इकतीसवा गुण ज्ञान

।। इकतीसवा गुण ज्ञान ।।

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपने राज दरबार में बैठे थे वहीं पर चारों दिशाओं के शंकराचार्य का आना हुआ । सम्राट विक्रमादित्य उनका भव्य स्वागत करते है । वह उनसे आशीर्वाद लेने के लिए उठते है ।

शंकराचार्य - नही राजन् कृपया उठे ना हम आपको आशीर्वाद देते है किंतु आपने वो पद पा लिया जो सभी से परे है । हम तो यहां आपसे वो लेने आए है जो हमारे पास भी नही है इसलिए आज आप ही हमारे गुरू होंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - परम पूजनीय शंकराचार्य जी हम आपको क्या दे सकते है हम तो आप सभी के सेवक है आप आदेश करे हम आपको सबकुछ दे देंगे ।
शंकराचार्य - सम्राट हम चारों अलग अलग प्रश्न से परेशान है हमने ईश्वर से भी इन प्रश्नों के उत्तर मांगे किंतु ईश्वर ने अपने अवतार से जुडे रिश्तो के नाम पर हमें कहा की हम उत्तर नही दे पाएंगे । किंतु इन उत्तरों का मिलना बहुत आवश्यक है मानव जाति के कल्याण के लिए । और जिन प्रश्नों का उत्तर हमें ईश्वर ने नही दिया ऐसे प्रश्नों का उत्तर देवताओं से मिलना भी मुश्किल है और चुंकी आप न्याय प्रिय है आपने अपने न्याय से देवताओं तक का न्याय कर दिया । आप जैसे ज्ञानी युगों बाद होता है जो अपने जीवन में एक भी गलती नही करता है इसलिए आप ही इन प्रश्नों के उत्तर दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी स्थान गृहण करे । और आपने हमें इस लायक समझा यह हमारे लिए हर्ष का विषय है । आप निश्चिंत होकर प्रश्न कीजिए । हम वही उत्तर देंगे जो होगा हम सत्य और न्याय करते समय किसी का भय नही देखते । हमने देवताओं का न्याय करने में भी परहेज नहीं किया जबकि हमें पता था की हमारे साथ अन्याय होगा किंतु सत्य के लिए हमें मिट जाना भी संभव है । आप प्रश्न करिए ।
शंकराचार्य - जी सम्राट हम जानते है आप ही उत्तर दे सकते है ।

बद्रीनाथ धाम शंकराचार्य अपना प्रश्न पूछते है ।
शंकराचार्य - भगवान परशुराम ने 21 बार क्षत्रियों का संहार किया । धर्म कहता है उन्होंने सही किया किंतु कुछ विचारक उन्हे हिंसक भी कहते है । क्षत्रिय समाज क्या समझे इसे । इस प्रश्न का उत्तर इसलिए भी आवश्यक है कि भगवान परशुराम को समाज जन किस रूप में पूजें ।
सम्राट विक्रमादित्य - भगवान परशुराम ईश्वर रूप में ही पूजें जाने चाहिए । भगवान परशुराम ने 21 बार निरंकुश क्षत्रियों का अंत किया अगर वे सबको मारते तो रघुवंश और भरतवंश कैसे आता है । भगवान परशुराम का तो अपमान सोचना तक नरक जाने के पाप के समान है । भगवान परशुराम ब्रह्म के प्रतिक है हमें तो उस क्षत्रिय राजा पर शर्म आती है जिन्होंने अपना राज पाट होने के पश्चात भी भगवान परशुराम के पिताजी ही हत्या कर दी । ब्राह्मण और संतों को तो दान देना चाहिए किंतु उस क्षत्रिय राजा ने गलत किया । इसलिए उसे दंड मिला जो आवश्यक था । भगवान परशुराम सदैव पूजनीय रहेंगे । भगवान परशुराम को सभी समाज को पूजना चाहिए उससे हमें संत और ब्राह्मणों का सम्मान करने का महत्व याद रहेगा । भगवान परशुराम तो त्रिकाल दर्शी थे वे जानते थे कश्यप ऋषि उनसे धरती दान में लेकर क्षत्रियों को दे देंगे किंतु भगवान परशुराम ने फिर भी सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर दी । ब्राह्मण को दान देना राजा का सौभाग्य है । परम पूजनीय शंकराचार्य जी भगवान परशुराम सदैव पूजनीय थे और रहेंगे उनके धर्म के प्रतिक होने की वजह से ही वे एक मात्र विष्णु अवतार है जो जीवित है श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी जाना पडा किंतु भगवान परशुराम यही है ।
शंकराचार्य - अद्भुत सम्राट आपके उत्तर से सभी संतुष्ट है आपने हमारा मार्गदर्शन कर दिया अब हम मठों के माध्यम से भगवान परशुराम के विषय में आम जन को जागृत कर पाएंगे।

द्वारकापुरी धाम शंकराचार्य प्रश्न पूछते है ।
शंकराचार्य - सम्राट प्रभु राम के पिता होने के बावजूद राजा दशरथ की इतनी पीडादायक मृत्यु क्यो हुई ।
सम्राट विक्रमादित्य - वो इसलिए परम पूजनीय शंकराचार्य जी क्योकि राजा दशरथ शब्द भेदी बाण विद्या में पूर्ण निपुण नही थे फिर भी उन्होंने उसका उपयोग किया और श्रवण कुमार जैसे धर्मातमा को मारा । वैसे राजा दशरथ पाप तो करने ही जा रहे थे श्रवण कुमार नही तो किसी पशु को तो वे मारते ही जब उन्हे जीवित करने का अधिकार नही है तो मारने का भी अधिकार किसने दिया है । उन्होंने उस दिन तीन पाप किए धर्म के प्रतिक ब्राह्मण कुमार श्रवण कुमार और उनके माता पिता की हत्या की । इसलिए धर्मातमा होने के बावजूद भगवान श्रीराम के पिता होने के बावजूद उनकी मृत्यु बहुत दर्द और पीडा में हुई । जब पाप करीब आया तो भगवान भी साथ नही दे पाए जैसे राम जी वनवास चले गए । राजा दशरथ पुत्रवियोग में मृत्यु को धारण किया । इसलिए आप चाहे अपनी भक्ति से ईश्वर के पिता बन जाए या पुत्र किंतु आपका पाप आपका साथ नही छोडता इसलिए मानव हो या पशु पक्षी हमें किसी को मारने का अधिकार नही । बाण चलाना सिखना है तो दूर फल रखकर उस पर चलाओ किसी के प्राणों से खेलना महापाप है । पाप आते ही इश्वर भी साथ छोड कर चले जाते है।
शंकराचार्य - अति उत्तम उत्तर आपके अतिरिक्त इस उत्तर को देने का साहस किसी में नही ।

जगन्नाथ धाम शंकराचार्य प्रश्न पूछते है ।
शंकराचार्य - महाभारत युद्ध किसका गलती से हुआ था ।
सम्राट विक्रमादित्य - महाभारत युद्ध होने में सबसे बडी वजह थी दिग्गजों का शांत रहना । सर्वप्रथम क्षत्रिय का कर्तव्य होता हे धर्म की रक्षा करना वह प्रजा के हित में कार्य करना किंतु धर्मराज युधिष्ठिर ना जाने किस सोच विचार धारा के थे की उन्होंने जुए जैसे खेल का निमंत्रण स्वीकार किया । में सबसे बडी गलती युधिष्ठिर की इसलिए मानता हूं की अपने राज पाठ को कौन दाव पर लगाता है उस राज्य पर युधिष्ठिर का अधिकार नही था ना केवल पांडवों का उस राज्य पर अधिकार था वहां की जनता का जिन्हे बिना विश्वास में लिए उनका राज्य दाव पर लगाता गया । आखिर राजा क्यो नही समझते की राज्य उनका जन्म सिद्ध अधिकार नही राज उनको प्रजा की सुख सुविधा करने के लिए नियुक्त किया जाता है । युधिष्ठिर ने तो अपनी पत्नी तक को दाव पर लगा दिया जो अमान्य कृत्य है । वहीं फिर अन्य पांडवो की जिन्होंने उसका विरोध नही किया बडे भाई का सम्मान होता हे किंतु उसे धर्म अधर्म देखकर निर्णय लिया जाना चाहिए । पांडवों की खामोशी उनका अपराध है । तत्पश्चात भीष्म की भी गलती है व्यक्ति को ओर खासकर राजघराने से जुडे व्यक्ति को ऐसी प्रतिज्ञा नही लेना चाहिए जो राज्य के विरोध में हो । उन्होंने हाथ पर हाथ धरे द्रौपदी का अपमान होने दिया जबकि ऐसी घटना पर हर प्रतिज्ञा तोड़ने का प्रावधान है । वही धृतराष्ट्र की गलती है जिसने निरंकुश होकर अपने अयोग्य वह अधर्मी बेटे दुर्योधन को रोका नही । जबकि एक राजा के राज सिंहासन पर बैठने के पश्चात कोइ सगा संबंधी नही होता है । धृतराष्ट्र अपने कुल का कलंक रूपी राजा निकला । इन सभी की अपनी अपनी वजह से हुई गलती की सजा 5 करोड़ लोगो ने अपने प्राण देकर चुकाई महाभारत युद्ध में । 

रामेश्वर धाम शंकराचार्य जी का प्रश्न ।
शंकराचार्य - सम्राट हम आपसे वो पूछेंगे जिसे समझने में वर्षो तक हमें अध्ययन करना पढे या वेदों तथा उपनिषदों को पढना पढे किंतु सर्वेश्रेष्ठ उत्तर तब भी ना मिले । 
सम्राट विक्रमादित्य -हम पूरा प्रयास करेंगे वैसे तो हमारे वेद पुराण उपनिषद् में सभी उत्तर मौजूद है किंतु हां यदि उत्तर कम शब्दो में मिले तो वह बेहतर है । बताइए क्या जानना चाहते है आप ।
शंकराचार्य - जीवन और मृत्यु का सच ।
सम्राट विक्रमादित्य - जीवन और मृत्यु । जीवन उद्देश्य पाने का मार्ग है ।
शंकराचार्य - और मृत्यु ।
सम्राट विक्रमादित्य - मोक्ष का कारण ।
शंकराचार्य - तो धर्म क्या है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नीति और नियम का बंधन ।
शंकराचार्य - अगर बंधन है तो शांति है कहा ?
सम्राट विक्रमादित्य - परमात्मा के पास जिनका वास हम सब के भीतर होता है । एक अंधेरी गुफा जिसमें उतरने से व्यक्ति घबराता है डरता है संसार की चका चोंद छोड़ स्वंय के भीतर उतरना अति आवश्यक है परम पूजनीय शंकराचार्य जी । उस अंधेरी गुफा में उतरने के बाद ही प्राप्त होगा वह स्वर्णिम प्रकाश और पूरा होगा मनुष्य के जीवन का उद्देश्य ।
शंकराचार्य - तो जीवन चक्र क्या है ।
सम्राट विक्रमादित्य - अलग अलग अवस्थाओं के लिए नियत कर्मो को कुशलता से करना ही जीवन चक्र है पूजनीय शंकराचार्य जी ।
शंकराचार्य - आप तो बहुत ज्ञानवान है महाराज । समझाने का तरीका इतना आसान की एक मूर्ख वक्ति भी सहजता से समझ जाए । आपके ज्ञान के सामने तो हमारा ज्ञान धूल के बराबर है।

सभी शंकराचार्य हां सम्राट आप बहुत ज्ञानी महापुरूष है आपके पास हर प्रश्न का उत्तर है हमें हमारे प्रश्नों के उत्तर मिल गए सदैव खुश रहिए महाराज सदैव खुश रहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी संतुष्ट है यह जानकर प्रसन्नता हुई । आप सभी भोजन करके ही जाएंगे ।

शंकराचार्य - जरूर । आप भी पधारे ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य ।

तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट् विक्रमादित्य 
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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