विक्रम बेताल कथा (भविष्य पुराण) 10

अध्याय १०

कलियुगीय इतिहाससमुच्चय का वर्णन

सूत जी बोले - महाभाग ! वैताल ने राजा से यह कहा कि - महाराज ! गौड़ देश में वर्धन नामक नगर हैं, उसमें ख्यातिप्राप्त एवं धार्मिक गुणशेखर नामक राजा राज करता था। जैन धर्मानुयायी निर्भयानन्द नामक उनका मंत्री था। किसी समय राजा ने शिव जी के मन्दिर में जाकर उस सर्वव्यापी एवं ईश्वर शंकर जी की अर्चना की। उसी समय एक बिच्छू ने क्रुद्ध होकर राजा को काट लिया। उस दुःख से दुःखी होकर राजा मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। उस समय जैनधर्मी निर्भयानन्द ने उस विष का अपहरण करके राजा से कहा - महाभाग, राजन् ! इन छहों शत्रुओं का, जो मान संस्थित एवं अधम हैं, मैं वर्णन कर रहा हूँ, सुनो ! काम, क्रोध, लोभ, रति, हिंसा और तृष्णा ये छहों दोष रजोगुण से उत्पन्न होते है, इनका भेद पृथक्-पृथक् बताया गया है । १ ६ । मोह, दंभ, मद, ममता, तथा निन्दित आशा की जो जगत् में व्याप्त हैं, तमोगुण से उत्पत्ति हुई है । विष्णु कामी है, शिव क्रोधी, ब्रह्मा लोभी, इन्द्र दम्भी, यम मोही, और कुबेर अभिमानी हैं। इस प्रकार ये सभी देवगण माया के अधीन हैं अतः इनके पूजन करने से क्या लाभ हो सकता है । उपरोक्त छहों शत्रुओं द्वारा जिसकी हार हो गयी है, उसे मुनियों ने अजिन बताया है, और जिसने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया वह अद्वैतवादी रागादि हीन होने के नाते जिन कहा गया है । उसी के ध्यान एवं भाव रखने से मनुष्यों को मोक्ष की प्राप्ति होती है । पृथिवीपति ! उनकी प्रसन्नता के लिए जो धर्म बताया गया है मैं कहा रहा हूँ, सुनो ! गो-पूजन से वे देवगण भी सदैव प्रसन्न रहते हैं इसलिए गो-पूजन ही शुद्ध धर्म है क्योंकि हिंसा सर्वत्र वर्जित की गई है। मदपान करने से सर्वात्मा भूत जिन को कष्ट होता है, अतः मांस भोजन और मद्यपान कराना सदैव निषिद्ध कहा गया है । न्यायतः धन का उपार्जन करके भूखे को भोजन करना चाहिए। सूर्य ही जिनकी आत्मा कहे गये हैं अतः जैनियों को उनके प्रकाशित रहने पर ही भोजन करना चाहिए। इस प्रकार (जैन धर्म का वर्णन करके वह मंत्री घर चला गया। तथा उसकी बातें स्वीकार करके राजा ने जिन धर्म को ग्रहण किया। कुछ समय व्यतीत होने पर उन्होंने वेद-मार्ग का उल्लंघन कर दिया। उस समय उनकी रानी ने अत्यन्त दुःखी होकर भगवान् शिव की शरण प्राप्त की । ७ १६ । रुद्र के वरप्रदान द्वारा रानी के महान् उत्तम पुत्र हुआ । उस वेद-व्रत के पारायण करने वाले का धर्मराज नामकरण हुआ। पश्चात् राजा गुणशेखर का निधन हुआ जिससे उन्हें नरक की प्राप्ति हुई। उस समय धर्मराज स्वयं धार्मिक राज्य करने लगा। अनन्तर उसके धर्म के प्रभाव से उसके पिता को स्वर्ग की प्राप्ति हुई । धर्मराज के गुणानुरूप और अत्यन्त उत्तम प्रकृति की तीन स्त्रियाँ हुई। वसंत ऋतु में किसी समय वह राजा अपनी रानियों समेत एक उपवन में जिसमें पुष्पों के ऊपर भौंरे गुंजार कर रहे थे, जाकर रमण करने लगा । शान्त होने पर वह राजा स्त्रियों समेत मदमत्त होकर प्रसन्नता प्रकट करता हुआ किसी सरोवर में स्नान करने लगा । १७-२१। वह एक कमल पुष्प लेकर रानी के हाथ में अर्पित किया, किन्तु उस पुष्प के पतन होने से उसका चरण लँगड़ा हो गया । दुःखी होकर राजा ने उस रानी की चिकित्सा की । पुनः रात्रि के समय चन्द्रप्रकाश होने पर चन्द्रकी किरणों से मुग्ध होकर घबड़ाकर गिर गई, किंतु, (पहली स्त्री का ) चरण अच्छा हो गया । और उसके गिरने के शब्द सुनकर तीसरी स्त्री को ज्वर हो आया । उस समय दूसरी पत्नी की मूर्च्छा छूट गई । राजा के स्पर्श करने से उसका ज्वर भी दूर हो गया । सुन्दर प्रभात होने पर वह उन स्त्रियों को लेकर अपने घर आया । इतना कहकर नम्रता पूर्वक उस वैताल ने राजा से कहा महाराज ! इन स्त्रियों में कौन सुकुमारी श्रेष्ठ कही जायगी । २२-२६

राजा ने कहा- उनमें तीसरी स्त्री परमोत्तम है क्योंकि वायु प्रकृति होने से पहली स्त्री का चरण कमल पुष्प (के स्पर्श) से लंगड़ा हो गया, कफ के अधिक कष्ट होने से चन्द्र किरण के कारण दूसरी स्त्री मूर्च्छित हो गई और शब्द मात्र सुनकर तीसरी को संताप हो गया अतः यही सर्वोत्तम उसकी स्त्री है। पश्चात् शिवभक्त उस राजा से वैताल ने पुनः कहा- प्रधान जैन धर्म है या वेद धर्म ? उन्होंने कहा सनातन (नित्य) होने के नाते वेदधर्म प्रधान है । उस व्यक्त रूपी ब्रह्म (वेद) के आठ श्रेणियाँ हैं— शूद्र, वैश्य, क्षत्री, ब्राह्मण एवं ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी ये क्रमशः उत्तरोत्तर श्रेष्ठ बताये गये हैं । २७-३१।
देखकर हाथ में तलवार लिए उन मल्लों को कृष्णांश के हननार्थ भेजा । उन मल्लों को क्रुद्ध एवं रोषपूर्ण जानकर उस बलवान् कृष्णांश ने उनमें से एक-एक को भूमि में गिराकर विजय की प्राप्ति की । मल्ल सैनिकों के पराजित हो जाने पर राजा ने हाथ में तलवार लेकर उस कृष्णांश द्वारा अपने जीवन को समाप्त करने के लिए कटिबद्ध होने का निश्चय किया। राजा ने उन्हें इस प्रकार मरण के लिए निश्चित तैयार जानकर अभय को आरोग्य करके उसके समेत राजा को अपने यहाँ प्रेम-पूर्वक रखा । नवें वर्ष के आरम्भ में कृष्णांश ( उदय सिंह ) के आह्लाद ( आल्हा ) आदि कुमारों समेत मृगयार्थ जंगल के लिए प्रस्थान किया । उन्होंने प्रस्थान करते समय राजा से कहा - भूपश्रेष्ठ, तात ! सम्पूर्ण आनन्द को प्रदान करने वाले आप परमकारुणिक हैं अतः हमें उन प्रिय घोड़ों को दे दीजिये । उसे सुनकर राजा ने उसे स्वीकार करते हुए अत्यन्त हर्षमग्न होकर उन चारों कुमारों के लिए पृथिवी निवासी चार दिव्य घोड़े प्रदान किये, जो हरिणी नामक घोड़ी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे । ३१-३७

ऋषियों ने कहा - मुने ! सूत ! भीष्मसिंह को देवेश इन्द्र के द्वारा वह हरिणी घोड़ी जिस प्रकार से प्राप्त हुई थी, हम लोगों ने आपके द्वारा उसे सुन लिया । अब यह सुनने की इच्छा है कि ये घोड़े, जो कुमारों को राजा द्वारा प्राप्त हुए हैं और जो दिव्यभूषणों से सुसज्जित एवं नभ (सलिल) चारी हैं, किस प्रकार उत्पन्न हुए हैं ? ३८-३९

सूत जी बोले -- धार्मिक राजा देशराज ने पहले समय में लगातार बारह वर्ष तक सूर्य की सेवा की थी। तदुपरान्त प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य ने उनसे कहा- वर की याचना करो। उन्होंने कहा- देव !

तुम्हें नमस्कार है, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो मुझे आकाश गंगा के जल में चलने वाले उस घोड़े को प्रदान करने की कृपा कीजिये । ४०-४२ । इसे स्वीकार कर सूर्य ने उसे पपीहा (लोक की रक्षा करने वाला) नामक घोड़ा प्रदान किया । पश्चात् लोक पालन करने वाला यह पपीहा नामक अश्व मदोन्मत्त होने के नाते काम को रोकने में असमर्थ होकर उस दिव्य ह्रिणी नामक घोड़ी के साथ मैथुन किया, जिसके गर्भ से ये - पीले वर्ण का मनोरथ ( मनोहर) और कृष्ण वर्ण का कराल (भीषणाकार ) ये दोनों एक ही गर्भ से उत्पन्न हुए, उन्हें शैव्य और सुग्रीव का कला अंश बताया जाता है । पश्चात् जिष्णु और विष्णु कला के अंश हरिणी के गर्भ से मेघपुष्प और बलाहक उत्पन्न हुए, जिन्हें सुवर्ण के समान अंगवाले को विन्दुल (वेंदुल) और श्वेतवर्ण वाले को हरिनागर कहा गया है। प्रथम दिव्य अंग वाले ये महावली चार घोड़े उत्पन्न हुए, अनन्तर इन्हीं अश्वों के अंश से अनेक की उत्पत्ति हुई है । विप्र ! इस प्रकार इनकी उत्पत्ति कथा तुम्हें बता दी गई । अब आगे समाचार बता रहा हूँ, सुनो ! इन चारों घोड़ों के भूमि पर प्राप्त होने पर मनोरथ नामक अश्व बलवान देवसिंह को दिया गया, आह्लाद (आल्हा) के लिए कराल, उदयसिंह को विन्दुल, और पुत्र ब्रह्मानन्द को हरिनागर नामक अश्व दिया गया । ये चारों राजकुमार अपने घोड़ों पर सवार होकर मृगया के लिए किसी जंगल की ओर चल पड़े । ४३-५१ । उस समय उन सबके पीछे बलखान ( मलखान ) भी अपनी हरिणी घोड़ी पर बैठकर जा रहा था । वहाँ वे सब सिंह के जंगल में पहुँचकर, आह्लाद (आल्हा) ने एक बाघ का शिकार किया, जो प्राणियों के लिए भयंकर होता है । उसी प्रकार देवसिंह ने सिंह, बलखान ने शूकर और ब्रह्मानन्द ने हरिण का शिकार किया । इस प्रकार उन कुमारों ने उस जंगल में सैकड़ों जंगली जीवों का शिकार करके उन्हें साथ लेते हुए अपने घर को प्रस्थान किया । उसी बीच कल्याणमुखी देवी शारदा ने सुवर्ण की मृगी का रूप धारणकर उनके सम्मुख दौड़ना आरम्भ किया ।५२-५५। उसे देखकर मोहित होकर कुमारों ने अपने-अपने बाणों से उस पर प्रहार किया किन्तु, उनके वे भीषण बाण, उस मृगी के अंगों में प्रविष्ट होकर भी नष्ट हो जाया करते थे । उसे देखकर आह्लाद आदि कुमार अत्यन्त आश्चर्य चकित होने लगे। उस समय उदयसिंह ने अपने बाण से उस पर आघात किया । उस बाण से पीड़ित एवं भयभीत होकर देवी दूसरे जंगल में चली गई । पश्चात् कृष्णांश ( उदयसिंह) भी क्रुद्ध होने के नाते अपने नेत्र को ताँबे की भाँति रक्तवर्ण करते हुए उसके पीछे चल पड़ा । वहाँ दूसरे जंगल में पहुँचकर देवी ने अपने स्वरूप को धारण करके प्रसन्न मुख मुद्रा करती हुई उससे कहा- मैंने तुम्हारी परीक्षा ली है, अतः जब कभी तुम्हें कहीं किसी प्रकार का भय दिखाई पड़े, उस समय सदैव मेरा स्मरण करते रहना, मैं तुम्हारा कार्य सिद्ध करूंगी, क्योंकि आप विभु ( व्यापक ) एवं कृष्ण के अंश से अवतरित हैं । इतना कहकर वह सर्वमंगला शारदा देवी अन्तर्हित हो गई और उदयसिंह उन कुमारों के साथ प्रसन्नतापूर्ण होते हुए घर पहुँचे । उस समय राजा उन कुमारों के पराक्रम को देखकर अत्यन्त सुखी हुए और वहाँ उसी समय से लक्ष्मी देवी ने भी प्रत्येक घरों में निवास करना आरम्भ किया । ५६-६२

श्री भविष्यमहापुराण के प्रतिसर्गपर्व में कलियुगीय इतिहाससमुच्चय वर्णन नामक दशवाँ अध्याय समाप्त । १० 1


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