बाईसवा गुण यश कीर्ति
।। बाईसवा गुण यश कीर्ति ।।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपने नए महल में टहल रहे थे वृक्षों को निहार रहे थे तभी उन्हे आवाज आई बचाओ बचाओ । सम्राट विक्रमादित्य तुरंत उस आवाज की तरफ भागते है तो उन्हे एक परिवार दिखता है जो क्षिप्रा नदी में डूब रहा था । सम्राट विक्रमादित्य क्षिप्रा जी में जाकर उन सभी को बचाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी कैसे डूब रहे थे क्या हादसा हुआ आपके साथ ।
विप्रदास - महाराज मेरा नाम विप्रदास है और यह मेरी पत्नी और मेरा बेटा । हम लोग बहुत गरीब है अपनी गरीबी की वजह से ही हम लोगों ने डूब कर मर जाने का प्रयास किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - आत्महत्या तो पाप है आप सभी को ऐसा नही करना चाहिए ।
विप्रदास - मगर महाराज हमारी स्थति बहुत खराब थी इसलिए हमने यह निर्णय लिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम तीनों हमारे साथ चलो । हमारे महल में अतिथि सत्कार करेंगे हम तुम्हारा ।
विप्रदास की पत्नी - महाराज हम बहुत ही गरीब है हमारे शरीर से दुर्गंध आ रही है आपके महल में हमारा मजाक उडाया जाएगा । हम आपके महल में रहने लायक नही है महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारे होते हुए तुम्हारा कोई अपमान नही करेगा तुम सभी चलो हमारे साथ । तुम जैसे चाहो वैसे रहना ।
" राजमहल जाने के बाद विप्रदास और उसकी पत्नी और बच्चे राजमहल में भी झोपड़ी की तरह व्यवहार करते है वे इतना हारा खाना देखकर आधा आधा खाकर आधा भोजन बिगाड़ देते है "
रसोइया - ठीक से खाओ तुम्हारा भोजन कोई नही ले रहा है अच्छे से खाओ ।
विप्रदास का बेटा - हम तो ऐसे ही खाते है क्या करोगे ।
" उसके पश्चात विप्रदास और उसका बेटा रहने की जगह पर ही दांत साफ करते है । वह बाहर बरामदे में सैनिक टहल रहे थे होते वे एक दूसरे से कहते है यहां आकर सुकून मिलता है वृक्षों के पास आकर गहरी सांसें लेकर तभी उन्हे बहुत बदबू आती है । अरे बाप रे इतनी बुरी बदबू वो भी महल के अंदर से । चलो अंदर जाकर देखते है । तभी एक सैनिक कहता है महाराज के अतिथि जहां मन कर रहा है वही शौच और मल कर रहे है "
वहीं विप्रदास और उनका परिवार रसोई में खाना बनते बनते उसे चखते है झूठा करते है ।
हलवाई - अरे यह क्या रह रहे हो तुम लोग यह भोजन हम सब जाएंगे ।
विप्रदास - तो क्या ये ले तू भी खा ।
और जबरदस्ती उनके मुह में खिला देते है ।
हलवाई रो रो कर महाराज विक्रमादित्य के पास जाते है ।
हलवाई - महाराज महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - बोलो महाराज क्या हो गया रो क्यो रहे हो ।
हलवाई - सम्राट आपके मेहमानों ने गर्म खिचड़ी से भरा पात्र मेरे मुह पर फेक दिया । महाराज मुझे पीडा हो रही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - उनकी तरफ से हम आपसे माफी मांगते है वो महल उन लोगों के लिए नया है धीरे धीरे हमारे तरीके सीख जाएंगे ।
सेवक - सम्राट वो तो नही सीखेंगे पर हम जरूर अपने तौर तरीके भूल जाएंगे । सम्राट हम क्षमा चाहते है अब हम उनकी सेवा नही कर पाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - कोई बात नही आप सभी क्षमा मत मांगिए वैसे भी वो हमारे अतिथि है हम उनकी सेवा करेंगे । विप्रदास विप्रदास ।
विप्रदास - सम्राट आपके सभी सेवक चले गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम आए है तुम्हारी सेवा के लिए । बताओ क्या सेवा कर सकता हूं तुम्हारी ।
विप्रदास - मेरी मालिश कर दो ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक है ।
विप्रदास - महाराज आप अच्छी मालिश करते है । आज मुझे वर्षो बाद नहाने का मन हो रहा है मेरे लिए गर्म पानी ले आओ मुझे नहला दो ताकि मेरी दुर्गंध दूर हो जाए ।
सम्राट विक्रमादित्य - जरूर ।
सम्राट विक्रमादित्य पानी लाते है और उसे नहलाते है । तभी वो गरीब ब्राह्मण देवता के रूप में प्रकट हो जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप कौन है ? आप तो गरीब ब्राह्मण विप्रदास नही लगते ।
" चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य में वरूण देव हूं । और वो मेरी पत्नी और मेरा नटखट बेटा "
वरूण देव की पत्नी - सम्राट चारो तरफ देखे जहां जहां हमने गंदगी की वहां वहां हीरे रत्न आ गए है ।
वरूण देव का पुत्र - हा महाराज क्योकि यह तो कभी गंदगी थी ही नही सभी हीरे मोती हो गए ।
वरूण देव - हा राजन् एक दिन हम सभी स्वर्ग में बैठे थे वहां हमारे राजा देवराज इन्द्र आपकी यश कीर्ति की बाते कर रहे थे । आपका यश तीनों लोकों में है । में आपकी परीक्षा लेने आया था । आपका धैर्य , आपका अतिथि सत्कार यही आपके यश कीर्ति का कारण है । आप धन्य है महाराज , आपका बारे में जो सुना वैसा ही पाया ।
सम्राट विक्रमादित्य - बहुत बहुत धन्यवाद वरूण देव आप सभी का ।
वरूण देव के पुत्र - पिताजी जब हम कोई अच्छा कार्य करते है तो आप हमें वरदान देते है तो महाराज को भी दिजिए ।
वरूण देव - क्यो नही पुत्र । सम्राट विक्रमादित्य बताइए हम आपको वर देना चाहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी देवताओं और सभी ईश्वर की हम पर कृपा है हमें अपने लिए कुछ नही चाहिए किंतु हम हर वरदान प्रजा के लिए जरूर मांगते है । आप हमें वर दिजिए की मालवा में हमेशा तीन फसल हो ।
वरूण देव - सम्राट विक्रमादित्य आपके राज्य मालवा में तीन फसल होगी और गर्मी के समय में भी वर्षा होती रहेगी जिससे तीसरी फसल भी अच्छी होगी । किंतु मौसम की वजह से कोई बीमार नही होगा । किंतु जब तक आपको याद किया जाएगा तब तक ही यह वरदान रहेगा जब लोग आपको भूलेंगे या जानबूझकर आपको नही मानेंगे उस दिन यह वरदान विलुप्त हो जाएगा । आपका यश युगों युगों तक रहेगा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
"तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिनके लिए हर वरदान प्रजा हित में होता था "
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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