ग्यारहवा गुण मित्रता

।। ग्यारहवा गुण मित्रता ।।

महाराजा भोज - देवी आपको मेरा प्रणाम ।
देवी - राजन् में इस सिंहासन में मित्रता की प्रतिक हूं , सच्चा मित्र वहीं जो एक दूसरे के हर मुश्किल में काम आए इस संसार में सर्वश्रेष्ठ मित्र चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ही थे अगर उनकी मित्रता की कथा नही सुनी तो क्या सुनी उनकी मित्रता इस संसार में कभी ना भूलने वाली मित्रता थी में आपको उनकी एक कथा सुनाती हूं । 
राजा भोज - जी देवी ।
एक दिन को बात है जब सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन बत्तीसी पर बैठे थे तभी दो मित्र उनसे न्याय मांगने आए एक का नाम था कर्मचंद एक का नाम था और दूसरे का नाम था धर्मचंद ।
धर्मचंद - सम्राट यह मेरा मित्र है कर्मचंद और यह युवती इनकी पत्नी है मगर यह इन्हें अपनी पत्नी मान ही नही रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्यों कर्मचंद आप इन्हें अपनी पत्नी क्यों नही मान रहे हो ।
कर्मचंद - सम्राट क्योंकि यह मेरी पत्नी नही धर्मचंद की पत्नी है और इन्ही के साथ ही इनका विवाह हुआ ।
दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते है यह इसकी पत्नी है यह इसकी पत्नी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - शांत हो जाइए आप दोनों तुम दोनो में से ही किसी ने इन से विवाह किया है अच्छा युवती आप स्वंय बताए ।
युवती - सम्राट में नही जानती कि मेरा विवाह किस से हुआ था ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या कह रही है आप एक युवती कैसे नही बता सकती ।
युवती - सम्राट मेरा विवाह तो धर्मचंद से ही हुआ था विवाह के बाद जब हम इनके नगर जा रहे थे तभी डाकुओं ने हम पर हमला कर दिया उन्होंने इन दोनों को मार दिया वह गर्दन काट दी । सम्राट में माता जी की बचपन षे आराधना करती आ रही थी मैने माँ से कहां आप मुझे ऐसे विधवा होते नही देख सकती और मैने तुरंत ही माता जी की आराधना चालु कर दी उन्होंने मुझे दर्शन दिये और कहां पुत्री तुम्हारी खुशी के लिए हम दोनो को जीवित कर देंगे और ऐसा ही हुआ उन्होंने मुझ से कहा की तुम दोनो के सिरो को उनके धड़ो से जोड दो में उन्हें जीवित कर दूंगी मैने हडबढी और अत्यधिक खुशी में दोनो के धडो के विपरीत सर लगा दिये ।
सम्राट विक्रमादित्य - यानि आपने धर्मचंद का सिर कर्मचंद के धड़ से और कर्मचंद का सिर धर्मचंद के धड़ से जोड दिया ।
युवती - जी सम्राट अब आप ही बताए की बदले हुए शरीर की वजह से कौन मेरा पति होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - वा मित्रता हो तो आप दोनो जैसी दोनो एक दूसरे की खुशी के लिए त्याग कर रहे थे । आप लोंगो का न्याय यह है कि देवी के पति का सिर जिस शरीर पर है वही उनका पति है क्योंकि देवी मनुष्य का स्वामी उसका मस्तक ही होता है ।
युवती - धन्यवाद सम्राट आपने मेरा न्याय कर दिया आपका हार्दिक हार्दिक धन्यवाद जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको खुशी हुई वो माइने रखता है । और धर्मचंद और कर्मचंद आप दोनों की मित्रता से हम खुश है आप दोनों सदैव ऐसे ही रहे यदि मनुष्य के जीवन में सच्चा मित्र हो तो सारी मुश्किले यूं समाप्त हो जाती है इस संसार में मित्रता से बढ कर कुछ नही है ।
उसी रात अचानक भयंकर तूफान आता है एक आत्मा सम्राट विक्रमादित्य के महल में प्रवेश करती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन है कौन है यहाँ सामने आओ हमारे ।
वराहमिहिर जी - क्या हुआ सम्राट कोई भी नही है यहाँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही वराहमिहिर जी हमने यहाँ किसी की उपस्थिति देखी है कोई तो है यहाँ ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आज तक दरबार में ऐसी कोई घटना नही देखी आप जाइए सम्राट हम इसका पता लगाते है ।
सेनापति - क्या हुआ वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - सेनापति जी यहाँ कोई जादूगर या को आत्मा है ।
उधर महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य के लिए भोजन लेकर आती है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट हमें इसका पता लगाना होगा हमारे महल में पहली बाय ऐसा हुआ है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप चिंता ना करे महारानी वराहमिहिर जी जाँच कर रहे है ।
तभी सम्राट की नजर खाने की थाली पर जाती है वे उसे देखकर कहते है यह क्या महारानी यह चावल तो पके हुए थे यह कच्चे कैसे हो गए ।
महारानी चित्रलेखा - किंतु सम्राट हमने तो आपको पके हुए चावल परोसे थे यह कच्चे कैसे हो गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह अवश्य उसी ने किया होगा ।
तभी खाने के बर्तन हवा में घुमते हुए नजर आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी हमें जल्द से जल्द उस जादूगर का पता लगाना होगा ।
वराहमिहिर जी - सम्राट यह कोई जादूगर नही है क्योंकि यह घटना महल के चारौ और हो रही है दूसरे लोग भी प्रभावित है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या सभो लोग ।
वराहमिहिर जी - हां सम्राट और सभी ने किसी सफेद साये हो देखा है और शास्त्रों के अनुसार उसे प्रेत कहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आप विश्रामकरिए और वराहमिहिर जी आप हमारे साथ आइए , वराहमिहिर जी हमारे महल में तो सदैव ही पूजा पाठ होता है और महारानी चित्रलेखा तो स्वंय सुबह शाम पूजा करती है फिर यह प्रेत यहां कैसे आ सकता है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट शास्त्रों में भी यहीं कहां गया है कि ऐसे स्थानों पर भूत प्रेत नहीं आ सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो इसका अंत तो फिर कोई तांत्रिक ही कर सकता है ।
वराहमिहिर जी - हमने एक तांत्रिक को बुलाया है ।
तभी बाबा त्रिकाल आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम बाबा त्रिकाल हमारे यहां बात यह है कि ।
त्रिकाल - हमें सब पता है सम्राट आप चिंता ना करे हम अभी सब ठीक देंगे ।
बाबा त्रिकाल की नजर सिंहासन के पीछे जाती है जहां एक साया था ।
बाबा त्रिकाल जैसे ही मंत्रोच्चार शुरू करते है तभी प्रेत उन पर हमला कर देता है बाबा त्रिकाल दूर फिका जाते है ।
बाबा त्रिकाल कहते है में तुम्हारे बिच में नहिं आऊंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - रूको बाबा रूको ।
बाबा त्रिकाल - चलो सभी सेवकों अब हम यहां नही रूकेंगे यह प्रेत बहुत शक्तिशाली है सम्राट आप भी सतर्क रहे ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् त्रिकाल भी भाग गए और उन्होंने सम्राट को महल छोडने के लिए कहा । राजा भोज - भला यह क्या समाधान है । देवी - उस दिन आधी रात को सम्राट विक्रमादित्य के साथ ऐसा घटा जो रोंगटे खड़े करने जैसा था ।।

सम्राट विक्रमादित्य को महारानी को आवाज आती है महारानी हवा में लटकती हुई नजर आती है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट हमें बचाओ सम्राट सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रेत तुम्हारी शत्रुता हमसे है हमारी प्रजा और महारानी से नही ।
महारानी तुरंत नीचे आ जाती है प्रेत उन्हें छोड देता है सम्राट विक्रमादित्य उन्हें सुरक्षित कक्ष में छोड़ देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम नही छोड़ेंगे तुम्हें प्रेत इस बार तुमने सारी सीमाएं लांघ दी तुमने केवल एस स्त्री नही हमारी पत्नी को कष्ट पहुंचाया है हमारे जीवन को संकट में किया है अवश्य तुम तक पहुंच कर रहेंगे हम ।
सम्राट विक्रमादित्य को वो साया इधर उधर घूमते हुए नजर आता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन हो तुम ये आंख मिचौली का खेल क्यों सामने आओ ।
तभी एक आवाज आती है वह प्रेत कहता है सम्राट विक्रमादित्य अगर आप साहसी हो तो पूर्णिमा की रात प्रेत भूमि में आना तब पता चलेगा तुम साहसी हो या नहीं और वहीं पर में बताऊँगा की में कौन हूं विक्रमादित्य प्रेत भूमि में राह देखूंगा तुम्हारी ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य आएंगे हम आपसे मिलने ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य कक्ष में जाते है वैद्य जी कैसी है महारानी क्या हुआ है उन्हें ।
वैद्य जी - सम्राट अचानक यह सब देखते से महारानी मूर्छित हो गई थी बस अब कभी भी उन्हें होश आ जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य महारानी के पास ही बैठ जाते है । सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आप एक वीरांगना है आप इतनी समस्याओं में नही झूकी तो आज इस डर को अपने उपर हावी मत होने दिजिए उज्जैनी की महारानी मूर्छित नही हो सकती महारानी उठीए ।
महारानी चित्रलेखा को होश आ जाता है वे कहती है सम्राट हमें बचा लिजिए वो हमें आपसे दूर कर देगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको मारना तो दूर आपको कोई छू भी नही सकता ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट वहां कुछ है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वहां कोई नही है हम है यहां तो वो यहां नही आ सकता आन हमारी आखों में देखिए आपको बुरे ख्याल नहीं आएंगे अपने मन से उसका भय निकाल दिजिए महारानी वो कितना भी शक्तिशाली हो हम आपको कुछ नही होने देंगे हम आपको वचन देते है हम उसे दण्ड अवश्य देंगे ।
उधर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य प्रेत भूमि की और निकलते है तभी वराहमिहिर जी कहते है सम्राट आज की रात आपमत जाइए आज पूर्णिमा है आज सभी प्रेत शक्तियों में सबसे ज्यादा शक्ति होती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी कल जो महल में घठा वो फिर ना हो इसके लिए हमें आज जाना ही होगा ।
महारानी चित्रलेखा - बिल्कुल भी नहीं सम्राट आपको हमारे लिए वहां जाने की जरूरत नही है हम भय के साये में जी सकते है पर आपको वहां भेज कर असुरक्षित नही कर सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें वहां कुछ भी नही होगा आप हमारी शक्ति है आपकी खुशी में ही हमारी खुशी है हमें कुछ नही होगा हमें मत रोकिए अगर हम यहीं रूक गए तो इस समस्या का समाधान नहीं होगा ।
महारानी चित्रलेखा - अगर आप जाना चाहते है तो अवश्य जाए महादेव आपकी रक्षा करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप ख्याल रखना अपना ।
सम्राट विक्रमादित्य प्रेत भूमि के निकट पहुंच जाते है तभी उनका घोड़ा रूक जाता है । सम्राट विक्रमादित्य कहते है लगता है हम प्रेत भूमि पहुंच गए है तभी चमकादर आने लग गए है और हमारा अश्व भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है क्योंकि पशुओं को पहले से पता चल जाता है अब हमें सावधानी रखनी होगी ।
तभी वो प्रेत कहता है तू होगा सम्राट महल का में इस प्रेत भूमि का बेताल हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - समाने क्यों नही आते तुम तब तुम्हें बताऊंगा की में महल का सम्राट हूं या इस पुरी धरती का चक्रवर्ती सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - पहुंच गए हम तुम्हारी प्रेत भूमि पर अब बताओ क्यों बुलाया और यह खेल बंद करो लुका छीपी का और सामने आओ । 
तभी सम्राट विक्रमादित्य उस गुफा में जाते है और वहीं पर उन्हें एक पेड़ पर बेताल लटका दिखता है ।
बेताल - आइए महाराज आज तो नया इतिहास लिखा जाएगा एक बेताल के यहां संसार के सबसे महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य पधारे है आओ सम्राट स्वागत है आपका ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो आप हो बेताल जिसने हमारे महल में उधम मचाई थी तुमने हमारी महारानी को दुख पहुंचाया था ।
बेताल - हां में ही आया था वैसे सुने बहुत है तुम्हारे बादे में लेकिन आज हम तुम्हें अपने बारे में बताएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम कहो ।
बेताल - सम्राट में उपर तुम नीचे कैसे बात होगी ।
सम्राट - तो नीचे आ जाओ ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् भला एक मरे हुए व्यक्ति को भौतिक संसार के व्यक्ति से क्या काम होगा । राजा भोज - देवी इस नजरिए से तो केवल एक ही बेताल की कोई इच्छा बाकि रह गई होगी जिसे वोपूरी करना चाहता होगा । ।।
उधर सम्राट विक्रमादित्य कहते है बताओ क्या चाहिए बेताल ।
बेताल - इस योनी में तुमसे क्या मागूंगा क्या लू तुमसे ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो फिर हमें क्यों बुलाया है तुमने ।
बेताल - मुझे तुम्हारा 32 गुणों वाला सिंहासन बत्तीसी चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम क्या करोगे उसका ।
बेताल - तुम उस पर बैठ कय न्याय करते हो तो में नृत्य तो करूंगा नही में तुमसे ज्यादा योग्य हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम्हें अपने बारे में गलत फहमी हुई है यह सिंहासन ऐसे नही मिलता और अगर तुम योग्य होते तो तुम्हें अपने आप मिल जाता यह सिंहासन इश्वर और देवताओं ने मिलकर हमें दिया है अपने अंदर जाखकर देखो बेताल तूम क्या हो और वो सिंहासन लोक कल्याणकारी है ।
बेताल - तू बता देगा या नहीं ।
सम्राट विक्रमादित्य - कभी नही और क्या कर लोगे तुम ।
बेताल - तो में तुम्हारा जीना दुश्वार कर दूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - सिंहासन पाना तो दूर तुम्हें में उसके पास भी नहीं भटकने दूंगा और जो तुमने कहा जीना मुश्किल कर दोगे मेरा क्या इतनी हिम्मत है तुम में भूलो मत बेताल में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हूं धन्यवाद दो इश्वर का की में उदार हूं वरना अब तक तुम क्या तुम्हारी पूरी प्रेत भूमि को खत्म कर देता में ।

सम्राट विक्रमादित्य - वह दिव्य सिंहासन पाना तो दूर में उस पर तुम्हारा बुरा साया भी नही पढने दूंगा ।
उधर महारानी चित्रलेखा पूजा करती है उसी वक्त बेताल आता है वो महारानी और वराहमिहिर जी और सभी को डराता है । वराहमिहिर जी सैनिको को बुलाते है मगर वो भो भाग जाते है बेताल वराहमिहिर जी को डराता है वराहमिहिर जी सहीत महल के सभी लोग घबरा जाते है । सभो लोग सुरक्षित स्थान पर जाते है लेकिन वहां भी बेताल आ जाता है । उधर सम्राट विक्रमादित्य महल में प्रवेश करते है व  देखते है उनके महल की स्थिति वह पुकारते है सबको उन्हें याद आता है कि यह काम अवश्य ही बेताल का ही होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य उस कक्ष में पहुंचते है वहां वो देखते है सब को आत्मा में बेताल प्रवेश कर लेता है वे सभी एक स्वर में कहते है सिंहासन बत्तीसी बेताल को सौप दो बेताल को । बेताल एक सवाल करता है वह कहता है अगर तुमने इसका उत्तर दे दिया तो में इन सब के अंदर से बाहर आ जाऊंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य उस प्रश्न का उत्तर दे देते है बेताल सब के शरीर में से निकल जाता है ।
बेताल कहता है सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन बत्तीसी मुझे सौप दो वरना यह तो केवल एक नमूना था वरना में इसे भूतों का डेरा बना दूंगा सिंहासन बत्तीसी लेकर आ जा में तेरी राह देखूंगा प्रेत भूमि में ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आप ठीक तो है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट ।

।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी बेताल को तो सिंहासन की जरूरत थी ही नही । देवी - ऐसा क्यो । राजा भोज - देवी क्योंकि हमारे शास्त्र में लिखा है मरे हुए व्यक्ति सिंहासन का क्या करेंगे जरूर कोई है जिसने बेताल को नियंत्रित कर रखा है और इस ब्रह्मांड में ऐसे कई रहस्य है । देवी - आप सही कह रहे है राजन् इसलिए सम्राट विक्रमादित्य ऐस पर विचार कर रहे थे । ।।

सम्राट विक्रमादित्य - आप क्यो चुप है वराहमिहिर जी आप बताए उसे वह सिंहासन क्यों चाहिए ।
वराहमिहिर जी - सम्राट मुझे डर है की कही मैने उसकी कुंडली बनाई तो वो मेरी बची हुई पुस्तक भी जला देगा और मेरे ज्ञान का स्त्रोत सूख जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप व्यर्थ में भयभीत हो रहे है कुछ नही करेगा वो हम है आपके साथ देखते है क्या करता है वो ।
वराहमिहिर जी - क्षमा किजिए सम्राट मगर मृत व्यक्ति की कुंडली नही बनाईजाती है सम्राट वह मनुष्य नही है हम गृहों के माध्यम से उसका पता नही लगा सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - फिर तो हमें और कुछ सोचना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य को कुछ गिरने की आवाज आती है तभी वो देखते है एक मूर्ति गिर जाती है सम्राट विक्रमादित्य को याद आता है उस प्रतिमा को देखकर की बेताल की हस्सी हमारे मित्र चित्रगुप्त जैसी थी और यह मूर्ति भी उसने ही हमें दी थी इस मूर्ति का गिरना कुछ संकेत है वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - आपके मित्र चित्रगुप्त तो आपके गुरुकुल में भी थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां वराहमिहिर जी और उसकी हस्सी बेताल से मिलती झूलती है ।
सम्राट विक्रमादित्य को अपने गुरुकुल की याद आती है वो बताते है एक किस्सा ।
सम्राट विक्रमादित्य - अरे चित्रगुप्त किसी पर हसना बहुत बुरी बात होती है ।
चित्रगुप्त - मगर हसना अपने स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है मित्र और तुम भी हसा करो राजा बनने के बाद तुम कहा हस पाओगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्यों नही जरूर हसूंगा ।
चित्रगुप्त - नही विक्रमादित्य राजा बनने के बाद बहुत जिम्मेदारी होती है तुम नही हस पाओगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम रहोगे ना हमारे साथ हमारे मंत्री बनके हमें हसाते रहना ।
चित्रगुप्त - नहीं मित्र में और तुम्हारा मंत्री तुम गंभीर स्वभाव के और में हसमूख क्या पूरब पश्चिम भी कभी एक होते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसका मतलब की तुम मित्रता की सच्ची परिभाषा नही जानते ।
चित्रगुप्त - अच्छा तुम मेरे मित्र हो तो मेरी एक पहेली का जवाब दो जब कई वर्षो बाद हम अपने अपने मुकाम पर पहुंच जाएंगे तब तुम क्या सोचोगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - वहीं की ऐसे अच्छे पल केवल मित्र ही निभा सकते है ।
।। कहानी बताते हुए सम्राट विक्रमादित्य कहते है वराहमिहिर जी हमारा मित्र बहुत हसमूख था मुझे लगा ही नही की वो कभी गंभीर भी होगा पर एक दिन वो गंभीरता से हमें एक जगह ले गया ।।
सम्राट विक्रमादित्य - यहां क्या है मित्र बात तो बताओ ।
चित्रगुप्त - यह देखो विक्रम ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम्हारे हाथ में यह प्रतिमा ।
चित्रगुप्त - यह प्रतिमा हमारी मित्रता की याद दिलाएगी तुम्हे की गंभीरता और हस्सी दोनो साथ साथ थे मेरा यह उपहार संभाल कर रखना मित्र समझना की जब तक यह प्रतिमा सुरक्षित है तब तक हम दोनों की मित्रता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - में इस प्रतिमा को संभाल कर रखूगां इसेकभी कुछ नही होने दूंगा ।
।। सम्राट विक्रमादित्य - और उस दिन पहली बार हमने उसे गंभीर देखा और पहली बार हस्सी को समझा उसने एक बात हमें बता दी की यह संसार क्षण भर का है मुस्कुराते हुए ही इसे बिताना है उस मुझे वो बड़े ज्ञानी लगे । वराहमिहिर जी - किंतु सम्राट आपके इस मित्र और बेताल में क्या संबंध है । सम्राट विक्रमादित्य - इसके लिए हमें अपने मित्र के यहां जाना होगा इस टूटी हुई मूर्ति ने कई राज खोल दिये हम आते है पता लगाकर ।

सम्राट विक्रमादित्य चित्रगुप्त के नगर जाते है उसके घर पर किंतु घर पर कोई नही होता है तभी एक व्यक्ति कहता है ।
व्यक्ति - किसे ढूंढ रहे है आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपने चित्रगुप्त को देखा उसके बच्चे उसका परिवार कहा है सब कहां है ।
व्यक्ति - मत पूछो भईया ऐसे दिन तो कोई दुश्मन को भी ना दिखाए ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह कैसी बात कर रहे है आप सब कुशल तो है ।
व्यक्ति - एक ब्राह्मण पत्नी को खेतो में काम करके बच्चो का पेठ पालना पढे तो कुशल कैसे और पति भी अपना धर्म नही समझता ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या आपको पता है वो कहा है ।
व्यक्ति - वो पास के साहूकार के खेत में काम कर रही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद हम अभी जाकर देखते है ।
उधर महल में काम करने वाले कर्मचारी कहते महारानी हम महल छोड कर जाना चाहते है हमें डर लग रहा है ।
महारानी चित्रलेखा - आप सब भयभीत ना होए वराहमिहिर जी क्या इसका कोई समाधान नही है ।
वराहमिहिर जी - महारानी आपने खुद देखा है उस अघोरी को भागते हुए अब हम सबको सम्राट विक्रमादित्य के साहस का समर्थन करना है अब वो ही कुछ कर सकते है ।
महारानी चित्रलेखा - हमें सम्राट पर पूर्ण विश्वास है हम आप सबको नही रोकेगे आप सभी अपना निर्णय स्वंय ले सकते है ।
प्रजा जन - नही महारानी हम सब आपके और सम्राट के साथ है जब सम्राट ने कभी हम सबका साथ नही छोडे हम उनके साथ है ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य खेत में पहुंच जाते है वे देखते है एक महिला वह उसके दो पुत्र खेत में कार्य करते है सम्राट उनसे मिलने जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम देवी ।
देवी - अरे आप एक राजा होकर मुझ से मिलने आए आप मुझे बुला लेते में आ जाती ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी हमारे मित्र कहा है जो आपको खेतो में काम करना पढ रहा है ।
देवी - सम्राट आप तो उनका स्वभाव जानते ही है एक बार कही निकल गए तो फिर कार्य पूरा करके ही आते है 6 महीने पहले आपसे मिलने ही निकले थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर देवी वो हमारे पास आए थे और दो तीन दिन रूके भी थे मगर फिर आपके पास आना है कहकर चले गए ।
देवी - मगर अब तक तो वो आए नही इसलिए इन दोंनो बच्चो को पालने के लिए हम यहां काम कर रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी यहां आपको काम करते हुए देख कर दुख हो रहा है आप हमारे हाथ चलिए हमारे महलमें हमारे परिवार के साथ रहे ।
देवी - हम नही चल सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर क्यों देवी हम मित्र है आपके पति के ।
देवी - और हम आपके मित्र की पत्नी है क्षमा किजिएगा सम्राट मगर यह मेरे स्वाभिमान के विपरीत है । हां यदि आप हमारी सहायता करना चाहते है तो आपको जब हमारे पति मिले तो आप एक बार उन्हें जरूर कहे ही उनके बच्चे उन्हें बहुत याद करते है ।
बच्चे - और मां भी पिताजी को बहुत याद करती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - में उसे ढूंढ कर ही लाऊंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य बार बार सोचते है चित्रगुप्त छह माह से घर नही आया है और बेताल की हस्सी भी उसके जैसी क्या है समझ नही आ रहा है कही चित्रगुप्त सिंहासन बत्तीसी को प्राप्त करने के लिए बेताल का सहारा तो नही ले रहा है नही यह नही हो सकता उसे तो अन्न के एक दाने का भी मोह नही है हमें आज भी याद है वो दिन जब वो हमसे मिलने आया था ।
सम्राट विक्रमादित्य उस दिन के बारे में सोचते है " यह उस दिन की कथा " ।। महारानी चित्रलेखा यह देखिए यह प्रतिमा देखिए यह हमारे मित्र ने हमें दी है हमारी मित्रता को याद रखने के लिए । महारानी चित्रलेखा - लगता है लो आपके परम मित्र है । सम्राट - हां । सैनिक - सम्राट आपसे कोई दरिद्र ब्राह्मण मिलने आया है वह अपना नाम चित्रगुप्त बता रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी हम इनकी ही तो बात कर रहे थे हम स्वंय उनका स्वागत करने जाएंगे । मित्र चित्रगुप्त ।
सम्राट विक्रमादित्य चित्रगुप्त के पैरों को साफ करते है ठीक उसी तरह जैसे श्री कृष्ण ने सुदामा चे पैरो को धोया था ।
महारानी चित्रलेखा - चित्रगुप्त जी एक दिन भी ऐसा नही बिता जब सम्राट ने आपको याद ना किया हो ।
चित्रगुप्त - भाभी यह तो मेरे मित्र की महानता है जो वो चक्रवर्ती सम्राट विश्व विजेता होते हुए भी मुझे याद करता है वरना मुझ में ऐसा क्या है जो मुझे याद किया जाए ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही मित्र हीरा अपना मोल स्वंय नही जानता है हम आपको कुछ नही दे सकते आपने तो हमें मित्रता की निशानी दी देखो वो प्रतिमा आज भी हमारे पास है मगर आज हम भी तुम्हें कुछ देंगे । मांगीये आपको क्या चाहिए ।
चित्रगुप्त - सम्राट आप हमें सबकुछ दे सकते है मगर मुझे सिर्फ आपकी मित्रता चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें गर्व है आप जैसे महान मित्र पर । अच्छा महारानी इनके लिए खीर ले आइए वरना ये ।
चित्रगुप्त हस कर कहते है मित्र आपको अब भी याद है कि हमें खीर नही मिली तो हम प्रस्थान कर लेंगे ।
पुरानी यादे सोचने के बाद सम्राट बेताल के रहस्य को जानने के लिए निकलते है ।
सम्राट विक्रमादित्य पहले महल जाते है चित्रगुप्त की मुर्ति लेने वहां जाकर वे देखते है कि कई कर्मचारी बेताल के डर से महल छोड कर जाते है तभी सम्राट आ जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी डरिए नही हम जब तक जीवित है आपको कुछ नही होने देंगे ।
कर्मचारी - सम्राट हमें यकीन है आप हमारी रक्षा करेंगे मगर सम्राट इस बार प्रेत का साया जिसे कोई नही हरा सका है ना मार सका है हम सभी अपनी आयु से पहले मरना नही चाहते अब हमें आज्ञा दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी जा सकते है किंतु आप सब का जाना यानी हमारे लडने से पहले ही हार धर्म की हार आप जा सकते है ।
कर्मचारी - हमें क्षमा कर दिजिए सम्राट हम।गलत थे हम आपको कैसे छोड सकते है हम कैसे भूल गए यह जीवन आपकी वजह से है सम्राट आप आगे बढीए हम आपके साथ है सम्राट विक्रमादित्य की जय सम्राट विक्रमादित्य की जय ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें इन सबकी रक्षा के लिए उस खंडित प्रतिमा को लेकर बेताल के पास जाना होगा महारानी हम आपको विश्वास दिलाते है की अब वह बेताल महल में नही आएगा ।
महारानी चित्रलेखा - हमें खुद से ज्यादा आप पर विश्वास है महादेव की कृपा से आप सफल होंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - शुभेचछा के लिए धन्यवाद ।

 चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य मूर्ति लेकर प्रेत  भूमि जाते है रास्ते में उन्हें कुछ भूतों के हाथ नजर आते है जो उनके पैरो को पकड देते है सम्राट विक्रमादित्य तुरंत तलवार निकालते है तभी सभी हाथ अपने आप दूर चले जाते है । सम्राट विक्रमादित्य प्रेत भूमि पहुच कर बेताल से मिलते है ।
बेताल - सम्राट विक्रमादित्य आप सिंहासन बत्तीसी लाए या नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस मूर्ति को देख रहे हो बेताल इस मूर्ति के लिए हम सबकुछ ले सकते है राज पाठ भी ।
बेताल - यह किसकी मूर्ति है ।
सम्राट विक्रमादित्य - अरे आपने ही तो उपहार में दी थी हम जानते है आप हमारे मित्र चित्रगुप्त है ।
बेताल आश्चर्यचकित हो जाता है 
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह क्या एक दीन हीन ब्राह्मण बेताल बन गए । देवी - राजन् आपको क्या लगता है क्या वो इतनी आसानी से अपना परिचय दे देगा नही वो अब मूर्ति पहचान ने से मना कर देगा । ।।
सम्राट विक्रमादित्य - मित्र पहले कुछ बाते करते है बड़े दिनों बाद मिले है और तुम्हें पता है आपकी पत्नी और बच्चे आपको बहुत याद कर रहे है आपकी पत्नी खेतो में काम कर रही है ।
बेताल - में अब प्रेत बन गया हूं तुम मुझे सिंहासन दोगे या नहीं ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य देंगे मित्रता के लिए तो जान भी हाजिर है । ऐसा कह कर सम्राट विक्रमादित्य चले जाते है ।
बेताल - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप वास्तव में सच्चे मित्र है तुमने निभाया है सच्चा मित्र धर्म । भद्रकाल मैंने निभा दिया है अपना वचन ।
बेताल भद्रकाल के पास जाता है ।
भद्रकाल - में भद्रकाल में हूं 12 सौर मंडल का स्वामी पूरी दुनिया मेरी मुठ्ठी में होगी में हूं अजर अमर अपराजेय उस वक्त मेरी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से हार हुई थे मैने उनका हम शक्ल भेजा था मगर इस बार मेरी विजय होगी इस दुनिया पर सिर्फ मेरा राज होगा ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह तो वही भद्रकाल है ना जिसने सम्राट का हम शक्ल भेजा था । देवी - हां यह वहीं है यह अपना साम्राज्य धरती पर स्थापित करना चाहता है किंतु यह उस बार असफल रहा । राजा भोज - और इस बार भी रहेगा और इस बार इसका विनाश हो जाएगा । देवी - आप इतने यकीन से कैसे कह सकते है । राजा भोज - क्योंकि यह सिंहासन बत्तीसी धारण करने वाले चक्रवर्ती सम्राटविक्रमादित्य में कुछ तो बात होगी जो वो देवताओं के प्रतिनिधि बन पाए । देवी - आपने बिल्कुल सही कहा । राजा भोज - यह सिंहासन बत्तीसी कोई आम सिंहासन नही है यह देवताओं का सिंहासन है धर्म का सिंहासन है यह किसी अधर्मी के हाथ में नही जाना चाहिए । देवी - और कभी चला गया तो यह मेरा संशय है । राजा भोज - देवी आप मुझे डरा रही है या मेरी परीक्षा ले रही है । देवी - में अपना संशय दूर कर रही हूं । राजा भोज - अगर यह सच हुआ तो भारी नुकसान हो जाएगा देवी । देवी - यही तो वो चाहता है सिंहासन बत्तीसी पाकर । ।।
उधर भद्रकाल बेताल से कहता है लाओ बेताल सिंहासन बत्तीसी कहा है मुझे उसे देखने की व्याकुलता है ।
बेताल - सिर्फ सिंहासन बत्तीसी नही यह कहो की उस पर बैठ कर तुम इस धरती पर राज करना चाहते हो उसकी व्याकुलता है ।
भद्रकाल - हाँ बेताल तुमने सही कहा ।
बेताल - तुम यह मत करो भद्रकाल वरना तुम्हारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा उस बार तुम यहाँ थे नही इसलिए बच गए इस बार तुम सामने हो तुम समाप्त हो जाओगे तुम जानते नही हो वो उज्जैनी का महाराजा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ।
भद्रकाल - तू मुझे सिंहासन बत्तीसी नही देना चाहता है लगता है तू भूल गया है संसार की सारी प्रेत आत्माएं मेरे कबजे में है सुन उनकी पुकार ।
प्रेत आत्माएं - बेताल हमें बचा लो बचा लो बेताल ।
भद्रकाल - बेताल अगर तुमने सिंहासन नही दिया तो में सभी प्रेत आत्माओं को जलाकर भस्म कर दूंगा ।
बेताल - अरे में तो मजाक कर रहा हूं छोड़ दो इन सभो को में लाऊंगा सिंहासन बत्तीसी ।
प्रेत आत्माएं - हमे बचा लो बेताल ।
बेताल - तुम सभी की रक्षा के लिए ही तो में इस अधर्म के कार्य में साथ दे रहा हूं और अपने सम्राट विक्रमादित्य से छल कर रहा हूं इसी मजबूरी के चलते ।
भद्रकाल - विक्रमादित्य अब तुम नही रोक सकते मुझे धरती का राजा बनने से ।
सम्राट विक्रमादित्य महल में वराहमिहिर जी और महारानी चित्रलेखा से कहते है कि बेताल ही चित्रगुप्त है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट वो आपके मित्र है क्या उन्होने पहचाना आपको ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महारानी उन्होंने तो मुझे पहचानने से इनकार कर दिया ।
वराहमिहिर जी - सम्राट जब वो आपके मित्र है तो फिर हमें क्यो सता रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - उसे यह सिंहासन चाहिए ।
महारानी चित्रलेखा - क्या उनको लालच है वो जब यहां आए थे तभी से उनमें लालचथा या और कुछ बात है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महारानी हमारे मित्र में तो एक प्रतिशत का लालच भी नही था इसके पीछे कोई भेद है यह वो खुद कुछ नही करा रहा है उससे कोई करवा रहा है ।
महारानी चित्रलेखा - इन सारी बातों का आपने क्या निर्णय लिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - आज सिंहासन बत्तीसी की वजह से हमारा मित्र धर्म संकट में है हम पहले मित्र धर्म बचाएंगे फिर सिंहासन बत्तीसी को मगर हम सबसे पहले पता लगाएंगे ।
उधर बेताल अपने मन में कहता सम्राट आप सिंहासन त्याग सकते है पर मित्रता जरूर निभाएंगे में जानता हूं मेरे मित्र को । 
उधर अगले दिन चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन के पास जाते है ।
महामाया देवी 32 देवियों के साथ सम्राट विक्रमादित्य के सामने खडी हो जाती है वह कहती है प्रणाम सम्राट आप सिंहासन बत्तीसी को दान में नही दे सकते है ।

महामाया - सम्राट आप यह सिंहासन बत्तीसी दान नही कर सकते और बेताल को तो बिल्कुल भी नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी हमें मित्रता धर्म निभाना है ।
महामाया देवी - क्षमा किजिएगा सम्राट मगर आपका मित्र तो चित्रगुप्त था ना कि बेताल अपने मित्र के प्रति मित्रता होना चाहिए ना कि आत्मा से ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी मित्रता का संबध मरने के बाद भी होता है और हम यह धर्म निभाएंगे ।
देवी महामाया - सम्राट मेरा इस सिंहासन के प्रति जो उत्तरदायित्व है उसचे अनुसार हम आपको यह बता रहे है कि आपका यह निर्णय गलत है यह उचित निर्णय नही है आप जैसे सर्वश्रेष्ठ सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति को यह निर्णय नही लेना चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्षमा किजिए देवी पर हम आपकी बात नही मान पाएंगे आपसे सहमत नही है हम हमें अपना सिंहासन बेताल को देना ही होगा देवी ।
देवी महामाया - सम्राट यदि यही आपका अंतिम निर्णय है तो हम देवियां आपका साथ नही दे पाएंगी हम सभी सिंहासन से निकल कर स्वर्ग लौक जा रही है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् यह पहली बार था जब हम सबने सम्राट के निर्णय को नही माना आपके अनुसार सम्राट का निर्णय सही था या गलत । राजा भोज - गलत निर्णय था उनका उसका कारण यह था कि उन्हे पता भी नही था की बेताल उसका क्या करेगा उसका उपयोग या दुरूपयोग । देवी - यानी हमारा निर्णय सही था । राजा भोज - क्षमा करिएगा देवी आप लोगों का भी निर्णय है सही नही था सम्राट विक्रमादित्य सभी धर्मो के पालक थे और वो तो अपना मित्रता का धर्म निभा रहे थे और आप लोग उन्हें मित्रता का धर्म निभाने से रोक रहे थे फिर क्या हुआ देवी । देवी - फिर क्या सम्राट विक्रमादित्य तो तैयार थे सिंहासन देने के लिए और यह पहली बार था जब सिंहासन किसी बेताल को मिलने जा रहा था । ।।
सम्राट विक्रमादित्य - हे कर्म धर्म वाले सिंहासन बत्तीसी कृपया हमारे साथ चलिए हमारे मित्रता धर्म निभाने में हमारा साथ दिजिए ।
सिंहासन बत्तीसी हवा में उड़ने लगता है जोर से तूफान आने लगता है सिंहासन बत्तीसी सम्राट विक्रमादित्य के साथ चलता है हवा में उड़कर ।
बेताल - आओ विक्रम आओ भय सबकुछ करवा देता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - गलत फहमी में हो बेताल भय वो भी तुमसे हम केवल मित्रता के लिए आए वरना इस संसार में हमें किसी का भय नहीं है ।
बेताल - अरे किस भी वजह से आया आया तो आज संसार में पहली बार इतिहास बन गया इस सिंहासन पर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य नही बेताल बैठ गया 32 गुणों वाले सिंहासन पर । यह क्या विक्रमादित्य मित्रता के नाम पर छुरा घोपा है तुमने ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या कह रहे हो तुम ।
बेताल - बिना पुतलियों का सिंहासन लेकर आया है बिना पुतलियों के यह सिंहासन सामान्य है कोई काम का नही है मामूली सिंहासन है यह तो अगर पुतलियां होती तो में बैठ ही नही पाता ।
सम्राट विक्रमादित्य देखर चोक जाते है कि उसमें पुतलियां नही थी ।
बेताल - तुमने छल किया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप हम पर लांछण लगा रहे हो ।
बेताल - नही विक्रम देखो महामाया देवी ने मुझे दर्शन नही दिये जब सिंहासन में पुतलियां ही नही है तो कहा से हो गया यह दिव्य सिंहासन ।
सम्राट विक्रमादित्य -हम अपने मित्र धर्म को कलंकित नही होने देंगे हम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है अपने वचन को निभाएंगे ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह आप लोगो ने क्या किया सिंहासन ही त्याग दिया और देवी आप आप तो मित्रता के गुण की रक्षिका है आपने सम्राट को नही समझा । देवी - राजन् हम सभी एक दुसरे से जुड़ी है और हम 32 देवियों के एक होने से ही देवी महामाया है जो हमारा प्रतिनिधित्व करती है यह निर्णय उनका था हम सब उनके साथ थी । राजा भोज - वैसे देवी आप सभी सिंहासन से निकलक कहां गए थे । देवी - वहीं पर जहां से हमें सिंहासन में रहने का आदेश मिला था । ।।
इंद्र देव - देवी महामाया दूत ने संदेश दिया की आपने सिंहासन छोड़ दिया ।
महामाया - हां इंद्र देव ।
इंद्र देव - सम्राट ऐसा नही कर सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां इंद्र देव ।
32 पुतलियाँ - प्रणाम चक्रवर्ती सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम । इंद्र हमने सिंहासन अपने मित्र को दान कर दिया है ।
इंद्र देव - परंतु सम्राट आप यह सिंहासन दान नही कर सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य -क्यों नही इंद्र देव आपके यहां तो विधान है कि कर्म से अर्जित की गई कोई भी वस्तु दान की जा सकती है यह सिंहासन भी हमने अपने कर्मो से ही प्राप्त किया है तो फिर हम दान क्यो नही कर सकते ।
इंद्र देव - आपका कथन सत्य है किंतु मेरा विचार यह है जो आप जानते है इस सिंहासन में सभी देवताओं की शक्ति है अगर आपके दान की वजह से यह सिंहासन गलत हाथो में पढ गया तो संसार कीसारी व्यवस्था संकट में पढ जाएगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - किंतु ऐसा ना करने से हमारी मित्रता संकट में पढ जाएगी ।
इंद्र देव - हम आपकी भावना समझते है मित्र और आप पर विश्वास भी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो फिर क्यों रोक रहे है आप हम अपने सिंहासन को कभी गलत हाथो में नही जाने देंगे उसका कभी दुरूपयोग नही होने देंगे इसके अतिरिक्त कुछ और है तो बताए । और हमारे मित्र इसका गलत उपयोग नही होने देंगे और हमारे होते हुए तो बिल्कुल भी नही ।
देवी महामाया - सम्राट किसी के भी मन को नही पढा जा सकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी महामाया हम केवल धर्म को पढ़ते है और हम आपसे निवेदन करते है आप सिंहासन में फिर से विराजमान हो जाए हम सिंहासन को कुछ नही होने देंगे आप सभी सिंहासन में विराजमान होकर सिंहासन को पूर्ण करे हम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप सभी को वचन देते है ।
इंद्र देव - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को विश्वास दिलाने की जरूरत नही है आप स्वंय सत्य धर्म न्याय के प्रतिक है ।
महामाया - मुझे क्षमा कर दिजिए सम्राट एक समय के लिए आप पर विश्वास नही किया हम आपके साथ है और सिंहासन की रक्षा भी करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता नही है आप सभी के सहयोग के लिए धन्यवाद ।

सम्राट विक्रमादित्य बेताल के पास आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कहो मित्र ।
बेताल - कहना क्या है पुतलिया कहां है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवियों हम आपसे आग्रह करते है इस दिव्य सिंहासन में विराजमान होए ।
देविया - जी चक्रवर्ती सम्राट ।
बेताल - विक्रम मैने पा लिया सिंहासन ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य ले जाओ तुम सिंहासन पर जाने से पहले यह बता दो की तुम्हें यह सिंहासन क्यो चाहिए था ।
बेताल - प्रश्न बहुत पुछते हो तुम विक्रम पर में नही रूक सकता में तो चला ।
बेताल सिंहासन बत्तीसी को लेकर भद्रकाल के पास पहुंच जाता है ।
भद्रकाल - बेताल तुमने मेरा काम कर दिया अब में बताऊँगा विक्रमादित्य को की वो मेरे सामने क्या है और में कौन हूं ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य उस स्थान पर खड़े होते है जहां सिंहासन बत्तीसी रखा था सम्राट विक्रमादित्य मन में कुछ सोचते है उसी वक्त महारानी चित्रलेखा और वराहमिहिर जी आते है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट क्या बेताल ने आपको बताया की उन्होंने आपसे सिंहासन बत्तीसी क्यों लिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महारानी उन्होंने नही बताया ।
महारानी चित्रलेखा - फिर अब क्या करेंगे सम्राट आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने एक धर्म निभा दिया हे मित्रता का अब हम राजा धर्म निभाएंगे । हम इंद्र देव को दिया हुआ वचन और महामाया देवी के विश्वास की रक्षा करेंगे ।
वराहमिहिर जी - मगर कैसे सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - उस सिंहासन का पता लगाकर और उसके लिए हमें आपकी सहायता चाहिए ।
वराहमिहिर जी - में आपके साथ हूं सम्राट ।
उधर सिंहासन बत्तीसी प्राप्त करके भद्रकाल कहता है संसार वासीयों अब में राज करूंगा पुरे संसार पर क्योंकि अब मेरे पास देवताओं की शक्ति आ गई है सिंहासन के रूप में ।
बेताल भद्रकाल को पुकारता है ।
भद्रकाल - किसने पुकारा तुम तुम अब तक यही हो बेताल ।
बेताल - हां भद्रकाल अब इन आत्माओं को मुक्त कर दो तुमने वचन दिया था सिंहासन बत्तीसी लाते ही तुम इन सब को मुक्त कर दोगे तो करो अब इन्हें मुक्त ।

भद्रकाल - दुबारा यह मत कहना ना ये मुक्त होगे ना तुम । बेताल अब तू मेरे किसी काम का नही अब में तुझे दंड दूंगा ।
बेताल अभी यहां से भागने में ही भलाई है ।
भद्रकाल - बेताल आज में सिंहासन धारण करने जा रहा हूं इसलिए तुझे छोड़ रहा हूं ।
उधर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपनी दैविक शक्ति से देखते की सिंहासन कहाँ है वही वराहमिहिर जी सम्राट विक्रमादित्य के बताने अनुसार नक्षा बनाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी उत्तर दिशा में सिंहासन को आकाश के मार्ग से ले जाया जा रहा है वही एक नदी है उसके बाद वो अध्र्य हो रहा है । क्या रहस्य है वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - रहस्य यह है की सम्राट उसके आगे प्रतो का संसार शुरू हो रहा है और वहां केवल प्रेत ही जा सकते है । और सम्राट मैने जहां तक सुना है प्रेत दिन में एक अपने स्थान पर जरूर आते है ।
उधय भद्रकाल सिंहासन की ओर बढ़ता है और कहता है में इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर राज करूंगा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की तरह मगर फर्क यह है कि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज का राज धर्म का था और हम अधर्म का राज करेंगे ।
भद्रकाल जैसे ही सिंहासन पर बैठने जाता है उसी वक्त उसे जोर का धक्का लगता है वो गिर जाता है ।
भद्रकाल - किसने किया यह दुस्साहस ।
महामाया देवी 32 पुतलियों का साथ सामने आती है और कहती है मूर्ख तू सिंहासन बत्तीसी धारण करने आया है और हमें नही पहचानता ।
भद्रकाल - में सिंहासन के अलावा किसी को नही जानता मूर्ख स्त्री ।
महामाया - मूर्ख तू हम सभी को बिना जाने सिंहासन पर बैठ ही नही सकता हम सभी इसकी रक्षिका है ।
भद्रकाल - तुम रक्षिका नही मेरी सेविका बनोगी ।
महामाया - तू इस सिंहासन पर कभी नही बैठ सकता यह सिंहासन सर्वगुण सम्पन्न सर्वश्रेष्ठ चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का है जिनके जैसा पूरे ब्रह्मांड में कोई नही है ना था इस सिंहासन की रक्षिका हूं इसलिए तेरे हित की बात कर रही हूं इस सिंहासन पर मत बैठ ।
भद्रकाल - में इस सिंहासन पर बैठ कर रहूंगा स्त्री तुम अपने हित की बात करो ।
भद्रकाल फिर आगे बढ़ता है तभी सभी देविया भद्रकाल के उपर शस्त्रो से हमला कर कहती है तुझ जैसे अपवित्र की छाया भी नही पढ सकती सिंहासन पर ।

भद्रकाल सभी देवियों को बंदी बना देता है और महामाया देवी को भी और वहां से चला जाता है कुछ समय के लिए । इस बीच चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य प्रेत भूमि जाते है वहां बेताल को वो कहते है कहां है सिंहासन बत्तीसी बेताल ।
बेताल - विक्रम मुझे माफ कर दो मैने वह सिंहासन बत्तीसी भद्रकाल को दे दिया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या यह क्या कह रहे हो तुम मैने वो तुम्हे दिया था । बात क्या है बेताल अब तुम मुझे पूरी सच्चाई बताओ यह सब क्या है ।
बेताल - में तुझे पूरी बात बताता हूं विक्रम । तुझे याद है में तेरे यहां आया था कुछ समय पहले तब में जीवित था तेरे वहां से निकलने के बाद में सीधे घर की और आ रहा था तभो भद्रकाल मुझे साधु के रूप में मिला उसने मुझे कहां था की सम्राट विक्रमादित्य की भलाई के लिए हम एक यज्ञ कर रहे है तुम भी चलो में वहां गया तब यज्ञ शुरू हो गया था इस बीच मुझे पता चला की मुझे मोहरा बना कर तुम्हारा सिंहासन लेने का षड्यंत्र भद्रकाल कर रहा था तभी मैने उसी यज्ञ कुंड में कुद कर जान दे दी मगर भद्रकाल ने मेरे मरने के बाद भी छल किया प्रेत लोक की सारी आत्माओं को उसने बंदी बना लिया और मुझ से सिंहासन लाने की बात कही इसलिए में सिंहासन लेने आया था ।
सम्राट विक्रमादित्य - बेताल तुमने मेरे लिए अपने प्राण तक की चिंता नही करी ।
बेताल - विक्रम सिर्फ तेरी नही इस संसार को भी में भद्रकाल जैसे गलत व्यक्ति के हाथ में कैसे जाने दे सकता था मगर इस भद्रकाल ने मुझे फिर भी नही छोड़ा । विक्रम सिंहासन बत्तीसी और सभी देविया संकट में है । और विक्रम मित्र हो तो तेरे जैसा आज संसार में भाई भाई का नही होता मित्र मित्र नही होते और तुने मरने के बाद भच मित्रता निभाई तू धन्य है महान है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - बेताल हमने जब आपकी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया था तब वो हाथ छोड़ने के लिए नही थामा था हमेशा साथ निभाने के लिए थामा है । अब तुमने मुझे सच्चाई बता दी अच्छा करा अब जल्दी से मुझे भद्रकाल के पास ले चलो में उस भद्रकाल को अब संसार से हमेशा के लिए समाप्त कर दूंगा ।
बेताल - विक्रम तू बिमार है या तुम्हारा घोड़ा जल्दी चलो कही वो कुछ अनर्थ ना कर दे ।
सम्राट विक्रमादित्य - चलो मेरे अश्व शीघ्र चलो ।
उधर भद्रकाल महामाया देवी से कहता हैदेवी बंद कर दो यह प्रयास तुम नही मुक्त हो पाओगी अब में तुम सभी के गुणो को अपने अंदर धारण करके सिंहासन पर बैठ जाऊंगा फिर तुम सभी कुछ नही कर पाओगी में तुम सबकी शक्ति लेने जा रहा हूं ।
महामाया देवी और सभी 32 देवियां संकट में पढ जाती है सभी की शक्तियां कम हो जाती है ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य बेताल से कहते है बेताल यह तुम कहां ले आए हो ऐसी जगह ।
बेताल - अरे में आपको क्या नृत्य दिखाने लाया हूं क्या ।
सम्राट विक्रमादित्य - चुप करो बेताल आपको यहां भी हस्सी मजाक सुज रहा है ।
बेताल - अरे समय कम है इसलिए इस जगह से लाया हूं ताकि समय कम लगे ।
बेताल - सम्राट अब आपको इस ज्वालामुखी में कूदना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नही है बेताल ।
बेताल - है मगर वहां तक जाने में एक माह लगेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - छोड़ो हम इसी मार्ग से जाएंगे ।
बेताल - अपने प्राणों की चिंता नही है क्या ।
सम्राट विक्रमादित्य - जब जनकल्याण की बात हो तब में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपने प्राणो की भी चिंता नही करता हूं ।
बेताल - वाह सम्राट आप तो महान है यह आपकी परीक्षा थी जिसमें आप सफल रहे आप बढीये आगे ।
उधर भद्रकाल सिंहासन बत्तीसी की ओर बढ़ता है उस पर बैठने के लिए ।
महामाया - हे विधाता हम सभी देवियां तो शक्तिहीन हो चुकी है आप तो शक्तिहीन नही है रक्षा करिए हमारी प्रभु ।
भद्रकाल - अब यह सिंहासन मेरा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - रूक जाओ भद्रकाल ।
भद्रकाल - कौन है यह जिसने मुझे रोकने का दुस्साहस किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने रोका तुम्हे ।
भद्रकाल - ओह तो तुम है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - भद्रकाल तुमने हमारे साथ गलत किया है पिछली बार भी और आज भी  वो तुम हो भद्रकाल जिसने हमारे मित्र के सेथ छल किया तुमने उसे बेताल बनने को मजबूर किया ।
भद्रकाल - हा में ही हूं ब्रह्मांड का नया इश्वर ।
सम्राट विक्रमादित्य - छल करने वाला इश्वर नहीं होता ना नायक होता है उनका तो केवल अंत होता है ।
भद्रकाल - सम्राट मेरा अंत नही हो पाएगा में 12 सौर मंडल में खंडित हो कर कुछ भी कर सकता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - याद करो भद्रकाल पिछली बार भी तुम्हारी हार हुई थी और आज भी होगी नही पूरी होगी तुम्हारी इच्छा ।

भद्रकाल - पिछली बार मेरा दूत आया था इस बार में स्वंय हूं लो करो मुझ से युद्ध ।
सम्राट विक्रमादित्य और भद्रकाल का युद्ध होता है ।
युद्ध में सम्राट विक्रमादित्य घायल हो जाता है उनकी रक्षा करने बेताल आता है किंतु भद्रकाल उसे भी घायल कर देता है । बेताल - उठ विक्रम में इसे ज्यादा देर नही रोक पाऊंगा ।
उसी वक्त सम्राट विक्रमादित्य उठ खड़े होते है । सम्राट विक्रमादित्य उस पर तीर छोड़ते है ।
भद्रकाल - ओह तो तुम्हे होश आ गया ।
सम्राट विक्रमादित्य - और तुम्हारा अंत भी निश्चित है ।
सम्राट विक्रमादित्य के तीर छोड़ते ही भद्रकाल गायब हो जाता है ।

सम्राट विक्रमादित्य अपनी शब्द भेदी भाण विद्या का उपयोग करते है और भद्रकाल के उपर तीर चला देते है जिस से उसकी सारी शक्तियां खत्म हो जाती है ।
भद्रकाल - सम्राट तुमने मेरी शक्ति तो खत्म कर दी मगर मुझे खत्म नही कर पाओगे में फिर लौटूंगा इस सिंहासन को पाने ।
सम्राट विक्रमादित्य - तेरी हर बार हार होगी ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है यह क्या देवी सम्राट ने उसे छोड़ दिया उसे मारा नही । देवी - मारते कैसे राजन् उसने अपने आप को तंत्र शक्ति से 12 भागो में विभाजित कर चुका है लेकिन सम्राट ने एक काम बहुत अच्छा किया भद्रकाल की सारी शक्तियां नष्ट कर दी अब हजारो वर्ष लग जाएंगे और उससे रक्षा के लिए इस सिंहासन बत्तीसी में तो शक्ति रहेगी ही । राजा भोज - मगर दुष्ट को छोड़ना तो गलत है । देवी - नही राजन् दुष्ट जब अपनी ताकत दिखाता है जब वो शक्ति से भरा हो और जब एक शक्तिशाली व्यक्ति शक्तिहीन होता है तब उसकी हालत मृत्यु से भी बदतर है और सम्राट विक्रमादित्य ने उसके साथ वो करके दिखाया है सम्राट ने संसार में अधर्म को रोक दिया है । राजा भोज - हां सही कह रही है आप देवी और यह लोक कल्याणकारी सिंहासन कभी बुरे लोगो के पास जाएगा ही नही । ।।
उधर महामाया देवी कहती है धन्यवाद सम्राट आज आपके कारण ना केवल सिंहासन बत्तीसी अपितु धर्म भी सुरक्षित हो गया घोर अनर्थ टल गया बहुत बहुत धन्यवाद सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही देवी महामाया अगर आप सबका साथ ना होता तो हम यह नही कर पाते । देवी अब आप सभी इस सिंहासन को धारण किजिए और उज्जैनी की ओर प्रस्थान किजिए । मित्र बेताल अगर तुम नही होते तो यह नही हो पाता ।
बेताल सभी आत्माओं को लेकर चला जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - बेताल का मन में अवश्य कोई बात है इसलिए वो यहां से ऐसे चला गया ।
उधर महल में महारानी चित्रलेखा कहती है आचार्य जी क्या कारण है सम्राट अब तक नही आए कोई विघ्न तो नही ।
वराहमिहिर जी - वो देखिए महारानी जी सिंहासन बत्तीसी आ गया अर्थात भद्रकाल पराजित हुआ ।
महारानी चित्रलेखा - हां सही कहा आपने मगर सम्राट नही आए सब कुशल तो होगा ना ना जाने वो कहा रह गए ।
महामाया देवी - महारानी चित्रलेखा आप सम्राट की चिंता मत करिए वो सुरक्षित है कुछ समय में आ जाएंगे ।
महारानी चित्रलेखा - धन्यवाद देवी ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य बेताल के पास जाते है ।
बेताल - सम्राट आप क्यों आ गए वापस यहां आप महल की ओर जाए ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य जाएंगे मगर पहले अपने मित्र को यहां से मुक्ति दिलाएंगे ।
बेताल - मुझे अकेले मुक्ति नही चाहिए मित्र हम सबको मुक्ति चाहिए और हमारे लिए संसार में कोई लोक नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सबके लिए कोई ना कोई लोक तो होगा ।
बेताल - सम्राट लोक तो है मगर उनके लिए जो समय आने पर मृत्यु को प्राप्त होते है उनके लिए पितृ लोक है मगर जो बिना मौत करते है हम जैसे उनके लिए कोई लोक नही है इसलिए कोई ना कोई भद्रकाल जैसा आकर इन्हे बंदी बना लेता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही अब इन्हें कोई बंदी नही बना पाएगा इन सबको सुरक्षित स्थान हम देंगे ।
बेताल - मगर सम्राट इनके लिए कोई लोक नही बनाया है इश्वर ने ।
सम्राट विक्रमादित्य - अगर नही है तो हम बनाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य यज्ञ करते है और आर्यमां का आव्हान करते है ।
आर्यमां - कहिए सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम आर्य मां आप इन सभी प्रेतो के लिए एक लौक बनाइए ताकि अपनी आयु पूरी होने तक यह सब वहां रह सके इन्हे कोई बंदी ना बना सके ।
आर्य मां - जो आज्ञा सम्राट ।
आर्य मां - सम्राट यह प्रेत लोक बनाया है हमने अब से सारी आत्माएं यही पर निवास करेंगी अब यह यहां सुरक्षित है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद आर्य मां ।
सभी प्रेतो को मुक्ति मिल जाती है ।
बेताल - धन्यवाद मेरे मित्र चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपने वो किया जो संसार में कोई नही कर पाया ।
सम्राट विक्रमादित्य - मित्र अब हमारे बिछड़ने का समय आ गया है ।
बेताल - में आपके साथ हमेशा रहूंगा आपको जब कभी मेरी जरूरत पढे आप आदेश करिएगा । अभी तो आप अपने महल में मेरे स्वागत की तैयारी करे ।
सम्राट विक्रमादित्य महल पहुंच जाते है सभी खुश होते है तभी अचानक बेताल आ जाते है महारानी घबरा जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महारानी अब बेताल हमारे मित्र है ।
बेताल - में हाथ जोड़कर आपसे क्षमा मांगता हूं महारानी ।
महारानी चित्रलेखा - आप क्षमा मत मांगिए आप सम्राट के मित्र है ।
बेताल - विक्रम मुझे माफी मिल गई महारानी से मेरा उद्देश्य पूरा हो गया अब में चलता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब आप भी यही रहो मित्र ।
बेताल - नही विक्रम में यहा कैसे रूक सकता हूं बेताल के निवास श्मशान में हैअब में इस संसार में रहूंगा तो केवल आपकी मित्रता के लिए जब कभी भी मेरी जरूरत पढ़े निसंकोच मुझे याद करना ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद मित्र आप जैसा मित्र पाकर हम धन्य हो गए ।
बेताल - मित्र तो आप हो सम्राट आपकी और हमारी इस दोस्ती को संसार हमेशा याद रखेगा ।
।। कथा पुरी होने पर देवी कहती है राजन् तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने अपने मित्र से मित्रता उसकी मृत्यु के बाद भी निभाई उन जैसा मित्र संसार में केवल एक ही बार होता है । राजा भोज - सम्राट के सम्मान में में अपना शीश नवाता हूं । देवी - सम्राट को सम्मान देने के लिए धन्यवाद आपका । राजा भोज - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को मेरा प्रणाम । ।।

नोट - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और बेताल की बेताल पच्चीसी की कथा भी इसी घठना के बीच में हुई थी । सम्राट विक्रमादित्य और बेताल की मित्रता संसार के लिए उदाहरण है आइए हम सब भी मित्रता का गुण सम्राट से सीखे ।

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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