विक्रम बैताल || कहानी 502 || गंधर्व सेन का और मोहनी का पृथ्वी पर जन्म और मिलन।

विक्रम बैताल || कहानी 502 || गंधर्व सेन का और मोहनी का पृथ्वी पर जन्म और मिलन।

साथियों अभी तक आपने सुना कि किस प्रकार अप्सरा मोहिनी नृत्य प्रस्तुती के लिए भगवान भोलेनाथ के सामने कैलाश जा रही थी और गंधर्व सेन ने उसका अपहरण कर विश्वकर्मा द्वारा बनाए अदृश्य महल में कैद कर लिया था लेकिन इंद्रदेव ने विश्वकर्मा के द्वारा उसे खोज निकाला और उसे श्राप देकर उसे एक गधा बनाकर भेज दिया। 

आईए उससे आगे की कथा सुनाते हैं।

श्राप मिलने पर गंधर्व सेन को अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने उसी वक्त से भगवान भोलेनाथ का नाम जप करना शुरू कर दिया। 

जब गंधर्व सेन धरती पर आया । सिंहल दीप की राजधानी चंपावती के पास उतर गया। तो उधर एक कुम्हार का गधा खो गया । वह गंधर्व सेन को अपना गधा समझ कर अपने साथ ले गया और अपने गधे की तरह ही उससे व्यवहार करने लगा। गंधर्वसेन शांत रहकर कुम्हार के व्यवहार को भगवान भोलेनाथ की कृपा समझकर सब कुछ सहन करता रहा। 

कुछ समय पर उपरांत मोहनी ने भी पृथ्वी पर चंपावती नामक नगरी के राजा शीलसागर के घर जन्म ले लिया। और वह भी भगवान भोलेनाथ की कृपा प्राप्ति के लिए उनकी आराधना में ही लगी रहती। राजा शीलसागर ने पुत्री का नाम वीरमती रखा। वह देखने में इतनी सुंदर थी कि नैयन अर्थात नेत्रों को दर्शन पाते ही अपार सुख की अनुभूति होती थी न, इसलिए लोग राजकुमारी को सौम्यदर्शना कहते थे। युवावस्था में कामदेव को भी आकर्षित करने वाले रूप को पाने के कारण आसपास के युवराज गण उसे मदन रेखा कह कर पुकारते थे।

वह भगवान भोलेनाथ का नाम दिन रात जपता रहता। इसी प्रकार 18 साल बीत गये। भगवान भोलेनाथ को उस पर दया आ गई और भगवान भोलेनाथ अपने पूर्ण स्वरुप में गंधर्व सेन के सामने प्रकट हो गए। और गंधर्व सेन से बोले

"गंधर्व सेन ! मैं तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हुआ । तुम मुझसे कोई भी वर मांग सकते हो।" अपने सामने भगवान भोलेनाथ को देखकर गंधर्व से में दंडवत प्रणाम किया।

"बाबा ! अगर आप मेरी सहायता करने आए हैं तो कृपया इस श्राप को समाप्त कर दीजिए।"

इस पर भोले बाबा बोले, " गंधर्व सेन ! यह श्राप किसी और का दिया गया होता तो मैं इसे समाप्त कर देता, लेकिन यह श्राप एक पिता का दिया हुआ है। इसलिए मैं तो क्या माता-पिता के दिए हुए श्राप को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता। " भोले बाबा कुछ देर के लिए गंभीर हो गए और फिर से बोले, " गंधर्व सेन तुम्हें मिला यह श्राप भविष्य में माता पिता की अवहेलना करने वाले पुत्रों के लिए के लिए एक सीख होगी।"

"बाबा कुछ तो कीजिए ।"

"बेटा ! माता पिता का बच्चे को श्राप, वज्रलेपित हो जाता है। उसे कोई नहीं काट सकता ।"

गंधर्व सेन बोला, "बाबा ! इस श्राप से मुक्ति का कोई उपाय ही बता दीजिए। बाबा ! मुझ पर कृपा कीजिए। बाबा ! मुझे बता दीजिए कि मैं इस श्राप से कैसे मुक्ति पाऊंगा। " 

भगवान भोलेनाथ चुप रहे तो गंधर्व सेन रोते हुए उनके पैरों में गिर गया और उनसे बोला, "बाबा ! कम से कम, ऐसा ही कर दो कि लोग मेरी भाषा समझ सके।"

भगवान भोलेनाथ बोले, "ठीक है, गंधर्व सेन ! आज से तुम इंसानी भाषा बोल पाओगे । जिस दिन किसी राजकुमारी से तुम्हारा विवाह होगा तो तुम्हारा आधा श्राप समाप्त हो जाएगा और उस दिन से तुम दुनिया की निगाहों में दिन में गधा बने रहोगा और रात को अपने राजकीय स्वरुप में आ जाएगे।" 

"बाबा ! आप ने मुझ पर बहुत बड़ी कृपा कर दी। बस मुक्ति का उपाय और बता दीजिए।" गंधर्व सेन भोलेनाथ से बोला।

भोलेनाथ मुस्कुराए और बोले, " तुम्हारे विवाह के 12 बरस बाद। तुम्हें इस शरीर से मुक्ति मिल जाएगी और तुम पुनः इंद्रलोक चले जाओगे। अगर तुमने इस बात का किसी से वर्णन किया तो तुम्हारी इस योनि की उम्र और 100 वर्ष बढ़ जाएगी।" कहकर भोले बाबा अंतर्ध्यान हो गए।

भगवान भोलेनाथ के आशीर्वाद से अब गंधर्व सेन को अपनी शक्ति प्रदर्शन का मौका मिल गया।

एक दिन कुम्हार ने कुछ ज्यादा ही बोझा उसके ऊपर लाद दिया और उसे बहुत दूर ले जाने लगा। रास्ते में उसकी निगाह वीरमती नामक रूपवती पर पड़ी । उसके रूप- लावण्य की छटा को देखकर गंधर्व सेन उस पर आसक्त हो गया।

"अरे वाह कितनी सुंदर लड़की है काश यह राजकुमारी होती।" खड़ा होकर सोचने लगा तभी राजकुमारी की सहेलियों ने कहा, "राजकुमारी जी ! चलिए, अब घर वापस चलते हैं। काफी समय बीत गया है।" यह कहते हुए वे दूसरे रास्ते पर मुड गईं।

घर लौट कर गंधर्व सेन ने मानव भाषा में बोलना शुरू किया, "हे मेरे मालिक, कुम्हार । यदि तू अपना भला चाहता है तो वीरमती के बारे में जानकारी निकाल वरना तेरे घर को तोड़ फोड़ दूंगा।"

पहले तो कुम्हार डर गया और फिर बोला, "कौन बोल रहा है?"

"मैं तुम्हारा सेवक गधा बोल रहा हूं।"

"हे भगवान ! अब मेरा क्या होगा? अब मैं  अपने सामान को दूसरे स्थान पर कैसे ले जाया करूंगा ? मेरे पास तो यही एकमात्र गधा था और वह भी इंसान की भाषा बोल रहा है।"

गंधर्व सेन ने फिर से बोलना शुरू किया, "हे मेरे मालिक, कुम्हार । तू चिंता मत कर इतना दाम दिलवा दूंगा तुझे काम करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। बस तू तो वीरमती के बारे में जानकारी निकाल।"

"कौन वीरमति?"

"वही सुंदरी , जो हमें रास्ते मिली थी।"

कुम्हार डर गया वह बोला, " वह तो राजा शीलसागर की लड़की है तुम्हें उससे क्या लेना देना और तुम कौन हो?

गधा बना गंधर्व सेन बोला, "मैं कोई भी होऊं,  लेकिन मुझे उस लड़की से शादी करनी है। यदि तूने इस कार्य में मेरी सहायता नहीं की तो तेरे इस घर को तोड़ फोड़ दूंगा और इस घर को मटियामेट कर दूंगा।"

कुम्हार डर गया और गंधर्व सेन से बोला, "आप जो कोई भी हो परंतु आप जानते हो कि यदि मैं राजा के पास तुम्हारा प्रस्ताव लेकर गया तो वह मुझे मेरे परिवार सहित मार डालेगा।" 

"अगर तू नहीं गया तो मैं तुझे मार डालूंगा।"

यह सुनकर कुम्हार और ज्यादा डर गया उसने अपना नगर छोड़ने की सोची और गधे को छोड़कर बाकी सारा सामान वह अपने साथ बांधने लगा।

बचपन से अब तक इसी परिवार के बनाए बर्तनों का ही उपयोग करके इस गांव के लोग गुजारा करते थे इसलिए वे लोग उसके जाने से बहुत दुखी हुए तो वे सभी कुम्हार के पास बात जानने के लिए पहुंच गए। 

"प्रजापति भाई ! यदि तुम्हारी कोई परेशानी है तो उस परेशानी को हम अपने ऊपर लेने के लिए तैयार हैं। लेकिन तुम्हें गांव से नहीं जाने देंगे।"

कुम्हार पहले ही दुखी था इतने सारे लोगों को सामने देख और दुखी हो गया। वह हाथ जोड़कर बोला, "भाइयों ! मैं तो एक धर्म संकट में फंस गया हूं। यदि मैं अपने गधे की बात मानता हूं तो राजा मुझे सजा देगा । यदि नहीं मानता हूं तो मेरा गधा मुझे सजा देगा।"

गांव वालों को उसकी बात समझ नहीं आई। तब उनमें से गांव का प्रमुख बोला भाई, " हमें तुम्हारी बात समझ नहीं आई है, कृपया ठीक से बताओ।"

कुम्हार बोला, " प्रमुख जी ! मेरा गधा इंसान की भाषा बोलता है और वह हमारी राजकुमारी से विवाह करने की जिद कर रहा है । अब बताइए यदि मैं राजा के पास उसके विवाह का प्रस्ताव लेकर जाता हूं तो वह मुझे मेरे परिवार सहित मार डालेगा। यदि नहीं जाता हूं तो यह गधा मार डालेगा।"

"भाई यह कैसी बात कर रहे हो। गधा बोलता है ऐसा हम पहली बार सुन रहे हैं।" गांव के प्रमुख ने कहा और पूरे गांव उसके बाद सुनकर आश्चर्यचकित थे। उन्हें कुमार की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कहीं गधा भी कभी बोलता है।

"चलो हम भी उसकी बात सुनते हैं।" कहकर गांव वाले उसके घर की तरफ चल दिए। और उसके घर में डेरा डाल लिया आधी रात होते ही गधा फिर से बोला, " ए मेरे मालिक कुम्हार ! यदि तूने मेरा कहा नहीं माना तो मैं तुझे और तेरे गांव को तहस-नहस कर दूंगा क्योंकि मेरा राज अब ये गांव वाले भी जान गए हैं। जा और मेरे लिए राजकुमारी का हाथ मांग कर ला।"

अब कुम्हार के साथ-साथ गांव वाले भी चंपावती राज्य को छोड़ने के लिए तैयार हो गए। जब गांव वाले गांव छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे थे । तो किसी में जाकर राजा को सूचना दे दी तो राजा ने प्रमुख सहित सभी को राज दरबार में बुलवा लिया। 

राजा शीलसागर बोले, " उस राजा पर धिक्कार है जिसकी प्रजा परेशान हो। प्रजा संतान के समान होती है और हर राजा को उसका धर्म पूर्वक पालन करना चाहिए। यदि तुम्हें कोई परेशानी है तो मुझे बताओ। यदि आप सभी लोग चले जाएंगे तो मेरा मेरा राज्य तो बदनाम हो जाएगा। "

गांव प्रमुख ने कहा, "महाराज ! यदि जान बख्शी जाए तो मैं कारण बताऊं।"

"ठीक है गांव छोड़ने का कारण बताओ। तुम्हें अभय दान दिया जाता है।" राजा शीलसागर ने कहा।

गांव प्रमुख बोला, " महाराज ! प्रजापति का गधा मनुष्य की बोली बोलता है और उसका कहना है कि यदि वह राजकुमारी के साथ उसके विवाह का प्रस्ताव लेकर नहीं गया तो उसके साथ साथ पूरे गांव को नष्ट भ्रष्ट कर देगा।"

राजा को भी आश्चर्य हुआ । उसने इस बारे में अपने मंत्रियों से सलाह ली। मंत्रियों ने कहा कि यह गधा या तो कोई देव है या राक्षस या  किन्नर या कोई गंधर्व है जो यहां पर गधे के रुप में कुम्हार के घर में रह रहा है।

"ओह तो यह बात है ! चलो हम भी परीक्षा कर लेते हैं कि वह कोई राक्षस है या कोई देव जो गधे रूप में है।" रात को राजा भी अपने मंत्रियों के साथ प्रजापति अर्थात कुमार के घर पहुंच गया ।

आधी रात होते ही उसने बोलना शुरू किया, "अब तो राजा भी मेरी बात को जान गया है। यदि उसने अपनी पुत्री का विवाह मेरे साथ नहीं किया तो मेरे मालिक कुम्हार तुझे, तेरे गांव और तेरे इस राजा के साथ पूरे चंपावती राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर दूंगा।"

इस पर राजा शीलसागर और मंत्री ने आपस में विचार-विमर्श किया कि पड़ोसी राजाओं की नजर हमारे राज्य पर है क्यों न इस देव से अपने राज्य के चारों तरफ किलाबंदी करा ली जाए। राजा मंत्री की बात से सहमत हो गया और उसने गधे से कहा, " हे महाराज ! मैं तुम्हारा बारे में कुछ भी नहीं जानता अपना परिचय दो।"

गधा बोला, "राजन ! अभी परिचय देने का समय नहीं है। पहले मेरी शादी राजकुमारी के साथ करो । तब तुम्हें मेरा परिचय अपने आप मिल जाएगा। आप मुझे गंधर्व सेन कहकर पुकार सकते हैं। "

राजा बोला, "हमारे पड़ोसी राजा हमारे राज्य पर आक्रमण करना चाहते हैं यदि तुम इसके चारों तरफ तांबे का मजबूत परकोटा बना दोगे तो मैं अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे साथ कर दूंगा।"

गधा बोला, " ठीक है महाराज ! कल सुबह तक आपका यह कार्य संपन्न हो जाएगा। जाओ और शादी की तैयारी करो।"

राजा और मंत्री चले गए । गधा बोला, "ए मेरे मालिक कुम्हार ! मेरे ऊपर काठी टांग और उसमें मिट्टी डाल। मुझे बाकी बचे समय में ही राज्य के चारों तरफ मजबूत परकोटे बनाने हैं।"

कुम्हार ने डरते डरते इसके ऊपर काठी टांग दी और उसमें मिट्टी भर दी। गधा कुम्हार के घर से बाहर निकल गया और उसने रात ही रात में चंपावती के चारों तरफ तांबे के मजबूत परकोटे का निर्माण कर दिया।

उसने चंपावती के चारों तरफ मजबूत दीवार तो बना दी लेकिन उसमें एक भी दरवाजा नहीं छोड़ा। अभी राजा उठे भी नहीं थे कि लोग राजा को दुहाई देते हुए राजमहल पहुंचने लगे। 

राजा ने सिपाहियों से पूछा, " यह शोर कैसा है ?" 

मंत्री ने बताया कि राज्य में चारों तरफ किसी ने तांबे की बहुत बड़ी व मजबूत दीवार बना दी है । लोग उसे तोड़ पाने में असफल हो रहे हैं। उनके बाहर भीतर की आवाजाही बंद हो गई है। इसी कारण वे सभी आपके पास आए हैं।"

राजा को गधे की बात याद आ गई । वे समझ गए कि यह गधे का ही कार्य है। उसकी शक्ति से लड़ पाना कठिन है। अतः विवाह के सिवाय दूसरा साधन नहीं है। वे मंत्री को साथ लेकर  सीधे कुम्हार के घर पहुंच गए और बोले, " मैं गंधर्व सेन के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने के लिए तैयार हूं। हे गंधर्वसेन किले में द्वार बनवाने का रास्ता बताएं।"

"राजन ! पहले शादी कराओ। उसके बाद ही मैं दरवाजे खोलूंगा।" गंधर्व सेन अर्थात गधे ने कहा।

राजा ने अगले दिन ही शादी करने का वचन दे दिया। कुम्हार के घर में बधाई बजने लगी और बनने गाये जाने लगे। 

परंतु राज महल में हाहाकार मच गया क्योंकि महारानी और राजकुमारी इस शादी के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हुई। तब चंपावती के राजा ने उन्हें बताया, " सुनिए महारानी और सुनिए राजकुमारी जी, हमने इस विवाह का प्रस्ताव यूं ही नहीं लिया है। हमें गंधर्व सेन की शक्ति के आगे अपने घुटने टेकने पड़े हैं।" कहकर राजा ने सारी कहानी उन्हें बता दी और यह भी बता दिया कि किस प्रकार हमारी नगरी के चारों तरफ किला बन गया है और हमारी चंपावती सुरक्षित हो गई है लेकिन अभी उसमें एक भी दरवाजा नहीं है। यदि शीघ्र ही दरवाजा नहीं बनाया गया तो। कुछ दिन बाद हमारा दूसरे राज्यों से संपर्क टूट जाएगा और फिर हमारी प्रजा भूखों मर जाएगी।

मजबूरन महारानी और राजकुमारी को भी इस विवाह के लिए हामी भरनी पड़ी ।  हामी के साथ ही राज महल में शहनाइयां बजने लगी। पूरा राज्य फूलों से सजा दिया गया। पूरा राज्य इस अनोखे विवाह को देखने के लिए राजधानी में एकत्रित हो गया। राजा ने उनके ठहरने और खाने-पीने की पूरी व्यवस्था की। विवाह इतना शानदार था कि उसकी चर्चा दूर-दूर तक होने लगी।

अगली सुबह गधा बना गंधर्व सेन बैंड बाजा और बारात के साथ राज महल के दरवाजे पर पहुंचा। राजा और दरबारियों ने उसका और बारात का बहुत ही शानदार स्वागत किया।

जयमाला के समय राजकुमारी ने गधे के गले में जयमाला डालने से साफ मना कर दिया, तो गंधर्व सेन को गुस्सा आ गया। उसने अपनी शक्ति के प्रभाव से राजमहल में उपद्रव मचाना शुरू कर दिया। 

तब राजकुमारी बोली, "तुम जो भी हो । पहले इस उपद्रव को बंद करो और मुझे अपने बारे में बताओ तभी मैं शादी करूंगी।"

गधा बना गंधर्व सेन बोला, "राजकुमारी जी ! यह बात मैं आपको रात को बताऊंगा। अब केवल एक ही रास्ता बचा है या तो राज महल को नष्ट होते हुए देखो या मेरे साथ विवाह कर लो।"

"यदि तुम भी झूठ की तो मैं अभी आत्महत्या कर लूंगी।" राजकुमारी बोली।

राजकुमारी बोली, "यदि रात में तुमने मुझे मेरे प्रश्न का जवाब नहीं दिया तो मैं आत्महत्या कर लूंगी और उसके जिम्मेदार तुम होओगे।"

"तो इसके लिए मुझे आपसे अकेले में बात करनी होगी।" गधा बोला।

"एक बार फिर से कहती हूं । तुम देव यक्ष गंधर्व राक्षस या कोई भी हो मेरे प्रश्न का जवाब दो, नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगी।" राजकुमारी ने जोर देकर कहा। 

गंधर्व सेन और राजकुमारी को कुछ समय के लिए अकेला छोड़ दिया गया ताप गंधर्व सेन ने राजकुमारी को इस प्रकार समझाया।

गधा बना गंधर्व सेन बोला, "राजकुमारी जी ! मुझ पर भरोसा करो । इसकी नौबत नहीं आएगी । बस रात में हमें एकांत में ऐसे महल में रहना होगा जिसमें कोई झरोखा आदि न हो। तभी मैं आपको अपनी सच्चाई बता पाऊंगा कि मैं कौन हूं ?"

"अगर यह तुम्हारी बात सच नहीं निकली तो।" 

"तो राजकुमारी जी ! आप चिंता मत करो । तो मैं यह राज्य छोड़ कर चुपचाप कहीं और चला जाऊंगा।" गंधर्व सेन ने कहा।

गधे की बात सुनकर राजकुमारी ने सबके सामने उसके गले में वरमाला डाल दी और इस प्रकार गधे बने गंधर्व सेन के साथ राजकुमारी का विवाह हो गया।

राजकुमारी बोली, "अब आप मेरे स्वामी हुए स्वामी और मैं आपकी दासी। हे मेरे स्वामी हमारी प्रजापत पर एक दया करो और मुझे बताओ कि किले के किस हिस्से पर द्वारा बनाया जा सकता है।"

गधा बना गंधर्व सेन बोला, "बिल्कुल, राजकुमारी जी ! मैं आपके इस प्रश्न का उत्तर अवश्य दूंगा। राजकुमारी जी । आपके राज महल में 5 दरवाजे हैं और पांचों दरवाजों के बिल्कुल सीध में यदि दीवार को खोदा जाएगा तो वहां पर मजबूत व शानदार लोहे के बने हुए दरवाजे निकलेंगे। जिन्हें आप जब चाहे खोल और बंद कर सकते हैं। परंतु कोई दुसमन उन्हें खोल नहीं पाएगा।"

महाराज और महारानी ने गधे बने गंधर्व सेन को राज्य को सुरक्षित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और कहा कि आप जैसा दामाद पाकर हम बहुत प्रसन्न हुए। अब हमारी प्रजा चारों व बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित और प्रसन्न रहेगी।

गधा बना गंधर्व सेन बोला, "महाराज ! यह तो आपके त्याग का फल है यदि आप त्याग नहीं करते तो यह किला कभी नहीं बनता और ने ही मुझे राजकुमारी मिल पाती।"

"बस महाराज आपसे प्रार्थना है कि हमारे रहने के लिए एक ऐसे स्थान की व्यवस्था की जाए जिसमें कोई झरोखा ना हो और कोई भी हमारी इच्छा के बिना अंदर है या बाहर आ जा सके।" गंधर्व से राजा से प्रार्थना की।

साथियों, भगवान शिव द्वारा बताए गए उपाय के अनुसार राजकुमारी से विवाह के उपरांत गंधर्व सेन के दूसरे श्राप की समाप्ति का समय आ गया था। 

तुरंत चंपावती किले के गेट खुलवा दिए गए । बाहर से आवागमन शुरू हो गया । अब महारानी और महाराज का दिमाग ठनका कि अब तक जो कुछ भी हुआ । वह किले के भीतर हुआ । जिसे केवल हमारी प्रजा ही जाती है । बाहर के राजा इसके बारे में बिल्कुल भी नहीं जानते हैं। जब बाहर के राजाओं को जब पता चलेगा कि चंपावती की राजकुमारी का विवाह एक गधे के साथ हुआ है। तो वे हमारी हंसी उड़ाएंगे और हमारी बहुत बेइज्जती होगी। इस पर उन्होंने राजकुमारी है और गंधर्वसेन से छुटकारा पाने का विचार बनाया।

राज महल के सेवकों ने गधे बने गंधर्व सेन से आकर कहा, "गंधर्व सेन जी ! आपके कहे अनुसार आपको एक बड़ा सा महल दिया जा रहा है जिसमें झरोखे नहीं हैं आप उसमें रह सकते हैं।"

रात होने से पहले महाराज और महारानी गंधर्व सेन और राजकुमारी को वीरमती को उस महल तक छोड़ने आए। वास्तव में वह महल नहीं एक कारागार था जिसका वे राज्य के सबसे खूंखार कैदियों को रखने के लिए उपयोग करते थे। उसी में दोनों को रखकर अपनी बेज्जती से बचने का सबसे अच्छा उपाय महाराज और महारानी को सूझा था।

इसी कारण उससे महल में बदल कर उसमें गधे बने गंधर्व सेन तथा राजकुमारी के रहने की व्यवस्था करवा दी गई थी।

जैसे ही गंधर्व सेन और राजकुमारी वीरमती ने महल के अंदर प्रवेश किया तो चंपावती के राजा अर्थात गंधर्व सेन के ससुर ने एक-एक कर महल के सातों द्वार बंद करवा दिए। इस प्रकार गंधर्व सेन और राजकुमारी दोनों उस महल में कैद होकर रह गए।

अब आपके मन में अनेक प्रश्न उठे होंगे। उन्हीं की संतुष्टि के लिए देखते रहिए वीर विक्रमादित्य की कथाएं।

इस प्रकार आज का एपिसोड नंबर 2 समाप्त हुआ एपिसोड नंबर 3 में देखिए 
गधे बने गंधर्व सेन की मुक्ति।

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
2/4/15/6/2023
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