बत्तीसवा गुण भगवान

।। बत्तीसवा गुण भगवान ।।

" आप सभी सोच रहे होंगे की यह आखिरी गुण भगवान नाम से क्यो है क्योकि बत्तीस गुण जिनमें होते है वो भगवान के बरोबर हो जाता है । विक्रमादित्य महान तपस्वी और योगी थे उनके दर्शन मात्र से मनुष्य का कल्याण होता था । इस गुण में सम्राट विक्रमादित्य के भगवान वाले गुण की कथा है आप अवश्य पढें "

एक दिन की बात है जब चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपने राज दरबार में कहते है प्रजा जनों हम 108 वर्ष पूरे होते ही चले जाएंगे स्वर्ग लोक हमें मृत्यु नही आएगी हम सशरीर जाएंगे । आपसे इसलिए कहा की हम 6 माह पूर्व पूरी पृथ्वी को सुचित करके जाएंगे ताकि आप सभी का प्रेम हमें प्राप्त हो ।
प्रजा जन - सम्राट महाकाल से प्रार्थना है कि वो दिन कभी आए ही नही वरना उज्जैनी और आपका यह मालवा राज्य और पृथ्वी अनाथ हो जाएगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी के प्रेम और समर्पण से ही हमें इंद्र देव के सिंहासन से भी महान हमारी उज्जैनी लगती है । हमें तो स्वर्ग का राजा बनने की जगह उज्जैनी का राजा बनने का गर्व है । 

सम्राट विक्रमादित्य वन में संतों के आशीर्वाद के लिए जा रहे थे । उन्हे एक हिरण मिलता है वो उनसे कहता है महाराज हमारी मदद करो । सम्राट विक्रमादित्य मन में विचार करते है की यह हिरण मनुष्य की तरह कैसे बात कर रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन हो तुम ।
हिरण - महाराज प्रणाम ।
सम्राट विक्रमादित्य - खुश रहो अपना परिचय दो ।
हिरण - महाराज मेरा नाम भंवर सिंह है में एक राजकुमारी हूं । में एक दिन हिरण का शिकार करने निकला था । और मैने शब्द भेदी बाण चलाया किंतु वह तीर हिरण को नही लगा अपितु संत के पास जाकर लगा उनकी तपस्या टूट गई और उन्होंने मुझे श्राप दिया की में जिसका शिकार करने निकला था उसी की तरह बन जाऊंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - कभी भी शब्द भेदी बाण बिना पूर्ण सीखे नही चलाना चाहिए इतिहास में दशरथ , पांडू जैसे वीर योद्धा भी शब्द भेदी बाण गलत तरह से चलाने की वजह से श्राप के भागी बने थे । हमने आज तक शब्द भेदी बाण कभी गलत तरह से नही चलाया । कानो को इतना परिपक्व रखना होता है जो मनुष्य अथवा पशु यहां तक की हवा की गति भी समझले वो होती है शब्द भेदी बाण विद्या । 
भंवर सिंह - आपने उचित ही कहा महाराज । महाराज फिर हमने उनसे क्षमा मांगी तब उन्होंने कहा जिस दिन महाराज विक्रमादित्य के दर्शन हो जाएंगे उस दिन तुम मनुष्य की तरह बोलोगे क्योकि महाराज विक्रमादित्य पाप पुण्य श्राप सब से परे हो गए है विश्व में एकमात्र उन्हे ही भगवान का दर्जा प्राप्त है । जिस प्रकार ईश्वर के दर्शन से श्राप से मुक्ति मिलती है वैसे ही आपके दर्शन से हमें श्राप से मुक्ति मिलेगी । महाराज आप उनके पास चलिए हम इस श्राप से छुट जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें उन मुनी के पास ले चलो । 
भंवर सिंह - जी महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम योगीराज ।
मुनि - सम्राट विक्रमादित्य आप । हम आपके दर्शन के लिए ही तपस्या कर रहे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारे दर्शन किंतु हम तो आम व्यक्ति है ।
मुनि - नही महाराज आप पहले थे अब नही है आपने अपने कर्मो से ईश्वरीय तत्व प्राप्त कर लिया है । हमें सपने में देवताओं ने कहा की आप देवो के देव है , भगवान देवराज इंद्र के चहेते है , आपके दर्शन करना अर्थात् भगवान इंद्र के दर्शन करने से कम नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मांगों योगी राज वरदान मांगो ।
मुनि - सम्राट विक्रमादित्य आप यह मुंगा दे दिजिए जिससे हमारी जो इच्छा होगी वह हमें मिल जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह लिजिए । और अब भंवर सिंह को ठीक कर दिजिए । 
मुनि - धन्यवाद सम्राट । जी अवश्य । 
भंवर सिंह - महाराज बहुत बहुत धन्यवाद ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब भंवर सिंह हमारी शिक्षा को सदैव याद रखना और कभी किसी निर्दोष पर वार मत करना अब तुम जाओ तुम्हारे माता पिता परेशान होंगे ।

मुनि - सम्राट आपकी प्रतिक्षा और भी कई लोग कर रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन मुनिवर ।
मुनि - हमारी तरह ही सैकड़ो संतों का मानना है आप अब ईश्वर की तरह बन चुके है । आप आइए हमारे साथ ।

मुनि - आइए सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी ।
मुनि - सम्राट आज अमावस्या है और सभी संत धर्म यात्रा पर जा रहे थे किंतु मौसम खराब होने की वजह से यह सभी अमावस्या से पहले वहां पहुच नही सके । अब वे सभी इस विकराल रात्री में बिना रोशनी के ना खाना पका सकते है ना विश्राम कर सकते है । किंतु सभी की आप में अपार श्रद्धा है आप ही अपने भक्तो की सहायता करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम अवश्य करेंगे । 
मुनि - ऋषि गण सम्राट विक्रमादित्य आ चुके है ।
ऋषि गण - प्रणाम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम आप सभी को । मुनिवर ने बताया आप सबको हमारी सहायता चाहिए । आप हमें बताएं ।
ऋषि गण - सम्राट हम आप सभी के अपार वह अनन्य समर्थक है । हमारी आपसे विनती है आप हमारे साथ भोजन करे आपके तेजस्वी रूप के दर्शन करना चाहते है वह आप सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पहले स्नान करके हमें धन्य करे तत्पश्चात हम स्नान कर पवित्र होना चाहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप तो सभी ऋषि है हम आपसे पहले कैसे स्नान कर सकते है ।
ऋषि गण - नही महाराज आप तो धर्म के प्रतिक है आपके स्नान के पश्चात ही हम स्नान करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य आपके स्नेह से हम अति प्रसन्न है । आप सभी का कल्याण हो ।

" सम्राट विक्रमादित्य अपने तेजस्वी रूप को यौग शक्ति से जागृत करते है सभी ऋषि गण उस तेज से अमावस्या की रात को पूर्णिमा की तरह अनुभव करते है । सम्राट विक्रमादित्य सभी संतों के साथ भोजन करते है वह रात्री जागरण करके सभी संतों की रक्षा में पहरा देते है । वह सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके ऋषि गण के स्नान तक तत्पश्चात सभी को विदा करते है । सभी ऋषि गण भी सम्राट विक्रमादित्य से कहते है बिलकुल ब्रह्मा विष्णु शिव की छवि है आपके भीतर । आपको मानने से ना केवल मुक्ति मिलेगी अपितु जीवन जीने के आदर्श भी प्राप्त होंगे । आपका यश युगों युगों तक रहेगा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज ।

" तो साथियों ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने एक सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लेकर अपने कर्मो से ईश्वरी पद प्राप्त किया । ईश्वर के अवतार ईश्वर ही होते है वे कुछ भी कर सकते है किंतु एक आम मनुष्य के लिए यह अलग कार्य होता है । चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हम सभी के लिए प्रत्यक्ष उदाहरण है अगर हम उनके विचारों पर चलकर आगे बढे तो हम भी यह पद प्राप्त कर सकते है "

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य


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