चौदहवा गुण देवत्व
।। चौदहवा गुण देवत्व ।।
इस गुण की कथा शुरू करने से पहले हम आपको एक सूचना देते है सम्राट विक्रमादित्य के जीवन की । सम्राट विक्रमादित्य की सेवा के लिए उनकी मदद के लिए मां कालिका ने मुंजा नाम का बेताल सम्राट विक्रमादित्य को दिया था जो उनकी सहायता करता था और जिसे सम्राट विक्रमादित्य भी अकसर पुकारते थे ।
।। चौदहवा गुण देवत्व ।।
एक दिन की बात है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन बत्तीसी पर बैठे थे राज काज के काम काज देख रहे थे तभी एक ब्राह्मण देव आते है सम्राट विक्रमादित्य ब्राह्मण देव को देखकर खुश होते है और कहते है स्वागत है ब्राह्मण देव कैसे आना हुआ आपका ।
ब्राह्मण- सम्राट शायद आपको याद होगा कई वर्ष बीत गए इस बात को आप मुझे पहचान पा रहे है या नही ।
सम्राट विक्रमादित्य- आप अपने आने के उद्देश्य का बताए हमें याद आ जाएगा ।
ब्राह्मण- सम्राट आज से 20 वर्ष पूर्व आप मेरे घर पर आए थे मेरे बेटे का विवाह है ।
सम्राट विक्रमादित्य- हम समझ गए आ गया हमें याद आपने आकर अच्छा किया हम आएंगे आपके पुत्र की शादी में उन्हें आशीर्वाद देने ।
ब्राह्मण- जरूर सम्राट आपका स्वागत है ।
सम्राट विक्रमादित्य- सेनापित ब्राह्मण देव के घर के बाहर कडा पहरा करो वहां पर सेना की एक टुकड़ी लगाओ और विवाह मंडप को चारो तरफ से कडे पहरे में रखो ।
सम्राट विक्रमादित्य वहां से जाते है तभी बेताल मुंजा उन्हे कहता है महाराज आपने ऐसा क्यो किया आखिर रहस्य क्या है ।
सम्राट विक्रमादित्य- सुनो मुंजा आज से कई वर्ष पूर्व हम राज्य के भ्रमण पर थे वहां एक आदमखोर शेर प्रजा को परेशान कर रहा था । हम उसी को भगाने जा रहे थे हमारा गला प्यास के मारे सूख रहा था तभी वहां एक ब्राह्मण भागते हुए आते है हम उन्हें कहते है रूको ।
ब्राह्मण- अरे भागो भाई आदमखोर शेर पीछे पड़ा है ।
तभी शेर आ जाता है सम्राट विक्रमादित्य उसे दंड देते है और शेर हमेशा के लिए भाग जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य- ब्राह्मण देव अब नीचे आ जाइए वो भाग गया है ।
ब्राह्मण- धन्यवाद आपका अरे महाराज आप मुझे क्षमा कर दिजिए में आपको पहचान ना सका ।
सम्राट विक्रमादित्य- कोई बात नही आप उस समय डरे हुए थे इसलिए ।
ब्राह्मण- सम्राट शाम हो गई है आपको प्यास और भूख लगी होगी सम्राट विक्रमादित्य आप हमारे यहां चलिए ।
सम्राट विक्रमादित्य- चलिए आज रात आपके यही विश्राम करते है ।
मुंजा फिर ब्राह्मण देव ने मेरे सोने की व्यवस्था की मगर मैनें उन्हें कहा में तो घर के बाहर की सोना चाहता हूं एक खाट दे दिजिए । मुंजा में रात में हो रहा था तभी कुछ हलचल हुई में उठा मैने देखा की दरवाजा तो लगा है । तभी मुझे एक देवी नजर आती है ।
सम्राट विक्रमादित्य- देवी कौन है आप ।
देवी- सम्राट में भाग्य देवी हूं उस बालक का भाग्य लिखने आई थी ।
सम्राट विक्रमादित्य- देवी वैसे तो हम भाग्य को ज्यादा नही मानते हम कर्मों में विश्वास करते है बाकि फिर भी क्या लिखा है आपने उस बालक के भाग्य में ।
देवी - उस बालक के भाग्य में अकाल मृत्यु का योग है उस बालक की मृत्यु होगी शादी के दिन ।
सम्राट विक्रमादित्य- नही आप इतनी कठोर नही हो सकती भाग्य देवी ।
देवी - सम्राट यह तो विधि का विधान है इसे कोई नही बदल सकता ।
सम्राट विक्रमादित्य- हम बदलेंगे इसको ।
देवी - देखते है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य यह पूरी बात मुंजा को बताते है और कहते मुंजा इसलिए हमने उस विवाह में सेना की एक पूरी टुकड़ी भेज दी है ।
मुंजा - चलिए सम्राट हम उसे कुछ नही होने देंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य- इश्वर करे की यही सच हो ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य मुंजा के साथ विवाह में जाते है वहा पुरी सेना खड़ी रहती है । विवाह में फेरो की विधि चलती है तभी वर माला में सांप निकल जाता है और वह उस युवक को डस लेता है ओर उसकी मौत हो जाती है । वह युवती और युवक के माता पिता रोते है तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते है यह नही हो सकता हम उसे नही मरने देंगे ।
पंडित जी - सम्राट आपको पता था कि मेरे पुत्र की मौत होगी ।
सम्राट विक्रमादित्य- हां जब आपके पुत्र का जन्म हुआ था तब में आया था तब भाग्य देवी ने बताया था ।
पंडित- सम्राट फिर तो यह विधि का विधान है हम कुछ नही कर सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य- आप चिंता ना करे बस मेरी एक बात समझ ले जब तक में नही आता आप अपने पुत्र का अन्तिम संस्कार मत करिएगा ।
पंडित- जो आज्ञा महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य- चलो मुंजा ।
सम्राट विक्रमादित्य घने जंगल में जाते है वह कहते है मुंजा इतने घने जंगल में उस सर्प को ढूंढना मुश्किल है तुम बिन बजाओ उससे वो बाहर आ जाएगा ।
मुंजा बिन बजाता है तभी वो सर्प बाहर आता है किंतु वो बार बार वार करता है मुंजा उसके वार को रोक कर उसे बंदी बना लेता है तभी वो सर्प अपने रूप में आता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नागराज चलो और उस युवक का जहर पियो और उसे जीवित करो ।
नागराज - सम्राट यह तो सम्भव नही है हां मगर यहां से 100 कोस की दूरी पर महाराज कुमारेश के राज्य में एक नाग मणि है उसे लेकर आप उसे जीवित कर सकते है ।
मुंजा - महाराज में ले आता हूं उसे ।
नागराज - नही यह सम्भव नही ।
सम्राट विक्रमादित्य- यह भी सम्भव नही वो भी सम्भव नागराज लगता है आपको अपने प्राणों को मोह नही में अभी तलवार से आपको खत्म कर देता हूं ।
नागराज - नही सम्राट हमारे कहने का मतलब है की वो मणि में ही ला सकता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य- तो आप चलो साथ में ।
नागराज - सम्राट मेरी स्थति बहुत खराब है यदि कोई मनुष्य या जानवर मुझे अपने शरीर में समाने दे तो में वहां जा सकता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य- ठीक है आप मेरे शरीर में आ जाइए ।
मुंजा - सम्राट यह आप क्या कर रहे है इससे तो आपके प्राण संकट में पढ जाएंगे ।
नागराज - नही जिस शरीर में मुझे भोजन और जीवन मिल रहा है वहां में ऐसा क्यों करूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य- यह सही कह रहे है मुंजा हमें कुछ नही होगा और हुआ भी तो हमारा तो जीवन ही धर्म और हमारी प्रजा के लिए है । आओ नागराज हमारे शरीर में आ जाओ ।
नागराज के शरीर में प्रवेश करते ही सम्राट विक्रमादित्य कमजोर होने लग गए ।
मुंजा - महाराज आप ठीक तो है ।
सम्राट विक्रमादित्य- हमारी चिंता मत करो चलो चलते है ।
3 दिन बीत जाते है सम्राट विक्रमादित्य बहुत कमजोर हो जाते है वे एक पेड़ की छाव में रूकते है ।
मुंजा - सम्राट 3 दिनों में ही आपकी क्या हालत हो गई है हम आपके लिए पानी लेकर आते है ।
तभी नागराज सम्राट विक्रमादित्य के शरीर से निकलता है वह कहता है वाह राजा वाह महान हो आप एक मामूली ब्राह्मण के लड़के के लिए अपने प्राण दाव पर लगा दिया की खुद मरने की स्थति में आ गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - मामूली इंसान नही होता मामूली उसकी सोच होती है नागराज ।
नागराज - वाह राजा हो तो तेरे जैसा ।
तभी नागराज के पिता जी आते है वह कहते है देख ले कितना फर्क है तुम दोनों में । राजा तू भी है मगर मक्कार और राजा यह भी है जो प्रजा के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार है तूने खुद के प्राण बचाने के लिए एक देवता समान निर्दोष व्यक्ति के प्राण लेने चाहे ।
नागराज - यह मणि हासिल करते भी मुझे मार देता ।
नागराज के पिताजी - यह राजा विक्रमादित्य है वचन के पक्के और ईमानदार इंसान यह तुझे कुछ नही करते ।
तभी मुंजा आ जाते है और नागराज भाग जाता है ।
नागराज के पिताजी - जाने दो उसे में बताता हूं आपको नाग मणि तक जाने का रास्ता ।
मुंजा - बताइए ।
यहां से दक्षिण दिशा की ओर जाना वहां सबसे बडी गुफा में तुम्हे वो मणि मिलेगी मगर उस मणि की रक्षा बहुत ही शक्तिशाली नाग कर रहा है ।
मुंजा - जी धन्यवाद । सम्राट ।
नागराज के पिताजी - महाराज की चिंता मत करो उन्हे इस फूल का रस पिला दो उनके शरीर का जहर खत्म हो जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य का जहर समाप्त हो जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य- धन्यवाद नागराज धन्यवाद मुंजा ।
नागराज - सम्राट इसमें धन्यवाद कैसा आपके काम आना हमारा सौभाग्य है आप विजय होकर लौटे ।
मुंजा - चलिए महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य- चलो ।
सम्राट विक्रमादित्य उस गुफा में जाते है तभी छोटा सांप निकलता है ।
मुंजा - सम्राट यह तो छोटा सा सांप है ।
सम्राट विक्रमादित्य- नही यह कोई माया है ।
तभी अचानक वो सांप बहुत विशाल रूप में आता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मुंजा तुम पिछे हो जाओ में लडता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य उस सर्प को युद्ध में हरा देते है वो वहां से जाता है तभी सम्राट विक्रमादित्य उसे कहते है रूपिए मणिधारी हमें सिर्फ उस युवक के प्राण बचाने के लिए मणि चाहिए हमें मणि रखना नही है आप साथ चले वह इसे फिर लेकर आ जाइएगा ।
मणिधारी नाग - सम्राट विक्रमादित्य आप बहुत महान है आपके जैसा राजा कही नही लोग नाग मणि प्राप्त करने के लिए मरते सै मगर आपने आज बता दिया की आपको कोई स्वार्थ नही है आप निस्वार्थ कार्य करते है चलिए सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य उस ब्राह्मण के घर आते है वह मणि युवक के सर पर घुमा कर उसे जीवित करते है ।
ब्राह्मण देव - सम्राट आप महान है आपकी वजह से हमें अपना पुत्र मिल गया ।
महाराज विक्रमादित्य की जय सभी कहते है ।
तभी भाग्य देवी आती है वह कहती है सम्राट आपने आज सिद्ध कर दिया की कर्म और पुरूषार्थ से भाग्य भी बदला जा सकता है आप महान है ।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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