विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 02

ठीक है। आपने जो अध्याय २ “कलियुग के इतिहास समुच्चय का वर्णन” दिया है, वह पहले से ही विक्रम–बेताल शैली में एक उत्कृष्ट कथा है। लेकिन जैसा आप चाहते हैं – इसे और भी रसपूर्ण, रहस्यमय, चटपटी, भावनात्मक तथा विस्तारपूर्ण बनाया जा सकता है ताकि श्रोता पूरी तरह डूबकर सुनें।
मैं इसे एक ही बड़े लेख (लगभग महागाथा के रूप में) प्रस्तुत करता हूँ।


अध्याय २

कलियुग के इतिहास-समुच्चय का विस्तृत वर्णन

सूतजी बोले—
हे द्विजश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें वह अद्भुत प्रसंग सुनाता हूँ जिसे वैताल ने विक्रमादित्य जैसे चक्रवर्ती सम्राट के सामने उपस्थित किया था। कथा ऐसी कि सुनने वाले का मन विचलित हो जाए, सोचने पर विवश हो जाए, और साथ ही उसमें धर्म और नीति का रहस्य भी प्रकट हो।


धर्मस्थल नगरी का वैभव

यमुना जी के पवित्र तट पर धर्मस्थल नाम की एक नगरी बसी थी। यह नगरी स्वर्ण-रजत से चमकती, अन्न-धान्य से परिपूर्ण और चतुर्वर्ण–संघटन से सम्पन्न थी। नगर की गलियाँ मानो पुष्पों से सजी थीं, बाजारों में चहल–पहल थी और धर्म–अधर्म की रेखा स्पष्ट दिखाई देती थी। इस नगर का राजा था—गुणाधिप

गुणाधिप केवल नाम का नहीं बल्कि गुणों से भी युक्त राजा था। वह न्यायप्रिय, दानी और धर्मपालक था। नगरवासी उसे पिता समान मानते थे। राजा का पुरोहित था—हरिशर्मा, जो शास्त्रों का गहन ज्ञाता और यज्ञ-हवन का आचार्य था।

हरिशर्मा की पत्नी सुशीला, पतिव्रता और कर्तव्यनिष्ठ थी। उनके घर में दो संतानें थीं—

  • सत्यशील – पुत्र, जो अध्ययन के लिए सदैव तत्पर रहता।
  • मधुमती – कन्या, जिसका रूप, शील और सौंदर्य नगर की कन्याओं में अनुपम था।

मधुमती का यौवन और वर-खोज

जब मधुमती बारहवें वसंत में पहुँची, तो उसकी कांति और लावण्य मानो चंद्रमा की पूर्णिमा की भाँति खिल उठा। नगर भर में उसके रूप और गुण की चर्चाएँ होने लगीं।

पिता हरिशर्मा और भ्राता सत्यशील दोनों उसके विवाह हेतु योग्य वर की खोज करने लगे। परन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार्य था। इसी बीच राजा गुणाधिप का राजकुमार विवाह-बंधन में बंधा, और सत्यशील अपने अध्ययन हेतु काशी चला गया।


वामन ब्राह्मण का आगमन और कन्या की व्याकुलता

उसी समय नगर में एक वामन नामक ब्राह्मण आया। वह विद्वान् था, यौवन से परिपूर्ण था और तेजस्विता उसके मुख पर झलकती थी। मधुमती ने जैसे ही उसे देखा, उसका मन चंचल हो गया।
वह पहली ही दृष्टि में उस पर मोहित हो गई।

वियोगिनी चकोरी जैसे चंद्रमा के बिना व्याकुल होती है, वैसे ही मधुमती वामन के बिना व्याकुल रहने लगी। उसने भोजन का त्याग कर दिया, वस्त्राभूषणों से विरक्त हो गई और शयन भी छोड़ दिया। उसकी आँखें बस उसी ब्राह्मण की छवि ढूँढने लगीं।


सुशीला का निर्णय

माँ सुशीला ने जब पुत्री की दशा देखी, तो समझ गई कि कन्या मन से वामन को स्वीकार चुकी है। इसलिए उसने कुछ स्वर्ण और ताम्बूल देकर ब्राह्मण का वरण कर लिया।

परन्तु पिता हरिशर्मा ने प्रयाग में रहते हुए एक अन्य ब्राह्मण—त्रिविक्रम, जो वेद-वेत्ताओं में श्रेष्ठ था, को कन्या के लिए चुन लिया।

इधर, काशी में पढ़ते हुए सत्यशील ने अपने गुरुपुत्र केशव को देखकर उसे भी अपनी बहन के लिए उपयुक्त वर मान लिया।


तीन वर, एक कन्या

भाग्य का खेल देखिए—
एक ही कन्या के लिए तीन-तीन वर सामने उपस्थित हो गए।

  • वामन (जिसे कन्या स्वयं चाहती थी),
  • त्रिविक्रम (जिसे पिता ने चुना),
  • और केशव (जिसे भ्राता ने वरण किया)।

माघ कृष्ण त्रयोदशी, शुक्रवार के दिन, शुभ लग्न में विवाह का समय निश्चित हुआ। कन्या के रूप से मोहित वे तीनों ब्राह्मण वहाँ आ पहुँचे।


मृत्यु का आघात

परन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार्य था।
विवाह के उसी दिन, जब सब आनंद के वातावरण में डूबे थे, एक सर्प ने कन्या को डस लिया।

वह प्राण छोड़कर वहीं गिर पड़ी।
पूर्वजन्म के कर्म का प्रभाव इतना तीव्र था कि किसी भी उपाय से वह बच नहीं सकी।

तीनों वर, माता-पिता और नगरवासी विलाप करते रहे। अंत में हरिशर्मा ने वेद-विधानपूर्वक उसकी अन्येष्टि क्रिया सम्पन्न की।


विरह और भटकन

कन्या की मृत्यु के बाद तीनों ब्राह्मणों की दशा विचित्र थी—

  • त्रिविक्रम – विरह में तपस्वी बनकर भटकने लगा।
  • केशव – कन्या की अस्थियाँ लेकर तीर्थ-यात्रा पर निकल पड़ा।
  • वामन – भस्म लेकर चिता पर ही बैठ गया और उसी स्मृति में डूबा रहा।

संजीवनी-मंत्र की प्राप्ति

त्रिविक्रम भटकते-भटकते सरयू तट पर लक्ष्मणपुर पहुँचा। वहाँ रामशर्मा नामक एक ब्राह्मण ने उसका सत्कार किया। उसी दिन संयोग से उसके पुत्र की मृत्यु हो गई।

पत्नी विशालाक्षी विलाप करने लगी। तब रामशर्मा ने संजीवनी-मंत्र का जप करके पुत्र को पुनर्जीवित किया। आभारी होकर उसने वह संजीवनी-मंत्र त्रिविक्रम को भी प्रदान किया।

त्रिविक्रम ने उसी मंत्र की सिद्धि प्राप्त की और यमुना तट पर, जहाँ मधुमती का दाह हुआ था, उसका प्रयोग किया। उसी समय राजा गुणाधिप का पुत्र भी मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। मंत्र के प्रभाव से वह पुनर्जीवित हो गया।

कृतज्ञ होकर राजकुमार ने त्रिविक्रम से कहा—
“आपने मुझे जीवनदान दिया है। मनचाहा वर माँगिए।”

त्रिविक्रम ने कहा—
“केशव नामक ब्राह्मण जो कन्या की अस्थियाँ लेकर तीर्थ गया है, उसे बुलवाइए।”


पुनर्जन्म और धर्म-संकट

दूतों द्वारा सूचना पाकर केशव लौट आया और उसने अस्थियाँ त्रिविक्रम को सौंप दीं। संजीवनी-मंत्र से मधुमती जीवित हो गई।

अब समस्या और गहरी हो गई। कन्या ने तीनों ब्राह्मणों को सामने देखकर कहा—
“धर्म के अनुसार मैं उसी की पत्नी बनने के योग्य हूँ जिसके साथ मेरा वास्तविक नाता बनता हो। आप तीनों में से जो धर्मसंगत हो, उसी का वरण करूँगी।”

तीनों मौन हो गए।


विक्रमादित्य का निर्णय

यह प्रसंग सुनाकर वैताल ने विक्रमादित्य से पूछा—
“राजन्! अब तुम ही बताओ, वह मधुमती किसकी पत्नी होने के योग्य है?”

विक्रमादित्य ने मुस्कराकर उत्तर दिया—
“वह वामन की पत्नी है। क्योंकि जिसने जीवनदान दिया वह पिता के समान है, जिसने अस्थि-संग्रह किया वह भ्राता के समान है। परन्तु जिसके प्रति कन्या का मन आकृष्ट हुआ, वही उसका वास्तविक पति होने का अधिकारी है।”

वैताल हँस पड़ा और बोला—
“राजन्! तुम्हारा निर्णय न्यायसंगत है।”


कथा का सार

इस प्रकार यह कथा केवल प्रेम और मृत्यु की नहीं, बल्कि धर्म और नीति की परीक्षा भी है।

  • यह दिखाती है कि कर्म और भाग्य का खेल कितना विचित्र होता है।
  • यह सिखाती है कि माता-पिता, भ्राता और प्रियतम की भूमिकाएँ अलग-अलग होती हैं।
  • और यह बताती है कि स्त्री का मन ही उसका वास्तविक चुनाव है, चाहे संसार कुछ भी कहे।

श्री भविष्य महापुराण के प्रतिसर्ग पर्व में कलियुगीय इतिहास-समुच्चय वर्णन नामक दूसरा अध्याय समाप्त।


👉 अब प्रश्न यह है—क्या आप चाहेंगे कि मैं इस अध्याय को और महाकाव्यात्मक शैली (संवाद, भावनात्मक वर्णन, और रहस्यमयी वातावरण) में 10–12 हज़ार शब्दों तक विस्तार दूँ, ताकि यह संपूर्ण रूप से एक ग्रंथ जैसे पढ़ने योग्य हो जाए?



अध्याय २ (↓ नीचे दी गई कहानी भविष्य पुराण में दी गई वास्तविककहानी है)

कलियुग के इतिहास समुच्चय का वर्णन

सूत जी बोले- द्विजसत्तम ! उस वैताल ने प्रसन्नतापूर्ण होकर प्रसन्नचित्त वाले उस राजा से कहा । जो उस समय महासिंहासन पर सुशोभित हो रहा था । 

एक बार यमुना जी के तट पर धर्मस्थल नामक एक सुन्दर पुरी में, जो धन-धान्य से परिपूर्ण, एवं चारों वर्णों के मनुष्यों से युक्त थी, गुणाधिप नामक राजा राज्य कर रहा था । स्नान पूजन के लिए नियत हरिशर्मा नामक उनके पुरोधा (पुरोहित) थे । 
सुशीला नामक पतिव्रतपरायणा उनकी पत्नी एवं सत्यशील नामक पुत्र था, जो विद्याध्ययन के लिए कटिबद्ध रहता था । 

शील, रूप, और गुणों से सम्पन्न मधुमती नामक उनकी एक पुत्री भी थी ।  बारह वर्ष की अवस्था होने पर उसके विवाहार्थ पिता और भ्राता दोनों कन्यां के अनुरूप वर की खोज करने लगे। उसी बीच पिता राजकुमार के विवाह में और भ्राता सप्तशील अपने अध्ययनार्थ काशी चला गया । 

राजन् ! उस समय वामन नामक एक ब्राह्मण, जो रूप, शील एवं वयस्क था, हरिशर्मा के यहाँ आ पहुँचा । मधुमती कन्या उसे देखकर कामातुर हो गई उसने व्याकुल होकर भोजन, वस्त्र, पान और शयनं का त्यागकर दिया। केवल चन्द्र के वियोग में चकोरी की भाँति कामबाण की पीड़ा का अनुभव करने लगी । १-९ । 

सुशीला ने अपनी पुत्री की अवस्था और उस वामन ब्राह्मण को देखकर कुछ स्वर्ण द्रव्य के साथ ताम्बूल प्रदान द्वारा उसका वरण कर लिया । हरिशर्मा ने प्रयाग में किसी त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण को देखकर, जो वेद और वेदाङ्ग के तत्त्व का निष्णात ज्ञाता था, अपनी कन्या के निमित्त उसका वरण किया। 

उधर सत्यशील ने केशव नामक अपने गुरुपुत्र को अपनी बहिन के निमित्त वरण करके अत्यन्त आनन्द विभोर होता हुआ घर को प्रस्थान किया । 

माघकृष्ण त्रयोदशी शुक्रवार के दिन शुभ लग्न में कन्या का पाणिग्रहण करने के लिए वे तीनों ब्राह्मण उसके रूप पर मोहित होकर वहाँ पहुँच गये। 

उसी समय किसी सर्प ने उस कन्या को काट लिया, जिससे पूर्व कर्म के प्रभाव से उसे प्राण त्यागने पर प्रेत होना पड़ा। उस समय उन तीनों ब्राह्मणों ने उसकी प्राणरक्षा के लिए अनेक यत्न किया, पर विष की तीक्ष्णतावश वह स्त्री जीवित न रह सकी । 

ततपश्चात् हरिशर्मा ने वैदिक विधान द्वारा उसकी अन्येष्टि क्रिया समाप्त की । राजन् ! अपनी कन्या के गुणों के स्मरण द्वारा अत्यन्त मुग्ध होते हुए वे अपने घर लौट आये । १०-१६ । 

आये हुए उन ब्राह्मणों में त्रिविक्रम काम पीड़ित होकर अनेक दुखों का अनुभव करता हुआ कंधा (गुदड़ी) धारण कर देश-देशान्तर भ्रमण के लिए चल पड़ा। 

केशव ने महादुःखी होकर अपनी प्रिया की अस्थियों का संचय करके कामबाण से पीड़ित होकर एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ को प्रस्थान किया। और 

वामन उसके विरह से संतप्त होकर उसके भस्म को लेकर कामार्त एवं केवल पत्नी का ध्यान करता हुआ चिता पर बैठ गया । १७-१९। 

एक बार सरयू नदी के तट पर स्थित लक्ष्मण नामक नगर में किसी ब्राह्मण के दरवाजे पर भिक्षा के निमित्त त्रिविक्रम पहुँच गया । शिवध्यान का पारायण करने वाले रामशर्मा ने उस दिन भोजनार्थ अपने घर उस यती (संन्यासी) को बुलाया था । उनकी पत्नी विशालाक्षी अनेक भाँति के भोजन पात्र में आये हुए यति के सम्मुख रख रही थी, कि राजन् ! उसी समय उसका पुत्र अपने कर्म के प्रभाव से मृतक हो गया । पश्चात् उनकी सहचरी विशालाक्षी ने जब भर्त्सना करने पर भी पुत्रशोक से संतप्त होने के कारण रुदन करना बन्द नहीं किया। तब रामशर्मा ने संजीवनी मंत्र की प्राप्ति करके उसके जप और संमार्जन द्वारा पुत्र को जीवित किया । अनन्तर विनम्र होकर उस ब्राह्मण ने उस संन्यासी को भोजन कराकर उसे शुभसंजीवनीमंत्र भी प्रदान किया। त्रिविक्रम ने उस मंत्र की सिद्धि यमुना तट के उस स्थान पर प्राप्त की, जहाँ हरिशर्मा ने उस स्त्री (पुत्री) का दाह किया था। उसी समय वहाँ के राजपुत्र का निधन हो गया । उपरांत उसके पिता ने शोक संतप्त होकर उसका दाहकर्म किया। उस बालक ने भी उस मंत्र के प्रभाव से जीवदान प्राप्त किया । 

तदुपरांत राजा गुणाधिप के उस महाबली पुत्र ने जिसे उस मंत्र के प्रभाव से जीवनदान प्राप्त हुआ था, त्रिविक्रम से कहा- आप ने मुझे जीवनदान दिया है, अतः मन इच्छित वरदान माँग लीजिये । 

ब्राह्मण ने कहा- राजन् ! केशव नाम का ब्राह्मण जो अस्थियों को लेकर तीर्थ चला गया है, शीघ्र उसका अन्वेषण होना चाहिए। राजकुमार वीरबाहु ने दूत द्वारा अपनी जीवनदान प्राप्ति की कथा उससे कहला दिया । 

ऐसी बातें सुनकर केशव ने अस्थियों समेत मार्ग से ही वापस आकर उस ब्राह्मण (त्रिविक्रम) को समस्त अस्थियाँ प्रदान की । अनन्तर जीवित होने पर वह स्त्री केशव आदि उन तीनों ब्राह्मणों से कहने लगी कि धर्मतः मैं जिसकी स्त्री होने के योग्य हूँ, उसी धार्मिक के साथ मैं चलने के लिये तैयार हूँ । 

इसे सुनकर वे तीनों ब्राह्मण मौन हो गये । अतः धर्मज्ञ, विक्रमादित्य तुम्हीं इसका निर्णय बताओ कि वह मधुमती नामक कन्या किसकी स्त्री होने के योग्य है । २०-३५

सूत जी बोले- नम्रता पूर्वक राजा विक्रमादित्य ने हँसकर वैताल से कहा- वह मधुमती कन्या उस वामन नामक ब्राह्मण की स्त्री होने के योग्य है । क्योंकि प्राण देने वाला पिता के समान और अस्थि देने वाला, भ्राता के समान होता है । ३६-३७

श्री भविष्य महापुराण के प्रतिसर्ग पर्व में कलियुगीय इतिहाससमुच्चय वर्णन नामक दूसरा अध्याय समाप्त । २ ।


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