उन्नीसवा गुण निष्काम
।। उन्नीसवा गुण निष्काम ।।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठे थे । वे सभी मंत्रीयों से बात कर रहे थे । तो बताइए मंत्री जी ।
मंत्री - सम्राट हमारे राज्य में पिछले सप्ताह से चोरी की घटनाएँ बढ सी गई है ।
सम्राट विक्रमादित्य - चोरी की घटनाएँ । यह तो चिंता का विषय है हमारे राज्य में महाकाल और माँ हरसीधी की कृपा से सबकुछ है सभी प्रजा जनों के पास अच्छे काम काज है । फिर चोरी की घटनाएँ बढना चिंता का विषय है । किंतु चोरी कोई शोक से नही करता है हमें उसके दूसरे पहलू पर भी सोचना होगा हमें उसकी मजबूरी पता करके उसे सही रास्ते पर लाना होगा ।
मंत्री - सम्राट यह तो सिर्फ आप ही सोच सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य- हमारे राज्य में अच्छा व्यवसाय है अधिक धन कमाने के अवसर है । माँ अन्नपूर्णा की कृपा है मालवा की इस धरती पर ।
मंत्री- सम्राट सही कहा आपने और चोरी करना तो महापाप है । हमारे लोग इसमे शामिल नही होंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह भी संभव हो की हमारे राज्य के वैभव से जलने वाले ऐसा कर रहे हो । आज रात को हम स्वंय निकलेगे देखने के लिए ।
मंत्री - धन्य है महाराज आप जब सब सो जाते है तब आप प्रजा की सुरक्षा के लिए निकलते है । महाप्रलय काल तक आपका नाम यह मालवा और भारत भूमि नही भूल पाएगी राजा हो तो आपके जैसा वरना ना हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - मंत्री जी ईश्वर ने हमें राजा बनाकर बहुत बड़ा भार दिया है प्रजा को सुखी रखना राजा का परम उद्देश्य है । यह तो स्वंय भगवान परशुराम जी ने कहा है की राजा वही जो प्रजा के मन को भाय । हम तो सिर्फ प्रजा को समर्पित है और ईश्वर का आशीर्वाद लेकर प्रजा के सुख के लिए अपना समय लगाते है ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आधी रात को आम जन की तरह वस्त्र पहन कर निकलते है । एक घर में चोर चोरी कर रहे होते है तभी सम्राट विक्रमादित्य पहुंच कर उन्हे पकड लेते है फिर उस चोर को कोतवाल ले जाते है । सम्राट कहते है सुबह बात करेंगे हम इससे ।
सम्राट विक्रमादित्य महल आ रहे होते है तभी एक कुटिया की ओर देखते है जहां एक निर्धन ब्राह्मण रहता है ।
ब्राह्मण के बच्चे भूख से रोते है और भोजन भोजन कहते है तभी उनके पिता कहते है मत रो बच्चो में कल सुबह भिक्षा मांगने जाऊंगा एक दिन नही गया ज्वर की वजह से तो रो रहे हो में कल ले आऊंगा । तभी सम्राट आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ब्राह्मण देवता यह माला लो मेरी और सुबह इसे बेच देना और इन बच्चो के लिए इतना अन्न रखना की वर्ष भर इन्हे समस्या ना हो ।
ब्राह्मण - धन्यवाद महानुभाव ।
सम्राट विक्रमादित्य- में तुमसे मिलने आते रहूंगा ।
ब्राह्मण पत्नी - जरूर यह कोई बड़े सेठ है ईश्वर उन्हे बहुत मान सम्मान दे ।
सम्राट विक्रमादित्य के जाने के बाद वो ब्राह्मण और ब्राह्मणी बाते कर ही रहे थे की उसी गुट का दूसरा चोर आ गया और उन ब्राह्मण से मोती की माला लेकर भाग गया । वह ब्राह्मण देवत रोते हुए चिल्लाने लगे ।
उस समय आकाश से दो सुंदर देवी एक दूसरे से बाते करती है । देवी तिललोतमा यह देखो मालवा प्रदेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का राज्य और वह उज्जैनी उनके राज्य की राजधानी । वो महाकाल मंदिर और वो गुरुकुल जहां श्री कृष्ण ने सुदामा के साथ ज्ञान प्राप्त किया , और वो क्षिप्रा माँ । और वह परम न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का महल । देवी अन्नपूर्णा से इतना सबकुछ सुनने के बाद देवी तिललोतमा कहती है देवी वैसे तो आपकी कृपा सब पर है पर मालवा पर कुछ अधिक ही ।
देवी अन्नपूर्णा - देवी तिललोतमा मेरी कृपा उस राज्य पर अधिक रहती है जहां राजा और प्रजा धर्म के स्वरूप कार्य करते है । चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने अपने पराक्रम से सृष्टि की रक्षा की थी वो तो ईश्वर की तरह ही पूजनीय है । राजा विक्रमादित्य सदैव प्रजा को समर्पित रहते है उनके राज्य में तो किसी चीज की कमी होना ही नही चाहिए । आओ उनका राज्य दिखाती हूं ।
देवी तिललोतमा - देवी वह कौन है । इतना सुंदर व्यक्ति ।
देवी अन्नपूर्णा - यही तो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है । जिन्हे होना तो महल में चाहिए पर राज्य के मार्ग पर भटक रहे है प्रजा को देखने यही उनकी महानता है ।
देवी तिललोतमा - बिल्कुल देवराज इंद्र की तरह ।
देवी अन्नपूर्णा - इंद्र से भी महान । सम्राट विक्रमादित्य में देवराज इन्द्र से भी ज्यादा गुण है । मनुष्य को कठोर तपस्या करने पर जो देवराज इंद्र नही देते होंगे वह चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य मनुष्य को यू ही दे देते है । उनके जैसा न्यायप्रिय कोई नही है । वो महान है ।
देवी तिललोतमा - देवी आप उनकी बहुत प्रशंसा कर रही है ।
देवी अन्नपूर्णा - तुम्हे यकीन नही हो रहा चलो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की परीक्षा लेते है ।
देवी तिललोतमा - हां पर आप नही में लूंगी ।
देवी अन्नपूर्णा - बिल्कुल आप लिजिए ।
देवी तिललोतमा रूप बदल कर रो रही होती है ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य रोने की आवाज सुनकर उस दिशा में आगे बढते है और उस बुड्ढी माता से कहते है माता दादी मां आप क्यो रो रही है ।
देवी तिललोतमा - तुम कौन हो आगे बढो ।
सम्राट विक्रमादित्य - दादी मां में विक्रमादित्य हूं इस राज्य का राजा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । मुझे बताओ आपके रूधन का कारण क्या है ।
देवी तिललोतमा - मेरा बेटा बिमार है ।
सम्राट विक्रमादित्य - दादी मां क्या हुआ उसे हमें बताए हम वेद को लेकर आएंगे ।
देवी तिललोतमा - वेद के यहां तो हम भी गए थे और ओषधि भी बताई फल ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन सा फल हम लेकर आते है ।
देवी तिललोतमा - हम जिस पेड के नीचे बैठे है वही फल ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह तो अच्छी बात है हम पेड पर चढ़कर तोड लाते है ।
देवी तिललोतमा - रूकिए राजन् वेद ने कहा था की कोई भी पराया व्यक्ति इसे छूएगा तो इस फल से ओषधि नही बन पाएगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह तो गंभीर समस्या है आप इस पर कैसे चंढेगी । चलिए आप हमारी कमर पर चढ जाइए और फल तोडिए ।
देवी तिललोतमा सम्राट विक्रमादित्य की कमर पर चढती है और अपने देविय रूप में भार बढा देती है सम्राट विक्रमादित्य के शरीर पर अचानक भार बढ जाता है वे की भार इतना कैसे बढ गया । वे कहते दादी मां जल्दी करिए किंतु वह जानबूझकर देर लगाते है । फिर वह उतर जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - फल तोड़ लिया ।
देवी तिललोतमा - धन्यवाद राजन् ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी । माता यह फल कौन सा है बड़ा अजीब है ।
देवी तिललोतमा - एक तुम ले लो ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही यह आपके पुत्र की औषधी के लिए है ।
देवी तिललोतमा - हमने दो फल लिए है एक से हमारा काम हो जाएगा एक आप रखो यह पुरस्कार समझो यह बहुत चमत्कार फल है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही माता हम सेवा का मूल्य नही लेते । आप रख लिजिए ।
तभी देवी अन्नपूर्णा आती है और कहती है बस बस कितनी परीक्षा लोगी सम्राट विक्रमादित्य की ।
सम्राट विक्रमादित्य- देवी आप दोनों कौन है अपना परिचय दीजिए ।
में अन्नपूर्णा हूं और यह अप्सरा तिललोतमा है । हम दोनों आपके राज्य का भ्रमण करने आए थे आपके यहां सभी सुखी है समृद्ध है ।
देवी तिललोतमा -आपके बारे में जितना सुना उससे कई अधिक महान है आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद देवी तिललोतमा । मगर माँ अन्नपूर्णा फिर भी मेरे राज्य में एक ब्राह्मण भूखा सो रहा था अभी अभी हम वहां हे आए ।
देवी अन्नपूर्णा - सम्राट फल के लिए कर्म तो करना ही पढेगा उस ब्राह्मण को कुछ कार्य करना चाहिए सिर्फ भिक्षा से फल नही मिलेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर माँ में राजा हूं मेरे राज्य में कोई भूखा सो जाए तो फिर कम कैसे राजा ।
देवी अन्नपूर्णा - धन्य है आप महाराज विक्रमादित्य आपके राज्य में कोई भूखा सो ही नही सकता । यह लिजिए हमारी तरफ से अन्न की पोटली इसमें आप जिस भोजन की कामना करेंगे आपको वह भोजन मिलेगा इससे आप हर निर्धन का पेट भर पाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद माँ अन्नपूर्णा आपकी कृपा हमारे इस भारत देश और मेरे मालवा राज्य पर बनी रहे ।
माँ अन्नपूर्णा और देवी तिललोतमा वापस चले जाते है । सम्राट विक्रमादित्य उस पोटली को लेकर ब्राह्मण देवता के पास जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - बच्चो यह लो खाना ब्राह्मण देवी आप भी लिजिए ।
ब्राह्मण देवता - महानुभाव आप कौन है कोई देवता या गंधर्व ।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसे मनुष्य हो तुम अपने राजा को नही जानते ।
ब्राह्मण देवता - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज आप मुझे लगा ही इतना ध्यान रखने वाला व्यक्ति आपके अतिरिक्त कोई नही हो सकता ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह पोटली आप रखो और बच्चो को कभी भूखे रही रखना ।
ब्राह्मण देवता - नही महाराज इतनी अमुल्य चीज आप हमें मत दिजिए । आपने हमें वो मोतियों की माला दी थी मगर वो भी हमसे एक चौर लेकर भाग गया ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौर वही होगा जो उस दिन भाग गया था । उसे में पकड लूंगा । किंतु आप एक बात बताए आप कुछ करते क्यो नही ।
ब्राह्मण देवता - सम्राट आप जो कहेंगे हम वही करेंगे आप बताइए हमें ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो आप इस पोटली को रख लिजिए । और क्या करेंगे आप इससे ।
ब्राह्मण देवता - इससे तो मेरा परिवार कभी भूखा नही रहेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - सिर्फ आपका परिवार ?
ब्राह्मण देवता - मेरे सगे संबंधी भी ।
सम्राट विक्रमादित्य - सिर्फ सगे संबंधी ?
ब्राह्मण देवता - मेरा पूरा समाज ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही आप ऐसा कुछ नही करेंगे हम आपको कार्य देते है जिससे आपका परिश्रम भी होगा और आपको भोजन भी मिलेगा ।
ब्राह्मण देवता - आज्ञा करे महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप इस पोटली से उज्जैनी के हर भूखे को खाना खिलाएंगे जो योग्य होगा उसे नही जिसे भोजन की जरूरत हो उसे ही इससे आपको काम भी मिलेगा और भूखे को भोजन ।
ब्राह्मण देवता - जो आज्ञा महाराज हम ऐसा ही करेंगे । आपको बहुत पुण्य मिलेगा आप महान है दयालु है ।
सम्राट विक्रमादित्य यह कह कर चले जाते है किंतु वो उस ब्राह्मण के घर के पीछे छुप जाते है उस चोर की प्रतीक्षा में । वह चोर आता है और उस ब्राह्मण से कहता है कौन है यह दानवीर । लाओ मुझे दो यह पोटली । तभी सम्राट विक्रमादित्य आ जाते है और उस चोर से लड़ कर उसे पकड लेते है ।
ब्राह्मण देवता - अरे मूर्ख चोर तू चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से लडेगा उनसे कोई नही जीत सकता ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम इस चोर को ले जाते है चलिए ब्राह्मण देवता आप इस पोटली से जनसेवा शुरू करे । जय महाकाल जय परशुराम ।
ब्राह्मण देवता - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की जय ।
तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिनकी तरह निष्काम शायद ही कोई हो । इतना अमुल्य उपहार भी उन्होंने दान कर दिया जबकि किसी के लिए यह करना असंभव है उनके अतिरिक्त । ऐसा ही उपहार द्वापरयुग में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को दिया था । उन्होंने उसे अपने परिवार के हीत में उपयोग किया किंतु ऐसा ही उपहार चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने जनमानस की सेवा में समर्पित कर दिया । वाकई चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य धरती पर सर्वश्रेष्ठ राजा थे । ना सतयुग ना त्रेता युग ना द्वापरयुग , कलयुग में ही सभी युगों के सर्वश्रेष्ठ राजा विक्रमादित्य का राज्य हुआ ।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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