।
महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य के पास पहुंच जाती है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट सब कुशल मंगल तो है ना आप हमें महल की जगह वन में लेकर आए ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी हम संकट में है हमारा राज्य हमारी प्रजा सब संकट में है ।
सम्राट विक्रमादित्य पुरी बात महारानी को बताते है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप बताए हम आपकी क्या सहायता करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - पहले तो आप हमें परखे कि हम असली सम्राट विक्रमादित्य है या नही ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट हम एक सती स्त्री है आपके स्पर्श से ही हम आपको पहचान गए अब आप आगे बताए हम क्या करे हम अभी सबको बता देते है की वो नकली है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं महारानी आप वहां जाए मगर सच्चाई मत बताए हमें उसे विश्वास में लेकर हराना होगा आपको उसे पता नहीं चलने देना है हमें उसकी सारी बाते पता करनी है ।महारानी चित्रलेखा - सम्राट हम अपना पति धर्म निभाएंगे हम उसे विनाश के मार्ग पर ले जाएंगे ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह तो बहुत अच्छा हो गया एक से बढ़कर दो । देवी - हां राजन् और यहां शक्ति की तो लड़ाई थी ही नहीं विवेक की थी और महारानी चित्रलेखा यह सहन नही कर सकती थी कि उनके पति के उपर सवाल उठे । राजा भोज - इसलिए पति और पत्नी को एक कहा जाता है एक दूसरे के साथ जीना यहीं इस संबध की परंपरा है । ।।
उधर नकली विक्रमादित्य महल में सभी पुजारियों को बुलाते है ।
नकली विक्रमादित्य - सभी पुरोहित गण यह बताए की आप मंदिर में किसकी पूजा करते है ।
राजपुरोहित जी - वो जो सृष्टि के पालन हार है जो सृजन करते है और जो प्रलय करते है जिनके द्वारा हम सबका अस्तित्व है ब्रहमा विष्णु महेश इनकी पूजा करते है हम ।
नकली विक्रमादित्य - तो आज से आप इनकी पूजा नहीं करेंगे आप उनकी पूजा करेंगे जो 12 सौरमंडल के स्वामी है और सिर्फ 12 ही नही सभी सौरमंडल के ।
राजपुरोहित जी - मगर सम्राट सर्वशक्तिमान तो केवल वह त्रिदेव ही है फिर किस देवता की बात कर रहे है आप ।
नकली विक्रमादित्य - भद्रकाल है इन सबसे शक्तिमान आज से सिर्फ उनकी पूजा होगी ।
राजपुरोहित जी - मगर सम्राट हमने तो कभी इनका नाम भी नही सुना है ।
नकली विक्रमादित्य - यही तो दुर्भाग्य है आप उनकी पूजा तो करे आप स्वंय जान जाएंगे ।
राजपुरोहित जी - मगर सम्राट उनका कोई प्रतिक नहीं है हम पूजा कैसे करे ।
नकली विक्रमादित्य - हे भद्रकाल हमें अपना प्रतिक दिजिए ताकि आपकी मूर्ति स्थापित कर हम आपकी पूजा कर सके आप इस प्रतिई की पूजा करिए ।
राजपुरोहित जी - मगर हम इनकी पूजा नही कर सकते क्योंकि यह देवता नही तंत्र के प्रतीक है ।
तभी तुरंत उन संत के शरीर में आग लग जाती है इससे सभी घबरा जाते है ।
उधर वराहमिहिर जी सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा से मिलने वन जाते है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट वो बहरूपिया दूसरे गृह का है और उसने मंदिरों में भद्रकाल की पूजा शुरू करवा दी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें उसे यह करने हे रोकना होगा महारानी चित्रलेखा आप अभी महल जाइए और उसे यह करने से रोके ।
महारानी चित्रलेखा - जी सम्राट हम अभी जाते है और कुछ कहना चाहते है आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां आप सतर्क रहिएगा हम आपको मुसीबत में भेज रहे है ।
महारानी चित्रलेखा - नहीं सम्राट आपकेलिए कुछ करने का अवसर मिला है ।
उधर महल में संत की मृत्यु होते ही दूसरे पूजारी डरते है नकली विक्रमादित्य कहता है और कौन है जो भद्रकाल को इश्वर नही मानता । पुजारी कहते है नही सम्राट हम सब मानते है ।
नकली विक्रमादित्य - तो उठाओ इस प्रतिक को पूजा करो इसकी ।
सैनिक सम्राट महारानी चित्रलेखा महल में आ गई है ।
महारानी चित्रलेखा - राजपुरोहित जी यह सब क्या है ।
राजपुरोहित जी - महारानी जी सम्राट ने आदेश दिया है इस प्रतिक की पूजा करे अब आप ही समझाए सम्राट को ।
नकली विक्रमादित्य आ जाते है तभी महारानी चित्रलेखा कहती है आप सभी इस प्रतिक की स्थापना करे सम्राट के आदेश का पालन करे सम्राट जो भी निर्णय लेते है सोच समझ कर लेते है ।
उधर असली सम्राट विक्रमादित्य के आदेश पर वराहमिहिर जी भद्रकाल के विषय में श्लोकों में सारी जानकारी ढूंढते है सम्राट विक्रमादित्य ने कहा थी की हमारे पूर्वजों ने सारा ज्ञान पुराणो में लिखा है सृष्टि से जुड़ा हुआ अवश्य ही भद्रकाल के बारे में सब लिखा होगा उसमें ।
आचार्य वराहमिहिर जी सभी संतो से कहते है आप सभी सारे वेदो का अध्ययन कर लिजिए । उधर महारानी चित्रलेखा नकली विक्रमादित्य को अपनी बातों में उलझाती है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आपने हमें देखा तक नही ना हमारे हाल चाल पूछे ।
नकली विक्रमादित्य - नहीं ऐसा नही है ।
उधर सभी संत कहते है वराहमिहिर जी हमने सारे वेदों का अध्ययन कर लिया किसी में नही लिखा है भद्रकाल के बारे में । तभी वराहमिहिर जी को सम्राट विक्रमादित्य की बात याद आती है वे कहते है संत गण सम्राट विक्रमादित्य ने मुझे कहा था की अगर वेदो में नही तो बीज मंत्रो में अवश्य छिपा होगा भद्रकाल का रहस्य और सम्राट ने यह भी कहा था सच्चे मन से माँ सरस्वती की आराधना करने हे हमें यह ज्ञान अवश्य प्राप्त हो जाएगा हमें देवी सरस्वती की आराधना करना चाहिए ।
उधर नकली विक्रमादित्य महारानी से कहते है ।
नकली विक्रमादित्य - महारानी हमारे राज्य में बहरूपिया आ गया था इसलिए हम चिंतित है ।
महारानी चित्रलेखा - यह तो आपके चहरे पर ही लिखा है आप चिंतित ना होए सम्राट हम आपके साथ है आप विश्राम करिए हम भोजन लेकर आते है ।
नकली विक्रमादित्य - हम तो यूहि भयभीत हो रहे है यह तो हमें ही असली विक्रमादित्य समझ रही है फिर भी हमें सतर्क रहना होगा इन स्त्रियों का कोई भरोसा नही यह उसका छल भी हो सकता है ।
महारानी चित्रलेखा - बहरूपिये यह तो तेरे अंत की शुरूआत है ।
उधर माँ सरस्वती की आराधना से एक पुस्तक प्राप्त होती है वह पुस्तक वन में वराहमिहिर जी सम्राट विक्रमादित्य के पास लेकर आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी इस पुस्तक के अनुसार 12 सौर मंडल है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट इसका मतलब ।
सम्राट विक्रमादित्य - मतलब यह की जीवन केवल इसी पृथ्वी पर नही है ऐसे 12 सौर मंडल है 12 पृथ्वी है हर मनुष्य के 12 जीवन है ।
वराहमिहिर जी - तो यह रहस्य है जीवन का ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां और यह बहरूपिया इसी लिए हमारे बारे में सब जानता है ।
वराहमिहिर जी - मगर सम्राट कोई भी सौर मंडल से बाहर नही आ सकता फिर यह सौर मंडल पार करके यहां कैसे आ गया ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसके पीछे भद्रकाल का ही हाथ है भद्रकाल अपार शक्तियों का मालिक और वो 12 सौर मंडलो पर एक छत्र राज करना चाहता है ।
उधर महल में नकली विक्रमादित्य दूसरे सिंहासन परबैठ कर कहता है भद्रकाल अब शीघ्र ही तुम्हारा राज होगा पूरे 12 सौर मंडल पर । तभी महारानी चित्रलेखा आती है वे कहती है सम्राट आप सिंहासन बत्तीसी पर क्यों नही बैठ रहे । नकली विक्रमादित्य यह बात टाल देता है और कहता है हम अभी आते है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप कहा जा रहे है ।
नकली विक्रमादित्य - हम देख कर आते है ब्राहमणों ने हमारा आदेश माना या नही ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आज तक कभी ऐसा हुआ है कि आपका आदेश किसी ने ना माना हो आइए हम पहले भोजन करते है ।
नकली विक्रमादित्य - हमें भोजन नही करना है ।
महारानी चित्रलेखा - ठीक है हम समझ गए है अब आप हमसे प्रेम नही करते है आज आपके लिए हम से बढकर आपका आदेश हो गया है ।
नकली विक्रमादित्य - हमें इस स्त्री का विश्वास नही तोडना चाहिए वरना संदेह हो जाएगा सबको चलिए महारानी भोजन करते है ।
महारानी चित्रलेखा मन में कहती है हम समझ रहे है इस बहरूपिये को मगर एक दिन ऐसा आएगा जब यह चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से क्षमा मांगेगा मगर इसे क्षमा नही मिलेगी ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य वराहमिहिर जी बात करते है वराहमिहिर जी उस बहरूपिये को रोकने का केवल एक ही विकल्प है हमें उस बहरूपिये के सौर मंडल में जाकर वहां उसकी शक्ति को समाप्त करना होगा यह अपने आप मर जाएगा ।
वराहमिहिर जी - मगर सम्राट यह तो असंभव है ।
सम्राट विक्रमादित्य - असंभव कुछ भी नही हम केवल आस्था के माध्यम से ही जा सकते है । हम दो शक्ति के माध्यम से ही जा पाएंगे वो जिसके लिए कुछ भी असंभव नही वो जो अमर है केवल वह ही शक्ति है ।
वराहमिहिर जी - हम कुछ समझे नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवान परशुराम और पवन पुत्र हनुमान । भगवान परशुराम भी अमर है और हनुमान जी भी ।
वराहमिहिर जी - तो आप किसे बुलाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवान परशुराम तो हजारो वर्षो से तपस्या में है वह हमारा उनसे मिलना लिखा मगर उसमें अभी समय है अभी हम पवन पुत्र हनुमान की आराधना करके उन्हें बुलाएंगे अभी तो हनुमान जी ही हमारा संकट दूर करेंगे ।
वराहमिहिर जी - हां सम्राट आप अवश्य उनकी पूजा करे ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् आपको क्या लगता है क्या एक मनुष्य दूसरे सौर मंडल में जा सकता है । राजा भोज - देवी जब आज के युग में आध्यात्मिक शक्तियां घट रही है (कम हो रही है ) तो मुझे नही लगता दूसरे सौर मंडल में जाना असंभव है हां सतयुग त्रेतायुगद्वापरयुग की बात अलग थी उस समय सत्य था धर्म था मगर कलयुग में यह असंभव है उस समय लोग सशरीर दूसरे लोको तक जा सकते थे किंतु अभी मुझे नही लगता । देवी - राजन् में आपकी बातो बे पूर्ण सहमत हूं मगर हम बात कर रहे है सम्राट विक्रमादित्य की । राजा भोज - तो फिर समस्या क्या है देवी । देवी - समस्या यह है कि क्या महारानी चित्रलेखा इतने समय तक उसे रोक पाएगी । राजा भोज - अवश्य रोकेगी । देवी - कैसे । राजा भोज - आकर्षण से । देवी - कैसा आकर्षण । राजा भोज - स्त्री की संरचना युगों युगों से स्त्री के आकर्षण में देवता बडे-बडे ऋषि मुनि बडे बडे राजा संत महात्मा सभ स्त्री के सामने हार गए केवल चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य नही हारे और यह सम्राट विक्रमादित्य नही उनका बहरूपिया है यह तो हारेगा ही महारानी चित्रलेखा तो बहुत विवेकशील है अति सुन्दर है उनके लिए तो यह बाए हाथ का खेल है ।
उधर महारानी चित्रलेखा नकली विक्रमादित्य को भोजन करवाती है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप भोजन क्यों नही कर रहे है ।
नकली विक्रमादित्य - हमारे मस्तिष्क में केवल ही बात चल रही है भद्रकाल की मूर्ति स्थापित हुई या नही ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट रूकिए ।
महारानी चित्रलेखा - हमें आपसे एक बात करना है मंदिरों में भद्रकाल की जगह आपकी मूर्ति स्थापित होनी चाहिए ।
नकली विक्रमादित्य - यह क्या कब रही है आप ।
महारानी चित्रलेखा - हम सत्य कह रहे है आपके अंदर वो सारे गुण है जो भगवान और देवता में होने चाहिए आपने संसार को कई बार बचाया संकटों से कोई देवता या भगवान नही आये थे बचाने मंदिरो में भद्रकाल क्यों पूजा जाए आपकी प्रतिमा स्थापित होनी चाहिए ।
सैनिक - सम्राट वह बहरूपिया कही नही मिला ।
नकली विक्रमादित्य - ढूंढते रहो उसे उसका सामना शेर से हुआ है ।
महारानी चित्रलेखा मन में कहती है अंत तो तेरा निकट है बहरूपिये तू मरेगा । हमें जल्द से जल्द सम्राट विक्रमादित्य से मिलना होगा ।
वराहमिहिर जी - सम्राट हमें यह जानना था अगर आप उस बहरूपिये के गृह में पहुंच भी गए तो उसका अंत कैसे करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - आइए हम आपको बताते है इस पुस्तक में देखिए यह जो रेखाएं है ये 12 सौर मंडल से आने वाली प्रकाश की किरणें है जो उस बहरूपिये को शक्ति प्रदान कर रही है यह प्रकाश असली व्यक्ति से गुजर कर नकली तक पहुंच रहा है हमें उसे असली व्यक्ति वाले स्थान पर लाने होगा उससे ही उसका अंत होगा ।
महारानी चित्रलेखा - मगर यह बात तो वो भी जानता होगा सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - बिल्कुल जानता है लेकिन यहां पर आपकी क्या भूमिका है यह जानिए आपकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी जब उसे इस बात के बारे में पता चलेगा तब आप उसे वहां ले जाइगा जहां उसे कोई स्थान ही ना मिले छुपने का ।
महारानी चित्रलेखा - ऐसा स्थान कहां है ।
वराहमिहिर जी - महारानी हमारे राज्य से 100 कौस दूर एक मरूमूमि है वहां पर दूर दूर तक कोई नही केवल एक वट वृक्ष है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आपको उसे उस वट वृक्ष तक ले जाना होगा ।
उधर नकली विक्रमादित्य महारानी के बातो के बारे में सोचता है वो बार बार महारानी चित्रलेखा के बारे में सोचता है ।
नकली विक्रमादित्य सोचता है महारानी कह तो सही रही थी हमारी पूजा तो होनी चाहिए भद्रकाल हमारे बिना है ही क्या । नहीं नही भद्रकाल हमारा अस्तित्व मिटा देगा कही वो स्त्री दोहरा खेल तो नही खेल रही है कही वो असली सम्राट विक्रमादित्य से तो नही मिली हुई है हमें देकना होगा अभी कहां है वो । तभी महारानी चित्रलेखा आ जाती है औरकहती है आपके हृदय में ही तो है हम ।
नकली विक्रमादित्य - कहां गई थी आप ।
महारानी चित्रलेखा - शिल्पकार के पास आपकी मूर्ति बनवाने के लिए आपको भगवान की तरह पूजते देखना चाहते है हम । किंतु सम्राट आपके चहरे पर चिंता की लकीरे ।
नकली विक्रमादित्य - आपको देखा नही इसलिए आप कही भी जाए हमें बता कर जाए ।
महारानी चित्रलेखा - जैसी आपकी आज्ञा सम्राट ।
नकली विक्रमादित्य मन में कहता है हम इस पर विश्वास नही कर सकते गुप्तचर महारानी पर नजर रखो ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य हनुमान जी के मंदिर में कहते है हे भगवान श्रीराम भक्त हनुमान आपने जिस प्रकार संसार से संकट समाप्त कर दिये उसी तरह हमारी सहायता करिए ।
उधर महारानी को शक हो जाता है कि उनके पीछे गुप्तचर है ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य कहते है हनुमान जी आपने श्रीराम की सहायता की माता सीता की खोज की लंका में आपने संकट हरे आप हमारी सहायता करे ।
महारानी चित्रलेखा चतुराई से गुप्तचरों को अपने से बहुत दूर कर देती है ।
उधर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हनुमान जी की आराधना करते है हनुमान जी तक यह बात पहुंच जाती है की कोई लोक कल्याणकारी देवता मुझे याद कर रहा है कोई सच्चा भक्त मेरे भगवान श्रीराम की आराधना कर रहा है हमें जाना ही होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - भक्तो सभी आरती के लिए खड़े हो जाइए सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा हनुमान जी की आरती करते है । आरती समाप्त होते ही सबको प्रसाद बाटते है सब के जाने के बाद एक व्यक्ति बचा होता है वो कहता है भगवान श्रीराम की कैसी आराधना पहले कभी नही देखी आप भक्ति में डूबे हुए हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी हमारी भक्ति में कहां कमी रह गई अब तक हनुमान जी नही आए ।
वराहमिहिर जी - सम्राट अवश्य आएंगे हनुमानजी उन्होंने ने ही कहा था राम जानकी की सच्ची आराधना में वे अवश्य आएंगे ।
महारानी चित्रलेखा - अवश्य आएंगे या आए होंगे सम्राट मैने सुना है ऐसे जगह पर राम भक्त हनुमान सबसे अंत में जाते है हो सकता है हम उन्हें पहचान ना पाए हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - अंत में तो वह वृद्ध व्यक्ति गए थे हमें उन्हें रोकना होगा ।
वराहमिहिर जी - रूकिए सम्राट हमें फिर से उनको आराधना करनी चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सही कह रहे है हम इस बार उनकी ऐसी पूजा करेंगे की उन्हें दर्शन देने को बाध्य कर देंगे । महारानी आपको एक काम करना होगा ।महारानी चित्रलेखा - जी आदेश ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आपको उस बहरूपिये को कल ही वट वृक्ष की पूजा के लिए लेकर जाना होगा ।
वराहमिहिर जी - मगर सम्राट अब तक तो हनुमान जी आए ही नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने जो खह दिया वह ही होगा अवश्य आएंगे भगवान हनुमान ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब आप जाइए महारानी वरना उसे शक हो जाएगा ।
उधर नकली विक्रमादित्य कहता है एक स्त्री पर नजर नही रख पाए तुम दोंनो । तभी महारानी चित्रलेखा आ जाती है ।
नकली विक्रमादित्य - कहां गई थी आप ।
महारानी चित्रलेखा - एक ब्राह्मण देवता से मिलने ।
नकली विक्रमादित्य - क्यों इश्वर तो हमें मानती है ना आप फिर ।
महारानी चित्रलेखा -मगर उस इश्वर की पूजा की विधि जानने के लिए गए थे ।
नकली विक्रमादित्य - क्या विधि बताई उन्होंने ।
महारानी चित्रलेखा - वट वृक्ष की पूजा करने से आपकी दीर्घ आयु होगी आपके सारे दुश्मन पराजित हो जाएंगे मगर आपको तो हमारी बातो पर विश्वास ही नही है ठीक है हम अपने कक्ष में चले जाते है फिर हम कभी अपने कक्ष से बाहर नही निकलेंगे ।
नकली विक्रमादित्य - ठहरिए महारानी आप हमें गलत समझ रही है हमें आपसे क्रोध नही है क्रोध तो उस बहरूपिये से है आपके बाहर जाने से वो आपके लिए संकट बन सकता है बताइ आपकी पूजा कैसे होगी ।
महारानी चित्रलेखा - हमें कल ही वट वृक्ष की पूजा के लिए जाना होगा ।
नकली विक्रमादित्य - कल ही ।
महारानी चित्रलेखा - जी वट वृक्ष यहां से 100 कौस दूर जाना होगा ।
नकली विक्रमादित्य - 100 कौस दूर हमें इतना दूर जाना होगा ।
महारानी चित्रलेखा - अगर आप नही जाना चाहते तो हम नही जाएंगे पर हमें आपकी चिंता है हम यह पूजा आपकी विजय के लिए करना चाहते है ताकि आप हमेशा विजय रहे ।
नकली विक्रमादित्य - हम आपके चेहरे पर उदासी नही देख सकते आप कल सुबह चलने की तैयारी करिए ।
महारानी चित्रलेखा - जी । महारानी मन में कहती है कल का दिन आखिर दिन होगा तेरा ।
नकली विक्रमादित्य से भद्रकाल कहता है विक्रमादित्य तेरे साथ छल हो रहा है तुझे धोखा दे रहे है ।
नकली विक्रमादित्य - कौन महारानी चित्रलेखा ।
भद्रकाल - हां वही तुझे धोखा दे रही है वो तुझे वट वृक्ष की पूजा के लिए ले जा रही है मगर तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए नही तुम्हें मारने के लिए ।
नकली विक्रमादित्य - इतना बड़ा छल ।
भद्रकाल - तुम भूलो मत कि तूम पृथ्वी लौक पर हो और वहां की स्त्रियां पति व्रता होती है ।
नकली विक्रमादित्य - अगर पतिव्रता उसका धर्म है तो हम उसे उसका सबसे बड़ा कलंक बना देंगे अगर पत्नी बनने का वो नाटक कर रही है तो हम पति बनेंगे ।
नकली विक्रमादित्य महारानी के पास जाते है । नकली विक्रमादित्य - महारानी आज हम आपका श्रृंगार करेंगे ।
महारानी चित्रलेखा मन में कहती है हे महादेव हमारा पतिव्रत धर्म बचाए हमारी सहायता करे । तभी अचानक नकली विक्रमादित्य के हाथ से हार गिर जाता है और वह गायब हो जाता है ।
नकली विक्रमादित्य - महारानी लगता है कोई नही चाहता कि हम आपका श्रृंगार करे किंतु कोई बात नही हम अपना पति धर्म निभाएंगे हम आपकी मांग में सिंदूर भरेंगे ।
महारानी चित्रलेखा फिर से महादेव को याद करती है । तभी भद्रकाल कहता है नकली विक्रमादित्य से मूर्ख दूर रहो उससे अगर तुमने उसे स्पर्श भी किया तो तुम्हारा विनाश हो जाएगा ।
महारानी चित्रलेखा बहुत प्रसन्न हो जाती है उनका पतिव्रता धर्म बच जाता है महारानी कहती है हे महादेव आज जैसे आपने हमारी सहायता की आप उसी तरह हमारे सम्राट विक्रमादित्य को भगवान हनुमान के दर्शन अवश्य कराए वह उनकी सहायता करे ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य हनुमान जी की पूजा करते है सबको प्रसाद बाटते है तभी सम्राट विक्रमादित्य की नजर उस वृद्ध व्यक्ति पर जाती है जो कल भी आखिर तक रूके थे और आज भी आखिर तक रूके ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रभु हम जानते है की आप ही प्रभु हनुमान है आप हमें दर्शन दिजिए हम आपके पैर तब तक नही छोड़ेंगे जब तक आप हमें दर्शन नही देते ।
हनुमानजी - हम भगवान नही है हम केवल एक भक्त है हमारे पैर छोड़ो ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप श्रीराम के भक्त है आप हमें दर्शन दिजिए ।
हनुमानजी - सच्चा भक्त है हमें दर्शन देने होंगे ।
तभी हनुमानजी अपने असली रूप में प्रकट हो जाते है ।
उधर नकली विक्रमादित्य क्रोध में आकर कहताहै हम नही करेंगे पूजा वट वृक्ष की ।
महारानी चित्रलेखा - क्या गलती हुई है हमसे ।
नकली विक्रमादित्य - छल किया है आपने हमसे ।
महारानी चित्रलेखा - कैसा छल आप हमें बताएं ।
नकली विक्रमादित्य - हे 12 सौर मंडल प्रकट हो हमारे सामने । देखो महारानी यह वो है जहां से हम आए है और हमने ही आपके पतिका रूप धारण किया ताकि उनके धर्म के साम्राज्य को खत्म करके अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर सके ।
महारानी चित्रलेखा - हम तो आपको पहले ही दिन पहचान गए थे किंतु आपका उद्देश्य अब जान पाए ।
नकली विक्रमादित्य - तो हमारा साथ क्यो दे रही हो ताकि अपने पति को बचा सको ।
महारानी चित्रलेखा - नही यह सब हमने आपके लिए किया है सच्चे मन से किया है ताकि आपका उद्देश्य पूरा हो सके ।
नकली विक्रमादित्य - झूठ कह रही हो तुम प्रमाण क्या है ।
महारानी चित्रलेखा - नही हम सच कह रहे है और शब्दो से बड़ा प्रमाण क्या होगा इस संसार में सच तो यह है कि हमारा मन उठ गया है हमारे उस आदर्शवादी पति से हमने हमेशा से आपके जैसा पति चाहा जो हमारी भावना को समझे हमें समय दे ना कि दिन भर प्रजा के लिए कार्य करे ।
नकली विक्रमादित्य - आपको पता है आप किसे यह सब कह रही हो हम तुम्हारे पति के शत्रु है ।
महारानी चित्रलेखा - होंगे पर हमारे तो नहीं है आपको पता है आपको देख कर हमारे सपने पूरे हुए हम चाहते है हमें देवी समझा जाए किंतु चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के साथ हमारे यह सपने पूरे नही हो सकते आपको देखा तो लगा आपका इश्वर बनने का सपना ही हमें देवी बना सकता है हमारे मन ने कहां चित्रलेखा जब यह व्यक्ति इश्वर बन जाएगा तो हम भी देवी बन जाएंगे लेकिन आपको देख कर लगता है कि आप हमारी बात पर विश्वास नही ईर रहे है ।
नकली विक्रमादित्य - आपकी बातो को समझ रहे है ।
महारानी चित्रलेखा - जब कोई स्त्री किसी पर विश्वास करती है तो सच्चे मन से करती है ।
उधर हनुमान जी कहते है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप है आपको देख कर हृदय में बहुत प्रसन्नता हुई । मेरे प्रभु श्री राम ने कहा था जल समाधी लेने से पहले की में अब जे रहा हूं हनुमान आप धर्म की रक्षा करना । सम्राट विक्रमादित्य आपका कार्य धर्म रक्षा का है इसलिए में आपके साथ हूं उज्जैनी नरेश मेरे होते हुए वो भद्रकाल कभी नही जीत पाएगा में आपको लेकर चलूंगा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य उस ग्यारहवे सौर मंडल पर जहां से वोबहरूपिया आया है । सम्राट विक्रमादित्य आज तक मैंने श्रीराम के अलावा किसी को नही उठाया है किंतु आप बिल्कुल उनके समान है आपको उठाना हमारा सौभाग्य है आइए चलते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद प्रभु ।
उधर महारानी चित्रलेखा कहती है हे महादेव मुझे क्षमा कर दिजिए सम्राट विक्रमादित्य के उद्देश्य के लिए हमें झूठ कहना पढा हमें नकली विक्रमादित्य के सामने अपने सम्राट विक्रमादित्य की बुराई करनी पढी ।
उधर नकली विक्रमादित्य महारानी चित्रलेखा की बाते सोचता है कि कौन इश्वर नही बनना चाहता हमें भी बनना है वैसे भी हम भद्रकाल को इश्वर बना रहे है उसकी जगह हम स्वंय बनते है ताकि हम भद्रकाल की गुलामी से भी बच जाएंगे ।
नकली विक्रमादित्य महारानी के पास जाता है । महारानी चित्रलेखा - हमने आपसे यह सब छुपाया उसके लिए आप हमें दण्ड दे सकते है ।
नकली विक्रमादित्य - दण्ड तो हम अवश्य देंगे और आपका दण्ड है की आप हमें वट वृक्ष की पूजा के लिए ले चले कब जाना होगा हमें वहां ।
महारानी चित्रलेखा - अभी तुरंत क्योंकि वह स्थान यहां से 100 कौस दूर है ।
उधर हनुमान जी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को उठाकर निरंतर चलते है ।
हनुमान जी - सम्राट यह सातवा सौर मंडल है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रभु आप हमें उस सौर मंडल पर लेकर चलिए जहां से वह बहरूपिया आया था ।
हनुमानजी - जी सम्राट ।
हनुमानजी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को उस सौर मंडल पर ले आते है जहां से वो बहरूपिया आया था ।
हनुमानजी - सम्राट यह वहीं गृह है जहां से वह बहरूपिया आया था अब आगे आपको ही जाना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी हम जाकर आते है ।
हनुमानजी - सम्राट हम आपकी यही प्रतिक्षा करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य उस गृह पर देखते है की यह तो बिल्कुल उज्जैनी जैसा है ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह कैसी माया थी वह नगर बिल्कुल उज्जैनी जैसा कैसे था । देवी - राजन् यही तो है ब्रह्माण्ड का रहस्य इस जगत है 12 सौर मंडल है और हर सौर मंडल पर एक पृथ्वी है जहां बिल्कुल इसी तरह जीवन है । राजा भोज - जब सबकुछ एक जैसा है तो दोंनो सम्राट विक्रमादित्य के चरित्र में इतना अंतर क्यों है जहां एक और चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य धर्म सत्य नयाय के प्रतिक है और दूसरी और यह बहरूपिया जो बिल्कुल उनके विपरीत है । देवी - आप बताए विवेक लगाए । राजा भोज - देवी कर्म के कारण । देवी - और कर्म क्या है । राजा भोज - देवी सम्पूर्ण ब्रह्मांड में पाँच कारक है इश्वर , प्रकृति , जीव और काल इन पर किसी भी प्राणी का वश नही होता ना संशोधन का मगर मनुष्य के हाथ में होता है कर्म कर्म से ही मनुष्य सबकुछ प्राप्त करता है चाहे वो इश्वर के करिब हो या इश्वर से बिछड़ना मनुष्य सबकुछ अपने कर्मो से ही प्राप्त करता है और हमारे सामने उधारण भी है एक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जो अच्छे कर्मो से इतने महान बन गए । देवी - बस वहीं चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने अपने कर्मो से मौक्ष प्राप्त कर लिया था । ।।
उधर सम्राट विक्रमादित्य नगर में पहुंचते हैतो वो देखते है उनके राज्य की प्रजा जैसी ही थी वे तीन चार लोगो का नाम लेकर उन्हें रोकते मगर कोई उन्हें नही सुन पाता है तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते है लगता है इस गृह के लोगो का निर्माण पंच तत्व से नही हुआ है और यह गृह भी दूसरा है अवश्य यही कारण है कि हमें यहां कोई सुन नही रहा है ।
उधर महारानी चित्रलेखा वट वृक्ष की पूजा करती है वह कहती है हे वट वृक्ष आप अपने समान लंबी आयु हमारे पति चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को भी देना वह उन्हें हर कार्य में सफलता देना ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य आकाश की ओर देखकर कहते है समय आ गया है यहीं वह उर्जा है जो इस गृह से हमारी पृथ्वी पर जाती है हमें इस शक्ति को पंच तत्व से भरना होगा और क्योंकि वह बहरूपिया पंच तत्व से नहीं बना है तो वह पंच तत्व की शक्ति को सहन नही कर पाएगा इससे वह अपने गृह पर आने को मजबूर हो जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी पूरी ताकत लगाकर उस गृह की सारी उर्जा अपने अंदर समाहीत कर लेते है ।
उधर वह बहरूपिया देखता है आकाश में और कहता है महारानी यह शक्ति पंच तत्व में ही विभाजित हो गई है यह तो हमारे लिए खतरा है हमें कही छुपना होगा वरना है यह हमारा विनाश कर देगी ।
नकली विक्रमादित्य - आप रूकी क्यो है महारानी चलिए हमारे साथ ।
महारानी चित्रलेखा - यही तो हम चाहते थे बहरूपिये ।
नकली विक्रमादित्य - यह क्या कह रही है आप अगर हम ही नही रहेंगे तो आपको देवी कौन बनाएगा आपकी इच्छा का क्या होगा ।
महारानी चित्रलेखा - मूर्ख एक पत्नी की इच्छा उसके पति से जुड़ी होती है आज हम तेरा अंत करेंगे ।
नकली विक्रमादित्य - इतना बड़ा छल ।
महारानी चित्रलेखा - छल तो तुमने हमारे पति चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के साथ किया था ।
नकली विक्रमादित्य - हम अपनी रक्षा कर लेंगे हम अभी जाते है छुपने ।
महारानी चित्रलेखा - तुम कही नही छुप सकते यहां स्थान ही नही है छुपने का तुम्हारा अंत निश्चित है ।
नकली विक्रमादित्य - धोखेबाज स्त्री ।
महारानी चित्रलेखा - बस अब एक और शब्द नहीं ।
नकली विक्रमादित्य - तुम्हें तो हम देख ही लेंगे पहले अपने आप को बचा ले ।
महारानी चित्रलेखा - तुम नही बच पाओगे इस संसाय में अधर्म का राज केवल कुछ दिना का होता है अच्छा राज तो केवल धर्म का ही होता है ।
वो किरणो अब पृथ्वी की और आती है नकली विक्रमादित्य भागता है पर उसे स्थान नही मिलता फिर उसे पानी नजरआता है जो उसे छिपने का स्थान दिखता मगर तभी महारानी चित्रलेखा उस पर डंडे से प्रहार करती है जिससे वह घायल हो जाता है और किरणे उस पर हमला कर देती है और वह बहरूपिया तुरंत अपने लोक पहुंच जाता है जिस गृह से वह आया है वह सीधे सम्राट विक्रमादित्य के सामने पहुंच जाता है ।
नकली विक्रमादित्य - विक्रमादित्य इसका मतलब यह है कि हमारी शक्ति को पंच तत्वों में विखंडित तुमने किया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां बहरूपिये हमने किया है तुमने क्या सोचा था तुम हमारी धर्म की धरती को अधर्म के रूप में परिवर्तित कर दोगे और हम पृथ्वी वासी सिर्फ हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहेंगे ।
हनुमानजी - तो तुम हो बहरूपिये जो हमारे भगवान श्रीराम की धरती पर अधर्म का राज फैलाने आए थे आज इस पवित्र धरती पर भगवान की धरती पर धर्म और देवताओं के प्रतिनिधि उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य राज कर रहे है उसे अपवित्र करने आए थे अगर तुम लोग नही सुधरे तो में तुम्हें और तुम्हारे स्वामी भद्रकाल को नष्ट कर देंगे ।
नकली विक्रमादित्य - मुझे क्षमा कर दो प्रभु अगर भद्रकाल नही कहता तो हम यह कभी नही करते हमें क्षमा कर दिजिए प्रभु हनुमान ।
हनुमानजी - क्षमा हमसे नहीं चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से मांगो जिन्होंने तुम्हें एक अवसर तुम्हें धर्म के मार्ग पर चलने का दिया ।
नकली विक्रमादित्य - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हमें क्षमा कर दिजिए ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य - जब प्रभु हनुमान ने तुम्हें क्षमा कर दिया है तो में दण्ड नही दे सकता ।
नकली विक्रमादित्य - धन्यवाद चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
हनुमानजी - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अब हमें भगवान परशुराम वह भगवान श्री राम की पावन धरती पर चलना चाहिए ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य - जी प्रभु ।
तभी हनुमानजी से विशाल रूप में हो जाते है और अपने हाथों चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को बिठा कर वापस पृथ्वी लौक ले आते है ।
नकली विक्रमादित्य को पश्चाताप होता है ।
भगवान हनुमान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को महारानी चित्रलेखा के पास ले आते है ।
महारानी और सम्राट दोनो हनुमानजी का आशीर्वाद लेते है ।
महारानी चित्रलेखा - आपका दर्शन पाकर हमारा जीवन धन्य हो गया जिसकी कल्पना भी नही थी वो आज साकार हो गया ।
हनुमानजी - पुत्री भाग्यशाली तो में खुद को मान रहा हूं कि मुझे आप जैसी पतिव्रता और विवेकशील पत्नी का दर्शन करने का सौभाग्य मिला आपने चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के साथ मिलकर धर्म की रक्षा की है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रभु आपके बिना कुछ संभव नही था हम अकेले कुछ नही कर पाते ।
हनुमानजी - नही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ऐसा नही है आपने तो अकेले पूरी पृथ्वी की रक्षा भी की थी हम जानते है और आप एक धर्मनिष्ठ और विवेकशील व्यक्ति है जो धर्म के लिए जीता है आपको कभी भी श्री राम के सेवक हनुमान की जरूरत पढे आप हमें अवश्य बुला लिजिएगा अब हम।चलते है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जय श्री राम ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी चित्रलेखा आज आपके स्त्री धर्म की विजय हुई है ।
महारानी चित्रलेखा - नही सम्राट यह तो आपकी जीत है आपके मार्गदर्शन के बिना यह कुछ संभव नही था ।
सम्राट विक्रमादित्य - समर्पण करना तो कोई आपसे सिखे ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने अपनी विवेकशीलता से संसार पर आने वादा संकट दूर कर दिया राजन् चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य कभी अपने लिए या केवल एक राज्य के लिए पुरे संसार के लिए सोचते थे । राजा भोज - यह तो आपने बिल्कुल सच कहा देवी उनके जैसा कोई नही । ।।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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