तेइसवां गुण प्रजा प्रेमी
।। तेइसवां गुण प्रजा प्रेमी ।।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य यज्ञ कर रहे होते है सभी ब्राह्मणों और संतों के साथ । यज्ञ चल रहा होता है उस वक्त के संत आते है ।
संत - राजन् राजन् ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम ऋषिवर । आप इतना घबराएं हुए क्यो है ? क्या हुआ है बताइए हमें ।
संत - आपका कल्याण हो राजन् । राजन् हमारे आश्रम के कुछ शिष्य वनों में लकडिया लेने गए थे । वो छ शिष्य अभी तक नही लौटे । उन्हे गुफा में रहने वाले दो राक्षसों ने उठाया है और वो उन्हे पहाड़ी पर ले गया वही वो उनकी बलि देगा । अब उनके प्राण आपके भरोसे है राजन् ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप चिंता ना करे हम उन सभी को बचाएंगे । आप निश्चिंत रहे जरूरत पढी तो हम अपने प्राण देकर भी उन शिष्यों को बचाएंगे । आप यही रूकिए ऋषिवर यही विश्राम करिए हम आपको वचन देते है आपके शिष्य आपके पास होंगे । मंत्री जी ऋषिवर के रूकने का प्रबंध करिए । और महारानी चित्रलेखा तक हमारा संदेश भेजिए की हमें तलवार देकर विदा करे ।
मंत्री - जो आज्ञा ।
" सम्राट विक्रमादित्य योद्धा के वस्त्र पहन तैयार होते है । महारानी चित्रलेखा उनकी आरती उतार कर उन्हे तलवार भेंट करती है । महाराज आप सकुशल आइएगा । सम्राट विक्रमादित्य - हम प्रयास करेंगे महारानी । महारानी चित्रलेखा - नही महाराज आप हर बार प्राण संकट में डालते है प्रजा के लिए और हमे विश्वास होता है की आप सकुशल आएंगे किंतु इस बार बात कुछ अलग है आप हमें वचन दिजिए आप सकुशल आएंगे । सम्राट विक्रमादित्य - हम वचन तो ऋषिवर को दे आए आपको नही दे पाएंगे किंतु आप अपना ध्यान रखिएगा चलते है जय मालवा । महारानी चित्रलेखा - जय मालवा महाकाल आपकी रक्षा करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी महाकाल तो सदैव हमारे हाथ है । "
सम्राट विक्रमादित्य अश्व पर बैठ ही रहे होते है कि सेनापति भी अश्व पर बैठ कर आ जाते है ।
सेनापति - सम्राट में भी आपके साथ चलूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही सेनापति यह कोई युद्ध नहीं है हम आपके प्राण संकट में नही डाल सकते । वहां हमे अकेले ही जाना होगा ।
सेनापति - सम्राट हमारे प्राण तो आपके ही लिए है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही हमारे लिए नही आपके प्राण उज्जैनी के लिए है और आप यही रहेंगे हमें यकीन था आप मित्रता निभाना अवश्य आएंगे किंतु आप यही रहीए बस यह देखिएगा की कोई राक्षस उज्जैनी में ना आ पाए ।
सेनापति - जो आज्ञा सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य घोडे से उस पहाड़ी पर जाते है ।
वही राक्षस उन बच्चो को डरा रहे होते है कई शिष्य रो रहे होते है । तभी एक राक्षस कहता है और रो बच्चो और रो मुझे रोते हुए बच्चे बहुत अच्छे लगते है ।
शिष्य - हमें जाने दो हमने तुम्हारा क्या बिगाडा है हमें जाने दो ।
राक्षस - जाने के लिए थोडी तुम्हे लाए तुम सबकी बलि देंगे हम दोनो भाई हा हा हा हा । हम पहले तुम्हारी गर्दन काटेंगे फिर तुम्हे खाएंगे ।
शिष्य - बचाओ हमें कोई बचाओ ।
राक्षस - यहाँ कोई नही आएगा तुम्हे बचाने चिल्लाते रहो । पहले किसे खाऊँ इसे या उसे ।
शिष्य - बचाओ हमें ।
राक्षस - कोई नही आएगा इसे ही खाता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - रूको जब तक में हूं तब तक धरती पर ऐसा अधर्म कोई नही कर पाएगा ।
राक्षस - कौन हो तुम ?
सम्राट विक्रमादित्य - में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हूं ।
राक्षस - तो तुम हो विक्रमादित्य तुम बचाओगे इन्हे ।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम्हे इन बच्चो को मार कर क्या मिलेगा क्यो पकडा है इन्हे ।
राक्षस - हम इनकी बलि देंगे उससे हमारी उम्र बढ़ेगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - विक्रमादित्य के होते हुए ऐसा अन्याय कभी नही होगा । हम तुमसे लड़ेगे ।
राक्षस - हम तुम्हे भी मारेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य और एक राक्षस का बड़ा भीषण युद्ध चलता है विक्रमादित्य उस राक्षस के उपर चढकर उसे नीचे गिरा देते है उसे हरा देते है तभी दूसरा राक्षस उन बच्चो की शीश पर तलवार रख देता है । विक्रमादित्य मेरे भाई को छोडो वरना में इन बच्चो को मार दूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - पीट पीछे क्या वार करते हो लड़ो युद्ध हमसे ।
राक्षस - तुम्हारे सिद्धांत हमारे पास नही है विक्रमादित्य हम तो राक्षस है छल हमारा काम है ।
मेरे भाई को छोडो ।
सम्राट विक्रमादित्य - एक ही शर्त पर तुम उन छात्रों को छोडो ।
पहला राक्षस - नही भाई ऐसा मत करना मुझे मरने दो और तुम इन सभी को मार दो में जीवित हो जाऊंगा क्योकि बलि देते ही मेरी उम्र में भी वृद्धि हो जाएगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही उन मासूम बच्चो को कुछ मत करो हम तुम्हारे भाई को छोड़ते है । और बलि ही लेना है तो हमारी लो इन सभी को छोड़ दो ।
राक्षस - ठीक है भाई सम्राट विक्रमादित्य की बलि की तैयारी करो और इनकी आखों पर पट्टी बांधो ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर पहले इन सभी को महल छोड़ कर आओ ।
राक्षस - ठीक है ।
राक्षस उन सभी छात्रों को महल के बाहर छोड़ देता है ।
राक्षस सम्राट विक्रमादित्य को माँ काली की प्रतिमा के सामने बलि के लिए खडा करता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - जय माँ काली ।
राक्षस - तुम्हारी आखों पर तो पट्टी है तुम्हे कैसे पता किसके सामने हम बलि दे रहे है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम माँ काली को ना पहचाने ऐसा हो नही सकता । तुमने हमारी आखों पर पट्टी बांधी है मेरे मन की आखों पर नही ।
राक्षस - तुमसे महामूर्ख राजा हमने नही देखा पराए लोगों के लिए अपनी जान दे रहे हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम महामूर्ख नही है क्योकि हमारा तो सौभाग्य है मर कर भी हम अमर हो जाएंगे । और वो बच्चे हमारे लिए पराए नही है हमारे राज्य का हर वक्ति हमारा अपना है चाहे हम उसे जाने या ना जाने हमने हमारा धर्म निभाया है । हमने हमारा प्रजा प्रेमी का कर्तव्य निभाया है ।
राक्षस - ठीक है तो अपनी मृत्यु के लिए तैयार हो जा ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे देवी माँ काली हमें अपने चरणों में जगह देकर मोक्ष प्रदान करना । हे देवी माँ हमारे इस राज्य की रक्षा करना और हमारे मालवा को यह सौभाग्य पुनः देना जो आपने हमें दिया विश्व संचालन का । हमारी यह पृथ्वी वासियों से मित्रता का गुण हमारे पुत्र में भी देना ।
राक्षस - आज हम दोनों भाईयों की सभी इच्छा पूरी हो जाएगी । लाओ भाई फरसा दो हम इसकी बलि देते है । विक्रमादित्य अब तुम गए ।
" अचानक ठंडी हवा चलती है और वो दोनो राक्षस अपने असली रूप में आ जाते है धन्य हो राजन् अपनी प्रजा के सबसे आखिरी वयक्ति के लिए भी अपने प्राण बलि के लिए देने को तत्पर हो गए " सम्राटविक्रमादित्य की पट्टी हट जाती है वे देखते है उनके सामने इंद्र देव और पवन देव प्रकट हो जाते है "
इंद्र देव - विक्रमादित्य तुम जैसा मित्र पाकर में धन्य हो गया । अपनी प्रजा के सबसे आखिरी व्यक्ति यानी की राज्य की सीमा पर बसे आश्रम के बच्चो के लिए भी मन में इतना प्रेम । तुम्हे यज्ञ करते हुए देखा तो लगा कि विक्रमादित्य सांसारिक चीजों का तो दान करते है समय आने पर अपने प्राणों का दान करते है या नही । किंतु आप हमारी परीक्षा में सफल हुए मित्र । आप धन्य है और धन्य है भारत देश की प्रजा और धन्य है आपका मालवा जहां आप जैसा वीर जन्मा । आपका प्रजा प्रेम ब्रह्मांड में सबसे बड़ा उदाहरण है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद देवराज धन्यवाद पवन देव । देवराज आपकी मित्रता पाकर हम भी धन्य है ।
" तो ऐसे थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिनके लिए प्रजा का हर व्यक्ति उनके लिए महत्वपूर्ण था उनके लिए वो अपनी जान तक देने को तैयार थे आज वे सबके सामने सबसे बड़ा उदाहरण है प्रजा के हित के लिए "
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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