बारवा गुण आत्मसम्मान

।। बारहवां गुण आत्मसम्मान ।।

राजा भोज जैसे ही 12 वी सीडी पर पहुंचते है तभी देवी प्रकट होती है । राजा भोज- प्रणाम देवी  आपका परिचय । देवी - में इस सिंहासन में आत्मसम्मान की प्रतिक हूं और आपको चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के आत्मसम्मान की कथा सुनाती हूं । पृथ्वी पर सभी देवता हर युग में अपना प्रतिनिधि राजा चुनते है पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए , और वो राजा पाताल लौक या कहीं से भी ए रही बुरी शक्तियों वह असुरो से संसार की रक्षा करते है ऐसे ही राजा को नरेंद्र अर्थात नरो में इंद्र की उपाधी मिलती है । इसलिए सम्राट विक्रमादित्य के समय में सभी देवता स्वर्ग में एकत्रित हुए थे अपना प्रतिनिधि राजा चुनने के लिए ।
देवराज इंद्र- देवों हम सभी यहां एकत्रित हुए है नरेंद्र के चुनाव का निर्णय करने के लिए । आप सभी बताए कौन है नरेंद्र की उपाधी के योग्य ।
मंगल देव- देवराज इंद्रप्रस्त के राजा उत्तमयोग वे वीर है वह असुरो को हराने की शक्ती रखते है ।
देवराज इंद्र- मंगल देव केवल वीर होने से कोई भी नरेंद्र की उपाधी धारण नही कर सकता वीर तो असुर भी होते है तीनों लोकों का प्रतिनिधि राजा वही हो सकता है जो आत्मसम्मानी हो जो आत्मसम्मान के लिए कभी हार ना माने जो आत्मसम्मान का प्रतिक हो ।
बृहस्पति देव - देवराज ऐसा तो पुरे ब्रह्मांड में केवल एक ही व्यक्ति है उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
देवराज इंद्र-  अगर आप सभी की यही सोच है देवों तो हमें इस प्रस्ताव को लेकर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के पास जाना चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा सुर्य देव को जल चढा रहे होते है तभी सभी देवता आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य-  प्रणाम देवों क्या आज्ञा है हमारे लिए ।
देवराज इंद्र- हम सभी देवों ने इस युग के लिए आपको हमारा प्रतिनिधि राजा चुना है जो आत्मसम्मान से भरपूर हो जिसने संसार के लिए सबकुछ त्यागा हो ऐसे तो केवल आप ही है जो आत्मसम्मान का मतलब जानता हो ऐसा संसार में आपके अलावा कोई नही जो जिसे इस पद पर बिठाया जा सके ।
महारानी चित्रलेखा - आप सभी देवो का धन्यवाद ।
देवराज इंद्र- धन्यवाद तो हमें सम्राट का करना चाहिए जिन्होने हमारे दिए हुए सिंहासन बत्तीसी का मान बढाया उसकी सुरक्षा की उस पर बैठ कर धर्म का उदय किया ।
सम्राट विक्रमादित्य-  धन्यवाद देवो अब आप हमें बताए हमें इसके लिए क्या करना होगा ।
इंद्र देव- आपको दशाशमेघ यज्ञ करना होगा जिससे चारों दिशाओं में अश्व जाएगा यदी वो अश्व सारे ब्रह्मांड में बिना रुकावट के हो आया तो हम आपको नरेंद्र की उपाधी देंगे और उस दिन से आप देवताओं वह इश्वर के धरती पर प्रतिनिधि कहलाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य-  जरूर हम करेंगे संसार के हित के लिए यह यज्ञ ।
देवराज इंद्र- यह यज्ञ केवल ऋषि वशिष्ठ राजपुरोहित ही करवा सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- मगर वो तो सतयुग में थे अब कहां मिलेंगे हमें ।
बृहस्पति देव- सम्राट विक्रमादित्य ऋषि वशिष्ठ अमर है और वो द्रोण की पहाड़ियों में आपको मिलेंगे आप पति पत्नी वहां जाए वह उनसे प्रार्थना करे ।
सम्राट विक्रमादित्य- धन्यवाद देवों ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट देवता आपको प्रतिनिधि राजा चुनकर गए यह तो हम सभी वह हमारी उज्जैनी के लिए गर्व का विषय है की सारे संसार का प्रतिनिधित्व उज्जैनी करेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य-  हां महारानी सभी देव हमें बहुत बड़ी बात कह कर गए है हमें इस कार्य में आपका भी साथ चाहिए ।
महारानी चित्रलेखा - हमारा सहयोग आपके साथ है ।
सम्राट विक्रमादित्य-  चलिए चलते है ऋषि वशिष्ठ के पास । महारानी देखिए यहीं है द्रोण पर्वत यही ऋषि वशिष्ठ के दर्शन होंगे ।
महारानी चित्रलेखा - मगर सम्राट यह पर्वत तो बहुत बडा है हम कहां खोजेंगे उन्हें ।
सम्राट विक्रमादित्य- इसके अलावा कोई मार्ग नही आइए खोजे उन्हें ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट ऋषि वशिष्ठ तो कही मिले ही नही रात हो गई पर वे मिले नहीं ।
सम्राट विक्रमादित्य- आपने सही कहा ऐसे वो मिलेंगे नही आइए हम अपनी आखें बंद करके उन्हें सचचे ह्दय से याद करे संसार में कुछ ऐसी चीजे होती है जो खुली आखों से नही दिखती ।
रघुकुल को अपने ज्ञान के प्रकाश से उज्ज्वल करने वाले ऋषि वशिष्ठ हमें दर्शन दिजिए ।
तभी एक रोशनी दिखती है ।
सम्राट और महारानी उस रोशनी से गुफा को ओर जाते है तभी वहां पर ऋषि वशिष्ठ नजर आते है।
 सम्राट विक्रमादित्य- चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा का प्रणाम स्वीकार करे ।
ऋषि वशिष्ठ- कल्याण हो । आपका यहां आने का कारण ।
सम्राट विक्रमादित्य- हम दशाशमेघ यज्ञ करना चाहते है कृपया आप हमारे साथ चले वह इसे पुरा करने में सहयोग दे ।
ऋषि वशिष्ठ- सम्राट इस यज्ञ को केवल वो ही दंपत्ति कर सकता है जिसके विचारों में कोई मतभेद ना हो जो अलग होकर भी एक हो जैसे राम सीता जो एक दूसरे का सम्मान करे जिसके हर विचार मिलते हो । सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा में आप दोनों से तीन प्रश्न करूंगा उससे पता चल जाएगा की आप वो दंपत्ति है या नही ।

ऋषि वशिष्ठ - सम्राट यदि आप दोनों ने तीनों प्रश्नों के उत्तर दे दिये तो में आपके साथ अवश्य चलूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य- जी ऋषिवर ।
ऋषि वशिष्ठ - पति पत्नी को एक दूसरे के किस हित की रक्षा करनी चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य- आत्मसम्मान की ।
ऋषि वशिष्ठ- वो क्या है जो पति पत्नी को एक दूसरे का पूरक बनाता है ।
महारानी चित्रलेखा- कर्म ऋषिवर ।
ऋषि वशिष्ठ- वो क्या है जो पति पत्नी के मध्य हमेशा विद्यमान रहना चाहिए ।
सम्राट विक्रमादित्य- विश्वास ।
ऋषि वशिष्ठ- आप दोनों ने मेरे प्रश्नों के उत्तर सही दिये में आपके साथ चलने को तैयार हूं और सम्राट विक्रमादित्य आप दोनो की जोड़ी सदैव बनी रहे ।

।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजा भोज यह सम्राट विक्रमादित्य के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि दशाशमेघ यज्ञ एक युग में केवल एक ही बार होता है और चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ही इस युग के पहले चक्रवर्ती सम्राट है दूसरा कोई नही केवल इतिहास में नाम के साथ चक्रवर्ती जोड देना चक्रवर्ती होना नही होता सम्राट विक्रमादित्य की तरह यज्ञ करके चक्रवर्ती सम्राट बनना होता है । राजा भोज- यह तो बहुत बड़ी बात थी । ।।

उधर ऋषि वशिष्ठ सम्राट से कहते है सम्राट यज्ञ का अश्व भेजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य- सेनापति अश्व लाओ ।
ऋषि वशिष्ठ- सम्राट विक्रमादित्य यह अश्व आपका प्रतिनिधि बनकर सम्पूर्ण धरती पर भ्रमण करके तीनों लोकों में भ्रमण करके आएगा यही इस यज्ञ का प्रमाण है ।
सम्राट विक्रमादित्य- जी ऋषिवर ।
ऋषि वशिष्ठ- सम्राट यह यज्ञ प्रारंभ हो चुका है यह यज्ञ तब तक चलता रहेगा जब तक अश्व सम्पूर्ण धरती दशो दिशाएं वह तीनों लोकों का भ्रमण करके नही आ जाता ।
प्रजा के बीच एक चर्चा चल रही होती है तभी अश्व  ( घोड़ा) उनके सामने से जाता है सभी कहते है यह तो दशाशमेघ यज्ञ का घोड़ा है प्रणाम करते है यह तो हमारे उज्जैन के लिए बहुत गर्व का विषय है की सम्पूर्ण ब्रह्मांड के सबसे महान राजा हमारे यहां से है ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य मन की आखों से कहते है हम पूर्वोत्तर के राज्यों को जीत चुके है और अब मगध में प्रवेश कर चुके है ।
मगध नरेश- जय हो सम्राट विक्रमादित्य की इस पृथ्वी पर केवल आप ही एक मात्र राजा है जो इस यज्ञ को पूरा कर सकते है जय हो सम्राट विक्रमादित्य की ।
सम्राट विक्रमादित्य- मगध से विदर्भ की ओर अश्व बड़ रहा है ।
विदर्भ नरेश- में सम्राट विक्रमादित्य के इस यज्ञ को कभी पूरा नही होने दूंगा ।
अश्व विदर्भ नरेश को पराजित करके झूका देता है ।
सम्राट विक्रमादित्य- विदर्भ जीत चुका है ।
सम्राट विक्रमादित्य- अश्व पूरी पृथ्वी जीत कर पाताल लौक में प्रवेश कर चुका है ।
पाताल नरेश- सैनिको हमें चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के घोड़े को किसी भी किमत पर जीतने नही देना है यदि विक्रमादित्य विजय हो गया तो हम राक्षसों का स्वर्ग पर अधिकार करने का सपना हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा और नरकासुर को हर हाल में स्वर्ग चाहिए चलो हमला करते है अश्व पर ।
सारे राक्षस मारे जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- हम पाताल में भी विजय हुए । यज्ञ के घोडे ने पाताल लौक को पराजित कर दिया ।
पाताल का राक्षस - सम्राट विक्रमादित्य तुम स्वर्ग को नही बचा पाओगे नरकासुर से हम स्वर्ग जितेंगे आज नही तो कल ।
सम्राट विक्रमादित्य- अश्व पृथ्वी और पाताल लौक को जीतेने के बाद अब स्वर्ग की ओर बढ रहा है ।
देवराज इंद्र- चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के अश्व का स्वागत है ।
तभी ऋषि विश्वामित्र आते है और कहते है देवराज इंद्र अब आप में इतना भी साहस नही बचा की आप एक मनुष्य के सामने हार जाए ।
देवराज इंद्र- ऋषिवर यहां हार जीत की बात है ही नही हम सभी देवता स्वंय चाहते है की उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हम सभी देवों के त्रिदेव के प्रतिनिधि राजा बने इसलिए हमने ही उनसे निवेदन किया की वे दशाशमेघ यज्ञ करे ।
ऋषि विश्वामित्र- क्या इसलिए की मनुष्य तीनों लोको पर राज करे मनुष्य को मुझसे अधिक आप शही जानते होंगे क्योकि मैने मनुष्य यौनी में जन्म लिया है मनुष्य अवसरवादी कुटिल होता है ।
देवराज इंद्र- मगर सम्राट विक्रमादित्य ऐसे नही है उन्होने तो धरती को बता दिया की एक मनुष्य कैसे होना चाहिए । सम्राट विक्रमादित्य और अन्य मनुष्यों में बहुत अंतर है अगर वो आत्मसम्मानी है तो परिक्षा दे सिद्ध करे अपने तेज को हम पकड़ेगे अश्व को ।
ऋषि विश्वामित्र- सम्राट विक्रमादित्य हम रोकेंगे तुम्हारा विजय रथ तुम्हारे नरेंद्र बनने का सपना तोड़ देंगे ।
ऋषि विश्वाम स्वर्ग से संदेश का तीर छोड़ते है ।
सम्राट विक्रमादित्य आपको मुझसे युद्ध करना होगा ।
ऋषि वशिष्ठ- सम्राट आपको चुनौती स्वीकार करके युद्ध करना होगा और आप विजय होंगे तभी यह यज्ञ पूरा होगा ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् यह चुनौती कोई सरल चुनौती नही थी ऋषि विश्वामित्र कोई आम संत नही थे क्षत्रिय होने के साथ साथ वे ऋषि भी थे इसलिए उनके स्वभाव में उग्रता तो थी ही अपितु ऋषि होने के कारण मंत्रो की शक्ति भी थी ऋषि विश्वामित्र कभी नही हारे थे और ना सम्राट विक्रमादित्य कभी हारे थे दोनों में से आज तक कोई हारा नही है । राजा भोज- मगर देवी सम्राट विक्रमादित्य तो एक धर्म कार्य कर रहे थे फिर ऋषि विश्वामित्र का यह स्वभाव सही नही था । देवी - ऋषि विश्वामित्र क्षत्रिय थे इसलिए उनके आत्मसम्मान पर यह बहुत बड़ी चोट थी उन्हें यह बिल्कुल अच्छा नही लगा की चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य देवताओं के प्रतिनिधि बने ।

देवर्षि नारद- ऋषि विश्वामित्र आपने इस अश्व को क्यों पकड़ा यह तो सम्राट विक्रमादित्य का अश्व है।
ऋषि विश्वामित्र- अगर में इस अश्व को नही पकड़ता तो धर्म की हानी होती अधर्म का विस्तार होता ।
नारद जी - यह क्या कह रहे है आप अधर्म यह सत्य नही है सम्राट विक्रमादित्य इस संसार में धर्म के प्रतीक है अपितु यह अश्व धर्म की रक्षा के लिए ही छोड़ा गया है ।
ऋषि विश्वामित्र- अगर यह यज्ञ सफल होता तो विक्रमादित्य में अहंकार आ जाता ।
नारद जी - सम्राट में कभी अहंकार नही आ सकता ।
ऋषि विश्वामित्र- सम्राट मेरी चुनौती में सफल होते है या नही इस से पता चल जाएगा ।
नारद जी - सम्राट आपकी चुनौती कभी स्वीकार नही करेंगे क्योंकि वो धर्म के प्रतिक है वो एक ऋषि के उपर शस्त्र नही उठाएंगे आप बहुत बड़ी गलती कर रहे है ऋषि विश्वामित्र आप बाद में बहुत पछताएंगे ।
ऋषि विश्वामित्र- देवर्षि आपने तो मेरा मार्गदर्शन कर दिया अब में ऋषि रूप में नही क्षत्रिय रूप में जाऊंगा ।
नारद जी - फिर तो आपकी हार तय है ठीक है आप जाइए कम से कम संसार अभिमान रूपक ऋषि विश्वामित्र और आत्मसम्मान के प्रतिक सम्राट विक्रमादित्य दोनो को देखकर संसार अवश्य कुछ सीखेगा ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य युद्ध की तैयारी करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- क्या हुआ महारानी आज आपके हाथों में वो शक्ति और चहरे पर वो उत्साह नही क्या हुआ है ।
महारानी चित्रलेखा- नही सम्राट हम इस बात से चिंतित है की आप उस योद्धा से युद्ध लड रहे है जिसे हमने कभी देखा नही ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी युद्ध में अकसर शत्रु नए ही होते है जिन्हें हमने कभी देखा नही आप चिंतित ना हो हमारे साथ धर्म है ।
महारानी चित्रलेखा - किंतु सम्राट ऋषि वशिष्ठ जी ने जो यज्ञ किया था वह उस अश्व में आपकी सारी शक्ति रखी थी यानी उस शत्रु में भी बहुत शक्तिया होंगी ।
सम्राट विक्रमादित्य- कोई बात नही महारानी युद्ध में पते चल जाएगा कौन विजेता है ।
ऋषि वशिष्ठ सम्राट विक्रमादित्य को तिलक लगाकर कहते है सम्राट यह युद्ध आपके जीवन का सबसे बड़ा युद्ध है क्योकि आप यह युद्ध जीतते है तो आप तीनों लोको के राजा वह तीनों लोकों के प्रतिनिधि बन जाएंगे अगर वो जीत गयि तो वो प्रतिनिधि बन जाएगा फिर ना जाने वो संसार में क्या करेगा सम्राट विक्रमादित्य आपको धर्म की रक्षा के लिए यह युद्ध जीतना ही होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य- हम ऐसा कभी नही होने देंगे आशीर्वाद दिजिए ।
ऋषि वशिष्ठ- विजय भव:।
उधर ऋषि विश्वामित्र भी अपने सभी मंत्रो और शस्त्रो का आव्हान करते है ।
ऋषि विश्वामित्र- अभी तक विक्रमादित्य आया क्यो नही लगता है युद्ध से पहले ही भयभीत हो गया ।
उसी वक्त रण में एक ध्वज आती है ।
ऋषि विश्वामित्र- यह क्या यह ध्वज तो विश्व विजय उज्जैनी धर्म ध्वजा है ।
सम्राट विक्रमादित्य- उज्जैनी के लोग कभी पीछे नही हटते आ गया हूं में ।
स्वर्ग से सभी देवता भी इस युद्ध को देखते है ।
ऋषि विश्वामित्र- विक्रमादित्य तुमने चुनौती स्वीकार करके अपने काल को आमंत्रित किया है ।
सम्राट विक्रमादित्य- यह तो वक्त बताएगा की मृत्यु किसे वर माला पहनाती है ।
उधर इंद्र देव कहते है देवर्षि मुझे तो बहुत चिंता हो रही है ऋषि विश्वामित्र के पास मंत्र और शस्त्र दोंनो है ।
देवर्षि नारद- जितनी कठीन परीक्षा होगी विजय उतनी ही सुखद होगी और आप क्यो चिंता करते है सम्राट विक्रमादित्य धर्म की ओर से लड रहे है और आप यह क्यो भूल रहे है जिसे आप तीनों लोको का राजा नियुक्त कर रहे है वो व्यक्ति युद्ध लड रहा है सम्राट विक्रमादित्य को कम आकना गलत है ।
युद्ध शुरू हो जाता है सम्राट विक्रमादित्य महज चार से पांच वार में ही ऋषि विश्वामित्र के शस्त्र गिरा देते है तभी ऋषि विश्वामित्र दैविक शक्ति का उपयोग करने लग जाते है तभी सम्राट विक्रमादित्य समझ जाते है की इन्हें कैसे पराजित करना है सम्राट विक्रमादित्य भी अपनी दैविक शक्ति का उपयोग करते है वो फिर ऋषि विश्वामित्र के उपर भारी पडते है तभी ऋषि विश्वामित्र गदा लेकर युद्ध करते है  सम्राट विक्रमादित्य उसमें भी भारी पढते है ।
उधर स्वर्ग में देवराज इंद्र कहते है अब में यकीन के साथ कह सकता हूं सम्राट विक्रमादित्य ही हमारे प्रतिनिधि बनने योग्य है जिस प्रकार से उन्होंने ऋषि विश्वामित्र की घेरा बंदी की ।
सम्राट विक्रमादित्य ऋषि विश्वामित्र को बूरी तरह युद्ध में हरा देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- विश्वामित्र अब तुम हार चुके हो पराजित हो चुके हो हमसे अब तुम्हारी कोई शक्ति काम में नही आएगी अब भलाई इसी में है तुम अपनी हार स्वीकार कर लो ।
तभी ऋषि विश्वामित्र अपने ऋषि वाले रूप में आ जाते है और सम्राट पर वार करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या यह तो ऋषि है हम एक ऋषि पर वार नही कर सकते यह तो अधर्म है ।

ऋषि विश्वामित्र बार बार वार करते है तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते है रूक जाइए हम आपका वार सहन कर रहे है इसका मतलब यह नही की हम कमजोर है आप ऋषि है और ऋषि पर वार करना हमारी सनातन धर्म की धरोहर नही । आप भली भाती जानते है कि इस युद्ध में पराजित कौन हुआ है ।
उधर महारानी चित्रलेखा भगवान शिव से प्रार्थना करती है हे महादेव सम्राट के आत्मसम्मान की रक्षा करना । तभी एक दासी कहती है महारानी सम्राट युद्ध में पराजित हो गए ।
महारानी चित्रलेखा - नही ऐसा नही हो सकता जरूर कुछ बात है ।
दासी - विश्वामित्र सम्राट को बंदी बनाकर महल में ला रहे है ।

।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है देखिए राजन् सम्राट विक्रमादित्य को आत्मसम्मान के लिए क्या कुछ करना पढा एक बात बताईए राजन् आत्मसम्मान और अहंकार में क्या अंतर है । राजा भोज- सबसे प्रमुख अंतर आत्मसम्मान के गुण है और अहंकार एक अवगुण , आत्मसम्मान इश्वर के समान है और अहंकार का अंत तो निश्चित है आत्मसम्मान प्रेम और विनय के सामने तो झूक जाता है किंतु छल के सामने वो पर्वत की तरह अडीग रहता है । देवी - वाह राजन् वाह आपने बिल्कुल सही विश्लेषण किया ऋषि विश्वामित्र मार्ग सा भटक गए थे वो अपने अहम को सिद्ध करने के लिए सम्राट विक्रमादित्य के आत्मसम्मान को खत्म करना चाहते थे ।
उधर विश्वामित्र उज्जैन नगर में सबके सामने कहते है में सम्राट विक्रमादित्य को दण्ड दूगा अब ।
महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य को गले लगा लेती है ।
ऋषि विश्वामित्र- देवी एक अपराधी के साथ सहानुभूति रखना अधर्म है हमें अपना राज धर्म निभाने दिजिए ।
महारानी चित्रलेखा - जो ऋषि ऋषि धर्म निभाना नही जानता वो राज धर्म क्या निभाएगा यदि आप एक सच्चे ऋषि होते तो आप एक धर्म निष्ठ और आत्मसम्मानी व्यक्ति का ऐसे अपमान नही करते मगर आप अपने अहंकार में चूर है ।
सम्राट विक्रमादित्य- शांत हो जाइए महारानी वो एक ऋषि है और ऋषि का अपमान हमारी संस्कृति नही आप एक वीरांगना है चिंता मत किजिए धैर्य रखिए । ऋषिवर आप अपनी कारवाई शुरू किजिए ।
ऋषि विश्वामित्र- तीनों लोको के स्वामि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य क्यो सही संबोधित किया ना आपको ।
सम्राट विक्रमादित्य- सही कहा आपने आज नही तो कल हम यह बनेंगे ही ।
ऋषि विश्वामित्र- सम्राट विक्रमादित्य में तुम्हे सबकुछ वापस दे सकता हूं अगर तुम मेरे चरणों में झूक जाओ ।
सम्राट विक्रमादित्य- हम झूकेंगे नही ऋषि । अगर आपके सम्मान में श्रद्धा में झूकना है तो जरूर झूकेंगे मगर आपके अहंकार और भय में झूकना है तो कभी नही झूकेंगे किसी किमत पर नही झूकेंगे ।
ऋषि विश्वामित्र- सैनिको विक्रमादित्य को बंदीगृह में बंद कर दो सैनिको तुम लोगो ने सुना नही हमने क्या कहा ।
सेनापति - हम अपने लोकप्रिय सम्राट विक्रमादित्य को हाथ भी नही लगाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य- कोई बात नही सेनापित आप हमे ले चलिए ।
उधर महल में ऋषि विश्वामित्र सिंहासन बत्तीसी को देखते है और कहते है तो यह है देवताओं द्वारा दिया हुआ अनमोल उपहार में देवताओं के सामने सिद्ध कर दूंगा की विक्रमादित्य में सब गुण होंगे पर आत्मसम्मान नही है ।
तभी ऋषि वशिष्ठ आते है कहते है विश्वामित्र ।
ऋषि विश्वामित्र- ऋषि वशिष्ठ आप ।
ऋषि वशिष्ठ- युग बदला समय बदला पर तुम अहंकार में अब भी चुर हो ।
ऋषि विश्वामित्र- ऋषि वशिष्ठ आप यहां अपने यजमान को बचाने आए है ।
ऋषि वशिष्ठ- में तुम्हे समझाने आया हूं समझ जाओ वरना तुम फिर सतयुग की तरह हारोगे जब नंदीनी गाय को ले जाते वक्त मुझ से हारे थे ।
ऋषि विश्वामित्र- आपको वजह से मुझे हारना पढा और आज भी आप ही है अब में सब हिसाब पूरा करूंगा ।
ऋषि वशिष्ठ- सम्राट विक्रमादित्य तो भगवान परशुराम की तरह है धर्म के रक्षक विश्वामित्र समझ जाओ वरना बहुत बुरे हारोगे क्योंकि इस बार तुमने आत्मसम्मान संसार के सर्वश्रेष्ठ पुरूष चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को ललकारा है आप बहुत पछताएंगे ।
उधर सेनापति वराहमिहिर जी और महारानी तीनों सम्राट विक्रमादित्य के पास आते है ।
सेनापति - सम्राट हम आपको ऐसे नही देख सकते आप हमारे राजा है ।
सम्राट विक्रमादित्य- में नही अब विश्वामित्र राजा है ।
सेनापति- हम उनकी आज्ञा का पालन नही करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य- हमारी आज्ञा है की आप उनके आदेश माने ।
वराहमिहिर जी - सम्राट यह हम कैसे कर सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- वराहमिहिर जी हमें खुद यह अच्छा नही लग रहा मगर विश्वामित्र एक ऋषि है और हमारे उज्जैनी की परम्परा है संतो का सम्मान करने की आप चिंता ना करे सब अच्छा होगा ।
महारानी चित्रलेखा रोती है तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते है महारानी वीर पुरूषो की पत्नियां पराजय पर रोती नही ।
महारानी चित्रलेखा - हम आपकी पराजय पर नही रो रहे है आप पराजित नही हुए है हम इस बात पर रो रहे है की आपकी पत्नी होने के बावजूद हम आपका दुख नही जान पा रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी आप रोइए नही हम आपको बताते है, महारानी हम पराजित हुए बीना ही पराजित हो गए क्योकि एक ऋषि पर शस्त्र ना उठाने का संकल्प है हां महारानी हमने उन पर शस्त्र ही नही उठाया ।
महारानी चित्रलेखा - हम यह सच्चाई अवश्य बताएंगे सबको हमें हमारे पति के आत्मसम्मान की रक्षा करनी ही होगी ।

विश्वामित्र- देवी आप यहां ।
महारानी चित्रलेखा - ऋषिवर हम क्षमा प्रार्थी है जो आपके महल में आने के बाद भी आपकी सेवा नही की कृपया आपके चरण पखारने की अनुमति दे ।
विश्वामित्र- अनुमति है । 
महारानी - ऋषिवर कृपया भोजन गृहण करे । 
विश्वामित्र- देवी आपके आतिथ्य भाव से हम प्रसन्न है ।
महारानी - यही हमारी उज्जैनी की परम्परा है इसी लिए सम्राट ने आप पर शस्त्र तक नही उठाया ।
विश्वामित्र- आप कहना क्या चाहती है ।
महारानी - बस यही की आपकी जो विजय हुई है वो विजय नही है ना ही सम्राट की हार सम्राट तो हार कर भी जीत गए वे हमेशा विजय ही रहे आपकी विजय केवल छल है आपने सम्राट के बाथ छल किया है और सम्राट आपका सम्मान करते है इसलिए वे चुप है ।
विश्वामित्र- अगर इतना ही सम्मान करते तो मेरे चरणों में झूक क्यो नही जाते क्यो अपनी झूठी शान में जी रहे है ।
महारानी- सम्राट आत्मसम्मान का पालन कर रहे है और आत्मसम्मान यानी इश्वर का सम्मान और चरित्रवान पुरूष कभी अंहकारी विचार के सामने नही झूक सकता सम्राट ऋषि विश्वामित्र के सामने सर झूका सकते है अंहकार में जी रहे विश्वामित्र के सामने नही ।
विश्वामित्र- तो दंड भुगतना पढेगा उनको कल के सुर्य उदय की प्रतिक्षा किजिए उनका आत्मसम्मान चुर चुर हो जाएगा ।
महारानी - हमें अपने पति के आत्मसम्मान पर बहुत गर्व है वो किसी के सामने नही झूकेंगे । 
उधर ऋषि वशिष्ठ से मिलने देवराज इंद्र समेत समस्त देवता गण आते है ।
देवराज इंद्र- ऋषि वशिष्ठ आप पुनः द्रोण पर्वत पर लौट आए क्या दशाशमेघ यज्ञ खण्डित हो गया , क्या चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हमारे प्रतिनिधि नही बन पाएंगे, बीत जाएगा यह युग बिना प्रतिनिधि राजा के । 
ऋषि वशिष्ठ- इंद्र देव ऐसा होगा इसकी सम्भावना नही के बरोबर है क्योंकि आशा का सुर्य अभी अस्त नही हुआ है जब तक सम्राट विक्रमादित्य का आत्मसम्मान है तब तक यह यज्ञ खण्डित नही होगा ।
देवराज इंद्र- और मुझे यकिन है की सम्राट विक्रमादित्य का आत्मसम्मान कभी खत्म नही होगा ।
ऋषि वशिष्ठ- इसलिए मैने आपसे कहा की आशा का सुर्य अभी अस्त नही हुआ है ।
उधर ऋषि विश्वामित्र कहते है विक्रमादित्य अंतिम बार कह रहे है आपसे की अपना निर्णय बदल दो ।
सम्राट विक्रमादित्य- कभी नही ।
ऋषि विश्वामित्र- सेनापति नौच लो इसके शरीर से सारे आभूषण छिन लो सारे राजकीय वस्त्र और बना दो इसे राजा से रंक ।
सम्राट विक्रमादित्य- सेनापित विश्वामित्र की आज्ञा का पालन करो ।
विश्वामित्र- विक्रमादित्य देख तेरे हठ ने तेरी क्या हालत कर दी है ना राज ना राजकीय वस्त्र सम्राट विक्रमादित्य आभूषण विहिन सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य- मनुष्य के सच्चे आभूषण उसके वस्त्र नही उसका चरित्र और आत्मसम्मान होता है ।
विश्वामित्र सम्राट विक्रमादित्य को काला टीका लगाते है और कहते है पूरी प्रजा देखेगी अब तुम्हे पालकी में ।
विश्वामित्र चौक जाते है पूरी प्रजा हाथ जोड कर खडी हो जाती है सम्राट के लिए ।
विश्वामित्र- देखो सभी यह अपनी रक्षा नही कर पाए और तीनों लौको के राजा बनने निकले थे ।
प्रजा - हमारे सम्राट नही हार सकते आपने छल किया है उनके साथ हम नही जाने देंगे अपने सम्राट और हम भी इस राज्य में नही रहेंगे हम भी अपने सम्राट के साथ जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य- नही आप सब ऐसा नही करेंगे आपके नए राजा भी अच्छे है वो क्षत्रिय तो है ही एक सिद्ध ऋषि भी है और प्रजा का पलायन करना राजा की कमजोरी माना जाता है आप ऐसा ना करे और हम जल्द आएंगे आप सबके बीच ।
विश्वामित्र- अरे मूर्ख छोड़ दो अपना हठ और झूक जाओ मेरे चरणों में भूल जाओ आत्मसम्मान, में अभी भी तुम्हे सबकुछ दे दूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य- कभी नही आत्मसम्मान हमारे लिए सबसे उपर है ।
विश्वामित्र- तो चले जाओ हमारे राज्य से ।
सम्राट विक्रमादित्य निकल जाते है तभी उन्हे महारानी चित्रलेखा दिखती है ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी आप यहाँ ।
महारानी चित्रलेखा- सम्राट जहाँ आप वहाँ हम ।
विश्वामित्र- देवी आपको यहाँ रहने की जरूरत नही है आप सम्मान के साथ महल में रह सकती है यह एक पराजित व्यक्ति है ।
महारानी चित्रलेखा - नही ऋषिवर जिस स्त्री के पति पर कलंक का काला टिका लगा हो वो सम्मान के साथ कैसे रह सकती है ।
विश्वामित्र- देवी जो जिस योग्य होता है उसे वो मिलता है ।
महारानी चित्रलेखा - गलत कह रहे है आप ऋषिवर ।
विश्वामित्र- तो फिर सही क्या है ।
महारानी चित्रलेखा - सही उस दिन होगा जिस दिन आपका यह हाथ कलंक के तिलक की जगह विजय का तिलक लगाएंगे ।

महारानी चित्रलेखा - ऋषिवर एक दिन ऐसा आएगा जब आपका यह कलंक का टीका लगाने वाले हाथ धर्म का तिलक लगाएगा और ऋषिवर वो दिन बहुत जल्द आएगा चलिए सम्राट हम आपके साथ है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है सम्राट विक्रमादित्य थे ब्रह्माण्ड से महान , थी उनमे विनम्रता उनके आत्मसम्मान के कारण ऐसे थे सम्राट विक्रमादित्य महान । मगर ऋषि विश्वामित्र को यह दिखाई ही नही दे रहा था । ।।
उधर ऋषि विश्वामित्र कहते है देवो देखो यह सिंहासन खाली पढा है सुना है जो इसकी रक्षा नही कर पाया उस विक्रमादित्य को आप सब इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधि बना रहे थे । 
इंद्र देव- ऋषिवर आप अभी भी सम्राट विक्रमादित्य को समझ नही पाए वे सोना है सोना जो आत्मसम्मान की भट्टी में कुंदन बनके निकलेगा ।
ऋषि विश्वामित्र- इंद्र देव जब आपका सम्राट विक्रमादित्य जंगल जंगल भटकेगा तो आत्मसम्मान की भट्टी अपने आप बुज जाएगी ।
इंद्र देव- और ऐसा दिन कभी नही आएगा आप देखते जाइए ।
उधर महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य से कहती है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य-  महारानी आप उठ क्यो गई आपको कुछ चाहिए एप आदेश करे ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट हम आपके मन को पढना बहुत अच्छे  से जानते है आप खुश होने का अभिनय नही कर सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी ऐसा नही है यह तो अच्छा है कि आपके साथ हमें समय बिताने का मौका मिल गया सुख दुख बाटने का मौका मिला , राज काज के काम में तो हम इतना व्यस्त हो जाते है कि समय ही नही मिलता आपके लिए आइए हमारे साथ हमने आपके लिए भोजन की व्यवस्था की है ।
उधर देवर्षि नारद आते है ऋषि विश्वामित्र के पास विश्वामित्र उनसे कहते है आइए नारद जी जाइए आपके प्रिय विक्रमादित्य के पास उन्हे आपकी जरूरत होगी । 
नारद जी - ऋषिवर उन्हे ही तो देख कर आ रहा हूं वे तो प्रसन्न है और सम्राट विक्रमादित्य तो वो हीरा है जो हर जगह अपने आत्मसम्मान की वजह से चहकता ही है मगर ऋषि विश्वामित्र जिसके लिए यह सब सुख सुविधा सब पाप है ऐसे ऋषिवर आप तो सारी सुख सुविधाएं भोग रहे है जबकि इन्हे तो आपका शत्रु होना था ।
ऋषि विश्वामित्र प्रण लेते है सुनो दशो दिशाओ पाच तत्वो आज में यह संकल्प लेता हूं जब तक सम्राट विक्रमादित्य का आत्मसम्मान खण्डित नही कर देता तब तक चैन से नही बैठेंगे ।
उधर सबसे दूर सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा खुद को समय दे रहे थे खुश थे दोनो एक दूसरे की मदद कर रहे थे । सम्राट विक्रमादित्य- महारानी आपकी रोटी अब तक बनी नही हमारी तरकारी बन गई । तभी सम्राट का थोड़ा सा हाथ जल जाता है महारानी तुरंत दोड कर आती है और कहती है सम्राट जला दिया ना हाथ और कहती है इसलिए कहते है जिसका काम उसी को साजे यह सब काम पुरूषो के नही है सम्राट अब आप रोटी बनाने का प्रयास करे हम बनाते है आपके लिए तरकारी ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा बहुत खुश थे । दोनो ने मिलकर भोजन बनाया ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी खाने की खुशबु तो बहुत अच्छी आ रही है ओर क्यो ना आए आपने जो बनाया है ।
महारानी चित्रलेखा - श्रेय तो आपको भी जाता है सम्राट ।
दोनो निवाला तो उठाते है मगर एक दूसरे को देखकर रूक जाते है फिर महारानी सम्राट को अपने हाथ से खिलाती है और सम्राट भी महारानी को खिलाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- एक बात कहूं महारानी महल ने हमें कभी यह सुख नही दिया की हम एक साथ खाना बनाए और एक दूसरे को खिलाए वास्तव में महल से ज्यादा सुख हमें वन में मिला है ।
इस दृश्य को देखकर ऋषि विश्वामित्र कहते है नारद ने सही कहा था यह दोनो तो यहा भी सुखी है मुझे कैसे भी करके यह सब खत्म करना होगा ।
विश्वामित्र कुटिया में आग लगा देते है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट यह क्या लगता है हमें किसी की नजर लग गई हमारी गृहस्थी खत्म हो गई ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी गृहस्थी पति पत्नी से बनती है कुटिया या महल से नही आइए हम आपके लिए एक नया घर बना देंगे चलिए यहाँ से ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् ऋषि विश्वामित्र अपने ऋषि स्वभाव से विपरित कार्य कर रहे थे उधर देवताओं की सुरक्षा संकट में पढने वाली थी देवताओं पर एक भीषण संकट आने वाला था सिर्फ देवताओं पर ही नही सारे संसार पर ।।
उधर नरकासुर सभी राक्षसों को एकता के सूत्र में पिरोता है और कहता है एक समय हम असुर देवताओं से संघर्ष करते थे स्वर्ग जाकर और आज हम यही सिमट गए हमें फिर एक होकर सिर्फ पातल ही नही स्वर्ग पर राज करना है ।
उधर सम्राट और महारानी वनों में रास्ता खोजते है । महारानी - सम्राट अब हम और नही चल पाएंगे हम कल रात से चल रहे है मगर रास्ता ही नही मिल रहा है । सम्राट विक्रमादित्य- महारानी हम आपके लिए जल लाते है हम और चलेंगे तो रास्ता मिल जाएगा आप विश्राम करिए हम आते है जल लेके ।

ऋषि विश्वामित्र अपनी माया हे पानी लाते है एक सुखे तालाब में वही सम्राट की नजर पानी पर पढती है वो जाते है वहाँ और पानी भरते है तभी ऋषि विश्वामित्र आ जाते है और कहते है सम्राट इस जल पर मेरा अधिकार है पानी भरने से पहले हार स्वीकार करनी होगी ।
सम्राट विक्रमादित्य- नही ऋषिवर  पृथ्वी, जल, वायु पर किसी का अधिकार नही होता यह तो प्रकृति का उपहार होता है ।
ऋषि विश्वामित्र- रूका विक्रमादित्य । विश्वामित्र अपनी माया से तालाब का पानी खत्म कर देते है ।
ऋषि विश्वामित्र- विक्रमादित्य हमने अपने तप से इस जलाशय का निर्माण करवाया था वरना इस जंगल में तालाब वह सरोवर नही है अगर तुम कहो तो फिर से में तालाब का निर्माण कर दूंगा लेकिन उसके लिए तुम्हे मेरे चरणों में झूकना होगा अपनी पत्नी के लिए यह सब करो तुम ।
तभी महारानी चित्रलेखा आ जाती है और कहती है कभी नही ऋषिवर और आत्मसम्मान दाव पर रखकर तो हमें कभी भी जल नही चाहिए आइए सम्राट अभी आपकी पत्नी में इतनी शक्ति है कि वो आपके साथ चल सके ।
उधर नरकासुर शुक्राचार्य से आशीर्वाद लेता है ।
नरकासुर- गुरूदेव आशीर्वाद दिजिए की में असुरों का साम्राज्य तीनों लोकों पर स्थापित कर सकूं आप अपनी सारी शक्ती मुझे दे दिजिए ।
शुक्राचार्य- मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है में अपनी सारी शक्ति तुम्हें देता हूं जाहों बनो त्रिलोकी ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् नरकासुर के उपर मौत का खतरा मंडरा रहा था । राजा भोज- मगर देवी वो कैसे नरकासुर तो शक्ति शाली था । देवी - जिस व्यक्ति में 32 गुण होंगे वो मनुष्य ही नरकासुर का काल बनेगा । 
उधर महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य से कहती है सम्राट यह हम कहां है हमें बहुत तेज भुख लग रही है ।
सम्राट विक्रमादित्य- यह देखिए महारानी बैर का पेड़ हमारे सामने ही है हम अभी लेकर आते है ।
सम्राट कुछ बैर लाकर महारानी के हाथो में रखते है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट हम नही खाएंगे आपने सुर्य देव को अर्ग नही दिया है तब तक आप भोजन नही करते हम भी कैसे कर सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- यहाँ पास में एक झरना है हम अभी वहाँ से आते है आप विश्राम करिए ।
सम्राट विक्रमादित्य सुर्य देव को जल चढाते है तभी ऋषि विश्वामित्र उन्हे देखते है ।
ऋषि विश्वामित्र सम्राट विक्रमादित्य के उपर के वस्त्र अर्थात उनका दूपटा हंस बनकर ले जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य हंस को आवाज मारते है किंतु वो चला जाता है । काफी समय होता देख महारानी सम्राट को ढूंढने के लिए आती है तभी उन्हे सम्राट विक्रमादित्य दिखते है । 
महारानी - सम्राट यह क्या हुआ ।
सम्राट- महारानी एक हंस हमारे वस्त्र ले गया ।
महारानी- सम्राट यह अवश्य विश्वामित्र ने ही किया है आपके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाने के लिए लेकिन हम दोंनो जबतक साथ है तब तक कोई कुछ नही बिगाड़ सकता । हम हमारे दूपटे को आधा करके आपको देते है ।
और सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा दोनों वहा से जाते है । तभी विश्वामित्र समझ जाते है की हमें इन दोंनो को दूर करना ही होगा ।
उधर महारानी चित्रलेखा सम्राट से कहती है सम्राट हमें बहुत बुरा लग रहा है सारे संसार को सुख देने वाले आपको आज इतना दुख उठाना पढ रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी आप हमारे साथ है तो कैसा दुख आप ही हमारा सच्चा सुख है आप चिंता ना करे हम मंदिर में है और मंदिर में सारी इच्छा पूरी होती है ।
तभी ऋषि विश्वामित्र रूप बदलकर संत के रूप में आते है और कहते है सीता राम ।
सम्राट विक्रमादित्य- नमस्ते ।
ऋषि विश्वामित्र ( भैस बदलकर ) - प्रसाद खाइए । सम्राट हमें आपसे एक काम है आप मेरी यह पोटली रख लिजिए जब तक हम आते नही आप इसका ध्यान रखिएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य- यदि आप चाहते है तो बिल्कुल ऐसा ही होगा हम आपकी इसी जगह प्रतिक्षा करेंगे । 
तभी कुछ सैनिक आते है और कहते है क्या है इस पोटली में ।
सम्राट विक्रमादित्य- इसमें प्रसाद है जो पुजारी जी देके गए थे ।
सैनिक- झूठ कह रहे हो तुम ।
और पोटली खोलने पर उसमे से स्वर्ण मुद्राएं मिलती है ।
सैनिक सम्राट और महारानी दोनों को बंदी बना लेते है ।
उधर नरकासुर राक्षसों से कहता है धरती पर हमसे लडने वाला कोई नही है अब सिर्फ स्वर्ग बचा है और वो स्वर्ग पर भाला फेकता है जो सीधे इंद्र देव के पास आता है सारे देवता चौक जाते है ।
देव गण - देवराज यह क्या है ।
इंद्र देव- देव गण यह नरकासुर है ।
देव गण - मगर देवराज वो तो पाताल लौक में है फिर उसका शस्त्र यहाँ तक कैसे आया ।
इंद्र देव- नरकासुर शक्ति शाली बनकर लौटा है ।
देव गण - उसे हराने वाले संसार में एक मात्र चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य थे जो ऋषि विश्वामित्र की वजह से दुख सहन कर रहे है ।
उधर सम्राट और महारानी को सामंत के पास लाया जाता है ।
सामंत- इस पोटली में 50 स्वर्ण मुद्रा कम है ।
सम्राट विक्रमादित्य- हमें नही पता हमने तो इसे खोला तक नही ।
सामंत- तुम्हे नही पता तो किसे पता । यह तेरी पत्नी है ना जब तक तू 50 स्वर्ण मुद्रा नही दे देता तब तक यह हमारे यहा सेविका बनके रहेगी ।
महारानी - नही सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य- नही ऐसा मत करिए ।
सामंत- 50 स्वर्ण मुद्रा ला फिर तुम्हे तुम्हारी पत्नी मिल जाएगी ।
सम्राट विक्रमादित्य- महारानी हम अवश्य आएंगे ।

सम्राट विक्रमादित्य को विश्वामित्र कहते है आत्मसम्मानी विक्रमादित्य हार गए ना अपनी पत्नी को । यह लो स्वर्ण मुद्रा और छोड़ दो अपने आत्मसम्मान को । 
सम्राट विक्रमादित्य- ऋषिवर हम अपना सबकुछ त्याग देंगे परंतु अपने आत्मसम्मान को नही छोडेंगे । आप हमें हराने आए है किंतु आप इसमे सफल नही हो पाएंगे ।
।। उधर कथा सुनाते हुए राजा भोज कहते है देवी ऋषि तो परीक्षा लेने की जगह अधर्म कर रहे है थे एक राजा से उसका राजपाठ छीन लिया और एक महारानी को दासी बना दिया । देवी - और सम्राट यह सब सहन कर रहे थे । राजा भोज- वो इसलिए क्योकि अगर सम्राट उनका विरोध करते तो उनका आत्मसम्मान हार जाता और देवताओं ने उन्हे जिस योग्य चुना है यह देवताओं की गरीमा की बात थी इसलिए सम्राट यह सब सहन कर रहे थे । ।।

उधर सम्राट विक्रमादित्य खेतों में काम कर रहे थे तभी उनका हल रूक जाता है । 
विश्वामित्र- यह हल में ही रोक रहा हूं विक्रमादित्य ।
वही महारानी चित्रलेखा के साथ भी लगातार दूर व्यवहार हो रहा था वे गेहू पिसने का काम पूरा करती तो ढेर सारे बर्तन उनका इंतजार करते वे सिर्फ सम्राट विक्रमादित्य को ही याद करती थी । उधर विक्रमादित्य पूरा खेत जोत कर बैठते है । खेत का मालिक कहता है वाह इतना बड़ा खेत तुमने अकेले जोत दिया मेरे बेलों को भी पीछे छोड दिया यह लो एक स्वर्ण मुद्रा ।
सम्राट विक्रमादित्य उस मुद्रा को पाकर उसे प्रणाम करते है वह कहते है महारानी हम जल्द आएंगे ।
उधर स्वर्ग में नरकासुर आता है पूरी शक्ति के साथ एक एक करके देवता अपनी अपनी शक्ति लगाते है ।
देवराज इंद्र- हम सभी देवता अपनी शक्ति को मिलाकर लडते है ।
किंतु नरकासुर फिर भी भारी पढते है सभी देवताओं पर ।
नरकासुर- कोई देवता मुझ से नही लड सकता अब स्वर्ग हमारा होगा कोई नही हरा सकता मुझे । 
देवराज इंद्र- जब वो आएगा तब तुम्हे पता चल जाएगा नरकासुर ।
नरकासुर- वो जब भी आए तब आएगा अभी तो तुम सब मेरे बंदी हो ।
नारद जी - नारायण नारायण हमें यह समस्या के जनक ऋषि विश्वामित्र को बताना पढेगा की अब वही कुछ करे । 
उधर ऋषि विश्वामित्र सिंहासन बत्तीसी के नीचे तपस्या कर रहे होते है ।
नारद जी - ऋषिवर नरकासुर ने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया है जिस वजह से भारी संकट उत्पन्न हो गया है वो देवताओं को पाताल लेकर जा रहा है और जो उसे रोक सकता था उसका दशाशमेघ यज्ञ आपने रोक दिया । 
ऋषि विश्वामित्र- में बचाऊंगा देवताओं को ।
उधर विक्रमादित्य सामंत के पास आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- सामंत जी यह लिजिए स्वर्ण मुद्रा हम रोज आपको एक स्वर्ण मुद्रा दिया करेंगे बस आप और आपकी पत्नी महारानी का ध्यान रखे ।
सामंत - तुम रोज एक स्वर्ण मुद्रा हमें दोगे ।
वही महारानी चित्रलेखा से एक घडा टूट जाता है तभी सामंत की पत्नी कहती है कौन भरेगा यह तुम्हारा पति पहले ही चोर है ।
सामंत - ऐसे तो तुम कभी अपनी पत्नी को वापस नही ले जा पाओगे ।
उधर विश्वामित्र नरकासुर को रोकते है तभी नरकासुर की शक्तिया भारी पढती है नरकासुर अपनी शकतियों से ऋषि विश्वामित्र को धरती की तरफ धकेल देता है ।
ऋषि विश्वामित्र सम्राट विक्रमादित्य के पास आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- ऋषिवर हम क्या कर सकते है आपके लिए ।
विश्वामित्र- सम्राट क्षमा दिजिए हमें हमने आपके आत्मसम्मान को ललकारा ।
सम्राट विक्रमादित्य- लज्जित ना करे ऋषिवर ।
ऋषि विश्वामित्र- लज्जित तो हम है सम्राट आप जैसा राजा तीनों लोको में कोई नही है आप ही संसार के प्रतिनिधि राजा बन सकते है आप आज से ही प्रतिनिधि राजा होने का धर्म निभाइए । 
सम्राट विक्रमादित्य- किंतु ऋषिवर हुआ क्या है ।
ऋषि विश्वामित्र- सम्राट नरकासुर ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया है वह देवताओं को बंदी बनाकर पाताल लेजा रहा है संसार में आप ही है जो उन्हे बचा सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- देवताओं के काम आना तो हमारे लिए गर्व की बात है किंतु हम यह नही कर पाएंगे आपने जो हमारे माथे पर यह कलंक का काला टीका लगाया है इसकी वजह से हम यह नही कर पाएंगे ।
ऋषि विश्वामित्र- सम्राट एक दिन हमने ही यह कलंक का टीका लगाया था आज हम ही इसे मिटाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य- मगर आपने सबके सामने यह टीका लगाया था ।
ऋषि विश्वामित्र- हम जानते है आज यहा कोई नही है मगर हम महारानी को लेकर आए है । महारानी आपने सही कहा था कि हमें एक दिन यह तिलक मिटाना होगा आप दोंनो सही थे ।

।। उधर कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी आखिर में सम्राट के आत्मसम्मान की जीत हुई । देवी - हां राजन् । राजा भोज- देवी यदि आप अन्यथा ना ले तो आपसे एक बात पूछता हूं । 
देवी - हां राजन् । राजा भोज- देवी प्रारंभ से ही मनुष्य देवता की रक्षा करता आया है जबकि देवता तो सर्वश्रेष्ठ होते है फिर वे अपनी रक्षा स्वंय क्यो नही कर पाते है । 
देवी- राजन् जब इश्वर ने सृष्टि बनाई तो यह व्यवस्था बनाई थी जिसमे कर्म करने का दायित्व मनुष्य को मिला । 
राजा भोज- यानि यदि मनुष्य 32 गुण धारण कर ले तो ना केवल मनुष्य अपितु देवता तक की रक्षा कर सकते है । देवी - और उसी दायित्व को पूरा करने के लिए सम्राट विक्रमादित्य देवताओं का प्रतिनिधित्व करेंगे ।

महारानी चित्रलेखा - ऋषिवर सम्राट को विजय होने का आशीर्वाद दिजिए ।
ऋषि विश्वामित्र- अवश्य देवी । विजय भव: । आप दोनों विश्व के सर्वश्रेष्ठ पति पत्नी है ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य नरकासुर के पास आते है । विक्रमादित्य को देख कर राक्षस सेना घबरा जाती है ।
नरकासुर- असुरो लडो विक्रमादित्य से ।
सम्राट विक्रमादित्य नरकासुर की सारी सेना को हरा कर खत्म कर देते है ।
फिर नरकासुर और सम्राट विक्रमादित्य एक दूसरे से युद्ध लडते है ।
नरकासुर कहता है विक्रमादित्य एक भेद की बात बताता हूं मुझे सिर्फ वही मार सकता है जिसमें 32 के 32 गुण हो उसके अलावा कोई नही और तुझ में एक भी गुण नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य मन में सोचते है हमें अपने 32 गुण योग शक्ति के माध्यम से बाहर निकालने होंगे तभी इसका अंत निश्चित है ।
उधर ऋषि विश्वामित्र ऋषि वशिष्ठ को याद करते है ।
ऋषि वशिष्ठ- कहिए ऋषि विश्वामित्र कैसे याद किया ।
ऋषि विश्वामित्र- प्रणाम ऋषिवर । यही बताने के लिए कि मेरे अंहकार की हार हो गई है में हार गया आत्मसम्मानी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से ।
ऋषि वशिष्ठ- नही जिस पल हमें अपनी पराजय स्वीकार हो जाए उसी पल हमारी पराजय जय में तब्दील हो जाती है ।
ऋषि विश्वामित्र- ऋषिवर आपसे एक अनुरोध है मेरी वजह से सम्राट विक्रमादित्य का दशाशमेघ  यज्ञ रूक गया था उसे आप पूरा करे और इस युग को अपना प्रतिनिधि राजा दे ।
ऋषि वशिष्ठ- अवश्य सम्राट विक्रमादित्य के लिए यज्ञ करना हमारा सौभाग्य है और सम्राट विक्रमादित्य ना केवल इस युग के अपितु हर युग के राजा में श्रेष्ठ है उनके जैसा राजा तीनों लोकों में कोई नही हुआ ।
उधर नरकासुर सम्राट विक्रमादित्य के 32 गुण देखकर घबरा जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य अपने 32 गुण धारण करके नरकासुर का अंत कर देते है । तभी उन्हे आवाज आती है सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य- इंद्र देव हम आ रहे है । विक्रमादित्य सभी देवताओं को छुड़ाते है ।
इंद्र देव- सम्राट आप अब अपना अधूरा दशाशमेघ यज्ञ पूरा करे और अपने चक्रवर्ती होने का गौरव प्राप्त करे ।
उधर महल में इंद्र देव सहीत सभी देव मौजूद रहते है ।
महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य की आरती उतारती है और कहती है सम्राट नरकासुर पर विजय की बधाई हो आपको ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महारानी यह विजय आपकीहै आप ही हमारा आत्मबल है आप साथ ना हो तो हम इस युद्ध में क्या जीवन के किसी युद्ध में नही जीत सकते इसका श्रेय आपको जाता है ।
महारानी चित्रलेखा - आपको भी सम्राट ।
ऋषि वशिष्ठ- सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य- प्रणाम ऋषि वशिष्ठ ।
ऋषि वशिष्ठ- आयुष्मान भव: सम्राट आइए अब हम शीघ्र इस यज्ञ को पूरा करते है ।
यज्ञ चल रहा होता है तभी ऋषि वशिष्ठ कहते है सम्राट यह यज्ञ जबतक पूरा नही हो सकता जब तक यज्ञ का अश्व आ नही जाता ।
ऋषि विश्वामित्र- अश्व यह रहा और यह तीनों लोको में विजय प्राप्त करके आया है ।
ऋषि वशिष्ठ- सम्राट आहुति दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य- जी ।
ऋषि वशिष्ठ- यज्ञ सम्पूर्ण हुआ अब आप इस मुकुट को धारण करे ।
सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन बत्तीसी पर बैठते है और ऋषि वशिष्ठ और ऋषि विश्वामित्र दोनों उन्हे मुकुट पहनाते है ।
इंद्र देव- सम्राट आज से आप हमारे इस युग के प्रतिनिधि राजा है आप नरेंद्र है नरों में इंद्र । चक्रवर्ती सम्राट नरेंद्र विक्रमादित्य की ।
सभी देव - जय ।
इंद्र देव- इस युग के हमारे प्रतिनिधि राजा विक्रमादित्य की ।
सभी देव - जय ।
इंद्र देव- चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की ।
सभी देव - जय ।
सम्राट विक्रमादित्य- धन्यवाद आप सभी का ।

।। उधर कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है अद्भुत में शीश झुकाकर नमन करता हूं सम्राट विक्रमादित्य को । देवी - राजन् सम्राट विक्रमादित्य में आत्मसम्मान था इसलिए वे किसी से नही हारे । राजा भोज- सही कहा देवी आपने अगर मनुष्य में आत्मसम्मान हो तो वह सम्पूर्ण संसार की रक्षा कर सकता है । देवी - हां राजन् और ना हो तो एक तिनके की भी नही । राजन् अब हम आपसे आज्ञा लेते है ।

जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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