अठाइसवा गुण भक्ति

।। अठाइसवा गुण भक्ति ।।

।। यह कथा सम्राट विक्रमादित्य के भक्ति गुण से संबंध रखती है इस कथा में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का एक अलग रूप दिखेगा जो आज तक किसी व्यक्ति में नही देखा होगा क्योकि या तो कोई भक्त होता है या राजा किंतु विक्रमादित्य जितने बडे राजा उतने ही बडे भक्त । इस कथा में विक्रमादित्य की भक्ति की सभी कथा है जो उन्हे सबसे बड़ा भक्त बनाती है ।।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य माँ हरसिद्धि के बहुत बड़े भक्त थे एक दिन माता ने उन्हे दर्शन दिए । 
माँ हरसिद्धि - वीर विक्रमादित्य उठो आंखे खोलो ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम माँ ।
माँ हरसिद्धि - आपकी भक्ति से हम बहुत प्रसन्न है मांगीए वरदान ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ आपकी कृपा ही हमारे लिए वरदान है ।
माँ हरसिद्धि - कठोर तपस्या भी की तो सिर्फ कृपा के लिए । 
सम्राट विक्रमादित्य - माँ हमें सिर्फ आपका आशीर्वाद चाहिए ।
माँ हरसिद्धि - आपकी तपस्या बहुत कठोर थी इसलिए हम बिना वरदान दिए नही जा सकते किंतु हां आप भी हमें अपनी कीमती चीज दे सकते है बदले में ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ आपका लिए तो हमारे प्राण भी हाजिर है हम अपना मस्तक आपके शीश चरणों में अर्पित करेंगे ।

" सम्राट विक्रमादित्य अपना शीष काटकर माँ के चरणों में चढा देते है । किंतु विक्रमादित्य का शीष फिर उनके शरीर से जुड जाता है । विक्रमादित्य फिर अपना शीश अर्पित करते है फिर उनका सिर धड पर आ जाता है । ऐसा विक्रमादित्य 11 बार करते है और सभी बार माँ हरसिद्धि उन्हे अपना शीश लौटा देती है वह 12 वी बार उनकी तलवार पकड लेती है "

माँ हरसिद्धि - वीर विक्रमादित्य भक्ति हो तो ऐसी जो ईश्वर को भक्त बना दे । आप जैसा भक्त दूसरा कोई नही जो मात्र ईश्वर के कहने पर बिना वरदान मांगे ही अपना शीश दान कर दे हे वीर विक्रमादित्य हम आपको सभी सिद्धियां देते है आपका तेज युगों युगों तक बरकरार रहेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - मां आपकी कृपा सदैव बनी रहे ।

" माँ हरसिद्धि की कठोर तपस्या के बाद विक्रमादित्य महाकाल के दर्शन की ओर अग्रसर होते है । विक्रमादित्य एक वृक्ष के नीचे 2 वर्ष तक तपस्या करते है वह इतनी कठोर तपस्या करते है जिस वृक्ष के नीचे वे बैठते है उसे ही अमर कर देते है वह वृक्ष सिद्धवट अमर हो जाता है । विक्रमादित्य की तपस्या से महाकाल स्वंय प्रकट हो जाते है " 

महाकाल - विक्रमादित्य आखें खोलो हम आपकी तपस्या से बहुत प्रसन्न है वर मांगो ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे ईश्वर हमें सिर्फ आपका आशीर्वाद चाहिए आप सभी का दिया हुआ सब है ।
महाकाल - हम आपको यह वरदान देते है की आपकी इस उज्जैनी नगरी का मान कभी कम नही होगा आपके साम्राज्य का विजय ध्वज तीनों लोकों में लहराए ।
सम्राट विक्रमादित्य - जय महाकाल ।

" सम्राट विक्रमादित्य धर्म के प्रतिक थे उन्होंने ईश्वर के आशीर्वाद का कभी अनादर नही किया उन्होंने सदैव जन सेवा में अपने आप को लगाए रखा " 

इसके आगे अगली पोस्ट में 
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
।। अठाइसवा गुण भक्ति ।।
    ।। पार्ट 2 ।।

" सम्राट विक्रमादित्य का तेज और पुण्य की वजह से देवता उनके मित्र बनते गए । स्वंय देवराज इंद्र विक्रमादित्य के परम मित्र थे । सम्राट विक्रमादित्य को भगवान ब्रह्मा विष्णु वह माँ लक्ष्मी माँ सरस्वती ने भी दर्शन दिए । सभी के आशीर्वाद से विक्रमादित्य धर्म के प्रतिक बन गए । विक्रमादित्य एक सामान्य मनुष्य होकर ईश्वरी शक्ति तक बन गए " 

एक समय की बात है जब सम्राट विक्रमादित्य अयोध्या की ओर गए किंतु उन्हे अयोध्या नगरी कई नही दिखी क्योकि कालांतर की वजह से अयोध्या समा गई थी । सम्राट विक्रमादित्य ने प्रयाग राज का नाम लेकर उन्हे बुलाया ।
प्रयागराज तीर्थ - सम्राट विक्रमादित्य स्वागत है पूरे एक युग के बाद आप जैसे महापुरूष के दर्शन हुए ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद तीर्थ राज । 
प्रयागराज तीर्थ - बताइए आपने हमें कैसे याद किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - अयोध्या नगरी कहां गई और श्रीराम का मंदिर ।
प्रयागराज तीर्थ - सम्राट विक्रमादित्य आप सरयू पारी के पास जाएंगे वही आपको एक नगरी खुदवानी पड़ेगी । वही पर अयोध्या नगरी के चिन्ह आपको मिलेंगे । 
सम्राट विक्रमादित्य - हम अयोध्या को फिर बसाएंगे प्रयागराज ।
प्रयागराज - धन्यवाद सम्राट आप अपने कार्य में सफल होंगे ।

" सम्राट विक्रमादित्य उज्जैनी आते है वह पूरे दल को भेजते है आयोध्या की खोज में । निरंतर प्रयास के बाद अयोध्या नगरी के अवशेष मिलते है । सम्राट विक्रमादित्य वहां भव्य नगर बनाने का आदेश देते है । अयोध्या नगरी फिर बस जाती है देवता भी सम्राट विक्रमादित्य पर पुष्प की वर्षा करते है । सम्राट विक्रमादित्य इसी के साथ साथ उसी स्थान पर भव्य राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करते है । उसी रात भगवान श्रीराम सम्राट विक्रमादित्य को दर्शन देते है ।
श्री राम - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप बहुत महान है । आपने तो हमें भी अपने पुण्य से चकित कर दिया सम्राट । अगर आप सतयुग में होते तो आपके गुणों को देखकर हम भी आपको ही अपना आदर्श और मार्गदर्शक बनाते । 
सम्राट विक्रमादित्य - यह सब आपकी कृपा है देव ।
श्री राम - हम आपको वरदान देते है अयोध्या मंदिर में यदि आपकी भी पूजा हो तो हमारी विशेष कृपा होगी उस पर ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवान श्रीराम आप दो ईश्वर अवतार है हम तो एक सामान्य मनुष्य है हमारी और आपकी बराबरी कैसी ।
श्री राम - नही सम्राट आपका धर्म ही आपकी पहचान है आपकी कीर्ति कीर्ति सदैव रहेगी । 

( माननीय सुप्रिम कोर्ट ने जो 2019 में राम मंदिर पर फेसला दिया था उसमें सम्राट विक्रमादित्य द्वारा स्थापित मंदिर का उल्लेख है उसी आधार पर राम मंदिर के पक्ष में फैसला आया था । हमारी मांग है केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से की भव्य राम मंदिर के पास विशाल चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की प्रतिमा स्थापित हो जिससे राम मंदिर को बनाने वाले सम्राट विक्रमादित्य का भी महत्व जान सके आम जन )

सम्राट विक्रमादित्य जब नए राजा बने थे अपने नगर उज्जैनी में एक दिन भ्रमण कर रहे थे तब उनकी नजर एक शमशान घाट पर पढी जहां एक लाश जल रही थी उन्होंने वहां पूछा किसकी मृत्यु हुई है । तब वहां के प्रबंधक कहते है महाराज यहां तो रोज ही एक मृत्यु होती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर ऐसा क्यो ।
प्रबंधक - भूखी माता रोज एक बलि लेती है ।

सम्राट विक्रमादित्य भूखी माता के मंदिर जाते है और कहते है माँ आप हमारा भोग लिजिए । हमें मृत्यु दे दिजिए और किसी की बलि ना ले ।
भूखी माता - ठीक है महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य समर्पित हो जाते है किंतु भूखी माता उन्हे कहती है सम्राट उठो हम आपका आभार नहो खा पाएंगे इतने धर्मातमा व्यक्ति की तो रक्षा की जाती है । हम आपको वरदान देंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँ अगर आपको वरदान ही देना है तो आप नगर की सीमा के बाहर क्षिप्रा के पार चली जाइए पूरा नगर आपकी वहीं पूजा करेगे वह मिठाई का प्रसाद चढेगा । 
भूखी भाता - राजा हो तो तुम्हारे जैसा किसी के साथ अन्याय नही किया । 

आज भी उज्जैनी में भूखी माता का मंदिर है ।
सम्राट विक्रमादित्य एक समय अपने मित्र से मिलने जबलिपुरम् ( जबलपुर ) गए थे । वहां से लौटते वक्त सम्राट विक्रमादित्य का रक्ष तेज गति से जा रहा था उन्होंने गणेश जी की प्रतिमा देखी । तो अपना रथ रुकवाया । उन्होंने गणेश जी की प्रतिमा उठाने का निर्णय लिया । 
सेनापति - सम्राट क्या हुआ । आप यह प्रतिमा मत उठाइए हो सकता है किसी की हो 
सम्राट विक्रमादित्य - नही यह किसी की नही है । सेनापति हमें लग रहा है की इस प्रतिमा में कुछ तो खास है । हमें इसे उज्जैनी लेकर चलेंगे वही भव्य मंदिर बनवाएंगे ।
" सम्राट विक्रमादित्य जैसे ही प्रतिमा को रथ पर अपने पास रखते है रथ आगे ही नही बढता तभी विक्रमादित्य आखें बंद करके कहते है हे चितां हरने वाले गणेश आप हमारी इस चिंता को हरे । उनके इतने कहने मात्र से गणेश जी प्रकट हो जाते है राजन् जितना सुना उससे कही अधिक पाया आपको । अब हम आपकी नगरी में ही बसेंगे चिंतामण गणेश नाम से । सम्राट विक्रमादित्य - जी अवश्य हम आपको उज्जैनी ले जाएंगे ।

सम्राट विक्रमादित्य की एक बार परीक्षा लेने स्वंय ब्रह्मा जी आए थे संत का वेश बनाकर ।
ब्रह्मा जी - सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवन् आप । 
ब्रह्मा जी - यह कैसे संभव है अपने हमें कैसे पहचान लिया । 
सम्राट विक्रमादित्य - एक भक्त की नजर से देखिए जरूर पहचान लेंगे ।
ब्रह्मा जी - आपकी कीर्ति से तो ब्रह्मलोक भी अछूता नही रहा । आपकी नगरी के बारे में कहते है की यहां मंदिर कभी खत्म नही होते ।
सम्राट विक्रमादित्य - परम पिता हमने यहां इतने मंदिर बनाए जिनकी कोई गणना नही ना ही हमारे नगर में कभी धर्म का अभाव होगा ।
ब्रह्म जी - हम आपकी परीक्षा लेंगे वह आपको शाम को बताएंगे ।
ब्रह्मा जी - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप ब्रहमांड के सबसे बडे भक्त है हम यह उपाधि आपको देते है । हमने अपने कमंडल में चावल के दाने रखे हर मंदिर में एक दाना चढाया दाने खत्म हो गए पर मंदिर नही । आपकी यह उज्जैनी मंदिरों की नगरी है । सम्राट विक्रमादित्य आपको आज हम जगत का सबसे बडा ईश्वरी भक्त कहते है । हमें आप पर गर्व है इतनी शक्ति इतने वरदान के बाद भी आप भटके नही सदैव न्याय पर अडिग रहे ।
सम्राट विक्रमादित्य - परम पिता परमात्मा आपके श्री चरणों में हमें स्थान मिला यही हमारे लिए गर्व की बात है । 

" इसी प्रकार जब एक दिन सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में चर्चा हुई की भगवान हनुमान और भगवान परशुराम आज भी जीवित है तभी विक्रमादित्य कहते है हनुमान जी से तो हमारी भेंट हो चुकी है भगवान परशुराम के दर्शन हो जाए तो जीवन सफल हो जाए "
सम्राट विक्रमादित्य महेन्द्र गिरी पर्वत जाते है । वह गुफा के बाहर भगवान परशुराम के नाम का जप करते है लगातार करते है पूरे दिन वह रात्री तक । सुबह ब्रह्म मुहूर्त में भगवान परशुराम का ध्यान टूटता है वे नाम जप देखकर कहते है कोई हमसे मिलने आया है "
भगवान परशुराम - लडो राजपुरूष ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवन् आप आपके दर्शन पाकर हमारी धर्म यात्रा पूरी हुई ।
भगवान परशुराम - आप कौन है देव ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रभु देव नही हम तो उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है । 
भगवान परशुराम - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप । तभी हम सोचे राजपुरूष होकर भी हमारी प्रार्थना वह इतनी विनम्रता तो सिर्फ आप ही में हो सकती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - सब आपकी ही कृपा । परशुराम जी एक प्रश्न था हमारे मन में अगर इस प्रश्न का उत्तर हमें मिल गया तो हम हमारा जीवन सफल मानेंगे और आपसे उचित उत्तर हमारे प्रश्न का कोई दे ही नही सकता ।
भगवान परशुराम - अवश्य । प्रश्न करो सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवान आप तो स्वंय ही धर्म के रक्षक है आपने धर्म की रक्षा के लिए 21 बार धर्मयुद्ध लड़ा हम उस युद्ध को सही मानते है हम आपकी जगह होते तो भी यही करते क्योकि आपने किसी जाति वंश नही आपने सिर्फ धर्म की रक्षा की । प्रभु क्या हमने भी जीवन भर संतों का सम्मान किया ? सदैव ब्राह्मणों का सम्मान किया , क्या हमने कभी भी धर्म आधारित कार्य करने में कभी भी कोई भेदभाव किया ? क्या हमने प्रजा प्रजा में कभी भी भेद किया ? बताइए प्रभु हमें ।
भगवान परशुराम - सम्राट विक्रमादित्य हमें यही आशा थी कि आप हमारे धर्मयुद्ध को धर्मयुद्ध ही कहेंगे । सम्राट विक्रमादित्य आपने संतों का सदैव सम्मान किया आप सर्वश्रेष्ठ विद्वान होने के बावजूद आपने सभी विद्वानों का सम्मान किया है । आपसे बड़ा ब्राह्मणों का सम्मान कोई कर ही नही सकता आपने ब्राह्मण पत्नी की रक्षा के लिए अपना जीवन भी न्योछावर क दिया , आप ब्राह्मणों के रक्षक है । आपने कभी भी धर्म आधारित कार्य में अथवा प्रजा प्रजा में कभी भेदभाव नही किया सम्राट विक्रमादित्य । आपने ब्राह्मणों से आशीर्वाद लिया , क्षत्रियों को साथ में रखकर सदैव धर्म का पालन करवाया , आपने वैश्य व्यापारी पर अन्य राजाओ की तरह केवल कर नही लगाए आपने व्यापारियों को सदैव मार्गदर्शन देकर उन्हे सहयोग किया , आपने शूद्रों का भी सदैव ध्यान रखा उन्हे कभी अन्न की समस्या नही आने दी । आपके राज्य में कभी भेदभाव नही हुआ आप धर्म के प्रतिक है ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवान परशुराम जी हमारा जीवन सफल हो गया हमने सदैव सब को एक सम्मान धर्म पर चलाया हमें यही जानना था और आप ही हमें उत्तर दे सकते थे ।
भगवान परशुराम - सम्राट विक्रमादित्य हमारे पास आइए । हम आपको अपने रक्त से आपको विजय तिलक लगाते है । यह तिलक आपके मस्तक पर सदैव रहेगा आप सदैव विजय रहेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - बहुत बहुत धन्यवाद भगवान परशुराम जी आपका यह आशीर्वाद हम पर सदैव रहेगा ।

तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने भगवान की भक्ति केवल दर्शन के बाद बंद नही की वे अलग अलग भगवान वह उन सब की कृपा के पात्र बने रहे । उन्होंने ईश्वर को भी गर्व करने पर मजबूर कर दिया । उन्होंने भगवान के ह्दय में जगा बनाई ।

तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य 
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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