पहला गुण पराक्रम
।। पहला गुण पराक्रम ।।
।। पराक्रमी विक्रमादित्य ।।
पहली पुतली पराक्रम की रक्षा का जय लक्ष्मी
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को सबसे प्रिय अपनी प्रजा थी वे नित्य अपनी प्रजा का हाल चाल जान ने के लिए राज्य में निकला करते थे एक दिन की बात है वे हर रोज की तरह अपनी प्रजा से मिलते हैं इतने में भयानक तूफान आ जाता है और सब कुछ असत व्यस्त हो जाता है सम्राट विक्रमादित्य तुंरत निकलते हैं यह देखने की ऐसा क्यों हो रहा है कुछ दूरी पर जाते ही वे देखते हैं कि हरी घास जल रही होती है तालाब में बुलबुले उठ रहे होते हैं वही कुछ दूरी पर उन्हें कई सारे साधू संत मिलते हैं जो सम्राट विक्रमादित्य को कहते हैं सम्राट वो देखिये पक्षी आसमान की और उड रहे हैं और मरते जा रहे हैं जैसे प्रकृति खूद को खत्म करने पर आतुर हो सम्राट यह सब प्रलय के संकेत हैं प्रलय होने वाला है सम्राट विक्रमादित्य संतो से कहते हैं इन सब के अलावा कोई और ठोस कारण है आपके पास । वही सब के जाने के बाद सम्राट विक्रमादित्य कुछ देर आसमान की और देख कर अपने महल लोट आते हैं वहाँ वे आचार्य वराहमिहिर जी से इस विषय पर चर्चा कर रहे होते हैं तभी वहाँ पर सम्राट विक्रमादित्य की धर्मपत्नी महारानी चित्रलेखा आती है और कहती है सम्राट जिस विषय पर आप चर्चा कर रहे है उसी से संबंधित आसमान में कुछ नजर आ रहा है तभी विक्रमादित्य महल के प्रांगण में आते हैं और जो नजारा वे देखते हैं अगर वो नजरा आज कोई देख ले तो जिते जी मर जाए आसमान से आग के बडे बडे ओले पड रहे होते हैं सम्राट विक्रमादित्य तुंरत वराहमिहिर जी से पूछते हैं यह सब क्या है ?
वराहमिहिर जी : यह सब तो प्रलय का संकेत है महाराज ।
सम्राट : ये क्या कह रहे हैं आप मगर अभी तो प्रलय का समय ही नहीं है ।
वराहमिहिर जी : जी सम्राट लगता है गृह नक्षत्रों में कोई बडा फेरबदल हुआ है जिस वजह से ऐसे हालात हो रहे हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य : तब तो हमें पृथ्वी वासियों के कल्याण के लिए उचित कदम उठाना ही होगा वराहमिहिर जी आप तुरंत सभी ज्योतिषाचार्यो की बैठक बुलाईये और निशकरष निर्णय निकालिए हम प्रजा को कुछ नहीं होने देंगे ।
वराहमिहिर जी और सम्राट विक्रमादित्य बैठक करते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य और वराहमिहिर जी बैठक में देखते हैं कि गृहों की दिशा एक दम से बदल चुकी होती है तभी वराहमिहिर जी कहते हैं सम्राट, राऊ देव गृहों में फेरबदल कर रहे हैं यही कारण है इस प्रलय का यही राऊ देव जो प्रचंड सूर्य को भी निगल कर अपना दास बना लेता है । राऊ देव अपनी दिशा को छोड विपरित दिशा की और जा रहे हैं पुष्प नक्षत्र की और ।
सम्राट : ऐसा क्या है पुष्प नक्षत्र में ?
वराहमिहिर जी : सम्राट पुष्प नक्षत्र ही सभी सुखों का कारण है ।
वही स्वर्ग लोक में भी हा हा कार हो रहा था , देवर्षि नारद इंद्र देव आप राऊ देव को रोकिए , देवराज इंद्र जी देवर्षि नही तो देवताओं का भारी नुकसान हो जाएगा सभी देवता मिलकर राऊ देव को रोकने जाते हैं राऊ देव कहते हैं इंद्र देव मैने समुद्र मंथन के समय अमृत पिया जिस वजह से मैं अमर हुआ किंतु मेरे लिए यह अमरता श्राप बन गयी आपने मुझे अपनी सभा में स्थान नही दिया मेरा अपमान किया में अब सारे संसार को खत्म कर दूंगा और सभी देवता पराजित हो जाते हैं और राऊ देव फिर से निकल पडते है संसार को नष्ट करने के लिए । वही उज्जैन में संसार को बचाने के उद्देश्य से विक्रमादित्य बैठक कर रहे होते हैं ।
वराहमिहिर जी : सम्राट विक्रमादित्य पुष्प नक्षत्र के नष्ट होते ही धरती से सबसे पहले जल समाप्त हो जाएगा फिर संपूर्ण अनाज नष्ट हो जाएगा और कभी पैदावार नही होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य : वराहमिहिर जी कितना समय है अभी पुष्प नक्षत्र को खंडित करने में ?
वराहमिहिर जी : चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य मेरी ज्योतिष विद्या की गणना के आधार पर आज से ठीक 21 दिन के तीसरे पहर की अंतिम घडी में पुष्प नक्षत्र खंडित हो जाएगा और उसी दिन होगा इस युग का अंत और खत्म हो जाएगी सृष्टि ।
राजा विक्रणादित्य : नहीं वराहमिहिर जी हम मिट जाएगें समाप्त हो जाएगे किंतु सृष्टि को कुछ नहीं होने देंगे ।
राऊ देव देवताओं को परास्त कर सृष्टि का विनाश करने लगातार बढते चले जाते हैं वही संसार को बचाने के लिए चिंतित चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य संसार को बचाने का उपाय खोजते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य घोडे पर सवार होकर सौरमंडल की और निकलते हैं ,
वराहमिहिर जी : उन्हें रोकते हैं और कहते हैं सम्राट आप सौरमंडल में प्रवेश नहीं कर सकते वहा गुरूत्व आकर्षण नही है वहा शुन्य गति है सम्राट आपके वहाँ जाने का अर्थ है आपके जीवन पर संकट होना ।
सम्राट विक्रमादित्य : आचार्य वराहमिहिर जी हमारे लिए हमारी प्रजा की हमारा जीवन है और हम अपनी प्रजा को कुछ नही होने देंगे जो लोग निस्वार्थ हितकारी कार्य करते हैं उन्हें कुछ नही होता ।
और सम्राट विक्रमादित्य सौरमंडल की और निकल पडते है । सौरमंडल में बडे बडे पत्थर आते हैं और सम्राट विक्रमादित्य अपने घोडे के साथ वापस क्षिप्रा नदी पर गिर जाते हैं वह सम्राट विक्रमादित्य अपने घोडे के साथ वापस राज महल लौट आते हैं ।
।। सिंहासन बत्तीसी की कथा सुन रहे राजा भोज पराक्रम की कथा पराक्रम की देवी से सुन रहे होते तो तुरंत कहते हैं जब सभी मार्ग बंद हो जाते हैं तो मनुष्य भक्ति के मार्ग पर जाता है यही किया होगा सम्राट विक्रमादित्य ने , देवी तुंरत कहती हैं राजा भोज आपके और चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के विचार बिलकुल एक जैसे हैं सिंहासन बत्तीसी को आप जैसा महान उतराधिकारी मिलना ही चाहिए ।।
सम्राट विक्रमादित्य : राजपुरोहितो के साथ राऊ देव का यज्ञ करते हैं ।
वराहमिहिर जी : निश्चित ही राऊ देव इस पुजा से प्रसन्न होंगे इस में तनिक भी शंका नहीं है ।
सम्राट विक्रमादित्य : इश्वर करे की यह सच हो और प्रथ्वी पर आने वाला संकट टल जाए ।
इस तरह तीन दिन और तीन रात तक चला यज्ञ पुरा होता है ।
सम्राट विक्रमादित्य : राजपुरोहित जी अब राऊ देव शांत हो चुके होंगे और पृथ्वी पर आने वाला संकट टल चुका होगा ।
राजपुरोहित जी : जी हा सम्राट हम ने पुजा तो पुरी की अब राऊ देव को प्रसन्न होना ही चाहिए ।
सैनिक : सम्राट धरती की और बडे बडे उल्का पींड आ रहे हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य : हमने राऊ देव को पुजा करके समझाया किंतु वे नही माने अब हम अपने शस्त्र उठाएंगे ।
और विक्रमादित्य तुरंत निकलते हैं अपना धनुष लेकर और अपने दैविक बाणों से सभी उल्का पींडो को खत्म कर देते हैं । यह संसार में पहली बार हुआ था जब किसी मनुष्य ने प्राकृतिक आपदा को रोका हो । सम्राट विक्रमादित्य महल लौटते हैं और आगे के बारे में सोचते हैं ।
अगली पोस्ट में देखिए विक्रमादित्य का पराक्रम
सम्राट विक्रमादित्य अपनी प्रजा को देखने निकलते हैं सभी से मिलते हैं तभी उन्हें अचानक कोई नहीं दिखता ऐसी कल्पना उन्हें होती है फिर वे थोडी दूरी पर जाते हैं वहाँ पर उन्हें कुछ बच्चे खेलते हुए नजर आते हैं कुछ लोग उन से पूछते हैं महाराज क्या 16 दिन बाद हम मे कोई जीवित नही बचेगा सम्राट वहा से जाते हैं बिना कुछ कहे ।
सम्राट विक्रमादित्य : हे विधाता हम क्या करे कैसे बचाए इस संसार को राऊ देव के प्रकोप से विधाता हम 700 करोड मनुष्यों उतने ही जीव जंतु 33 करोड देवी देवताओं के प्राणों को कैसे बचाये हमारा मार्गदर्शन किजिये विधाता ।
तभी इंद्र देव प्रकट होते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य : इंद्र देव हमारी सहायता कीजिए कैसे प्रवेश करे सौरमंडल में हमें बताइए ।
इंद्र देव : सम्राट विक्रमादित्य आपको अपने शरीर को पंच तत्वों में विलिन करना होगा साधना से तभी आप प्रवेश कर पाएंगे ।
सम्राट : मगर इंद्र देव हम इस शरीर के द्वारा क्यों नही जा सकते वो मनुष्य कायर होंगे इंद्र देव जिन्हें अपने जीवन का मोह होगा ।
इंद्र देव : नहीं सम्राट कोई भी पृथ्वी वासी सौरमंडल में प्रवेश नही कर सकता क्योंकि धरती की गती और वहा की गति में अंतर है और आप अपने गुणों के तेज से वहा पहुंच भी गये तो आप राऊ देव के सामने पहुंच भी गये तो आपके शरीर के टुकडे टुकडे हो जाएगे इसलिये आप पंच तत्व अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी , अंतरिक्ष इन पंच तत्वों में आप अपने शरीर को विलय कर सौरमंडल में प्रवेश करिए और राऊ देव को हरा दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य : हम वचन देते हैं इंद्र देव हम अपने आप को पंच तत्वों में विलीन जरूर करेंगे सृष्टि की रक्षा के लिए ।
इंद्र देव : आप महान है सम्राट जो अपनी प्रजा और सृष्टि संपूर्ण धरती के बारे में इतना सोचते हैं आप बचाइए सम्राट हम सभी आपके साथ हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य सबसे पहले जल की तीन दिन तक लगातार तपस्या कर जल में विलीन होते हैं फिर अग्नि की लगातार 3 दिन फिर वायु फिर धरती फिर अंतरिक्ष इस प्रकार 15 दिन की कठोर तपस्या से सम्राट विक्रमादित्य अपने शरीर को पंच तत्वों में विलीन कर लेते हैं और महल लोटते है ।
नोट : यहाँ यह जरूर जानिए की जो कठोर तपस्या राजा विक्रमादित्य ने की वह हर मनुष्य के लिए संभव नहीं है बडे बडे ऋषि मुनियों को सैकडों जन्म लग जाते है मगर तब भी वे इस साधना को पूरा नही कर पाते हैं इस संसार में यह महान साधना सिर्फ सम्राट विक्रमादित्य ने की थी ।
सम्राट विक्रमादित्य के महल लौटने से पहले महारानी चित्रलेखा राज्य का कार्यभार संभालती है ।
आचार्य वराहमिहिर : महारानी आज से ठीक 1 दिन बाद प्रलय हो जाएगा ।
महारानी चित्रलेखा : नही वराहमिहिर जी अन्त केवल दिनों का होगा संसार का नहीं हमें विश्वास है अपने पति चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य पर और उनके संकल्प पर वो संसार को कुछ नही होने देंगे ।
प्रजा : महारानी जी सारा अन्न जलकर राख हो गया ।
महारानी : वराहमिहिर जी क्या कारण हो सकता है इस सब का ।
वराहमिहिर जी : महारानी जी लगता है राऊ देव और निकट पहुँच चुके हैं इसलिए पृथ्वी पर अकाल की स्थति बन गयी है और जल भी समाप्त होता जा रहा है ।
महारानी : चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जब तक है तब तक पृथ्वी पर कोई संकट नही आ सकता ।
।। पराक्रम की देवी राजा भोज से कहती है संसार के विनाश का समय निकट था सभी लोग भय से काँप चुके थे संपूर्ण युग समाप्ति की और था संपूर्ण मनुष्य जाति काँप चुकी थी और बड रही थी निराशा अब यदि कोई आशा थी तो वो थे स्वंय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।।
सम्राट विक्रमादित्य महल लौट ते हैं और अपनी प्रजा को कहते हैं आप मत घबराये हम है अभी ।
महारानी चित्रलेखा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की आरती कर रही होती है ।
महारानी चित्रलेखा : सम्राट हम अपनी सारी प्रजा का दायित्व आपको देते हैं ।
सम्राट : महारानी जी पृथ्वी वासियों की रक्षा करना हमारा प्रथम धर्म और परम कृत्वय है हम मिट जाएगें समाप्त हो जाएगे मगर कभी पृथवी वासियों को बिखरने नही देंगे ।
महारानी चित्रलेखा : जी सम्राट हम अर्धांगिनी है आपकी हमे पूर्ण विश्वास है आप पर ।
आचार्य वराहमिहिर जी आशीर्वाद दिजिये हमें आप अपने उद्देश्य में सफल हो महाराज । महारानी जी आप अपना और प्रजा का ध्यान रखिएगा ।
आचार्य वराहमिहिर जी : महाराज आप जल्दी जाइये अब सिर्फ 12 घंटे बचे हैं ।
और चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य निकल पडते है संसार को बचाने ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी साधना के बल पर सौरमंडल पहुंच जाते हैं और वे वहा पहुंच कर और शीघ्रता करते हैं । वही धरती पर साँस भी खत्म हो जाती है सभी बेहोश होकर गिर पडते है । सभी देवता सूर्य देव शनिदेव सभी देख रहे होते हैं वही राऊ देव पुष्प नक्षत्र को खंडित करने का शस्त्र छोड देते हैं पुरी पृथ्वी हिल जाती है ।
।। पराक्रम की देवी कहती हैं राजा भोज से राजन सब कुछ असफल हो जाता है तभी राजा भोज कहते हैं नही देवी पुरे मन से किया हुआ कर्म और चक्रवर्ती पराक्रमी विक्रमादित्य जो पृथ्वी वासियों के लिए निस्वार्थ कार्य कर रहे होते हैं भला वे कैसे असफल हो सकते थे ।।
देवराज इंद्र कहते हैं अब तो आखरी उम्मीद सम्राट विक्रमादित्य भी नजर नही आ रहे तभी शनिदेव कहते हैं देवराज देखिए सम्राट विक्रमादित्य आ गये । सम्राट विक्रमादित्य राऊ देव के सामने पहुंच कर वो प्रहार अपने उपर ले लेते हैं ।
राऊ देव : सम्राट विक्रमादित्य आप क्यों आए हैं यहाँ आप तो वैसे भी प्रतापी है आपका प्रलय में कुछ नही होता ।
सम्राट विक्रमादित्य : राऊ देव पृथ्वी वासी हमारी प्रजा है हम उन्हें कुछ नही होने देंगे ।
राऊ देव : अच्छा तो अब तुम रोकोगे मुझे जिस राऊ को कोई भी देवता नही हरा पाया स्वयं भगवान भी मुझे रोकने नही आए ।
सम्राट विक्रमादित्य : क्योंकि अभी हम जीवित हैं और आपने कहा कि हम क्या रोकेंगे तो यह तो युद्ध के बाद ही पता चलेगा राऊ देव ।
राऊ देव और विक्रमादित्य दोनों धनुष से युद्ध करते हैं । सम्राट विक्रमादित्य अपनी पुरी ताकत लगा देते हैं और राऊ देव को बंदी बना लेते हैं वही पुष्प नक्षत्र आगे निकल जाता और संसार से सदा सदा के लिए प्रलय का खतरा टल जाता है राऊ देव छुटते ही विक्रमादित्य पर हमला करते हैं चुकीं सम्राट की पुरी ताकत चली जाती है ।
राऊ देव : विक्रमादित्य तुमने ऐसा क्यों किया मेरा बदला विफल कर दिया हमारे प्रतिशोध का क्या जो हम अपने अपमान का ले रहे थे देवताओं से ।
सम्राट विक्रमादित्य : मगर आपके प्रतिशोध लेने का यह सही तरीका नही है आप तो देवता है फिर भी आप सारी मानव जाति को खत्म कर रबे थे इसमें तो आपका निजी स्वार्थ नजर आ रहा है अगर आपको स्थान नही मिला तो आप हमारे पास आते हम इंद्र देव को आदेश देते । राऊ देव : तुमने अच्छा नहीं किया विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य हमने बिल्कुल उचित किया है राऊ देव हमने पृथ्वी वासियों से अपनी मित्रता निभाई है ।
राजा विक्रमादित्य और राऊ देव का फिर से युद्ध होता है विक्रमादित्य की सारी शक्तियाँ खत्म हो चुकी होती है तभी भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं और राऊ देव से कहते हैं राऊ क्यों कर रहे हो यह राऊ देव प्रभु इंद्र ने मुझे अपनी सभा में जगह नही दी में कहा जाता तभी ब्रहमा जी कहते हैं आज से आपका स्थान ब्रहम लोक में होगा इस सम्मान पर राऊ देव खुश होते हैं वही ब्रहमा जी विक्रमादित्य को उनकी सारी शक्तियाँ लोटा देते हैं और कहते हैं आज आपने ना केवल पृथ्वी वह मानव जाती वह देवताओं पर उपकार किया अपितु आपने हम त्रिदेवों पर भी उपकार किया जब से यह संसार बना है आपके जैसा राजा हमने नही देखा । विक्रमादित्य ब्रहमा जी को प्रणाम करते हैं वह हमारा कर्तव्य है यह यह कहते हैं । राऊ देव विक्रमादित्य से क्षमा माँगते है वह कहते आज आपने हमें अपने देवता पद से गिरने से बचाया आप महान है हम आपको वरदान देना चाहता है ग्रमण किजिये हमारा वरदान तभी विक्रमादित्य कहते हैं आप हमे वचन दिजिये इसके बाद आप कभी भी पुष्प नक्षत्र को खंडित मत किजिएगा । सम्राट वरदान मांगा तो भी दूसरों के लिए हम वचन देते हैं आपको । आपकी जय हो सम्राट यह कह राऊ देव चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को गले लगा लेते हैं । अंत में विजय सत्य और धर्म की हुई ।
।। जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।।
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