विक्रम बैताल || कहानी 503 || महाराज विक्रमादित्य का जन्म और देवास नगरी की ध्वस्त होना।
विक्रम बैताल || कहानी 503 || महाराज विक्रमादित्य का जन्म और देवास नगरी की ध्वस्त होना।
इस कहानी को प्रारंभ करने से पहले हम चंपावती नगरी के बारे में बताना चाहेंगे कि चंपावती वर्तमान सोनकच्छ तहसील में स्थित एक गाँव है । चंपावती बौद्ध कालीन व जैन कालीन इतिहास का गवाह है । इसी चंपावती गाँव में गंधर्वसेन नाम के राजा राज करते थे। राजा गंधर्वसेन के नाम पर बाद में चंपावती से गंधर्वपुरी हो गया। आज भी इसका नाम गंधर्वपुरी है।
इस कहानी की भूमिका बनाने का कारण यह है कि आप इसकी एतिहासिकता के बारे में भी जान सकें।
चलिए अब अपनी कहानी पर आते हैं।
साथियों अभी तक आपने सुना कि किस प्रकार अप्सरा मोहिनी ने इंद्रसभा की नृत्य प्रतियोगिता जीती। उसके उपरांत वह भगवान भोलेनाथ के सामने नृत्य प्रस्तुती के लिए कैलाश जा रही थी और गंधर्व सेन ने उसका अपहरण कर विश्वकर्मा द्वारा बनाए अदृश्य महल में कैद कर लिया था लेकिन इंद्रदेव ने विश्वकर्मा के द्वारा उसे खोज निकाला और उसे एक गधा बनाकर पृथ्वी पर भेज दिया। साथ ही अप्सरा मोहिनी ने भी स्त्री रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया।
गधे बने गंधर्वसेना ने राजकुमारी से विवाह किया और अपनी नगरी को सुरक्षित बना दिया। शादी के उपरांत राजा ने लोक लाज के डर से जेल को महल में परिवर्तित करके। उन्हें उस जेल रूपी एक महल में कैद कर दिया । जिस महल में एक भी झरोखा नहीं था।
साथियों आइए अब उससे आगे की कहानी सुनाते हैं।
जैसे रात का अंधकार फैला वैसे ही गंधर्व सेन रूपी गधा सुंदर राजकुमार के रूप में बदल गया। परंतु उस गधे का शरीर वही जमीन पर पड़ा था। राजकुमारी इस बात को देखकर आश्चर्यचकित कि यह सब क्या और कैसे हो गया। कब गंधर्वसेना को सामने देख कर राजकुमारी को श्राप मिलने की संपूर्ण कथा उसकी आंखों के सामने घूम गई। उसे सब कुछ याद आ गया दोनों खुशी से उस महल में रहने लगे।
राजकुमार को अपने सामने देखकर राजकुमारी बहुत प्रसन्न हुई। वह गंधर्व सेन से माफी मांगने लगी।
यह सब भोले बाबा की कृपा से हुआ है। गंधर्व सेन ने कहा, " यह सब भोले बाबा की कृपा है। इस लिए भोले बाबा की सेवा करते रहो और किसी चीज पर ध्यान मत दो वही हमारा भला करेंगे।"
राजकुमार क्योंकि गंधर्व थे तो वे अनेक विद्याओं को जानते थे इसलिए वे रात को राजकुमार रूप में अपना भेष बदलकर निकलते हैं और और पूरी चंपावती में घूम कर लोगों के दुख दूर किया करते । जो भी उनसे पूछता तो वे महेन्द्रादित्य के नाम से अपना परिचय देते।
धीरे-धरे महेन्द्रादित्य नामक राजकुमार इतने प्रसिद्ध हो गए कि चंपावती के लोग महेन्द्रादित्य का नाम जपने लगे।
महेन्द्रादित्य हमेशा कहता कि यह मेरा राज्य है। इसमें लोगों भूखे उठेंगे लेकिन भूखे सोएंगे नहीं। इस प्रकार उसने अपने राज्य में सुख और समृद्धि ला दी।
राजा यह सोचकर खुश थे कि हमारी किस्मत अच्छी है कि हमने जैसे ही लड़की को अपने से जुदा किया है वैसे ही राज्य में सुख समृद्धि ने अपने पैर फैला दिए हैं। वह लड़की शायद हमारे लिए मनहूश थी। आसपास के राजा चंपावती की खुशी से सेवा में लगे।
अभी कुछ ही दिन बीते थे कि चंपावती नगरी पर आसपास के राजाओं ने आक्रमण कर दिया। दिन भर तो द्वार बंद रहे लेकिन रात में दुश्मन के लोगों ने अंदर घुसकर दरवाजे खोल दिए । इससे दुश्मन राजा अंदर घुस गए तब गंधर्व सेन ने अदृश्य रूप में ही सबको मार भगाया।
समय बीता उनके एक पुत्र ने जनम लिया । उन्होंने उसका नाम भर्तहरि रखा। भर्तहरि के उपरांत उनके यहां एक कन्या ने जन्म लिया। जिसका नाम उन्होंने मैनावती रखा।
बड़े पुत्र भर्तहरि की राजकाज में अरुचि तथा सन्यास में रुचि को देखते हुए उन्होंने एक और पुत्र की कामना की। चंपावती एक छोटी सी नगरी थी जो सुख और समृद्धि से भरपूर थी परंतु अभी पूरा आर्यवर्त ही नहीं संपूर्ण पृथ्वी आताताईयों से त्रस्त थी।
कथासरित्सागर' के अनुसार महेन्द्रादित्य को दूसरे पुत्रार्थ विविध प्रकार की तपस्या तथा व्रत करने पड़े थे ।
इस बात का वर्णन क्षेमेंद्र और सोमदेव की कथाओं में भी मिलता है। उन दोनों ने अपनी कथाओं में पृथ्वी की कष्टपूर्ण दशा का वर्णन किया है।
तब पृथ्वी के भार को हटाने के लिए दैवी सहायता की अपेक्षा की गई तो 'इन्द्र के नेतृत्व में देवतागण कैलाश पर्वत के लिए चल पड़े।
जिस समय उत्तुङ्ग कैलाश पर, जिसकी घाटियों को सुरवृन्द देखा करते हैं, जो उदीची के स्मित सा सुन्दर है, जो सबको पराजित करने में सशक्त है, वे शिव पार्वती के साथ वहां विराजमान थे।
इन्द्र के नेतृत्व में देवतागण कैलाश पर्वत शिव के पास गये और बैठकर शिव की स्तुति करने लगे। जब शिव ने उनके आने का कारण पूछा तो
तो उन्होंने कहा, "हे देवाधिदेव ! वे असुर, जिनका आपने और विष्णु ने संहार किया था, पृथ्वी पर स्लेच्छों के रूप में फिर उत्पन्न हुए हैं। वे यज्ञ और अन्य कर्मों में बाधा डालते हैं। सच तो यह है कि उन्होंने कौन सा अपराध छोड़ रखा है ? आप तो सबकुछ जानते हैं। हे देव ! देवलोक पृथिवी से पोषण पाता है क्योंकि ब्राह्मणों द्वारा जो कुछ भी अग्नि में आहुति दी जाती है वही स्वर्गवासियों का पोषण करती है । किन्तु, म्लेच्छों ने पृथ्वी को रौंद डाला है, देवतागण यज्ञभाग एवं अन्य पूर्ति के साधनों के विच्छिन्न हो जाने से शक्तिहीन हो गये हैं । उन्होंने प्रसन्न देवताओं की दशा तिनकों के बराबर कर दी है। अब केवल आप ही शरण हैं । अतः इस सम्बन्ध में विचार कीजिये। "
महेन्द्रादित्य की पुत्र की अभिलाषा तथा देवताओं का शिव के यहाँ पहुँचना एक ही समय हुआ ।
भगवान शिव महिमन मुस्कुराए तब उन्होंने देवताओं से कहा, 'जाओ, इस बात के लिए चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं । निश्चिन्त हो जाओ । विश्वास रखो, मैं शीघ्र ही एक ऐसा उपाय करूँगा जिससे कठिनाई समाप्त हो जायगी।'
इस प्रकार सांत्वना देकर शिवजी ने देवताओं को विदा किया और जब वे चले गये तो पार्वती के साथ बैठे हुए शिव ने माल्यवन्त नामक गण को अपने पास बुलाया और आज्ञा दी, 'वत्स ! जाओ मनुष्य की स्थिति में उबारने के लिए उज्जयिनी की चंपावती नगरी में राजा महेन्द्रादित्य के वीर पुत्र के रूप में जन्म ग्रहण करो ।"
महन्द्रादित्य को शिवजी ने यह वरदान दिया कि जल्द ही तुम्हारे पुत्र होगा और उसका नाम तुम विक्रमादित्य रखना। विक्रमादित्य नाम, 'विक्रम' और 'आदित्य' के समास से मिलकर बना है जिसका अर्थ 'पराक्रम का सूर्य' या 'सूर्य के समान पराक्रमी'। उन्हें विक्रम या विक्रमार्क भी कहा जायेगा है । विक्रमार्क भी दो शब्द 'विक्रम' और 'अर्क' के समास से मिलकर बना है। अर्क का अर्थ भी पराक्रम का सूर्य' या 'सूर्य के समान पराक्रमी' है। वह वडा ही प्रजावत्सल राजा होगा। उपनाम (शत्रु-संहारक होने के कारण) विषमशील कहलायेगा ।
'उचित समय आया तो महेन्द्रादित्य के एक वैभवशाली पुत्र उत्पन्न हुआ । जिसने जन्म कक्ष को उसी प्रकार भास्कर कर दिया जैसे सूर्य आकाश को कर देता है। जब उसका जन्म हुआ तो आकाश सचमुच प्रभा से परिपूर्ण हो गया, आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी, देवताओं ने दुम्बुभि नाद किया। उस समय ऐसा मालुम होने लगा मानो सम्पूर्ण नगर उत्सव के आनन्द में मग्न हो गया ।
इस प्रकार उपर्युक्त महेन्द्रादित्य की बड़ी-बड़ी प्रार्थनाओं के पश्चात् विक्रमादित्य उत्पन्न हुए तथा विक्रमादित्य का जन्म एक शिव गण थे।
वह बालक भी महाबुद्धिमान् एवं अपने पिता-माता अत्यन्त प्रिय करने वाला हुआ ।
होनी बलवान होती है यही हुआ की राज्य की उन्नति से चिढ़कर आस-पड़ोस की राजाओं ने चंपावती पर आक्रमण कर दिया जब महिंद्र आदित्य को पता चला तो दिन में वह अब गधे की योनि में था धीरे-धीरे पूरी चंपावती को घेरने लगे। चंपावती नगरी के सैनिक वीरता से लड़े परंतु मारे जाते रहे अंत में शक राजाओं ने चंपावती राज्य पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उन्होंने चंपावती के राजा और रानी, दोनों को ही बंदी बना लिया।
जैसे-जैसे संध्या घिरी महेद्र आदित्य अपने राजकुमार के रूप में आ गया । उसने पुनः शत्रुओं पर आक्रमण करके उन्हें खदेड़ दिया और राज्य फिर से अपने सास-ससुर को दे दिया। अपने सामने एक सुंदर राजकुमार को देखकर उनका मन हुआ कि काश ऐसा सुंदर राजकुमार उनका दामाद होता।
महिंद्र आदित्य वैसे ही गंधर्व था । वह उनकी बात पर मुस्कुराया और बोला आप मुझे अपना पुत्र समझ सकते हैं।
अचानक हुए हमले से चंपावती हाथ से खिसकती देख अब दुश्मन सेना समझ चुकी थी की रात्रि में चंपावती को जीतना कठिन है इसलिए पता करो कि रात को जो महेंद्रादित्य रूपी राजकुमार युद्ध करने के लिए आता है। वह दिन में कहां चला जाता है।
शत्रु गुप्तचरों ने इस बात का पता शीघ्र ही लगा लिया। उन्होंने गंधर्व सेन की गधे बनने और राजकुमारी में राजकुमार बनने की सारी कहानी शत्रु राजाओं को बता दी।
कि किस प्रकार गंधर्वसेन दिन में गधा और रात में गधे की खोल उतारकर राजकुमार बन जाता है ।
अब शत्रु राजाओं ने फिर से चाल चली उन्होंने चंपावती को फिर से जीत लिया और उसके साथ ससुर को मार डाला। जब रात होने लगी तो उन्होंने अपने गुप्त चारों को गंधर्व सेन के गधे रूपी चमत्कारिक खोल को लाने के लिए कहा।
जब राजा को गंधर्व सैन ने जैसी ही गधे का खोल त्यागा वैसे ही गुप्तचरों ने उस पर अपना कब्जा कर शत्रु राजाओं को दे दिया। शत्रु राजा ने तुरंत ही उस चमत्कारिक खोल को जलवा दिया।
जैसे जैसे गंधर्वसेन का खोल जलने लगा वैसे ही गंधर्व सेन भी जलने लगा। जलते हुए गंधर्व सेन ने दौड़कर वीरमति व अपने दोनों पुत्रों और पुत्री को गुप्त रास्ते से जंगल की ओर जाने का इशारा कर दिया। वे समझ चुके थे कि चंपावती मेरे रहना अब खतरे से खाली नहीं है इसलिए वे चुपचाप जंगल की तरफ चल दिए।
गंधर्व सेन जलते जलते भी दुश्मन राजाओं का संहार करता रहा । जब खोल पूरी तरह से जल गया तो राजकुमार बनने गंधर्व सेन के भी प्राण पखेरू उड़ गए। इस प्रकार गधे बने गंधर्व सेन को अपने श्राप से मुक्ति मिली गई और वह फिर से इंद्रलोक की ओर चला गया।
लेकिन गुप्त द्वार से भागते वक्त रानी ने वीरमति ने पीछे मुड़कर नगरी की तरफ देखा तो उसे अपने पति गंधर्व सेन की याद आ गई । उसे अपने बूढ़े माता-पिता की याद आ गई जिसका शत्रु राजाओं ने बुरी तरह से मार डाला था। और उसने चंपावती नगरी की तरफ देखते हुए पूरी नगरी को श्राप दिया कि जिस प्रकार शत्रुओं ने मेरे पति को जल से मारा है उसी प्रकार यह सारा राज्य सभी राजाओं सहित पूरी की पूरी नगरी पत्थर की होकर जमीन में समा जाए और वे जंगल की तरफ मुड़ गए।
रानी के श्राप मुख से निकलते ही पूरी की पूरी नगरी पाषाण में बदल गई फिर यहाँ का हर व्यक्ति, पशु और पक्षी सभी शाप से पत्थर के हो गए थे। फिर एक 'धूकोट' (धूलभरी आँधी) चला, जिससे यह पूरी नगरी उस धूल के अंदर जमीन में दफन हो गई।
देवास की सोनकच्छ तहसील में स्थित एक गांव की पहचान इसी चंपावती के रूप में की गई है। यह एक ऐसा गाँव है जो भारत के बौद्धकाल तथा जैन इतिहास का भी गवाह है। इस गाँव का नाम पहले चंपावती था। गंधर्वसेन के नाम पर बाद में चंपावती का नाम गंधर्वपुरी हो गया। आज भी इसका नाम गंधर्वपुरी है।
हालांकि वैज्ञानिकों के लिए भी इसके पीछे की सचाई जानना मुश्किल रहा है। जमीन की खुदाई के दौरान यहाँ आज भी महात्मा बुद्ध, महावीर जैन, विष्णु के अलावा ग्रामीणों की दिनचर्या के दृश्यों से सजी व मोहक मूर्तियाँ मिलती रहती हैं। जो चंपावती के नष्ट भ्रष्ट होने तथा उसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी देती हैं।

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