विक्रम बैताल || कहानी 501 || विक्रमादित्य और उसके पिता

विक्रम बैताल || कहानी 501 || विक्रमादित्य और उसके पिता

मैं अपने इष्ट देव भगवान भोलेनाथ तथा अपने पूज्य देव कान्हा जी और राधा जी को याद करके यह कथा आपको सम्मुख रखने का प्रयास कर रहा हूं। उनसे प्रार्थना करूंगा और मेरी बुद्धि में इस कथा को कहने की शक्ति प्रदान करें।
सहायक तुम्हें जानिके 
कथा कह रहो भोलेनाथ
विक्रमादित्य की कथा कहूं 
जिसे सुने बैठ सब साथ

इंद्रलोक में सभी बहुत खुशहाल थे। उसी इंद्रलोक में एक बहुत ही सुंदर और नृत्य में पूर्ण निपुण अप्सरा रहती थी । उसका नाम था मोहनी। वह नृत्य में इतनी कुशल थी की इंद्रदेव भी उसकी नृत्य कला में कमियां नहीं निकाल पाते थे। 

इंद्रदेव उसकी बार-बार प्रशंसा करते थे और आज भी उन्होंने वही प्रशंसा की इंद्रदेव बोले, " वाह मोहिनी वाह तुम्हारा निर्देश देखकर मुझे हर बार अपूर्वा आनंद की अनुभूति होती है। मेरे लिए एक दिव्य अनुभव से कम नहीं है।

यह सुनकर मोहिनी बोली, "महाराज ! हर बार की तरह मेरी प्रशांसा मत कीजिए । मेरी नृत्य में जो त्रुटियां हो उन्हें भी बताने का कृपया कीजिए।"

इंद्र बोले, " मोहिनी ! तुम्हारे नृत्य में कोई भी त्रुटि मुझे नहीं दिखाई देती । फिर तुम्हें त्रुटि कैसे बताऊं? 

" महाराज मैं न केवल एक नृतिका बनकर नहीं रहना चाहती। मेरे अंदर और सुंदर तो सीखने की अभिलाषा जागती रहती है। मैं संपूर्ण ब्रह्मांड की सबसे प्रवीण नृतिका बनना चाहती हूँ।  इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि आप नृत्य में जो कमियां है उन्हें भी बताइए।"मोहिनी ने हाथ जोड़कर इंद्रदेव से प्रार्थना की।"

"नृत्य के सबसे बड़े जानकार और यूं कहें कि नृत्य के जनक भगवान भोलेनाथ है। केवल और केवल वे ही तुम्हारे नृत्य में त्रूटी निकाल कर तुम्हें सबसे श्रेष्ठ नृतिका बना सकते हैं। " इंद्रदेव ने कहा।

मोहिनी हाथ जोड़कर बोले, "प्रभु ! मैं क्या कर सकती हूं?"

"करना क्या है ? जाओ और भगवान भोलेनाथ के दर्शन करो और उनकी कृपा प्राप्त करो? अपने इस नृत्य का प्रदर्शन उनके सामने करो। यदि वे प्रसन्न हो गये तो समझ लेना कि तुम विश्व की सर्वश्रेष्ठ नृतकी हो।" इंद्रदेव बोले।

और आपका मनोरंजन किस प्रकार होगा तो इंद्रदेव बोले हम एक पक्ष के लिए भगवान विष्णु के लोग जा रहे हैं आप तब तक हमारी आज्ञा से भगवान शिव के लोग जाकर शिव के लोग कैलाश जाकर उनके सामने अपने इस नृत्य का प्रदर्शन कीजिए।

"जैसी आज्ञा"

मोहिनी इंद्रदेव से आज्ञा लेकर कैलाश की चल दी, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, होनी बलवान होती है और वो होकर रहती है । 

कैलाश के रास्ते में इंद्र का पुत्र गंधर्वसेन मिल गया। जो मन ही मन मोहिनी को प्रेम करता था और अपना बना कर रखना चाहता था उसने उसे कैलाश की ओर जाते देखा तो है मोहनी मोहन पुकारते हुए उसके पीछे पीछे दौड़ चला।

मोहिनी ने रुका उसे देखा गंधर्व सेन ने उसे पूछा मोहिनी इतनी जल्दी में, तुम कहां जा रही हो।

इंद्रदेव की आज्ञा से भगवान भोलेनाथ के सामने अपने नृत्य का प्रदर्शन करने।

वहां से कब लौटेगी गंधर्व सेन ने पूछा

पता नहीं । जब भोलेनाथ चाहेंगे। कह कर रहे हैं आगे बढ़ ली।

गंधर्व सेन ने मोहिनी को रोकने का बहुत प्रयत्न किया लेकिन जब वह नहीं रुकी तो उसने उसे ब्रह्म पास में बांधकर बंदी विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई गुप्त भवन में बंदी बना लिया। लेकिन मोहिनी का अपहरण करते हुए इंद्रलोक की कुछ सेवकों ने गंधर्व सेन को देख लिया। 

कहते हैं कि 15 दिन बाद जब इंद्रदेव इंद्रलोक आए तो मोहिनी को वहां ने पाकर वे चिंतित हो ।
"अब तक तो मोहनी को लौट आना चाहिए था। चलो कोई बात नहीं । कैलाश पर्वत पर ही तो है चलो उसके कुशल क्षेम के लिए अपने दत भेज देता हूं।" ऐसा सोचकर उन्होंने अपने दोस्त कैलाश पर्वत पर भेजें।

परंतु मोहिनी के कैलाश न पहुंचने की कहानी जानकार उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपने दरबारियों को विश्व भर में उसकी खोज के लिए भेजा । जिन दरबारियों ने गंधर्वसेन को मोहिनी हरण करते हुए या ले जाते हुए देखा था। उन्होंने उसकी सारी कहानी इंद्रदेव के सामने बता दी। 

इंद्रदेव ने गंधर्व सेन की खोज पूरे इंद्रलोक में की लेकिन वह इंद्रदेव को नहीं मिला । इस पर उन्होंने कुशल भवन निर्माता विश्वकर्मा को बुलाकर पूछा, " विश्वकर्मा ! क्या इन्द्र लोक में कोई ऐसी जगह है। जिसे हम नहीं देख पा रहे है। 

जी महाराज।

ऐसी कौन सी जगह है
महाराज आपके पुत्र गंधर्व सेन का महल

जी आपके पुत्र गंधर्वसेन ने मुझसे एक ऐसा ही महल बनवाया था। जिसे कोई नहीं देख पाए। आप तो क्या कोई भी उस महल को नहीं देख पाएगा । 

हमें उसके पास लेकर चलिए 

तब विश्वकर्मा इंद्रदेव को लेकर उस महल द्वार पर पहुंचे तो उन्होंने अपने वजह से उसके को द्वार तोड़ डाला और मोहिनी के साथ पकड़ लिया ।

मोहिनी ने अपनी सारी व्यथा इन्द्रदेव को बताई तो इंद्रदेव ने अपने पुत्र को गधा बनाकर पृथ्वी भेज दिया। साथ ही मोहनी को भी पृथ्वी पर जाकर नारी रूप प्राप्त करने का श्राप दे दिया।

गंधर्व सेन ने इंद्रदेव के पैर पकड़ लिया और कहा मुझे माफ कर दो। मुझे अपने श्राप से मुक्त दे दो। तब इंद्रदेव ने गंधर्वसेन से कहा'
"गंधर्व सेन तुम नहीं जानते कि तुमने कितना बड़ा पाप किया है। मोहिनी भोलेनाथ की सेवा में जा रही थी और तुमने उसको रोका नहीं बल्कि उसका हरण भी किया। इसलिए वैसे तुम्हें इस रूप से मुक्ति दिला सकते हैं। "

★इस प्रकार आपने गंधर्वसेना और मम्मी को मिले साथ की कथा का पहला भाग सुना दूसरे भाग में सुनिए गंधर्व सेन का और मोहनी का पृथ्वी पर जन्म और मिलन।★

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
22/2/17/5/2022
 🙏💐🙏

Comments

Popular posts from this blog

राजा विक्रमादित्य और 32 पुतलियों की कथा प्रश्न

विक्रम बैताल || कहानी 604 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 4] अगली आठ कहानियां

विक्रमादित्य की परीक्षा: 32 पुतलियों के प्रश्न