चौथा गुण चरित्र
।। चौथा गुण चरित्र ।। चरित्रवान विक्रमादित्य ।।
राजा भोज जैसे ही चोथी सीडी चढते है वैसे ही चरित्र की देवी उन्हें रोकती है और कहती है आपको सम्राट विक्रमादित्य के चरित्र के बारे में जान ना होगा , सम्राट विक्रमादित्य जो इस संसार के सबसे बडे चरित्रवान पुरुष थे उनका चरित्र भगवान राम के चरित्र से भी बडा था , सम्राट विक्रमादित्य का चरित्र उतना ही श्रेष्ठ था जितना इस संसार के जीवन के लिए पानी है । उनके जैसा चरित्रवान होना ठीक उसी समान है जिस प्रकार आसमान से तारे तोड कर लाना ।
आइये राजा भोज में आपको इस संसार के सर्वश्रेष्ठ चरित्रवान पुरुष की कथा सुनाती हूँ ।
एक समय की बात है इंद्रदेव ने एक सभा का आयोजन किया उस सभा में यह तय किया जाना था कि इस संसार में किस गुण के प्रतिक कौन है । कौन मनुष्य किस गुण के कारण प्रसिद्ध है ।
इंद्र देव - आदरणीय ऋषि गण इस सभा के आयोजन का उद्देश्य है गुणों के प्रतिक स्वरूप मनुष्यों का चयन जिस प्रकार सभी देव किसी ना किसी गुण के लिए प्रसिद्ध है ठीक उसी तरह मनुष्यों का चयन करना है । अब मैं गुरु बृहस्पति से आग्रह करूंगा की वो गुणों के प्रतिक मनुष्यों की घोषणा करे ।
बृहस्पति देव - पृथ्वी पर तप के प्रतिक है ऋषि विश्वामित्र क्योंकि क्षत्रिय होते हुए भी उन्होंने ऋषि पद प्राप्त किया । वही ऋषि पद के लिए ऋषि वशिष्ठ जो ऋषि पद पर सबसे महान है । वही तीसरा सदगुण है त्याग जिसके प्रतिक है दधीचि जिन्होंने संसार की रक्षा के लिए अपने शरीर तक को त्याग दिया ।
ऋषि दुर्वासा - क्षमा कीजिए गुरु बृहस्पति परंतु इन सभी गुणों में सर्वश्रेष्ठ है चरित्र क्योंकि चरित्र से ही सभी गुण संचालित होते हैं अतः जो चरित्र का प्रतिक होगा वही इस ब्रह्मांड का सर्वश्रेष्ठ मनुष्य होगा जिसकी गाथा त्रिदेव भी गाएंगे ।आप चरित्र के प्रतिक मनुष्य की घोषणा किजिये । आपने चरित्र के प्रतिक स्वरूप हम ऋषियों में किसे चुना है ।
गुरु बृहस्पति - ऋषिवर संसार में चरित्र के प्रतिक है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
ऋषि दुर्वासा - यह कैसी अर्थहीन बात कर रहे हैं गुरु बृहस्पति एक राजा कभी चरित्र का प्रतिक नही हो सकता वो विलासिता का प्रतीक है आप हम ऋषियों का घोर अपमान कर रहे हैं ।
गुरु बृहस्पति - नही ऋषि दुर्वासा में आप ऋषियों का अपमान नही कर रहा मगर सम्राट विक्रमादित्य का चरित्र आप सभी ऋषियों से भी ऊंचा है ।
ऋषि दुर्वासा - तो ठीक है यदि विक्रमादित्य चरित्र का प्रतिक है और इस ब्रह्मांड का सर्वश्रेष्ठ मनुष्य है तो उसे इसकी परीक्षा देनी होगी ।
" ऋषि दुर्वासा मोहिनी को प्रकट करते हैं । "
मोहिनी - प्रणाम ऋषिवर में अपने निर्माण का उद्देश्य जानती हूँ , और यह भी जानती हूँ कि मोहिनी की शक्ति से आज तक कोई नही बच पाया है बडे बडे देवता ऋषि मुनि भी हार गये । चरित्र वान विक्रमादित्य को में अपनी एक मुस्कुराहट से वश में कर लूँगी ।
सम्राट विक्रमादित्य सुबह सुबह क्षिप्रा नदी में पुजा कर रहे होते हैं तभी वहा मोहिनी यानी प्रियमवधा आ जाती है ।
प्रियमवधा मन में कहती हैं सम्राट विक्रमादित्य आज तुम्हारा धर्म चरित्र सब खत्म कर देंगे हम सारा संसार मुझ से हारा है आज तुम भी हारोगे ।
प्रियंवदा एक नांव में सवार होती है मगर सम्राट विक्रमादित्य उसे बिना देखे वहां से पूजा करके निकलते हैं । तभी प्रियंवदा !
प्रियंवदा - बचाओ ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह पुकार तो नदी से आ रही है हमें उसे बचाना ही होगा ।
तभी सम्राट विक्रमादित्य उसे बचा लेते हैं मगर वही से एक अलग लोक आ जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी यह हम कहाँ आ गये ।
प्रियंवदा - यह है श्रृंगार लोक , और में हूँ यहाँ की रानी प्रियंवदा ।
सम्राट विक्रमादित्य - स्वागत के लिए धन्यवाद देवी ।
प्रियंवदा - दासियों सम्राट को हमारे रंग महल में लाओ ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्षमा करिएगा देवी किंतु हम रंग महल नही पृथ्वी लोक जाएगें अपनी उज्जैनी ।
तभी प्रियंवदा सम्राट को बंदी बना लेती है
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या र रही है देवी आप ।
प्रियंवदा - आपको श्रृंगार की बेडीयो में जकड रहे हैं ताकि आप कही जा नही पाए ।
सम्राट विक्रमादित्य पृथ्वी लोक का रास्ता खोज ते है तभी वह जहाँ हाथ रखते हैं एक सुंदर स्त्री प्रकट हो जाती है किंतु सम्राट किसी पर ध्यान नही देते हैं । सम्राट विक्रमादित्य रंग महल की ओर जाते हैं वहाँ पर सैकडों स्त्रियाँ सहित प्रियंवदा सम्राट को घेर लेती हैं ।
प्रियंवदा - सम्राट विक्रमादित्य मैं आपसे प्रेम करती हूँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर हमें आपसे सिर्फ सहानुभूति है ।
प्रियंवदा - मगर प्रेम क्यों नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्योंकि आप हमारे प्रेम के योग्य नहीं है ।
प्रियंवदा - क्यों आपके पास हृदय नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारे पास हृदय है देवी परंतु हमारे हृदय में हमारी पत्नी है । और हम केवल उन्हीं से प्रेम करते हैं ।
प्रियंवदा - भूल जाइए उन्हें । ओर हमारे साथ श्रृंगार लोक में बस जाइये , चिरयौवन के स्वामि रहेगें कभी बूढे नही होंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम यौवन के लिए अपने चरित्र का त्याग नही करेंगे देवी ।
प्रियंवदा - राजन् यह जो बात आपने इतने विश्वास से कहीं है, अगर हम छू भी ले तो आपका यह चरित्र ओस की तरह उड जाएगा । और आप सबकुछ भूल जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - कोशिश कर के देख लीजिए देवी । आप अपनी इच्छा पूरी करिए हम छूए ।
प्रियंवदा जैसे ही सम्राट को गले लगाने जाती है उसे झटका लगता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह हमारी पत्नी का प्रेम है देवी और उन्हें दिया हुआ वचन ।
प्रियंवदा - सम्राट आज यह पहली बार हुआ है । जब मेरे छूने के बाद भी किसी का मन नही बदला हो ।
चरित्र की देवी राजा भोज से कहती है सम्राट का चरित्र बहुत महान है , सही कहा देवी और यह एक सच्चे पुरुष का ही चरित्र था । किंतु देवी , जी कहिए राजा भोज , देवी ! प्रियंवदा असफल रही थी और उसके प्रेम निवेदन को सम्राट ने अस्वीकार किया था । अब वो शांती से नही बैठेगी । आपने सही कहा राजा भोज ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें तुरंत इस महल से बाहर जाने का रास्ता खोजना होगा । यह तो वही मार्ग है जिस से हम यहाँ आए थे यही मार्ग हमें पृथ्वी लोक ले जाएगा ।
तभी मार्ग बंद हो जाता है और प्रियंवदा सामने आ जाती है और कहती है महाराज यह श्रृंगार लोक है यहाँ आना और जाना सब हमारी इच्छा से ही होता है । और तभी प्रियंवदा अपने हाथों में काम वासना का धनुष बाण हाथ में लेती है ।
प्रियंवदा - राजन् यह सम्मोहन बाण है इसके लगते ही आप अपनी पृथ्वी , उज्जैनी , पत्नी और चरित्र सब भूल जाएंगे और आपको याद रहेगी तो केवल प्रियंवदा । ऐसा कह कर सम्राट के उपर बाण छोड ती है और वह बाण उनके शरीर में समा जाता है । उसके बाद प्रियंवदा सम्राट विक्रमादित्य के उपर प्रेम बाण छोडती है और कहती है कि राजन् यह बाण आपके मन मस्तिष्क से आपकी पत्नी की सारी यादें मिटा देगी । उसके बाद प्रियंवदा सम्राट विक्रमादित्य पर काम वासना का बाण छोडती है और कहती है राजन् इस बाण के लगते ही आपके हृदय से चरित्र और धर्म का कवच हमेशा के लिए टूट जाएगा । और आप मुझ से बहुत प्यार करने लगेंगे । ऐसा कह कर प्रियंवदा बाण छोडती है सम्राट के शरीर में तीनों बाण चले जाते हैं ।
प्रियंवदा सम्राट विक्रमादित्य के करीब आती है और कहती है सम्राट अब आपका चरित्र खत्म होकर रहेगा क्योंकि जो तीन बाण मेंने आप पर चलाए है वे तीन बाण कामदेव ने महादेव के उपर चलाए थे और आप त्रिदेव तो है नही आपका चरित्र तो गया अब ।
प्रियंवदा - महाराज अब यह दूरी क्यों हमारे करीब आइये आपकी यह मुस्कुराहट से हम समझ गये हैं कि आप अपनी पत्नी को भूल गये हैं करीब आइये महाराज । तभी प्रियंवदा सम्राट के करीब जाती है तभी सम्राट विक्रमादित्य दूर हो जाते हैं और कहते है देवी जिस बाणों से आपने हमारे चरित्र को भ्रष्ट करना चाहा वो मोहिनी बाण हमारे चरित्र और हमारी पत्नी के प्यार से हार गये । और आपने सही कहा हम त्रिदेव की तरह भगवान नही है मगर एक चरित्रवान पुरुष है ।
प्रियंवदा - सम्राट अब हम आपको रोकेंगे नही मार्ग सामने है चले जाइये किंतु जाने से पहले आपको सत्य जरूर कहना चाहूँगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - कहिये देवी ।
प्रियंवदा - आपके चरित्र के सामने मेरा यह रूप हार गया ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी के चरित्र के आगे मेरा सौंदर्य शीशे की तरह चकनाचूर हो गया है । सम्राट मैने कहा था कि आप त्रिदेव की तरह नही मगर आपको देख कर यह लगता है कि आपके बीतर त्रिदेव है आप चतुर्थ देव है । प्रियंवदा - जाइये सम्राट यह रहा मार्ग । और सम्राट वापस चले जाते हैं ।
चरित्र की देवी राजा भोज से कहती है राजा भोज ये है कामदेव के तीन अपराजित बाण जो सम्राट विक्रमादित्य के महान चरित्र के सामने हार गये ।
राजा भोज - मगर देवी प्रियंवदा इतनी बेबस । जब किसी प्रेमिका का प्यार पुरा नही होता तब वो चोट खाई हुई नागिन की तरह हो जाती है अपना बदला पुरा करने के लिए कुछ भी कर सकती है । प्रियंवदा एक स्त्री थी और जहाँ स्त्री ममता का सागर होती है वही निर्ममता भी उस में होती है जहाँ स्त्री कोमल होती है वही वो कठोर भी होती है । प्रियंवदा ने सम्राट विक्रमादित्य के साथ छल किया होगा ।
प्रियंवदा सम्राट विक्रमादित्य के साथ छल करती है । प्रियंवदा सम्राट विक्रमादित्य की अनुपस्थिति में उज्जैनी पहुंच जाती है ।
प्रियंवदा - तो यह है सम्राट विक्रमादित्य की धर्म न्याय और चरित्र की नगरी उज्जैनी । जहाँ उनके महान चरित्र की वजह से उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है । मगर में सम्राट विक्रमादित्य के चरित्र को खत्म कर दूंगी और जो प्रजा उन्हें पूजती है वो उन से घृणा करेगी ।
उसी दिन प्रियंवदा साध्वी के वेश में महल में पहुंचती है तभी सैनिक उन्हें रोक देते हैं और वराहमिहिर जी पहुंच ते हैं ।
वराहमिहिर जी - क्यों मिलना चाहती है आप महारानी जी से प्रयोजन क्या है ।
प्रियंवदा - यह हम सिर्फ महारानी जी को ही बताएंगे ।
वराहमिहिर जी - तो फिर आप नही मिल सकती ।
प्रियंवदा - अलाक निरंजन एक साध्वी का अपमान सब का विनाश हो जाएगा ।
तभी महारानी चित्रलेखा जी आ जाती है ।
महारानी चित्रलेखा - वराहमिहिर जी बात क्या है ।
वराहमिहिर जी - महारानी यह बिना बताए आपसे मिलना चाहती है ।
प्रियंवदा - आज आपके दर्शन हो ही गए महारानी जी ।
महारानी चित्रलेखा -देवी आप आइए यह तो हमारा सौभाग्य है पूजा के तुरंत बाद एक साध्वी के दर्शन हो गए । कहीये बात क्या है ।
प्रियंवदा - यहां सब के सामने नहीँ अकेले में ।
महारानी चित्रलेखा - आइए पधारे ।
वराहमिहिर जी - राऊ काल में किसी अपरिचित व्यक्ति का महल में प्रवेश करना हे इश्वर कृपा करना ।
प्रियंवदा - परम पिता परमेश्वर जैसा सुना था वैसा पाया " जैसा देखा वैसा पाया जैसा सोचा वैसा जाना , मैं ढूंढ रही थी जिसे सोप सकूँ जीवन का फल जिसको , मिली मुझे वो सति सावित्री परम पिता परमेश्वर ।
महारानी चित्रलेखा - देवी मैं कुछ समझी नहीं ।
प्रियंवदा - महारानी हम अपनी भक्ति का फल देना चाहते हैं मगर हम सति सावित्री को ढूंढ रहे थे जिसके रूप में हमें आप मिली और इस पुरे युग में आपसे श्रेष्ठ सति कोई नही है । इसलिए हम आपको कुछ देना चाहते हैं । महारानी हमारे तप का यह फल खाइये इस से आपकी सुंदरता हमेशा रहेगी और आपके यौवन पर कभी बुढापे का असर नही पडेगा ।
महारानी चित्रलेखा - यह तो हमारा सौभाग्य है , मगर हम आपके तप का फल नही ले सकते ।
प्रियंवदा - इसका अर्थ जानती हो । तुम एक साध्वी के निरादर के साथ साथ हमारे तप का निरादर कर रही हो ।
वराहमिहिर जी - यह पत्र कुंडली बताएगी उसके आने का अर्थ , यह क्या छल की रचना है उसके आने का उद्देश्य । मगर यह छल किसके साथ है ।
महारानी चित्रलेखा - देवी हमारी वजह से आपका जीवन और तप खराब नही होगा हम खाएंगे ।
प्रियंवदा - जी महारानी जी ।
महारानी चित्रलेखा - देवी आपकी आखों में आसूं क्यों ?
प्रियंवदा - नहीं कुछ नही ।
महारानी चित्रलेखा - बताइये देवी देखिए हमनें भी आपकी बात मानी अब आप भी मानिए । हमारी परम्परा है संतो और साध्वी के मुख पर सुख देखना ।
प्रियंवदा - महारानी आपकी सुंदरता देख कर हमारे भी मन में मोह जाग गया आपके समान ब्रह्मांड सुंदरी होना ।
महारानी चित्रलेखा - मगर देवी सुंदरता तो इश्वर की देन होती है । भला इसमें हम आपकी क्या सहायता कर सकते हैं ।
प्रियंवदा - आप हमें अपना सौंदर्य कुछ समय के लिए दिजिये ।
महारानी चित्रलेखा - जरूर आपने हमें अपने तप का फल दिया ।
प्रियंवदा मन में कहती हैं सम्राट विक्रमादित्य आज से खत्म हो जाएगी आपके चरित्र की शक्ति ।
प्रियंवदा मन में कहती हैं - अब विक्रमादित्य तुम्हारा चरित्र खत्म हो जाएगा क्योंकि तुम दूसरी स्त्री के करीब नही जाते हो मगर तुम्हारी पत्नी के रूप में तुम मुझे नही पहचान पाओगे ।
महारानी चित्रलेखा - देवी अब हमें अपना रूप लौटा दिजिये ।
प्रियंवदा - रूप और वापस हमनें तुम से यह रूप वापस देने के लिए नही लिया था । अब तुम जाओगी वन और हम रहेगें महारानी बन कर ।
महारानी चित्रलेखा - यह संयासी कैसी उलटी बात कर रही है स्त्री तो त्याग की देवी होती है । अब कैसे ले इस संयासी से अपना रूप । देवी आपने कुछ क्षण के लिए हमारा रूप लिया था , हमें अपना रूप लौटा दिजिये ।
प्रियंवदा - महारानी यह मजाक नही है यह सच है कडवा सच अब आप संयासी है और हम महारानी चित्रलेखा है और हमारा अधिकार चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य सहीत पुरी उज्जैनी और पृथ्वी पर है ।
महारानी चित्रलेखा - आप हमें अपना रूप लौटा दिजिये वरना हम सैनिकों को बुलाएंगे ।
चहरा बदलने की वजह से सभी प्रियंवदा को ही महारानी समझ रहे थे ।
प्रियंवदा - वराहमिहिर जी ! वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - क्या हुआ महारानी जी ।
प्रियंवदा - हम से गलती हो गई वो संयासी के रूप में छली है ।
सेनापति - ऐसा क्या हुआ महारानी ।
प्रियंवदा - उसने कक्ष में जाते ही हम से हमारा रूप मांगा और खुद को महारानी कहने लगी ।
महारानी चित्रलेखा - यह सब झूठ है वराहमिहिर जी सेनापति जी यह झूठ बोल रही है हम ही आपकी महारानी है ।
।। रूप बदलने की वजह से किसी ने महारानी चित्रलेखा की बात नही मानी और वराहमिहिर जी उन्हें महल से जाने को कहते हैं महारानी चित्रलेखा हुई बेबस महल से जाना पढा उन्हें वही सभी दरबारी झूठ का शिकार होती हैं ।।
महारानी चित्रलेखा - नही वराहमिहिर जी यह झूठ बोल रही है ।
वराहमिहिर जी - देवी हमारे राज्य की संस्कृति है औरतों का सम्मान कृपया मुझे अपने संस्कार की सीमा तोडने पर विवश ना करे । सैनिकों निकाल दो इन्हें ।
सवर्ग में देवराज इंद्र दूरवासा ऋषि से कहते हैं ।
इंद्र देव - ऋषिवर परीक्षा तो सम्राट विक्रमादित्य की थी फिर सम्राट की पत्नी महारानी चित्रलेखा को दण्ड क्यों । यह तो परीक्षा के नाम पर अधर्म है ।
ऋषि दुर्वासा - नही देवराज यह अधर्म नही है । यह तो सम्राट विक्रमादित्य की वास्तविक परीक्षा है । सम्राट विक्रमादित्य का बल था महारानी चित्रलेखा का प्रेम । अब पता चलेगा की सम्राट चरित्रवान है या नहीं ।
इंद्र देव - ऋषि वर सम्राट विक्रमादित्य के चरित्र का पतन उतना ही असंभव है जितना ब्रह्मा विष्णु शिव के अस्तित्व का ना होना ।
सम्राट विक्रमादित्य बाहर से महल लौटते है , प्रियवंदा उनकी आरती उतार रही होती है तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी वर्षो से आपने परंपरा बना ली है ।
प्रियवंदा - कैसी परंपरा सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम जब भी कही बाहर से आते हैं आप हमारी आरती उतारती है ।
प्रियवंदा - उतारेंगे क्यों नही आप हमारे सुहाग है ।
सम्राट विक्रमादित्य - और ना आपका उत्तर बदलता है ।
प्रियवंदा- कैसा उत्तर ?
प्रियंवदा मन में कहती हैं - हमे चित्रलेखा से पूछ लेना चाहिए था कि वो क्या कहती थी ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह तो आप बताए महारानी ।
प्रियवंदा - हम आपकी परीक्षा ला रहे हैं आप बताए ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक है हम बताते हैं । आप हमेशा कहती हैं कि हम आपकी आरती नही आपकी नजर उतारते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आप कुछ भूल रही है ।
प्रियवंदा - क्या भूल रहे हैं हम ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुछ नही हम बस ऐसे ही आपको छेड रहे थे ।
प्रियवंदा - जी चलिए ।
सम्राट विक्रमादित्य मन में सोचते हैं - आज पहली बार ऐसा हुआ है जब हम बाहर से आए और महारानी ने हमारे चरण ना छुए हो । मना करने के बाद भी हट कर के छूती रही ।
सम्राट विक्रमादित्य अपने कक्ष में जाते हैं ।
प्रियंवदा - सम्राट विक्रमादित्य आपका चरित्र जो देवताओं ऋषियों और भगवान के बीच चर्चा का विषय है उस चरित्र को आज में खत्म कर दूँगी ।
प्रियंवदा सम्राट विक्रमादित्य के करीब जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऐसा क्यों लग रहा है हमें कि यह महारानी नही और कोई है ।
तभी प्रियंवदा उन्हें गले लगाती है तभी सम्राट के हृदय में तेज उतपन्न होता है और प्रियंवदा को जोर का झटका लगता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन हो आप और हमारी पत्नी के रूप में क्या कर रही है आप हमारी पत्नी नही है बताओ कौन है आप ।
।। तभी चरित्र की देवी राजा भोज से कहती है ।
देवी - राजन् क्या किसी के चरित्र में इतनी ताकत होती है ।
राजा भोज - हाँ जिसकी आत्मा जितनी पवित्र उसका मन चरित्र उतना ही महान ।
देवी - सम्राट विक्रमादित्य को यह आभास कैसे हुआ उन्होंने सिर्फ स्पर्श से कैसे पहचान लिया ।
राजा भोज - क्योंकि राजा विक्रमादित्य ने सच्चा प्यार किया था और प्यार स्पर्श का मोहताज नही है इसलिए जब प्रियंवदा ने सम्राट को स्पर्श किया तो सम्राट विक्रमादित्य की आत्मा और मन ने इसे स्वीकार ही नहीं किया ।
देवी - राजा भोज और सम्राट विक्रमादित्य वास्तव में प्यार को समझते हैं ।
देवी - मगर अभी भी सम्राट की समस्या खत्म नहीं हुई थी ।
राजा भोज - मगर क्यों अब वो सबको बोल सकते थे ।
देवी - मगर उनके पास कोई सबूत नहीं था । सम्राट विक्रमादित्य मन की आखों से देखते थे मगर लोग बाहर की आखों का देखा ही सच मानते हैं ।।
सम्राट विक्रमादित्य प्रियंवदा को दरबार में लेकर जाते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही वराहमिहिर जी नही यह हमारी चित्रलेखा नही है हम अपनी पत्नी को जानते हैं ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आपको भूल हो रही है जो सामने दिखाई दे रहा है उस से में क्या पूछूँ , आपको भ्रम हो रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - भ्रम आपको हो सकता है हमें नही आखें आपकी धोखा खा सकती हैं हमारी नहीं । यह कोई छडयंत्र कारी है । बताओ स्त्री कौन हो तुम ।
प्रियंवदा - सम्राट आप भले हमें सजा दिजिये मगर हमारे साथ ऐसा व्यवहार ना करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - पती पत्नी के रिश्ते में निष्ठा और इमानदारी होनी अवश्यक है मगर तुम नही हो हमारी पत्नी ।
वराहमिहिर जी - सम्राट भ्रम को त्याग दिजिये , और यह संदेह खत्म करिए महारानी के रूप में और कोई नही हो सकता ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी हम विनती करते हैं आपसे हमारी पत्नी कहा है बता दिजिये ।
प्रियंवदा - आप सत्य जान ना चाहते हैं तो सुनिए आप बदल गये हैं आपका चरित्र बदल गया है आप हमारे स्थान पर किसी और को महारानी बनाना चाहते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - बस स्त्री बस अब इसके आगे एक शब्द नही हम सबकुछ सहन कर सकते हैं पर अपने चरित्र पर लांछन नही तुम कौन हो क्या हो सब जानते हैं हम ।
प्रियंवदा - तो बता दिजिये ना सबको ।
सम्राट विक्रमादित्य - यहीं तो अफसोस है कि हम निरूत्तर है किंतु हम प्रमाण लेकर आएगें ।
प्रियंवदा - क्या लाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रमाण स्वरूप अपनी पत्नी को लाएंगे जिन्हें तुम ने कही छुपा दिया है और सब की आखों पर अपीमनी माया की पट्टी लगा दि है । हम आएंगे अवश्य आएगें प्रमाण के साथ ।
दुर्वासा ऋषि- विक्रमादित्य हर परीक्षा में पास हो सकता है मगर दुर्वासा की परीक्षा में नही ।
प्रियंवदा - सम्राट आपकी हर परीक्षा में सफल हुए में उनका चरित्र खत्म नही कर पाई । ऋषिवर सम्राट विक्रमादित्य एकलौते चरित्रवान पुरूष है इस संसार के सारा संसार रोह की आँख में पिघल जाएगा मगर सम्राट विक्रमादित्य कभी नही पिघलेगा । अब आप उनकी परीक्षा मत लिजिए ।
दुर्वासा ऋषि - बस मुझे शिक्षा मत दो तुम्हारा कर्तव्य मेरे आदेश का पालन करना अब विक्रमादित्य की अटल परीक्षा लो ।
प्रियंवदा - वो कैसे ।
दुर्वासा ऋषि - चरित्र को मृत्यु की कसौटी पर परीक्षा लो ।
प्रियवंदा - इतनी कठीन परीक्षा नही ऋषिवर में नही ले सकती ।
दुर्वासा ऋषि - लो वरना ऐसा श्राप दूंगा कि जन्म जन्मांतर तक चरित्र हीन जीवन जीयोगी ।
सम्राट विक्रमादित्य घोडे पर सवार होकर निकल जाते हैं वन में वे कहते हैं । हम सबके स्वर सुन पा रहे मगर अपनी पत्नी के नही महारानी चित्रलेखा कुछ बोलिए ।
तभी महारानी चित्रलेखा वन में एक गुफा में बेहोश हो कर गिरती है और सम्राट कहती हैं , महाराज स्वर सुन लेते हैं और उस दिशा में निकल जाते हैं । महारानी चित्रलेखा का रूप वापस हो जाता है । सम्राट विक्रमादित्य घोडे पर सवार होकर तेज गति से आते हैं और गुफा में पहुंच जाते हैं ।
महारानी चित्रलेखा - जब सांस के बगैर जीवन का कोई मौल नही प्रभु तो सम्राट के बिना जीवन जीने से अच्छा है मृत्यु ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महारानी चित्रलेखा आपको जीना है हम आपके थे और हमेशा आपके ही रहेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य महारानी चित्रलेखा को गले लगा लेते हैं महारानी चित्रलेखा रोती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महारानी नही मत रोइये हम आ गये हैं ।
महारानी चित्रलेखा - आपने उस स्त्री को पहचान लिया महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - हाँ महारानी भला पहचानते कैसे नही हमनें जीवन में प्रेम सिर्फ आपसे ही किया है दूसरी स्त्री हमारे लिए पराई है इसलिए हमने दूसरा विवाह भी कभी नही किया ना करेंगे हम सिर्फ आपके है ।
महारानी चित्रलेखा - हमें यकीन था महाराज । अब आप हमें शीघ्र से शीघ्र राजमहल ले चलिए ।
इतना कह कर महारानी बेहोश हो जाती है
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी हम शीघ्र ही जल लेकर आते हैं । सम्राट विक्रमादित्य तालाब से पानी लेने आते हैं तभी प्रियंवदा फिर से महारानी चित्रलेखा बन कर आ जाती है और कहती है सम्राट आप अपनी पत्नी को देख कर खुश नही हुए ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह रूप का खेल खेलना बंद करो प्रियंवदा ।
प्रियंवदा अपन असली रूप में आ जाती है ।
प्रियंवदा - यह रूप का खेल नही है राजन् यह प्रेम निवेदन है ।
सम्राट विक्रमादित्य - जो कभी निष्कर्ष तक नही जाएगा । चलि जाओ यहाँ से प्रियंवदा ।
प्रियंवदा - हम ऐसे नही जाएगें ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो कैसे जाएगीं आप ।
प्रियंवदा - यह वर माला मेरे गले में डाल कर मुझ से प्रेम विवाह कर लिजिए कसम आपकी हम चले जाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - असंभव है ये सात जन्मों तक संभव नहीं ।
प्रियंवदा - राजन् प्रेम का अपमान करना बहुत बडा पाप है आपको भी इसका दण्ड भुगतना पडेगा । यह लिजिए माला और अपनी पत्नी की तस्वीर को लगा दिजिएगा जिसके लिए आपने हमें ठुकराया उनके काम आएगी यह ।
सम्राट विक्रमादित्य तुरंत गुफा की और जाते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम महारानी को कुछ नही होने देंगे ।
प्रियंवदा एक सर्प प्रकट करती है जो महारानी चित्रलेखा को डस लेता है , सम्राट आते है पर उपके आने से पहले महारानी चित्रलेखा की मौत हो जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी आखें खोलो महारानी ।
प्रियंवदा - अब आपकी पत्नी कभी आखें नही खोल सकती मर चुकी है वो आपकी पत्नी का जीवन आपके चरित्र की भेंट चढ गया । मगर हम आपकी पत्नी के प्राण लौटा सकते हैं मगर आपको हम से विवाह करना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - असंभव ! चरित्र ही अमृत हमारी पत्नी ही हमारे लिए सबकुछ है हमारा चरित्र हमारा प्रेम हमारा जीवन सबकुछ हमारी पत्नी है ।
प्रियंवदा - ऐसा प्रेम ऐसा चरित्र ऐसा जीवन किस काम का जो अपना आधा अंग कही जाने वाली पत्नी की भी रक्षा ना कर सके ।
सम्राट विक्रमादित्य - सच ऐसा जीवन कोई काम का नही इसलिए हमारी पत्नी के साथ हम अपना जीवन भी समाप्त कर देंगे परंतु चरित्रहीन जीवन कभी नही जिएंगे किसी भी किमत में नही किसी भी परिस्थिति में नही ।
सम्राट विक्रमादित्य महारानी चित्रलेखा का शरीर क्षिप्रा के तट पर लाते हैं और उनके सामने बैठ कर कहते हैं - महारानी हमने जीवन भर आप ही से प्रेम किया और आप ही के संग जीवन बिताने के सपने देखे अब आप ही नहीं रही तो हम जीकर क्या करेंगे हम योगशक्ति के द्वारा आपके साथ अपने जीवन का भी त्याग कर लेंगे । और विवाह की बेदी पर लिए सातों वचनों का पलन ।
सम्राट विक्रमादित्य ऊँ का उचारन करते हैं और अग्नि देव का मंत्र बोल अपने जीवन को समाप्त करने लगते हैं तभी पुरा स्वर्ग हील उठता है पुरा ब्रह्मांड काँप उठता है ।
इंद्र देव - ऋषिवर यह एक चरित्र वान पुरुष की परीक्षा लेने का परिणाम है आज इंद्रासन डोल रहा है कल संसार से सारा धर्म और पुण्य समाप्त हो जाएगा । और अगर यदि ऐसा हुआ तो इसके दोषी होंगे आप ऋषि दुर्वासा ।
दुर्वासा ऋषि - आप चिंता मत कीजिए इंद्र देव ना आपका स्वर्ग को कुछ होगा ना संसार से धर्म समाप्त होगा हम जानते हैं सब कैसे ठीक होगा आइये ।
सभी देवता, प्रियंवदा , और ऋषि दुर्वासा आते हैं ।
ऋषि दुर्वासा - आखें खोलिए राजन् और आग को बंद करिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सब लोग यहाँ ।
ऋषि दुर्वासा - आपके चरित्र के तेज ने हमें यहाँ आने को विवश हो गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें क्षमा कीजिएगा हमारे चरित्र की वजह से आपको कष्ट हुआ ।
प्रियंवदा - नही राजन् क्षमा आप नही हम सभी आपसे मांगेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप ।
प्रियंवदा - हाँ राजन् मुझे ना चाहते हुए भी आपकी परीक्षा लेनी पढी ऋषि दुर्वासा के कहने पर , मगर हम सभी आपसे हार गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - लेकिन देवी हम भी तो पराजित हो गए ।
ऋषि दुर्वासा - आप पराजित नही हुए हैं सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसे पराजित नही हुए परीक्षा तो हमारी ली जा रही थी पर दण्ड हमारी पत्नी को क्यों मिला । ऐसा क्यों हुआ देवों हमारी पत्नी ने क्या किया था बताइए हमें ।
ऋषि दुर्वासा - परीक्षा का यही नियम है सभी सहारो को हटाकर उसे अकेला छोड दिया जाता है । मगर आप अकेले नही है आपकी पत्नी आपके साथ हैं । देखिए उन्हें पुनः ।
महारानी चित्रलेखा जिंदा हो जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा दोनों ऋषि दुर्वासा को हाथ जोडते है ।
देवराज इंद्र - तो बताइए ऋषिवर क्या विचार है आपका विक्रमादित्य के चरित्र पर ।
ऋषि दुर्वासा - केवल एक ना भूतों ना भविष्यति । इस संपूर्ण सृष्टि में सम्राट विक्रमादित्य जैसा चरित्रवान राजा ना हुआ है ना होगा । सम्राट यह में त्रिदेव का फैसला लेकर आया हूँ आपका चरित्र कैलाश पर्वत से भी ऊंचा और निर्मल है और श्री राम की मर्यादा से भी ऊंचा है आपका चरित्र । मुझे इस ब्रह्मांड का सब कुछ पता है और आप इस ब्रह्मांड के सबसे महान पुरुष है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस विश्वास के लिए आपका कोटी कोटी नमन ऋषिवर ।
प्रियंवदा - जब तक आपके जैसे लोग इस संसार में है स्त्री अपनी सुंदरता को वरदान समझेगी एक स्त्री होने के नाते मुझे आप पर गर्व है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद देवी । आप सभी का धन्यवाद ।
।। भगवान भी उनकी महानता मानते थे तो हमें विक्रमादित्य को बहुत मान ना चाहिए कई लोग श्रीराम को लाते हैं महाराज के सामने मगर समझिए राम जी कृष्ण जी और भगवान परशुराम भगवान थे और विक्रमादित्य मनुष्य और त्रिदेव हमेशा मनुष्य की महानता का सबसे ज्यादा सम्मान करते हैं ।।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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