उनतीसवा गुण दुख भंजक
।। उनतीसवा गुण दुख भंजक ।।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी प्रजा के दुख हरने के लिए रात को निकलते थे प्रजा का दुख दर्द दूर करने के लिए वे अक्सर निकलते थे । सम्राट विक्रमादित्य को एक कुटिया से रूधन की आवाज आ रही थी वे उस ओर जाते है ।
रात्री की निस्तब्धता का भंग करती हुई एक कुटिया में से रुदन की ध्वनि आ रही थी । भीतर एक वृद्धा थी जिसके नेत्रों की ज्योति मंद हो चुकी थी । उन ज्योतिहीन नेत्रों के भीतर से उष्ण आंसुओं की धार बहाती हुई वह रो रही थी । उसका इकलौता जवान लडका जो उसके जीवन का एकमात्र सहारा था । बर्बर शकों के आक्रमणो में मारा गया था । अचानक द्वार खटखटाने की ध्वनि हुई । बुढिय़ा ने पूछा इस आदि रात को कौन है ?"
उत्तर मिला " माँ मै आया हूँ।" माँ शब्द मात्र से ही बुढिया का हृदय आनंद से झूमने लगा । भावाकुल दशा में वह द्वार की ओर दौडी । एक सुंदर युवक सुर्य के समान तेजस्वी युवक बुढिया के चरण स्पर्श करने लगता है । बुढिय़ा उसे अपने हृदय से लगा कर प्रेम आसुओं से स्वागत करती है । बेटा तु जीवित हैं ?
माँ मैं तेरी सेवा के लिए आया हूँ , पर बेटा इतने दिनों गुम रहा ? बेटा तेरी आवाज कुछ बदल गयी है ? हाथ से छू कर माँ ने पुनः कहा - तेरा शरीर भी कुछ बङा है । माँ काल बीतने से कुछ अन्तर भी हो जाता है । यह कह कर नवयुवक ने बुढिया की रात भर सेवा की तथा प्रातः काल नवयुवक ने कहा -" मैं राजदरबार में नोकरी के लिए जा रहा हूँ शाम को आऊंगा ।
( सम्राट विक्रमादित्य अपना राज धर्म का कर्तव्य भी निभा रहे थे उन्होंने अपनी रात की नींद का त्याग कर दिया था )
माँ को कुछ सन्देह हुआ किन्तु नवयुवक का प्रमे तथा सेवा भाव देखकर उसने यही सोचा कि मेरे अपने पुत्र के सिवा और कोई ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता । प्रतिदिन रात्री को नवयुवक आ कर माँ की सेवा करता तथा सूर्योदय होते होते वह चला जाता । एक दिन बुढिया को पता चल गया कि वह नवयुवक और कोई नहीं स्वयं दुखियों के दुख दूर करने वाले , न्याय प्रिय , विश्व विजेता , त्रिलोक विजेता , महाराज शकारी चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य है जो रात्री को वेश बदल कर अपनी प्यारी प्रजाओं के दुःख भंजन के लिए घूमते हैं , तथा दुखियों के आंसू पोंछते हैं । अपना सारा वात्सल्य उस तेजस्वी युवक पर लुटाते हुए वृद्धा ने रोते हुए कहा " महाराज! आप सारे विश्व के चक्रवर्ती सम्राट होते हुए भी मेरी जैसी भिखारिन की झोपडी में पधारे तथा स्वयं मेरे पुत्र बनकर मेरी सेवा करते रहे । मैं अपना सबकुछ देकर भी इस उपकार का बदला नहीं चुका सकती । राजा विक्रमादित्य कहते है माता यह हमारे जीवन का लक्ष्य है दुखियों के दुख दूर करना । बुढिय़ा माँ कहती है "हे विक्रम " जब तक सुरज - चांद रहेगा विक्रम तेरा नाम रहेगा । उस वृद्धा माता के आशीर्वाद में स्वयं भारत माता का अपने इस तेजस्वी पुत्र के लिए आशीर्वाद निहित था ।
सम्राट विक्रमादित्य - माता आपने तो हमें एक प्रकार से अमरता का आशीर्वाद दे दिया हमारा नाम अमर रहेगा आप सभी के आशीर्वाद से ।
बुढिया माता - आप को देखकर जीवन धन्य हो गया सम्राट । आप भगवान परशुराम की तरह है उन्होंने भी विश्व में धर्म की स्थापना की आपने भी उन्ही की तरह दुखियों का दुख दूर किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - वे तो ईश्वर है हमारे भी मार्गदर्शक है ।
बुढिया माता - आपने श्रीराम की तरह पापियों को मारा किंतु उन्होंने संवत् नही चलाया । श्रीकृष्ण में देवतव था किंतु वे स्वंय राजा नही बने । भगवान बुद्ध ने विश्व में शांति का संदेश दिया और वे संत बन गए । चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपका प्रभाव इन सबसे अधिक होगा आप भगवान परशुराम की तरह वीर धर्मात्मा है , आप श्रीराम की तरह धर्म के रक्षक है , आप श्रीकृष्ण की तरह नेतृत्व कर्ता है , आप महात्मा बुद्ध की तरह शांति के प्रतिक है किंतु अधर्म होने पर आप भगवान परशुराम है । आपके उपर ईश्वर का आशीर्वाद सदैव बना रहे ।
सम्राट विक्रमादित्य - माता आपने हमारी तुलना करके हमे तो बडा बना दिया । आपका आशीर्वाद ही हमारे लिए ईश्वर का आशीर्वाद है । माता आज से आप यहां नही रहेगी आपके आगे पीछे कोई नही है आपको हम महल में विश्राम कक्ष में आने का आग्रह करते है आपका ध्यान वहां रखने वाले सभी है
बुढिया माता - जो आज्ञा महाराज ।
" तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिन्होने प्रजा की सेवा में अपना सबकुछ लगा दिया वे धर्म के प्रतिक थे दुखियों के दुखभंजक थे "
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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