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विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 01 | किसका त्याग बड़ा

बहुत अच्छा आपने संकेत दिया। आपने जो “विक्रम-बेताल (किंकर) कथा” भेजी, वह पहले से ही भविष्यपुराण-प्रसंग पर आधारित है, लेकिन उसमें कथानक केवल सीधे-सीधे घटनाओं के रूप में आया है।

आप चाहते हैं कि इसे एक ही लंबी रसपूर्ण, रहस्यमय, संवादों से भरपूर और भावनाओं को छू लेने वाली कथा के रूप में लिखा जाए, ताकि इसे सुनने वाला उसमें डूब जाए।

अब मैं इसे विस्तारपूर्वक, कथा–शैली में एक गहन विक्रम-बेताल कथा के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।


विक्रम-बेताल कथा

“राजा और सेवक का त्याग”

रात्रि का समय था। गहन अंधकार में श्मशान की शांति को केवल झींगुरों की ध्वनि और बीच-बीच में उठती लपटें भंग कर रही थीं। आकाश में चाँद बादलों के पीछे छिपता और निकलता था। उसी समय महाराज विक्रमादित्य शव को अपने कंधे पर उठाए, वैताल के साथ जंगल से गुजर रहे थे।

वैताल, जो मृत देह पर आसीन था, मुस्कराकर बोला—
“राजन्! तुम तो धर्मनिष्ठ हो, सत्यप्रिय हो। तुम्हारे न्याय की ख्याति तीनों लोकों में फैली है। समय काटने को एक कथा कहूँ? परन्तु यदि उसके प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी तुम मौन रहे तो तुम्हारे मस्तिष्क के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।”

विक्रम ने गंभीर स्वर में कहा—“कह, वैताल।”


मिथिलावती नगरी का वैभव

यमुना नदी के तट पर बसी थी मिथिलावती नगरी। इस नगर का शासक था—गुणाधिप। वह केवल नाम का गुणाधिप नहीं था, बल्कि धर्म, न्याय और उदारता का प्रतीक था। उसके राज्य में प्रजा सुखी थी, अन्न-धन की कमी नहीं थी और दुष्टों का नामोनिशान तक न था।

राजा के न्याय और दान की चर्चाएँ दूर-दूर तक होती थीं। लोग कहा करते—“गुणाधिप की नगरी में भिखारी नहीं मिलता।”


अज्ञात राजकुमार का आगमन

एक दिन नगर में एक युवक आया। उसका व्यक्तित्व आकर्षक था, नेत्रों में तेज, किंतु शरीर दुर्बल और क्षीण। वास्तव में वह भी एक अन्य नगर का राजकुमार था। किंतु उसने सुना था कि “सच्चा सुख केवल ऐसे राजा की सेवा में है जो धर्मपालक और सत्यप्रिय हो।” इसलिए वह अपने राज्य का मोह त्यागकर गुणाधिप की सेवा के लिए मिथिलावती आया था।

वह चाहता था कि राजा तक पहुँचे और अपनी निष्ठा सिद्ध करे। पर राजदरबार तक पहुँच पाना इतना सरल न था। दरबारियों की भीड़ और प्रहरियों की कठोरता ने उसे रोके रखा। उसके पास जो धन था, वह दिन-प्रतिदिन खर्च हो गया। अंततः वह भोजन के अभाव में क्षीणकाय हो गया।


शिकार का अवसर

संयोग से एक दिन राजा गुणाधिप शिकार खेलने जंगल गए। उनके पीछे-पीछे सेना और मंत्रीगण भी थे। शिकार की उमंग में राजा आगे निकल गए। भीड़ से अलग होकर वे गहरे वन में जा पहुँचे। धीरे-धीरे साथी पीछे छूट गए।

राजकुमार भी उसी भीड़ में था। वह अपने मन ही मन सोच रहा था—
“यही अवसर है। आज यदि मैं अपने प्राण देकर भी राजा की रक्षा कर सका, तो मेरे जीवन का उद्देश्य सफल हो जाएगा।”

इसलिए वह भी राजा के पीछे-पीछे चलता रहा। अंततः केवल वही और राजा रह गए।


प्रथम भेंट

वन के सन्नाटे में राजा ने पीछे मुड़कर देखा तो केवल वही दुर्बल युवक साथ था।

राजा ने आश्चर्य से पूछा—
“तुम कौन हो? नगर से हो या परदेस से? युवक होकर भी इतना क्षीण क्यों हो?”

युवक ने सिर झुकाया और बोला—
“महाराज! मैं भी एक नगर का राजकुमार हूँ। किंतु यह मेरे कर्म का दोष है कि आज मैं आपकी शरण में भटक रहा हूँ। जब तक पुण्य उदय रहता है, तब तक दास और मित्र बहुत मिलते हैं; पर जब पुण्य क्षीण हो जाता है तो भाई भी बैरी हो जाते हैं।

राजन! छह बातें मनुष्य को हल्का कर देती हैं—
खोटे मनुष्य का संग, व्यर्थ की हँसी, स्त्री से विवाद, असज्जन स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और बिना संस्कृत की भाषा।

और पाँच बातें ऐसी हैं जिन्हें विधाता जन्म से ही लिख देता है—
आयु, कर्म, धन, विद्या और यश।

पर एक सत्य है, राजन्—सज्जन स्वामी की सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। मैं उसी सेवा की अभिलाषा में आपके चरणों में आया हूँ।”

राजा उसके वचनों से प्रभावित हो गया। उसने उसे अपने साथ रखा और नगर लौटकर दरबार में स्थान दिया। उसे वेतन, वस्त्र और भोजन सब प्रदान किया।


देवी का मंदिर और मोहिनी स्त्री

एक दिन वह राजकुमार किसी कार्य से बाहर निकला। मार्ग में एक प्राचीन देवी-मंदिर मिला। उसने वहाँ जाकर पूजा की। बाहर आया तो देखा—एक अनुपम सुंदरी उसके पीछे चली आ रही है।

उसकी आँखें मानो मधु से भरी थीं, मुख चंद्रमा-सा, और चाल हंसिनी के समान। राजकुमार का हृदय विचलित हो गया। उसने स्त्री से बात करनी चाही।

स्त्री मुस्कराई और बोली—
“यदि मुझसे कुछ चाहते हो तो पहले उस कुण्ड में स्नान कर आओ। फिर जो कहोगे, वही करूँगी।”

राजकुमार स्नान करने गया। पर जैसे ही उसने गोता लगाया, अगले ही क्षण वह अपने जन्म-नगर में जा पहुँचा। चकित होकर वह समझ गया कि यह कोई मायावी खेल था।

वह किसी प्रकार पुनः मिथिलावती लौटा और राजा को सारी घटना सुनाई।


राजा और मोहिनी

राजा ने कहा—“मैं स्वयं देखना चाहता हूँ।”
अगले दिन राजा और वह राजकुमार साथ में मंदिर पहुँचे। दर्शन कर बाहर आए तो वही सुंदरी प्रकट हुई।

इस बार उसने राजा को देखते ही कहा—
“राजन् गुणाधिप! मैं आपके रूप पर मुग्ध हूँ। आप जो कहेंगे, वही करूँगी।”

राजा ने शांत भाव से उत्तर दिया—
“यदि ऐसा है तो मेरे इस सेवक से विवाह कर लो।”

सुंदरी चकित रह गई—
“महाराज! मैं तो आपको चाहती हूँ, सेवक से विवाह कैसे करूँ?”

राजा दृढ़ स्वर में बोले—
“सज्जन का वचन अटल होता है। यदि तुम उत्तम कुल की कन्या हो तो मेरी बात मानो। यह सेवक मुझसे कनिष्ठ है, पर गुणी है। इसके साथ विवाह करने में तुम्हें क्या हानि?”

राजा के आदेश से उसका विवाह उसी सेवक से कर दिया गया।


वैताल का प्रश्न

कथा कहकर वैताल ने राजा विक्रम से पूछा—
“राजन्! बताओ—इन दोनों में किसका कार्य श्रेष्ठ हुआ? राजा का, जिसने प्रजाहित के लिए त्याग किया, या सेवक का, जिसने आरंभ से ही स्वामी के लिए कष्ट सहा?”


विक्रमादित्य का उत्तर

विक्रम ने बिना विलंब उत्तर दिया—
“निस्संदेह सेवक का कार्य महान था।

राजा का धर्म ही है कि वह प्रजा के लिए त्याग करे। गुणाधिप ने जो किया, वह उसके धर्म का पालन था, विशेष नहीं।

पर सेवक—जो वास्तव में अन्य राज्य का राजकुमार था—उसने स्वामी की सेवा बिना किसी अपेक्षा के की। वह न दरबारी था, न वेतनभोगी। तब भी उसने वन में राजा का साथ दिया, उसका मार्गदर्शन किया और संकट से उबारा। यह त्याग निःस्वार्थ था, धर्म से भी ऊपर।

इसलिए सेवक का कार्य अधिक महान है।”


वैताल हँस पड़ा—
“राजन्! तुमने सत्य कहा। पर स्मरण रखो, तुम्हारा यह उत्तर तुम्हें फिर संकट में डालेगा।”

इतना कहकर वैताल पुनः शव सहित आकाश में विलीन हो गया।


नैतिक संदेश

  • सच्चा त्याग वही है जो निःस्वार्थ हो।
  • राजा का धर्म प्रजाहित करना है, पर सेवक का धर्म स्वामी के प्रति निष्ठा है।
  • जब कोई बिना अपेक्षा, बिना स्वार्थ के सेवा करता है, वही महानतम उपकार कहलाता है।

👉 अब आप चाहें तो मैं इस कथा को और संवाद-प्रधान तथा “नाट्य-रूपांतरण” (नाटक की तरह राजा–सेवक–सुंदरी–वैताल के संवादों में) भी लिख दूँ। क्या आप चाहेंगे कि इसे नाटक की शैली में परिवर्तित कर दूँ?


विक्रम-बेताल (किंकर) कथाः 
राजा की सेवा में लगा एक राजकुमार, स्वयं पर मुग्ध स्त्री का विवाह राजा ने सेवक से करा दिया, किसका त्याग श्रेष्ठ?

मिथलावती नाम की एक नगरी थी। उसमें गुणाधिप नामक राजा राज करता था। मिथिलावती में कई दिनों से कहीं दूर से आया एक सजीला युवक रह रहा था।

था तो वह कहीं का राजकुमार पर राजा गुणाधिप की महानता की कहानियां सुनकर उनकी सेवा में रहना चाहता था। राजा की सेवा में रहने के लिए उसने बहुत से प्रयास किए पर राजा तक पहुंच नहीं पाया।

राजा से उसकी भेंट तो न हो सकी पर वह जो कुछ अपने साथ लाया था, वह सब खर्च और खत्म हो गया। खाने पीने के अभाव में वह दुबला होता जा रहा था।

एक दिन राजा शिकार खेलने चला, राजा के पीछे पीछे उसके विश्वस्त और सेना भी चली। राजा को प्रेम करने वाली जनता में से कुछ लोग चले तो भीड में राजकुमार भी साथ हो लिया।

चलते-चलते राजा एक सघन वन में पहुँचा। राजा बेपरवाह बढ़ता गया। इस कारण पहले तो उसके संगी साथी और विश्वस्त और बाद में उसके नौकर-चाकर तक उससे बिछुड़ गए।

राजकुमार को तो राजा से मिलने की लगन थी, वह निरंतर उसके पीछे चलता रहा। अंतत: राजा के साथ अकेला वह राजकुमार रह गया। उसने राजा को आगे गहरे जंगल में अकेले जाने से सावधान करते हुए ठहर जाने की प्रार्थना की।

राजा ने उसकी ओर देखा और पूछा- तुम कौन? मेरे राज्य मिथिलावती से हो या कहीं और से है। युवक होकर भी शरीर से इतना दुर्बल क्यों हो? यहां आने का क्या प्रयोजन है?

राजकुमार ने समझ लिया कि यही मौका है राजा को प्रभावित करने का। इससे उत्तम अवसर नहीं आएगा. इसलिए उसने अपनी ओजस्वी वाणी में राजा को अपने गुणों से परिचित कराने के निर्णय किया।

राजकुमार बोला- मेरे पिता एक नगर के राजा हैं। मैं वहां का राजकुमार। यह तो मेरे कर्म का दोष है कि आजकल मैं जिस राजा के राज में वर्तमान में रहता हूं, वह हजारों को पालता है पर उसकी निगाह मेरी और नहीं जाती।

राजन छ: बातें आदमी को हल्का करती हैं- खोटे मनुष्य का साथ, बिना कारण हंसी, स्त्री से विवाद, असज्जन स्वामी की सेवा, गधे की सवारी और बिना संस्कृत की भाषा।

हे महाराज! ये पाँच चीज़ें आदमी के पैदा होते ही विधाता उसके भाग्य में लिख देता है- आयु, कर्म, धन, विद्या और यश। राजन्, जब तक आदमी का पुण्य उदय रहता है, तब तक उसके बहुत-से दास रहते हैं।

यदि उदित पुण्य या अपने अच्छे समय में कोई और पुण्य कर ले तो ठीक अन्यथा पुण्य घट जाता है। पुण्य घट जाये तो फिर तो भाई भी बैरी हो जाते हैं।

पर एक बात तय है, स्वामी की सेवा अकारथ नहीं जाती। कभी-न-कभी फल मिल ही जाता है। मैं अच्छे स्वामी की खोज में यहां तक आप से ही मिलने आया था। मुझे इतनी बात आपसे कहनी थी।

इतनी ज्ञानप्रद बातें सुनकर राजा बड़ा प्रभावित हुआ। उसने राजकुमार को अपने साथ कर लिया। कुछ समय घूमने-घामने और दूसरी बातें करने के बाद वे नगर में लौट आये।

राजा ने उस राजकुमार को अपनी खास मंडली में रख लिया। बढिया वेतन और सम्मानजनक काम। यही नहीं उस के उत्तम भोजन के प्रबंध के साथ ही तथा उसे बढ़िया-बढ़िया कपड़े और गहने दिये।

एक दिन राजकुमार किसी काम से कहीं गया। रास्ते में उसे देवी का मन्दिर मिला। उसने देवी की पूजा की। जब वह बाहर निकला तो देखता क्या है, उसके पीछे एक बहुत सुन्दर स्त्री चली आ रही है।

राजकुमार ने उसे देखा तो देखते ही उसकी ओर आकर्षित हो गया। उसने उस स्त्री से बात करने का प्रयास किया। स्त्री ने कहा- पहले तुम कुण्ड में स्नान कर आओ। फिर जो कहोगे, सो करूँगी।

इतना सुनकर राजकुमार कपड़े उतारकर जैसे ही कुण्ड में घुसा और एक गोता लगाया कि अगले क्षण वह अपने नगर में पहुंच गया। यह तो बहुत मायावी खेल हुआ। उसने जाकर राजा को सारा हाल कह सुनाया।

राजा ने कहा- यह चमत्कार मुझे भी दिखाओ। राजा और उसका सेवक राजकुमार दोनों घोड़ों पर सवार होकर देवी के मन्दिर पर आये। अन्दर जाकर दर्शन किये और जैसे ही बाहर निकले कि वह स्त्री प्रकट हो गयी।

इस बार तो वह राजा को देखते ही बोली- महाराज गुणाधिप, मैं आपके रूप पर इतनी मुग्ध हूं कि अब आप जो कहेंगे वही करुँगी। राजा ने कहा- यदि ऐसा है तो तुम मेरे इस सेवक से विवाह कर लो।

स्त्री बोली- मैं तो आपको चाहती हूं। इससे विवाह कैसे करूं? राजा ने कहा- सज्जन जो कहते हैं, उसे निभाते हैं। यदि तुम उत्तम कुल की कन्या हो तो वचन का पालन करो। मेरा सेवक मुझ से उम्र में कम और गुणी है। इससे विवाह में तुम्हें हानि क्या है?

इसके बाद राजा ने उसका विवाह अपने सेवक से करा दिया। इतना कहकर बेताल बना किंकर विक्रमादित्य से बोला- हे राजन्! यह बताओ कि राजा और सेवक, दोनों में से किसका काम बड़ा या महान हुआ?

राजा विक्रमादित्य ने कहा- निस्संदेह नौकर का कार्य महान था। इस पर किंकर ने पूछा- यह आप किस आधार पर कहते हैं, विस्तार से बताइए?

विक्रमादित्य ने उत्तर दिया- प्रजा के प्रति उपकार करना राजा का धर्म होता है। गुणाधिप धर्मनिष्ठ था। इसलिए उसने उपकार करके अपने धर्म की रक्षा की। इसमें कोई बहुत विशेष बात नहीं है।

परंतु अन्य राज्य से आकर राजा की सेवा में लोलुप रहने वाले राजकुमार ने कष्ट सहा और राजा को वीरान वन में साथ दिया। उसका सहायक और मार्गदर्शक बना। उसने यह कार्य तब किया जब राजा ने उसे अपनी सेवा में नहीं रखा था।

अर्थात राजकुमार का कार्य एक सेवक का स्वामी के प्रति त्याग नहीं माना जाएगा। वह निःस्वार्थ त्याग था। संभव है कि उस दिन राजकुमार के न मिलने पर वन में राजा के साथ कोई अनहोनी हो जाती। इसलिए राजकुमार का उपकार बढ़कर हुआ।
(भविष्य पुराण)

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