विक्रम बैताल || कहानी 504 || वन में नाग के डसने से विक्रम की मृत्यु।
विक्रम बैताल || कहानी 504 || वन में नाग के डसने से विक्रम की मृत्यु।
अभी तक आपने सुना कि गंधर्वसेन को चंपावती नगरी के शत्रुओं ने मार डाला। जिससे उनकी मुक्ति हो गई और वे इंद्रलोक चले गए । लेकिन रानी ने अपने पति और माता-पिता की निर्मम हत्या पर क्रुद्ध होकर पूरी चंपावती नगरी को श्राप दे दिया।
रानी के श्राप मुख से निकलते ही पूरी की पूरी नगरी पाषाण में बदल गई फिर यहाँ का हर व्यक्ति, पशु और पक्षी सभी शाप से पत्थर के हो गए थे। फिर एक 'धूकोट' (धूलभरी आँधी) चला, जिससे यह पूरी नगरी उस धूल के अंदर जमीन में दफन हो गई।
रानी ने अचानक से अपने पीछे बडी विचित्र सी आवाज सुनी तो उसने पीछे मुड़कर देखा, उसने देखा कि एक अंदर में पूरी की पूरी चंपावती नगरी जमीन के अंदर समा गई। लेकिन उनकी पत्नी वीरमति अपने दोनों पुत्र और एक पुत्री के साथ जंगल में आगे बढ़ गईं।
इस वक्त भर्तहरि की उम्र 12 वर्ष मैनावती के उम्र 10 वर्ष तथा विक्रम की उम्र मात्र 4 वर्ष की थी।
रास्ते में चलते चलत विक्रम बहुत बुरी तरीके से थक गए और बैठकर अपने पैरों से कांटे निकालने का झूटा प्रयास करने लगे यह देख कर भरथरी मन ही मन बड़े दुखी हुए कि मेरा छोटा भाई थक गया है लेकिन मुझसे यह नहीं कह रहा कि मैं थक गया हूं और बहाना भी बना रहा है तो वह भी पैर में कांटे निकालने का।
भर्तहरि ने अपने छोटे भाई विक्रम को अपने कंधे पर बिठा लिया और जंगल में आगे को बढ़ गए। जंगल और घना होने लगा, जंगली जानवरों की आवाज और तेज होने । लगी भर्तहरि ने रक्षार्थ अर्थात अपनी रक्षा हेतु अपनी तलवार हाथ में ले ली। विक्रम को कंधे पर तथा तलवार को हाथ में लेकर भर्तहरि बड़ी सतर्कता के साथ आगे बढ़ने लगे।
परंतु देव योग से उनके साथ कोई भी अप्रिय घटना नहीं घटी। धीरे-धीरे जंगल में उजाला होने लगा जंगली जानवरों की आवाज कम होती चली गई । अब लगा कि वे जंगल से बाहर आ चुके हैं । लेकिन आश्रय की खोज में भी आगे बढ़ी तो दूसरा जंगल सामने आ गया । जल्द ही रात घिर आई और रोशनी के अभाव और रात के अंधेरे में उनके लिए चलना कठिन हो गया। भर्तहरि माता से बोलो माता अब हमें कहीं कोई सुरक्षित स्थान देख कर रुक जाना चाहिए। वैसे लगता है कि हम शहर किसी नगर के निकट ही पहुंच चुके हैं परंतु रास्ता दिखाई नहीं दे रहा कब कौन-कौन सा जंगली जानवर आक्रमण कर दी पता ही नहीं चलेगा।
माता ने कहा, " बेटा ! ठीक है किसी पेड़ की सहायता ले लेते हैं। उस पर बैठकर विश्राम करेंगे किसी घने शाखा वाले वृक्ष को ढूंढो।"
तब एक बहुत अधिक शाखा वाला वृक्ष देखकर भर्तहरि ने अपनी तलवार से उसकी शाखाओं को काटकर उस पर मचान बना ली। तब विक्रम और अपनी माता के साथ उस मचान पर बैठ गए रात भर भर्तहरि पहरा देते रहे।
सुबह होने को आई तो माता बोली, " बेटा भर्तहरि ! अब तुम विश्राम कर लो अब थोड़ी देर मैं जाग लेती हूं।"
भर्तहरि बोला मां यहां जंगली जानवरों का अभी भी खतरा बना हुआ है । रोशनी हो जाए तो मैं विश्राम करूं, लेकिन मां के आगे भर्तहरि की एक नहीं चली और वह विश्राम के लिए लेट गया तभी एक जोरदार नींद का झटका सा आया और वह गहरी नींद में सो गया।
दिन निकल आया चिड़िया चहचहाने लगी और रोशनी काफी हो गई तो अचानक से भर्तहरि जाग उठा। उसका पूरा शरीर पसीने से नहा गया था ।
भरथरी के अचानक उठने पर माता ने पूछा, " क्या हुआ कोई दुश्मन देखा क्या ?"
भर्तहरि बोला, "हां माता ! एक भयानक स्वप्न देखा है । जिसमें मैं किसी नगर की तरफ जा रहा हूं। कुछ लोगों ने मुझे पकड़ लिया है और एक दैत्य मुझे भक्षण करने के लिए आ रहा है । यह सोच कर माता डर गई कि कहीं यह बुरा स्वप्न सत्य न हो जाए परंतु उन्होंने भर्तहरि को ऐसा बिल्कुल भी सोचने नहीं दिया और बोली, "बेटा भर्तहरि ! अब तुम अपने पिता की तरह पराक्रमी हो और तुम हमारी सुरक्षा कर सकते हो और अपनी भी।"
कहकर उसके सिर पर हाथ फैराया, और वे सब आगे बढ़ गए।
तभी वीरमति को लगा कि वह एक जानी पहचानी जगह पर है। उसे याद आया कि यह तो स्थान देखा हुआ सा लग रहा है। एक रात गंधर्व सेन वीरमति को घुमाने के लिए इसी स्थान पर लेकर आए थे और उन्होंने अपने योग माया से यहां पर रोशनी कर दी थी और वहीं पर एक वृक्ष के बारे में बताया था कि निकट भविष्य में यह वृक्ष हमारी बहुत सहायता करेगा क्योंकि दिन में जब मैं गधे रूप में होता हूं तो मेरे अस्त्र-शस्त्र गुप्त रूप में इसी वृक्ष पर रहते हैं । जो किसी को दिखाई नहीं देती।
निकट भविष्य में तुम यहां आओ तो मेरी मायावी तलवार अपने साथ जरूर ले लेना । वह तुम्हारी हर प्रकार से रक्षा करेगी । जब तक वह तलवार तुम्हारे पास रहेगी तुम पर कोई भी जंगली जानवर आक्रमण नहीं कर सकेगा और जब युद्ध में वह तलवार तुम्हारे हाथ में होगी तो कोई भी दुश्मन तुम्हें जीत नहीं सकेगा।
उस बात को याद आते ही वह वीरमति सीधे वृक्ष के पास गई और बोली, " हे वृक्ष देव ! मेरे पति की मायावी तलवार मुझे लौटा दीजिए। मुझे उसकी आवश्यकता है । तभी वृक्ष से एक तलवार नीचे गिरी और वीरमति ने उसे उठा लिया ।
वह तलवार लेकर भर्तहरि के पास जाकर बोली, "भर्तहरि बेटा ! यह तलवार रखो, यह मायावी तलवार है । तुम इससे किसी का भी जीत सकते हो। जब तक यह तुम्हारे पास है कोई भी तुम्हें नहीं जीत पाएगा। "
भर्तहरि बोला, " मां यह तलवार किसकी है? और इस घने जंगल में आपको कहां से मिला।"
तब वीरमति ने सारी कहानी भर्तहरि को बताई। विक्रम भी उनकी बात बड़े ध्यान से सुन रहा था।
विक्रम बोला, "बड़े भैया ! आप इसे अपने पास रख लो और अपनी तलवार मुझे दे दो । मैं भी युद्ध कला सीख लूंगा और तुम्हारे जैसा बड़ा बनूंगा।
भर्तहरि ने सोचा क्यों नहीं यह चमत्कारी तलवार अपने भाई को ही दे दी जाए क्योंकि वह भी तलवारबाजी चलाना नहीं जानता और मैं तो यह सब सीख चुका हूं तब भर्तहरि बोले, " अनुज विक्रम ! मुझे इस तलवार की आवश्यकता नहीं है। तुम इस तलवार को रख लो क्योंकि तुम तलवारबाजी नहीं जानते और जब यह तलवार तुम्हारे हाथ में होगी तो कोई भी तुम्हे नहीं जीत पाएगा ।"
कहते हुए भर्तहरि ने वह तलवार विक्रम को आगे कर दी विक्रम बोला, " भैया ! यह तलवार बहुत बड़ी है और मैं बहुत छोटा मैं इसे अभी नहीं संभाल पाऊंगा ।"
तभी एक करिश्मा हुआ और वह तलवार अपने आप छोटी हो गई। यह देखकर विक्रम बहुत खुश हुआ परंतु उसका दिमाग ठनका की छोटी सी तलवार से युद्ध कैसे किया जाएगा । वह भैया से बोला, " भैया ! मेरे साथ युद्ध करो। देखना चाहता हूं कि यह तलवार मेरी सहायता करेगी भी या नहीं "
जैसे ही विक्रम ने भर्तहरि ने विक्रम पर तलवार से वार करना चाहा वैसे ही तलवार बड़ी हो गई और भर्तहरि के साथ दोनों का महान युद्ध छिड़ गया । बारह वर्ष और चार वर्ष के दोनों बालक आपस में युद्ध कर रहे थे। यह साधारण युद्ध नहीं रहा, वह भयंकर युद्ध में बदल गया। दोनों कई घंटे तक युद्ध करते रहे परंतु विक्रम तलवारबाजी की कला नहीं जानते हुए भी भर्तहरि से बहुत अच्छी तरह से लड़ रहा था परंतु वह भरतरी पर जानलेवा वार नहीं कर रहा था । यह सब देखकर वीरमति और भर्तहरि चकित रह गए।
अब भर्तहरि बोली, " अनुज विक्रम ! अब मैं निश्चिंत हो गया कि मेरी अनुपस्थिति में तुम मां की रक्षा करने में पूरी तरह समर्थ हो और पूर्णतया सुरक्षित भी हो। अब मुझे कोई चिंता नहीं है । अब मेरा अनुज अपनी और मां जी की रक्षा स्वयं कर सकता है।
माता भी बहुत खुश हुई लेकिन भरतरी और विक्रम इस युद्ध में बहुत अधिक थक गए।
दोनों मां से बोले," माता ! अब हम विश्राम करना चाहते हैं। थोड़ी देर हमें विश्राम करने दीजिए।"
माता बोली, "ठीक है।" चलो उस घने वृक्ष के नीचे । हम विश्राम कर लेते हैं। सामने नगरी भी दिखाई दे रही है। पर वह बहुत दूर है। विश्राम के बाद हम उसी नगरी में प्रवेश करेंगे।
दोनों गहरी नींद में सोए हुए थे तभी वहां से एक काला विषधर आया और उसने विक्रम को डस लिया और भरथरी को जैसे ही डसने जा रहा था, तो वीरमति ने विक्रम की तलवार लेकर उसके दो टुकड़े कर दिए।
वीरमती चीख पुकार करने लगी। माता की चीख सुनकर भर्तहरि उठ बेठा। उसने देखा विक्रम जंगल में मृत पड़ा हुआ है और माता रो रही हैं। भर्तहरि जैसे ही बैठा तो उसने देखा कि विक्रम का पूरा शरीर नीला पड़ गया है और पास में ही काला नाग दो टुकड़े हुए पड़ा है।
भरथरी बोला, " माता जी ! अब रोने से कोई फायदा नहीं । अब हमें प्रिय अनुज की क्रिया भी करनी है। आप इस की रखवाली करो । मैं नगरी में जाकर इसके क्रिया की कुछ सामान खरीद कर लाता हूं। यह कहकर और माता को दिलासा देकर भर्तहरि नगरी की ओर चल दिया।
इस प्रकार आज का एपिसोड नंबर 4 समाप्त हुआ। हमें आशा है कि आपको हमारी यह है कड़ी अवश्य पसंद आएगी और अगले एपिसोड नंबर 5 में देखिए ★ भर्तहरि का राजा बनना।★

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