विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 04
अध्याय ४
कलियुगीय इतिहाससमुच्चय का वर्णन
सूत उवाच -इसे सुनकर वैताल ने राजा से पुनः कहा- परम अद्भुत एक भोगावती नामक नग है, जिसमें रूपवर्मा नामक राजा राज करता था । उसके बुद्धिविशारद एक शुक (तोता ) था, जिसका नाम चूडामणि बताया गया है। वह उस राजा के यहाँ एक सुन्दर पिंजरे में रहता था । तीस वर्ष की अवस्था होने पर किसी समय उस रूपवर्मा ने उस शुक से पूँछा - शुक ! मेरे योग्य कोई सुन्दरी है ! यदि है, तो बताओ ! उसे सुनकर उस शुक ने कहा- राजन् ! मगध देश के राजा की पुत्री, जिसका नाम चन्द्रावती है, आप के योग्य है, इस समय उसी का ग्रहण कीजिये । ऐसा सुनकर उस राजा ने गणेश नामक किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को यथेच्छ धन देकर उससे कहा- जिस प्रकार उसके साथ विवाह हो सके, वही कीजियेगा । यह गणेश नामक ब्राह्मण भी शीघ्रतया मगध देश में पहुँचकर वहाँ महादेव जी की प्रार्थना करके प्रसन्नचित्त से उनकी स्तुति करने लगा। शिव, शान्त, एवं समस्त अभीष्ट के प्रदायक को नमस्कार है, भव, शंकर एवं रुद्र के लिए अनवरत नमस्कार है । मृड, आनन्दरूप, तथा सम्पूर्ण दुःख के अपहरण करने वाले को नमस्कार है । इस प्रकार उस ब्राह्मण के स्तुति करने के समय में चन्द्रावती कामातुर होकर मदनमंजरी नामक मैना से कहने लगी- इस भूतल में मेरे योग्य कोई पुरुष है ? उसने कहा - भोगावती पुरी का राजा रूपवर्मा तुम्हारे योग्य हैं। यह सुनकर उस राजपुत्री ने मनोरथ सिद्धि करने वाली उस दुर्गा देवी का, जिसने इस जगत् का निर्माण किया है, मानसिक आराधना आरम्भ की । १-१२। हे जगत् की माता ! आप के लिए बार-बार नमस्कार है, आप मेरे कार्य की सिद्धि करने वाली हैं। आप त्रिलिंङ्ग की जननी, सनातनी वर्णमूर्ति हैं, स्वाहा, स्वधा, एवं संध्या भी आप ही हैं अतः आपको बार-बार नमस्कार है । हे शिवे ! राजा रूपवर्मा को मेरा पति कीजिये । इस प्रकार की स्तुति करने पर जगन्मयी जगदम्बा ने प्रसन्न होकर उसके पिता मगधेश, तथा माता को मोहित करके उसी मास के अन्त में उन दोनों का विवाह संस्कार सम्पन्न करा दिया। पश्चात् वे दोनों सुखोपभोग करने लगे ।१३-१६। एक दिन राजा ने मदन मंजरी नामक उस मैना से कहा कि तुम इस शुक के साथ अपना विवाह संस्कार सम्पन्न करा लो । मैना बोली- राजन् ! विवाह इस प्रकार का अच्छा होता है, जिसमें यथायोग्य स्त्री-पुरुष हो क्योंकि उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार के पुरुष होते हैं उसी प्रकार तीन भाँति की स्त्रियाँ भी होती है। अतः उत्तमा नारी अभ्रमपुरुषों के योग्य नहीं होती हैं क्योंकि राजन् ! इसका कारण जिस प्रकार मैंने देखा है, बता रही हूँ, सुनो ! इलापुर नगर में एक लक्षपति वैश्य रहता था, जिसका नाम देवाजी बताया जाता है। उसकी पत्नी पतिव्रता थी, किन्तु उसके कोई सन्तान नहीं थी । बहुत प्रयत्न करने पर महादुष्ट एक पुत्र उत्पन्न हुआ । द्यूत की क्रीडा, मद्यपान, और वैश्याओं का साथ करता हुआ वह महाधूर्त प्रतिदिन मांस का भक्षण भी करता था। उसके इस कुकृत्य को देखकर उसके माता और पिता दोनों ने बन में जाकर नरनारायण का ध्यान करके परमपद की प्राप्ति की। उसके पुत्र मदनपाल ने घर के समस्त धन का अपव्यय करके निर्धन होने पर अपने वृत्यर्थ (व्यापार के लिए) किसी अन्य देश की यात्रा की। उस यात्रा में वह उस रमणीक चन्द्रपुर में पहुँचा, जिसमें हेमपति नामक वैश्य रहता था। उसने उस सेठ से अपना समस्त वृत्तान्त कह सुनाया- मैं देवयाजी वैश्य का पुत्र हूँ, अपने पास थोड़ा-सा धन लेकर समुद्री मार्ग से इस प्रदेश में विक्रयार्थ आया था। पर महावायु के झकोरे से मेरा सम्पूर्ण द्रव्य जल में डूब गया । आर्य ! अतः लज्जावश मैं अपने माता-पिता के पास नहीं जा रहा हूँ । ऐसा सुनकर पति ने प्रसन्न होकर अपनी पत्नी काम मंजरी से कहा-ब्रह्मा ने यह उत्तम सुन्दर संयोग उपस्थित किया है, तुम्हारी सम्मति प्राप्त कर मैं पुत्री चन्द्रकांति का पाणिग्रहण इससे कराना चाहता । आपस में उन दोनों ने इस प्रकार मंत्रणा करके विधान पूर्वक उसे कन्यादान दे दिया । १९-२९। उपरांत अपने घर में ही उस जामाता मदनपाल को भी ठहराया। एक मास रहकर उसने विनम्र होकर अपने श्वसुर से कहा— हे धनाध्यक्ष ! मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये, मैं शीघ्र अपने गृह जाना चाहता हूँ । इसे सुनकर पति ने अपनी कन्या चन्द्रकान्ति को सुवर्ण के आभूषणों से सुसज्जित करके दासीसमेत उसके साथ भेज दिया । राजन् ! उस दुष्टात्मा ने (कुछ दूर जाकर ) पालकी के वाहक कहारों और इतर मनुष्यों को लौटाकर दासी का प्राण ले लिया । पश्चात् समस्तधन ग्रहणकर अपनी पत्नी को अकेली छोड़कर महानीच मदनपाल एकाकी गृह पहुँच गया। एक वर्ष के भीतर उस धन का कुमार्ग में अपव्यय करने पर पुन: भूखे रहकर अत्यन्त शोक करने लगा। तदुपरांत वह दुष्ट पुनः अपने श्वसुर के यहाँ पहुँचा । चंद्रकात अपने पति को देखकर नम्रता पूर्वक उससे बोली मैंने अपने पिता से कह दिया है कि चोरों ने मेरे धन का अपहरण किया है, अतः आप अपने संताप का त्याग कर इसी मेरे गृह में सदैव निवास करो । उसे स्वीकार कर उस महाधूर्त ने कुछ दिन वहाँ रहकर अपनी उस पत्नी को अत्यन्त मोहित समझकर एक दिन अंधेरी आधी रात के समय उसका प्राण का अपहरण करके उसके सम्पूर्ण आभूषणों को लेकर वहाँ से चल दिया । अतः कह रही हूँ कि राजन् ! तोता और मैना का विवाह संबंध करना अयोग्य होने के नाते अनुचित है । ऐसा सुनकर उस शुक (तोते) ने उस कारुणिक राजा से कहा- मैं इस प्रकार की अधम स्त्री से सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहता हूँ । क्योंकि यह मैना नारी के समान अधम और श्यामांगी होने के नाते कुरूपा है । राजन् ! मैं उत्तम शुक हूँ । राजन् ! मैं उस कारण को बता रहा हूँ, जिसे मैने स्वयं देखा है । कांचनपुर नामक नगर में शंखपति नामक एक बनिया रहता था । ३०-४१ । उसके पुत्र का नाम सिंधुगुप्त था, जो गुणी एवं धनी व्यक्ति था । उसकी पत्नी का नाम प्रभावती और पुत्र का श्रीदत्त नाम था । उसने जयश्री नामक नगर के निवासी सोमदत्त की पुत्री जयलक्ष्मी का पाणिग्रहण अपने पुत्र ( श्रीदत्त) के साथ सम्पन्न किया । पश्चात् श्रीदत्त ने अपने व्यापारार्थ कुरुदेश की यात्रा की। वहाँ से धन की राशि अर्जित करके बारहवें वर्ष अपने घर आया । इधर जयलक्ष्मी अपने पिता के गृह में रहती हुई एक दिन काम पीड़ित होने पर मंत्रीपुत्र सोमदत्त पर मोहित हो गई । उस महाअधम स्त्री ने दूती द्वारा उससे सम्पर्क स्थापित करके अधिक धन के अपव्यय समेत उसके साथ रमण कराना आरम्भ किया। तीन मास के उपरांत उसका पति श्रीदत्त अपनी ससुराल आया। उसे आया हुआ देखकर वह दुःख का अनुभव करने लगी । आधीरात के समय उसकी माता ने उसे उसके पति के पास भेजा । यद्यपि अत्यन्त क्रुद्ध होने के नाते जयलक्ष्मी का ओंठ स्फुरित हो रहा था, तथापि किसी प्रकार वहाँ गई । ४२-४८ । अत्यन्त सम्मान समेत अपने पति के . साथ स्नेह प्रकट कर अपने महल में लौट आई। पश्चात् वह व्यभिचारिणी उस दूती के घर गई तो देखा कि उस (संकेत वाले) शून्य घर में सोमदत्त किसी सर्प के काटने से निष्प्राण होकर पड़ा है। किन्तु वह स्त्री वहाँ पहुँच कर विषमुग्ध उस जारपुरुष के साथ वेग से रमण करने लगी । उसी स्थान के पीपल के वृक्ष पर रहने वाला कोई पिशाच उस सुन्दरी व्यभिचारिणी को देखकर उस शव की देह में प्रविष्ट होकर उस रमणी के साथ अत्यन्त रमण किया । पश्चात् दाँतों से उसकी नाक काट कर उसी पीपल पर पुनः चला गया। कोई कफल्ल नामक चोर उस घटना को देखकर उस कामिनी के पीछे-पीछे उसके महल में चला गया । ४९-५३ ।
उस समय वह अभागिनी जयलक्ष्मी अपने पति के समीप जाकर अत्यन्त रुदन करने लगी, जिससे कि सभी लोग वहाँ पहुँच आये । महाधनी सोमदत्त ने अपनी पुत्री को नाकविहीन देखकर अपने जामाता को बाँध कर शीघ्र राजा के यहाँ पहुँचाया। राजा के आदेश से राज कर्मचारीगण उसे फाँसी पर चढ़ाना चाहते थे कि उसी समय वही कफल्ल नामक चोर ने वहाँ पहुँच कर राजा से समस्त घटना का वर्णन किया । उसकी बातें सत्य मानकर राजा ने उस महानीच जयलक्ष्मी को, विरूप करके उसकी दुर्गति की गई. गधे पर बैठाकर अपने नगर से निकाल कर बाघ आदि जानवरों से युक्त किसी जगंल में भेज दिया। अतः नृप । मेरी बात सुनो मैना मेरे योग्य नहीं है । इतना कहकर वैताल ने नम्रता पूर्वक विक्रमादित्य से कहा - अधिक पाप करने वाली स्त्रियाँ होती हैं या पुरुष यह मुझे बताने की कृपा कीजिये । ५४-५९
विक्रम बोले- उस निर्गुण ब्रह्म की माया वर्ण स्वरूप और तम नपुंसक बताया गया है, अतः वही एक अव्यय ब्रह्म तीनों लिंगों वाला कहा जाता है। ब्रह्म का तेज अक्षीण और उसकी माया लिंगों (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग) का स्वरूप बतायी गयी है। उसी के द्वारा यह निखिल विश्व उत्पन्न हुआ हैं, अतः उस अम्बिका को नमस्कार है । नपुंसक स्त्री सदैव श्रेष्ठ होती हैं और स्त्री से अधिक पुरुष । व्याधिहीन पुरुष और नारी, अधिक कर्म करने वाली बतायी गई है । उसी प्रकार पण्डितों ने क्लीब (नपुंसक) में अज्ञान अधिक बताया है। पुरुष के लिए कर्म ही एक बन्धन और बन्धनहीन होना ज्ञान बताया गया है। अतः अधिक पाप कर्म करने वाली नारी और पाप कर्महीन पुरुष कहा गया है । ६०-६४
श्री भविष्यमहापुराण के प्रतिसर्ग पर्व में कलियुगीय इतिहाससमुच्चयवर्णन नामक चौथा अध्याय समाप्त |४|
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