सोलहवा गुण साहस

।। सोलहवा गुण साहस ।। 

यह कथा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के युद्ध कौशल से जुड़ी है , चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने शकों और हूणों को परास्त किया यह तो दुनिया जानती है किंतु कैसे किया यह कोई नही जानता । सम्राट विक्रमादित्य को जब जानकारी प्राप्त हुई की शक और हूण भारत पर कब्जा कर रहे है तब सम्राट विक्रमादित्य ही एक मात्र राजा थे भारतवर्ष में जिन्होंने शकों के खिलाफ युद्ध की शुरुआत की । महाराज विक्रमादित्य ही वो पहले ऐसे राजा थे जिन्होंने सम्पूर्ण भारत वर्ष के राजाओं को एकत्रित करने के लिए संदेश भेजा की एक ध्वज के नीचे आकर ही हम भारत वर्ष की रक्षा कर सकते है और उसकी अखंडता बनाए रख सकते है । यह उनका साहस ही था जो उन्होंने यह भी कहा की जो इस एकता के सूत्र में नही आएगा उसे भी वो शक और हूण से कम नही समझेंगे । सम्राट विक्रमादित्य ने छोटे बड़े युद्ध लडकर ना केवल शकों को खदेडा अपितु उन्हे अपने कब्जे वाले क्षेत्र से भी भगा दिया । शक हूण मालवा में तो आ भी नही पाए किंतु जहां थे वहां से उन्हे खदेड दिया । विक्रमादित्य ने मथुरा अयोध्या काशी हरिद्वार को बचा कर वहां पुनः मंदिर , धर्मशाला , घाट , की स्थापना की । वहा धर्म नागरीयों का निर्माण किया । सम्राट विक्रमादित्य कभी अपने शत्रु को छोड़ते नही थे वे उन कमजोर शासकों की तरह नही थे जो इतिहास में अपना नाम दया करने वाला शासक के नाम से दर्ज करवाए । सम्राट विक्रमादित्य कहते थे दया उन पर करो जो उस योग्य हो जिसने पहले अन्याय किया वो दया का पात्र नहीं । इतिहास में शायद ही कोई योद्धा सम्राट विक्रमादित्य की तरह था जिसने पहली बार शत्रु के घर पर हमला किया । सम्राट विक्रमादित्य ने शकों और हूणों को ना केवल भारत से खदेडा अपितु उनके देश जाकर उन पर हमला किया वह भारत की शक्ति का परिचय दिया । सम्राट विक्रमादित्य ने ईरान इराक जहां शकों का राज था वहां सम्राट विक्रमादित्य ने व विश्व विजय उज्जैनी ध्वज " धर्म ध्वजा को फहरा दिया । सम्राट विक्रमादित्य के ध्वज का नाम विश्व विजय उज्जैनी ध्वज था । सम्राट विक्रमादित्य शकों को पराजित कर भारत लौटे किंतु उन्होंने आने के बाद कोई उत्सव नही मनाया अपितु एक चिंतन बैठक बुलाई ।

सम्राट विक्रमादित्य उज्जैनी लौटे तभी उनके सेनापति ने कहा महाराज इस विजय पर एक भव्य उत्सव आयोजित करते है किंतु विक्रमादित्य कहते है सेनापति अभी उत्सव नही चिंतन करने का समय है । आप सभी भारतीय राजा महाराजा जनपदों अथवा महाजनपदों के प्रतिनिधि को बुलवाने का संदेश भेजने को कहते है । एक सप्ताह बाद उज्जैनी में सभी भारतीय राजाओं की बैठक होती है ।
सम्राट विक्रमादित्य उस बैठक में कहते है । आदरणीय राजा महाराजा आप सभी ने मेरे संदेश पर भारत वर्ष की रक्षा के लिए मेरा साथ दिया में आप सभी को धन्यवाद देता हूं ।
राजा - महाराजा -- महाराज विक्रमादित्य जी धन्यवाद तो हम सभी को आपको देना चाहिए क्योकि आप तो स्वंय अपने राज्य की रक्षा को सज थे किंतु हम सभी में बिखराव था अगर आप हम सभी को एकता के सूत्र के एक धागे में नही बांधते तो हम सभी को शक और हूण गाजर मूली की तरह काट देते और हमारी प्रजा भी नही बच पाती आपकी वजह से ही भारत वर्ष सुरक्षित है । 
सम्राट विक्रमादित्य  - यह तो हमारा कर्तव्य था । हमने आप सभी को इसलिए बुलाया है कि हमारे आपसी मन मुटाव बनते बिगडते रहेंगे किंतु हम सभी के लिए देश सर्वप्रथम होना चाहिए । हमने आप सभी को इसलिए बुलाया की हम सभी को एक ध्वज के नीचे आना चाहिए और हम सभी राजा महाराजा तो है किंतु हमें एक योग्य राजा चुनना चाहिए जो हम सभी का नेतृत्व कर सके और उसी के नेतृत्व में हम सभी विदेशी आक्रांताओं से लडते रहे और भारत वर्ष की एकता बनाए रखे ।
राजा - महाराजा  -- मालवा नरेश महाराज विक्रमादित्य आप ही हमारा नेतृत्व करे आपसे योग्य कौन है भला पूरे भारतवर्ष में । और उज्जैनी ध्वज के नीचे पूरा भारत एकत्रित हो सकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य -आप सभी सिर्फ इसलिए हमें ना चुने की हमने आपकी रक्षा की या आप सभी को उज्जैनी में बुलाया आप में से भी यदि कोई नेतृत्व करना चाहे तो अपनी योग्यता सिद्ध करके नेतृत्व कर सकता है क्योकि हमारा मानना है की यह देश सुरक्षित रहना चाहिए ।
राजा - महाराजा -- नही उज्जैनी नरेश हम सभी आपके नेतृत्व में ही लडेंगे आप ही हमारा सम्राट है । और आप में ही सबसे ज्यादा काबिलियत भी है । 
सम्राट विक्रमादित्य - अगर आप सब की इच्छा है तो हम यह दायित्व उठाने को तैयार है हम एक सेना गठित करेंगे ।

में विक्रमादित्य एक सेना गठित करूंगा जो भारत वर्ष पर कभी भी किसी विदेशी आक्रमणकारी को भारत में आने नही देगी यह विक्रम राज है जहां सिर्फ सत्य धर्म न्याय की जीत होगी किसी अधर्मी के विचारों की नही । हमारी विशाल सेना में सभी राजा महाराजा की एक एक टुकड़ी होगी जो आपातकालीन परिस्थिति में काम आएगी । ऐसे ही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की विशाल सेना खडी हुई जिसमें 1 करोड़ से भी अधिक सैनिक थे जिनमें हजारों घुड़सवार शामिल थे । विक्रमादित्य की विशाल सेना को देखकर बड़े बड़ो के हौसले पस्त हो गए । सम्पूर्ण पृथ्वी पर विक्रमादित्य की वीरता का डंका बजता था । इतिहास गवाह है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने ना कभी किसी के साथ अन्याय किया ना किसी के साथ अन्याय होने दिया । वे न्याय का दूसरा नाम बने । सम्राट विक्रमादित्य ने सम्पूर्ण भारतवर्ष को तो सुरक्षित किया ही अपितु सम्पूर्ण पृथ्वी पर भी शांति स्थापित की । उन्होंने छोटे बड़े युद्ध सीमा विवाद को खत्म कर दिया । छोटे छोटे राज्य के सीमा विवाद को खत्म कर एक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया । सम्राट विक्रमादित्य के साहस का ही परिचय था जो वे यह सब कर पाए उन्होंने अपना साहस सदैव धर्म रक्षा के लिए ही उपयोग किया । सम्राट विक्रमादित्य ने सभी राजा महाराजा को समान रूप से एकत्रित भी किया । वह एकता के सूत्र में बांधा ।

तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य 
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य

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