विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 09

अध्याय ९

कलियुग के इतिहाससमुच्चय का वर्णन

सूतजी बोले - महाबुद्धे, शौनक ! उस महाकुशल राजा का सम्मान करता हुआ वैताल ने उनसे कहा--राजन् ! रमणीक कामपुर नामक नगर में राजा वीरसिंह न्याय और धर्म के अनुसार राज करता था। उसी नगर में धनी, मानी हिरण्यदत्त नामक वैश्य भी रहता था । रूप-यौवन सम्पन्न कामाला नामक उसकी पुत्री, जो सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी, कुसुमप्रिय होने के नाते वसंत के समय नित्य पुष्पों के लिए लालायित रहती थी । एक बार वह पुष्प-संचय के लिए भ्रमर गुंजित किसी उपवन में जा रही थी, उस समय उसे धर्मदत्त के पुत्र सोमदत्त ने देखकर बल प्रयोग करना चाहा कि उस निर्जन स्थान में उसने नम्रता पूर्वक कहा - महावीर ! अभी कन्या हूँ, अतः धर्मतः मुझे छोड़ दीजिये । १ ६ । विवाह हो जाने पर उसके दशवें दिन पहले आपकी ही सेवा करूँगी । अतः दयानिधे । दश दिन के लिए (मुझे मुक्त करने की ) आज्ञा प्रदान कीजिए। वह उसे स्वीकार करके अपने घर आया । उस कन्या के पिता ने उसी गाँव में मणिग्रीव वैश्य के पुत्र मदपाल के साथ उसका पाणिग्रहण कार्य सम्पन्न कर दिया । वह स्त्री अपने श्वसुर के घर जाकर अपने मित्र के प्रति चिंतित होने लगी । नवमें दिन कामातुर एवं मदांध होने के नाते (उसके स्वामी ने ) उस कामिनी को पकड़कर बलात् आलिंगन करना चाहा कि उसकी पत्नी उस पूर्व मित्र की बातों का स्मरण करके रुदन करने लगी। उस समय उसके पति ने शान्तिपूर्वक यह कहा—शोभने ! तुम्हारी आँखें तो मद से भरी दिखायी दे रही हैं, फिर क्यों रुदन कर रही हो, मुझसे सत्य कहो । उस सत्यवती ने उपवन में जो कुछ हुआ था उस को उसी ढंग से उससे कहकर यह भी कहा 'भीमसोमदत्त ! यदि मैं तुम्हारे समीप न आ सकी तो मैं अपना वैधव्य जीवन व्यतीत करती हुई उस पाप प्रायश्चित करूँगी !' इस प्रकार वचन बद्ध होने के नाते मैं उसके समीप अवश्य जाऊँगी । यह सुनकर उसके पति ने उसे जाने के लिए सहर्ष आज्ञा प्रदान किया ।७-१४। पश्चात् कुछ समय तक उसके पार्श्व भाग में शयन करने के उपरांत कामपीड़ित होकर वह कामिनी अपने मित्र के यहाँ गई । मार्ग में चोर ने उसे समस्त आभूषणों से सुसज्जित देखकर उसके लोभवश उससे कहा सुन्दरि ! कहाँ जा रही हो, इस रात्रि में तुम्हारा किसने सम्मान नहीं किया । भामिनि ! मुझसे सत्य कहो । मदांध होती हुई कामालसा ने उस चोर से कहा— काम - बाण से रक्षित होकर मैं अपने मित्र के यहाँ जा रही हूँ । चोर ने उससे कहा – सुभ्रु ! अबले ! अपना आभूषण मुझे दे दो, क्योंकि मैं चोर होने के नाते धन का ही ग्रहण करता हूँ । इसे सुनकर उसने कहा उस उपपति अपने मित्र के साथ आलिंगन करके तुम्हें आभूषण प्रदान करूँगी । इसे स्वीकार करके वह भी उसके साथ सोमदत्त के यहाँ गया। उस कामिनी को देखकर उस वैश्य ने कहा – कामालसे ! यहाँ किस प्रकार तुम्हारा आगमन हुआ शीघ्र सत्य बातें बताओ, पश्चात् तुम्हारी सेवा स्वीकार करूँगा । कामालसा ने सभी बातों का यथावत् वर्णन किया। इसे सुनकर विष्णुदेव द्वारा अवबोधित होने पर उसके हृदय में ज्ञान उत्पन्न हुआ । अनन्तर पतिव्रता मानकर उसकी परिक्रमा करके सम्मान पूर्वक लौटा दिया। विष्णुदेव द्वारा उसके कारण ज्ञान कराने पर वह चोर भी उसके पति के गृह में जाकर प्रवेश किया । अनन्तर वह कामालसा देवी अपने पातिव्रत धर्म के प्रभाव से देवाधिदेव द्वारा प्राप्त दिव्य विषयों का उपभोग कर जीवन व्यतीत करने लगी । इतना कहकर वैताल ने उस कोविद राजा से कहा- उनमें किसका सत्य श्रेष्ठ कहना चाहिए, मुझे बताइये । १५-२४
सूत जी बोले- ऐसा कहने पर राजा ने वैताल से कहा - श्रेष्ठ सत्यता चोर की है, मैं उसका कारण भी बता रहा हूँ, सुनो ! राजा के भय से उस वैश्य ने उस नारी का उपभोग नहीं किया, वैधव्य-भय के नाते वह देवी अपने मित्र के यहाँ गई । और उसके स्वामी ने धर्मभय के नाते अपनी पत्नी का उपभोग नहीं किया ! किन्तु चोर ने केवल सत्य के भय से सहर्ष उसका त्याग किया । २५-२८

श्री भविष्यमहापुराण मे प्रतिसर्ग पर्व में कलियुगीय इतिहाससमुच्चय वर्णन नामक नवाँ अध्याय समाप्त | ९|


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