पाँचवा गुण यौगशक्ति
।।पाँचवा गुण यौगशक्ति ।।
राजा भोज जब पाँचवी सीडी पर चढते है तो यौगशक्ति की देवी उन्हें रोकती है और कहती है आप इस सिंहासन पर अभी नही बैठ पाएंगे इस सिंहासन पर वो ही बैठ सकता है जिसमें चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के समान यौगशक्ति हो । राजा भोज में आपको सम्राट विक्रमादित्य यौगशक्ति की कथा सुनाती हूँ । यह उस समय की बात है जब चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का विवाह नही हुआ था जब सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा की मुलाकात भी नही हुई थी । एक दिन की बात है जब सम्राट विक्रमादित्य एक धार्मिक यात्रा से लौट रहे थे तभी अचानक मौसम बिगडा ।
वराहमिहिर जी - सम्राट मौसम बिगड रहा है हमें कही सुरक्षित स्थान पर रूक जाना चाहिए ।
सेनापति - नही सम्राट हमारे पास धर्म ध्वजा है हमारा मार्ग कोई नही रोक सकता ।
तभी बिजली गिरती है धर्म ध्वजा पर और ध्वज जल जाता है सैनिक घायल हो जाता है सम्राट विक्रमादित्य तुंरत घोडे से उतर कर सैनिक के पास जाकर उसे बचा लेते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - धर्म ध्वज का जल जाना तो अपशगुण माना गया है वराहमिहिर जी क्या संकेत हो सकता है इसका ।
वराहमिहिर जी - सम्राट नक्षत्र की गणना के अनुसार मृत्यु योग बना हुआ है किसी की मृत्यु होगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - किसकी मृत्यु ओर क्यों ।
वराहमिहिर जी - हमारे साथ कोई पापी है सम्राट जिसने अधर्म किया है उसकी मृत्यु होगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - पर हमारे बिच कौन पापी हो सकता है ।
वराहमिहिर जी -यह हम नही ज्योतिष की गणना कह रही है और अगर हम अपना कुशल मंगल चाहते हैं तो हमें बिना देर किये उस पापी को यहाँ से निकालना होगा वरना हम सब काल के शिकार होंगे । सम्राट यह सिर्फ बिजली नही है हम सब की मृत्यु है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी हमारे बिच का कोई भी व्यक्ति कहीं नही जाएगा । प्रियजनों हम आपको वचन देते हैं कि आप सभी को हम कुछ नही होने देंगे आपके उपर आने वाला संकट हम अपने उपर ले लेंगे । कृपया हमें सिर्फ इतना बताओ की वो पाप किसने किया और क्यों ।
तभी एक सैनिक आकर सम्राट विक्रमादित्य के पैर पकड लेता है और कहता है सम्राट मैनें किया है वो पाप ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या पाप किया है आपने ।
सैनिक - महाराज मंदिर से आते वक्त मूर्ति मैनें ही चौरी कि थी ।
सेनापति - सम्राट इस पापी को समूह से निकाल दिजिये । हम इसके लिए सभी के प्राणों को संकट में नही डाल सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं सेनापति गुस्से में लिया गया निर्णय कभी सही नही होता । इस व्यक्ति से सब के सामने अपना पाप कबूला है ।
और तभी उस सैनिक के उपर बिजली घीर रही होती है तभी सम्राट उसे दूर कर वो बिजली अपने उपर ले लेते हैं । सम्राट का पुरा शरीर जल जाता है ।
।। कथा सुनते वक्त राजा भोज कहते हैं आश्चर्य देवी बिजली को अपने उपर ले लिया वो भी एक सैनिक के लिए जबकि राजा महाराजा कभी सैनिकों के प्राणों का नही सौचते । देवी - किसी के भी प्राणों की रक्षा के लिए अपने प्राणों को दाव पर लगा लेना यही तो सम्राट विक्रमादित्य का गुण था । इसलिए तो वो संसार में अकेले है " एको हम दिव्यत नास्ति " उनके समान दूसरा कोई नही । यह दोहा भगवान शिव ने सम्राट के लिए कहा था ।।
सम्राट विक्रमादित्य की आत्मा ऊ का जप करती है सम्राट की यौगशक्ति जागृत होती है सम्राट का शरीर वापस आ जाता है और बिजली और तूफान सब खत्म हो जाते हैं । सभी लोग सम्राट विक्रमादित्य की जय जयका करते हैं ।
।। राजा भोज - मगर देवी यह कैसे संभव है कि एक मृत व्यक्ति जिंदा हो जाए । देवी - यह संभव है सिर्फ यौगशक्ति से और सम्राट विक्रमादित्य वो तो इस ब्रह्मांड के सबसे बडे साधक थे यौगशक्ति के । शरीर उनका जरूर खत्म हुआ था मगर उनकी आत्मा जीवित थी और आत्मा हमेशा अमर होती है । इसलिए उन्होंने यौगशक्ति का सहारा लिया ।
राजा भोज - तब तो वहाँ हर्षोल्लास का माहौल हो गया होगा । देवी - हाँ इसलिए उनके वापस जीवित होने की खुशी में राजभवन में उत्साह का माहौल हो गया ।
राजमहल में नृत्य आयोजित होता है सभी दरबारी सहित सम्राट विक्रमादित्य ताली बजाते हैं नृत्य खत्म होते ही , तभी अचानक सम्राट विक्रमादित्य को छोड दूसरे सभी उसी अवस्था में अटक जाते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन है वो जिसने हमारे दरबार में तंत्र शक्ति प्रयोग करने का दुस्साहस किया है । कौन है आप आपकी शक्ति उपयोग करके क्या सिद्ध करना चाहते हैं आप ।
तभी वह व्यक्ति बोलता है सिध्द नही करना चाहता याद दिलाना चाहता हूँ जब आपका जीवन खतरे में था और हमने आपकी रक्षा की थी । तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते हैं हमें याद है उस दिन हम पहाड़ी की चोटी से गिर गये थे आपने अपनी यौगशक्ति से हमें बचाया था मित्र मातृणड । और हमें यह भी याद है कि हमने आपको खुश होकर वचन दिया था तब आपने कहाँ था कि में जब चाहूँगा तब आप पुरा करेंगे वचन ।
मातृणड - सम्राट कहीं समय की धुंध ने आपके वचन को तो नही भूला दिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने आपसे कहाँ था हम अपना नाम भूल जाएंगे मगर वचन नही । आओ मित्र हमारी बाहें आपको गले लगाने के लिए उत्सुक हैं । वर्षो बाद मिले हो अपने मित्र को गला नही लगाओगे ।
मातृणड - क्यों नही मित्र ।
सम्राट विक्रमादित्य - किंतु एक बात बताओ मित्र तुम्हारी यह स्तंबन विद्या भी कमाल है अब हमारे सभी दरबारियों को इस से मुक्त करो ।
मातृणड उन्हें मुक्त कर देते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - उपस्थित सज्जनों यह हमारे गुरूकुल के मित्र है मित्र मातृणड ।
सभी दरबारी एक स्वर में आपका स्वागत है हमारे सम्राट की नगरी में ।
सम्राट विक्रमादित्य - गुरूकुल से आने के बाद राजकाज के कार्य में कुछ ऐसे उलझे की समय का स्मरण ही नही रहा ।
मातृणड - मुझे दिया हुआ वचन भी भूल गये ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही मित्र, हम कब से तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे कि तुम आओ और हम वचन पुरा करे ।
मातृणड - तो अब वो समय आ गया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - माँगो मित्र ।
मातृणड - कुछ भी मांग लू।
सम्राट विक्रमादित्य - हाँ ।
मातृणड - मित्र मुझे प्रेम हो गया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो समस्या क्या है ।
मातृणड - समस्या यह है कि विवाह के लिए एक शर्त है और वो शर्त सिर्फ तुम पूरी कर सकते हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर मित्र शर्त हम पुरी करे और विवाह तुम करो यह कैसे संभव है । यह तो नियमों का उल्लंघन होगा ।
मातृणड - वो नियमों के विरूद्ध होगा । और आपके वचन का क्या ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही मित्र, हमारे लिए हमारा वचन भी प्रिय है और तुम भी ।
मातृणड - तो निभाइये ना अपना वचन और कर दिजिये हमारी इच्छा पुरी । आप अपनी यौगशक्ति का प्रयोग करे किसी को भनक तक नही लगेगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - संसार को भले ना लगे मगर हमारी आत्मा को पता लग जाएगी ।
मातृणड - समझ गया में वचनों को तोडना तो सम्राटों की परम्परा रही है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य में आपके साम्राज्य आपका यश पराक्रम साहस सब को समाप्त होते हुए देख रहा हूँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - शांत मित्र शांत हम उज्जैन वंशी कभी अपना वचन नही तोडते ।
मातृणड - सच्चा मित्र हूँ इसलिए जा रहा हूँ अपने मित्र का पतन होते हुए नही देख सकता इसलिए जा रहा हूँ । आज्ञा चाहता हूँ मित्र मगर मन में हमेशा एक बात रहेगी कि हमारा मित्र अपने वचन धर्म की रक्षा नही कर पाया ।
सम्राट विक्रमादित्य - रूको मित्र हम करेंगे अपने वचन धर्म की रक्षा हम तोडेंगे स्वयंवर की शर्त , बताओ हमें कौन है वो स्त्री ।
मातृणड - सिंहल देश की राजकुमारी चित्रलेखा ।
राजकुमारी चित्रलेखा अपने महल में स्नान के तुरंत बाद भगवान शिव की पूजा करती हैं । चित्रलेखा भगवान शिव की बहुत बडी भक्त थी । पूजा के बाद वो अपने कक्ष में जाती है वहाँ वह अपनी कल्पना से एक सुंदर पुरूष का चित्र बनाती है और वह चित्र किसी और का नही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का था , राजकुमार चित्रलेखा जिन्होंने ना कभी सम्राट को देखा ना कभी मिली ना कभी जानती थी उनका चित्र बनाया यह तो जनमों जन्म का प्यार है जो इश्वर दोनों को फिर मिला रहा है । राजकुमारी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य को पहले से प्यार करती थी उनकी तस्वीर बना कर कहती थी प्रियतम अपनी चित्रलेखा के प्रणाम को स्वीकार करे और महादेव अगर यह इस संसार में है तो हमें मिलवाए ।
।। कथा सुनते वक्त राजा भोज कहते हैं देवी सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा की बडी ही रोचक प्रेम कहानी है , और महारानी चित्रलेखा की प्रेम की क्या उंचाई है कि उन्होंने सम्राट को बिना देखे ही उनका चित्र तक बना दिया और उनके मिलने से पहले तक वे उन्हें अपना भगवान मान चुकी थी । देवी - राजा भोज यही तो आत्मीय प्रेम की महानता है । जो सिर्फ उन में था ।।
राजकुमारी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य के चित्र को देखती रहती है उनकी सखियाँ हस्ती हैं और कहती है सखी तुम्हारे प्रियतम आएगें तो सही ना । तभी चित्रलेखा कहती हैं विधाता हमें उन से जरूर मिलाएगें । वही दूसरी ओर मातृणड सम्राट को कहता है आपको अपनी यौगशक्ति से स्वंयवर जितना ही होगा तभी हम राजकुमारी चित्रलेखा से विवाह कर पाएंगे वही विक्रमादित्य कहते हैं हम अपना वचन निभाएंगे । वहीं दूसरी ओर चित्रलेखा की माँ आ जाती है और चित्रलेखा से कहती है पुत्री मेरे मना करने पर भी तुम इस अंजान पुरुष के चित्र बनाती हो तभी चित्रलेखा कहती हैं माँ यह अंजान नही है , कैसी बात करती हो पुत्री जिसका ना कोई पता है ना अस्तित्व और कल तो तुम्हारा विवाह है , नही माँ यह कल जरूर आएंगे क्योंकि मन से किया हुआ प्रेम पुरा जरूर होता है और यह कल आएगें , पुत्री तुम्हारे पिता ने चित्र देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा , नही माँ अनर्थ नहीं होगा हमारे स्वामि सब ठीक कर देंगे । और राजकुमार चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य के चित्र को देख कर कहती है कल आप आना और हम से विवाह करना चाहे स्वर्ग से उतर कर आना मगर आना जरूर ।
सम्राट विक्रमादित्य और उनका मित्र सींगल द्वीप पहुंच जाते हैं ।
महल में सभी राजाओं और उनके राज्यों के नामों की घोषणा होती है तभी सैनिक घोषणा करते हैं सुनों सुनों सुनों परमवीर पृथ्वीपति विश्व विजेता चक्रवर्ती सम्राट उज्जैन नरेश महाराजा विक्रमादित्य पधार रहे हैं ।
विक्रमादित्य महल में आते हैं मातृणड के साथ ।
मातृणड - वो देखिये मित्र स्वंयवर की शर्त जिसे आपको पुरा करना है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक है ।
।। यौगशक्ति की देवी महाराजा भोज से प्रश्न करती है बताइये राजन् सम्राट विक्रमादित्य सींगल देश कैसे पहुँचते हैं मातृणड की वजह से या राजकुमार चित्रलेखा की वजह से , राजा भोज - देवी वास्तव में सम्राट विक्रमादित्य वहा राजकुमारी चित्रलेखा की वजह से पहुंचते हैं क्योंकि यह राजकुमारी का ही सच्चा प्रेम था कि विधाता ने सम्राट को वहा पहुंचा दिया मातृणड तो एक माध्यम था , देवी - अब देखना होगा जीत किसकी होगी सम्राट के वचन की या महारानी के प्रेम की ।। राजकुमारी चित्रलेखा की सहेलियाँ उन्हें तयार करते वक्त कहती हैं अब हमारी सखी हम से दूर हो जाएगी कल कोई राजकुमार उन्हें जीत कर ले जाएगा ।
राजकुमारी चित्रलेखा - नहीं कोई भी राजकुमार नही हमें सिर्फ वो ही ले जाएंगे जो हमारे मन मंदिर में है ।
तभी राजकुमारी की कुछ सहेलियाँ आती है दौडी दौडी ।
राजकुमारी चित्रलेखा - क्या हुआ तुम सभी बावरी बनी दौडी दौडी क्यों आ रही हो ।
सहेलियाँ - राजकुमारी वो आ गए ।
राजकुमारी - कौन आ गए ।
सहेलियाँ - वो ही जिनके तुम चित्र बनाती हो ।
राजकुमारी - क्या सच में क्या नाम है उनका ।
सहेलियाँ - उनका नाम है विक्रमादित्य , उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जो इस पुरी पृथ्वी के अकेले चक्रवर्ती सम्राट है ।
।। कहानी सुनाते वक्त देवी राजा भोज से कहती है - प्रेम ही धर्म प्रेम ही कर्म जब मिलने की हो सच्ची लगन । राजा भोज -हाँ देवी राजकुमारी चित्रलेखा का प्रेम खिच लाया सम्राट को वरना वो यहाँ क्यों आते , अब दौनों का भाग्य मिलने वाला था ।
देवी - मगर राजन् भाग्य तो सबका अलग अलग होता है ।
राजा भोज - नहीं देवी यहाँ बात अलग थी राजकुमारी सम्राट से अटूट प्रेम करती थी उनकी ख्याति उनके सम्मान के लिए वो हमेशा तत्पर थी और वही सम्राट के पास किसी भी चीज की कमी नही थी वो चक्रवर्ती सम्राट थे उन्हें बस सच्चे प्रेम की तलाश थी उन्हें राजकुमारी चित्रलेखा से अच्छी पत्नी मिल ही नही सकती थी और राजकुमारी को सम्राट जैसा समझदार चरित्रवान पति मिल ही नही सकता था वे दोनों एक दूसरे के लिए बने थे । इसलिए जैसे ही राजकुमारी को पता चला होगा उन्होंने सभी मर्यादाओं और सीमाओं को पार कर दिया होगा सम्राट से मिलने के लिए और देवी सच्चे प्रेम को आजतक भला कौन बांध पाया है । देवी - सही कहा आपने राजन् ।
राजकुमारी चित्रलेखा स्वंयवर स्थल की और जाती है , उनकी माँ - पुत्री वहाँ नही जाना ।
वही सभा में महाराजा चंद्रसेन कहते हैं - में आप सभी राजाओं का स्वागत करता हूँ सिंगल द्वीप पर आप सभी में जो शर्त पुरी करेगा उस से हमारी पुत्री का विवाह होगा ।
स्वयंवर की शर्त मंत्री जी आपको बताएंगे ।
मंत्री - माननीय नरेशों स्वंयवर की शर्त के अनुसार जो भी इस प्रतियोगिता को पुरा करेगा वो राजकुमारी चित्रलेखा से विवाह करेगा । जो कोई भी इस कलश को एक ही बार में भेद देगा और कलश में रखे दूध से शिव का अभिषेक करेगा वो ही प्रतियोगिता का विजेता होगा किंतु एक बात और याद रखे कलश में रखे दूध की धारा ठीक उसी तरह सीधी होनी चाहिए जिस प्रकार भगवान शिव की जटा से गंगा निकलती है ।
मातृणड सम्राट विक्रमादित्य से कहता है मित्र इसलिए हम आपको यहाँ लेकर आए हैं यह प्रतियोगिता बहुत कठीन है इसे सिर्फ तुम ही पुरा कर सकते हो ।
वही राजकुमारी चित्रलेखा सभा में आ जाती है और अपने सपनों के राजकुमार को जीवित देख अत्यंत खुश होती है वही सम्राट विक्रमादित्य की नजरें राजकुमारी पर पडती है दोनों एक दूसरे को एकटक देखते हैं । तभी राजकुमारी की माँ आकर उन्हें ले जाती है ।
मातृणड - देखा मित्र यह है राजकुमारी चित्रलेखा जो अप्सराओं से भी सुंदर ।
सम्राट विक्रमादित्य मन में एक ही बात सौच रहे होते हैं आखिर ऐसा क्यों लग रहा है हमें उन्हें देखकर की वो हमें वर्षो से जानते हैं आखिर ऐसा भाव क्यों आया मन में ।
वही सिंगल द्वीप के महाराज सभी को कहते हैं आप सभी विश्राम करिए कल स्वयंवर है उसकी तैयारी के लिए ।
सिंगल राज्य के राजा महारानी को कहते हैं महारानी आज जो भी हुआ अच्छा नहीं हुआ एक राजकुमारी का ऐसा व्यवहार भरी सभा में आना यह गलत है ।
महारानी - जी मगर महाराज हमारी पुत्री का स्वास्थ्य कुछ ठीक नही था ।
महाराज - नहीँ कुछ और बात है ।
तभी राजकुमारी चित्रलेखा आती है और कहती है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - पिता जी आपको जो भी पूछना है आप हम से पूछिये हमारे पास उत्तर है आपकी सभी बातों का ।
महाराज - क्या है यह सब पुत्री । यह तो उज्जैन के महाराज चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का चित्र है । मगर तुम ने उन्हें कब देखा और यह चित्र बनाया ।
राजकुमारी चित्रलेखा - हाँ यह सच है कि यह चित्र हमने बनाया मगर हमने उन्हें आज से पहले कभी नहीं देखा मगर हमने उन्हें बिना देखे ही चित्र बना लिया था । और अब यह चित्र केवल रंगों से बनी निर्जीव आकृति नही है बल्कि यह हमारे जीवन में रंगो को भरने वाली सजीव आकृति भी है ।
महाराज - मतलब ।
राजकुमारी चित्रलेखा - हमनें इन्हें अपने जीवन का अधिकारी चुन लिया है ।
महाराज - बस चित्रलेखा बस तुम अपने जीवन का इतना बडा निर्णय नही ले सकती ।
महारानी - महाराज आप क्रोध ना करे ।
महाराज - आपने हमें यह सब पहले क्यों नही बताया ।
महारानी - पहले हमें लगा कि यह सिर्फ चित्रलेखा की कल्पना है मगर जब हमनें आज सम्राट विक्रमादित्य को देखा तो लगा यह केवल चित्रलेखा का आकर्षण नही यह तो सत्य है , और विधाता भी पहले से ही तय कर चुका है ।
महाराज - नही विधाता ने सिर्फ कल होने वाले स्वयंवर को तय किया है ।
महारानी - महाराज आपसे विनती है कल होने वाले स्वयंवर को स्थगित कर दिजिए और चित्रलेखा का विवाह सम्राट विक्रमादित्य से कर दिजिये ।
महाराज - नहीं ऐसा कभी नही होगा कल जो भी स्वयंवर की शर्त को पूरा करेगा चित्रलेखा का विवाह उसी से करेंगे ।
राजकुमारी चित्रलेखा - पिता जी आप कुछ भी कर ले हमारा विवाह हमारे सपनों के राजकुमार से ही होगा कल स्वयंवर की शर्त सम्राट विक्रमादित्य ही पूरा करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या हो गया है हमें , हमें क्यों ऐसा लग रहा है कि राजकुमारी चित्रलेखा वहाँ सिर्फ हमारे लिए आइ थी उन्हें देख कर ऐसा भाव क्यों आया मन में की उनका और हमारा जनमों जनम का साथ है ।
तभी वहाँ पर मातृणड आता है और कहता है । तो मित्र क्या सोच रहे हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुछ भी नही मित्र मातृणड ।
मातृणड - छुपाइये मत मित्र आपके मन में मोह जाग गया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मोह किसके प्रति ?
मातृणड - राजकुमारी चित्रलेखा के लिए । मगर आप अपने वचन को मत तोडीएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - पृथ्वी सूर्य की ओर चक्कर काटना भूल सकती है मगर हम अपने वचन को निभाना नही भूल सकते । मगर वचन किस तरह से निभाना है उसके हित और अहित के बारे में सोचना हमारा धर्म है ।
मातृणड - सोचिए अवश्य सोचिए मगर स्वयंवर में भाग केवल में लूँगा आप नहीं स्वयंवर की शर्त को पुरा में करूंगा आप सिर्फ यौगशक्ति के द्वारा मेरे शरीर में आकर शर्त पुरा करिएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - यानी स्वयंवर की शर्त आप पुरा करेंगे ।
मातृणड - हाँ तभी तो मैं राजकुमारी चित्रलेखा से विवाह कर पाऊँगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - परंतु यह यौग शक्ति का अपमान नहीं होगा ।
मातृणड - यौग शक्ति का अपमान या राजकुमारी पर मोह जाग गया है आपका ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं मित्र हम तो चाहते हैं आप उन से विवाह करे ।
मातृणड - तो फिर ऐसे शुभ अवसर पर अशुभ बाते क्यों कर रहे हो मित्र ।
वहीं दूसरी ओर राजकुमारी चित्रलेखा अपने कक्ष में सम्राट विक्रमादित्य के चित्रों को देखती है । ओर कहती हैं स्वामि आप प्रेम की डोर से बंधे हमारे स्वयंवर में आए हम पर आपने उपकार किया तभी उनकी सहेली उन से कहती है राजकुमारी इनकी जगह किसी और ने स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी तो । राजकुमारी चित्रलेखा - नही ऐसा नही होगा विधाता ने ऐसा लेख लिखा ही नही है । तभी उनकी सभी सहेलियाँ आती है राजकुमारी एक भूरी खबर है सम्राट विक्रमादित्य स्वयंवर में भाग नही ले रहे हैं उनकी जगह उनके मित्र मातृणड भाग लेंगे ।
राजकुमारी चित्रलेखा दौडी चली जाती है बैचेन होकर तभी उनकी माता उन से पूछती है ।
महारानी - पुत्री कहाँ भागी जा रही हो ।
राजकुमारी चित्रलेखा - माँ सम्राट यहाँ स्वयंवर में भाग लेने नही किसी दूसरे के सहयोगी बन कर आए हैं । हम नियती के ऐसे क्रूर मजाक को सहन नही करेंगे । सम्राट हमारी जिंदगी के ऐसे निर्णायक फैसले से दूर नही जा सकते । सम्राट स्वयंवर में भाग ले ना ले हम उन से ही विवाह करेंगें , किसी और से नहीं । इसलिए हम उन्हें अपना निर्णय बताने जा रहे हैं ।
महारानी - जा पुत्री जा में तुझे नहीं रोकुंगी मगर एक बात जरूर कहना चाहूँगी जो हर माँ बेटी की विदाई पर कहती हैं कि कुछ भी करना मगर ऐसा काम कभी मत करना जिस से कुल कलंकित हो ।
।। कहानी सुनाते वक्त यौगशक्ति की देवी राजा भोज से कहती है मर्यादा लाज शर्म यही सब बाते हैं जिस से लोग महिलाओं पर शासन करता आया है बताइए क्या राजकुमारी चित्रलेखा लांग जाएगी मर्यादा । राजा भोज - नही देवी प्रेम तो वो अहसास है जिसे प्रकर करने पर कोई भी सीमा नही लांघी जाती प्रेम तो पूजा है प्रेम फूलों में बसी खुशबु है जब प्रेमी और प्रमिका आमने सामने बैठते हैं तब उनकी प्रेम की तरंगे सारे वातावरण को खुशनुमा बना देती है वही सच्चे प्यार में शब्दों का मौन रहना और आखों का बोलना ही सच्चे प्रेम की परिभाषा है ।।
राजकुमारी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य का संगीत सुन कर उनके पास आती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी आप यहाँ ।
राजकुमारी चित्रलेखा - जहाँ संगीत वहीं सरगम , जहाँ दिया वहाँ बाती , वहीं जहाँ कंठ वहीं वाणी ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी आप तो बहुत अच्छी कविता बनाती है , आपके शब्दों में मिठास है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - धन्यवाद ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसमें धन्यवाद कैसा हमारी जगह और कोई भी होता तो भी यही कहता ।
राजकुमारी चित्रलेखा- मगथ आज तक हमने किसी को नही सुनाई अपनी कविता ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर ऐसा क्यों ।
राजकुमारी चित्रलेखा - क्योंकि आज तक हमें ऐसा कोई मिला ही नहीं जो हमारी कविता के माध्यम से हमारी भावनाओं को समझ सके क्या आप हमारी कविता को संगीत देगें क्या यह उपकार हम पर करेगें ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य किंतु उपकार नही सहयोग ।
राजकुमारी चित्रलेखा - कविता सुनाती है - बचपन बिता यौवन आया प्रेम ने अपना गीत गाया , खोजा खोया बहुत प्रेम को जब नही मिला तो उदास निराश कौन होगा हमारा प्रेम कहा मिलेगा हमारा अपना प्रेम तब मन ने हमारा सर सहलाया एक रूप हमें दिखाया और देखो भाग्य हमारा हमने सामने उसको पाया ।
राजकुमारी चित्रलेखा अपनी कविता कह कथ चली जाती है वहीं सम्राट रात भर उसी कविता के बारे में सोचते रहे ।
फिर अगले दिन स्वंयवर का बिगुल बजता है स्वंयवर सभा में सभी उपस्थित होते हैं राजकुमारी चित्रलेखा भी शादी के जोडे में आती है ।
राजकुमारी चित्रलेखा और सम्राट विक्रमादित्य दौनों दुविधा में रहते हैं । जहाँ राजकुमारी सम्राट से प्यार करती है वहीं सम्राट मातृणड को दिए वचन के बारे में सोचते हैं ।
मंत्री - स्वंयवर में पधारे सभी लोगों का स्वागत है यहाँ एक धनुष रखा है हर व्यक्ति को तीन मौके मिलेंगे जो कोई भी धनुष से तीर छोड कर इस कलश को भेदेगा और कलश में रखे दूध का देवा दी देव महादेव के शिवलिंग स्वरूप का अभिषेक स करेगा उसी को राजकुमारी वरमाला पहनाएगी । राजकुमारी चित्रलेखा के पिता महाराजा धर्मदत्त यह स्वंयवर चालु करने का आदेश देते हैं ।
स्वंयवर शुरू हो जाता है
सभी राजा महाराजा असफल हो जाते हैं , तभी सभा में घोषणा होती है और अब बारी है ब्राह्मण कुमार मातृणड की ।
मातृणड - मित्र जा रहा हूँ में वक्त आ गया है अपना वचन निभाने का हम जाए तब तक आप अपनी यौग शक्ति से हमारे अंदर आ जाइएगा , हम तीर चलाएंगे पर निशाना आपका होगा ।
ऐसा कह कर मातृणड जाता है और तीर उठा लेता है ।
सम्राट विक्रमादित्य धर्म संकट में फस जाते हैं कि राजकुमारी से कैसे छल करू और मित्र को दिया हुआ वचन भी नही तोड सकता ।
सम्राट विक्रमादित्य दूर बैठ कर अपनी यौग शक्ति का उपयोग करते हैं मगर ध्यान नही कर पाते हैं और मातृणड का बाण खाली हो जाता है , सम्राट विक्रमादित्य दूसरी बार फिर ध्यान करते हैं मगर उन्हें आखें बंद करते वक्त सिर्फ राजकुमारी चित्रलेखा ही दिखती है । तभी क्रोध में आकर मातृणड सभी को अपनी सम मोहन विद्या का उपयोग कर सबको वही रोक देता है ताकि सम्राट से बात कर सके ।
मातृणड - सम्राट यह क्या हो गया है आपको दो बाण विफल हो गए वचन भूल गए हैं आप मगर तिसरा बाण विफल नही होना चाहिए और मुझे तो यह लगता है कि आप राजकुमारी चित्रलेखा के रूप पर मोहित हो गए हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - बस मातृणड हम दुविधा में हैं इसका अर्थ यह नही कि तुम कुछ भी कहो ।
मातृणड - मगर सम्राट दुविधा कैसी ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्योंकि तुम जो कर रहे हो वो अधर्म है ।
मातृणड - धर्म अधर्म सोचना था तो वचन देने से पहले सोचते अभी धर्म यही है कि आप अपना वचन निभाए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम धर्म के रक्षक है अपना वचन निभाएंगे ।
मातृणड सब कुछ पहले जैसा कर देता है । स्वयंवर फिर से शुरू होता है ।
स्वयंवर फिर से शुरू हो जाता है । मातृणड जैसे ही धनुष पर तीर चडाता है सम्राट विक्रमादित्य यौग शक्ति के माध्यम से उस में प्रवेश कर लक्ष्य को भेद देते हैं और वापस खुद के शरीर में आ जाते हैं वही मातृणड विजय हो जाता है ।
और इसी के साथ मातृणड ने स्वयंवर की शर्त पुरी कर ली है अब राजकुमारी चित्रलेखा माला पहनाएगी ।
महाराज - जाओ पुत्री अपने जीवन साथी को माला पहनाओ ।
राजकुमारी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य को वर माला पहना देती है ।
।। कहानी सुनते वक्त राजा भोज यह क्या राजकुमारी चित्रलेखा ना तो स्वयंवर का अपमान कर दिया , देवी नही राजन् राजकुमारी चित्रलेखा ने स्वयंवर का अपमान नही सम्मान किया है पहली बार संसार में किसी ने स्वयंवर का सम्मान किया राजन् स्वयंवर का अर्थ है स्वंय की इच्छा से चुना हुआ वर । राजा भोज - मगर देवी फिर स्वयंवर की शर्त का क्या , देवी - राजन् शर्त दूसरों ने बनाई राजकुमारी ने नहीं । फिर आगे क्या हुआ देवी ।
मातृणड - महाराज धर्मदत्त यह आपका कैसा स्वंयवर है जहाँ जीतता कोई ओर है और कन्या वर माला किसी और को पहनाती है ।
महाराज धर्मदत्त - शांत कुमार मातृणड शांत राजकुमारी चित्रलेखा से आपका ही विवाह होगा । देखो पुत्री चित्रलेखा तुम से बहुत बडी भूल हुई है अब इस भूल को सुधारो और वर माला मातृणड के गले में पहनाओ ।
राजकुमारी चित्रलेखा - नहीं पिता जी यह हमारा स्वंयवर है और हमने कोई अनर्थ नही किया हमने अपनी इच्छा से विवाह किया है ।
महारानी - पुत्री तुम ने सही नही किया ।
राजकुमारी चित्रलेखा - माँ हर पल संतान को सुख देने वाली मां कह रही है यह । माँ हम उसे अपना पति नही मान सकते हम उस से प्रेम नही करते ।
महाराज धर्मदत्त - पुत्री यह गलत है तुम यह नही कर सकती ।
राजकुमारी चित्रलेखा - पिता जी यह कैसी रूढीवादी सोच है जो एक पुत्री को उसकी पसंद से विवाह तक नही कर सकती । यह एक पिता की सोच है या एक राजा की ।
महाराज धर्मदत्त - अगर पिता का हुआ तो ।
राजकुमारी चित्रलेखा - तो यह पुत्री आपकी खुशी के लिए कुछ भी करेगी ।
महाराज धर्मदत्त - और अगर एक राजा का हुआ तो ।
राजकुमारी चित्रलेखा - तो हम विरोध करेंगे इस गलत परंपरा का ।
महाराज धर्मदत्त - पुत्री यह एक पिता की इच्छा है कि तुम मातृणड से विवाह कर लो ।
राजकुमारी चित्रलेखा - पिताजी अब हम अकेले फैसला नही ले सकते हम सम्राट विक्रमादित्य को पति मान चुके हैं अब हमारी जिंदगी के सारे फैसले हम और सम्राट मिलकर ही कर सकते हैं मगर आपकी खुशी के लिए हम सम्राट से बात करेंगे ।
मातृणड - विक्रमादित्य तुम ने वचन तोडा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने कोई वचन नही तोडा है मित्र हमने वचन निभाया है , हम नही जानते यह सब क्यों हुआ कैसे हुआ मगर यह सब गलत हुआ है अब और क्या कर सकता हूं तुम्हारे के लिए ।
मातृणड - यहाँ से चले जाओ ।
राजकुमारी चित्रलेखा - सम्राट यहाँ से कही नहीं जाएगें ।
मातृणड - आप इन्हें रोक कर अडचण पैदा कर रही है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - अडचन आप पैदा कर रहे है ।
मातृणड - देवी स्वयंवर की शर्त के हिसाब से हम आपके पति है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - स्वंयवर हमारा था और हम आपको पति नही मानते हैं और शर्त पिताजी कि थी हमारी नही । अब आप कृपया हमें एकांत दे हमें सम्राट से कुछ बात करना है ।
सम्राट विक्रमादित्य - राजकुमारी चित्रलेखा आपने ऐसा क्यों किया ।
राजकुमारी चित्रलेखा - अपने प्रेम के लिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - किस प्रेम की बात कर रही है आप ।
राजकुमारी चित्रलेखा - यदि आप जान ना चाहते हैं उस प्रेम को जिस के लिए हमने अपने धर्म तक की चिंता नही की । आइए हमारे साथ ।
राजकुमारी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य का हाथ पकड कर उन्हें अपने कक्ष में ले जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी यहाँ क्यों लाई आप क्या है यहां ।
राजकुमारी - हमारा प्रेम , चारों और अपनी दृष्टि घुमाएं और फिर बताए हमने गलत किया या सही ।
सम्राट - देवी बिना किसी प्रमाण के कुछ कहना गलत होगा ।
राजकुमारी - प्रमाण मिलेंगे आपको ।
राजकुमारी चित्रलेखा सारी तस्वीरें उन्हें दिखाती है । सम्राट विक्रमादित्य चौक जाते है क्योंकि सभी तस्वीरें उनकी रहती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या है देवी चारों ओर हमारी तस्वीर ।
राजकुमारी चित्रलेखा - देख लिया ना प्रमाण एक नही कई है जो हमारे प्रेम को दर्शा रहा है , हमारे लिए केवल आप की सबकुछ थे है और रहेंगे । आप नही तो हम भी नही ।
राजकुमारी वहाँ से चली जाती है
कहानी सुनाते हुए यौग की देवी राजा भोज को चित्र दिखाती है , राजा भोज - अदभुत , अविश्वसनीय । देवी - कौन यह चित्र । राजा भोज - नहीं चित्र बनाने वाले की सोच उनकी दृष्टि उनकी भावना । देवी - राजकुमारी ने पुरे जीवन में सम्राट को देखा तक नही मगर फिर भी उन्होंने अपनी कल्पना से उनके जीवन के हर पहलू के चित्र को बना डाला , राजन् क्या यह संभव है बिना देखे उनके चित्र बनाना । राजा भोज -देवी प्रेम केवल एक जन्म का नही जन्म जन्मांतर का साथ होता है ।
देवी कथा में आगे कया हुआ ।
राजकुमारी चित्रलेखा - इस सत्य को हम अब तक स्वीकार नही कर पा रहे हैं कि कलश भेदन किसी और ने किया क्योंकि आपके अलावा कोई और ऐसा कर ही नही सकता और ना ही जन्म जंमानतर तक कर पाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - इतने विश्वास से आप कैसे कह सकती है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - इस लिए क्योंकि हमारा प्रेम सच्चा है और विश्वास की नीव पर खडा है । अब बताइए की हमने जो किया वो गलत किया हमें नही डालनी चाहिए थी आपको वर माला ।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसे कहे की आपने वर माला डाल कर गलत किया , आपको देख कर हमारे मन में भी तो यही ख्याल आया था कि आपसे हमारा संबंध भी सदियों पुराना है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - हमारे प्रेम का निर्णय सुनाईये ।
मातृणड - देवी एक अपराधी क्या निर्णय सुनाएगा , हमने सुनी आपकी प्रेम कथा और इन चित्रों की सत्य भी सुना हम प्रशंसा करते है आपके समर्पण की । किंतु देवी अब इन सब का कोई मौल नही अब आपको यह समर्पण हमारे प्रति करना है । दासियों ले चलो राजकुमारी को और इनक विदाई की तैयारी करो ।
सम्राट विक्रमादित्य - रूक जाओ कोई भी राजकुमारी को उनकी इच्छा के विरुद्ध यहाँ से नही ले जाएगा , यह एक स्त्री की स्वतंत्रता के खिलाफ है , मित्र मातृणड अब तुम अधर्म पर आ गए हो अगर शस्त्र उठाना है तो हम भी पीछे नही हटेंगे ।
मातृणड -शस्त्र उठाओगे , वाह सम्राट आज एक न्याय शील पराक्रमी सम्राट का चरित्र साफ हो चुका है , सम्राट विक्रमादित्य आप स्वंय राजकुमारी को लौटा दिजिये और वचन प्रिय सम्राट बने ।
महाराज चंद्रसेन - दासियों राजकुमारी को ले जाओ और इनकी विदाई की तैयारी करो ।
राजकुमारी चित्रलेखा - सम्राट हमारी रक्षा करिए अपना पति धर्म निभाइये ।
राजकुमारी चित्रलेखा के जाने के बाद सम्राट विक्रमादित्य उनकी द्वारा बनाई गई सभी तस्वीरें देखते हैं और अंत में उन्हें राजकुमारी की भी तस्वीर दिखती है , सम्राट अपनी तलवार निकाल कर अपने रक्त से उनकी तस्वीर में मांग भर कर कहते है मातृणड जिस वचन के लिए हमने अपनी यौगशक्ति का प्रयोग कर तुम्हे विजय बनाया उसी तरह अब हम अपनी यौगशक्ति के माध्यम से अपनी पत्नी को बचाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य दूर जंगल में यौग साधना करते है इधर राजकुमारी की विदाई होती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मातृणड तुम्हारे वचन के साथ केवल हमारा शरीर बंधा है आत्मा नही अब हम उनकी यौगशक्ति से रक्षा करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी यौग शक्ति से दूर बैठे बैठे मातृणड का वाहन रोक देते हैं ।
मातृणड - यह घोडा आगे क्यों नही बढ रहा है सैनिकों धका मारो । जरूर इस रथ को सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी यौगशक्ति से बांध दिया । चलो राजकुमारी अब आपको पैदल चलना होगा हमारे साथ ।
राजकुमारी चित्रलेखा - हमारा हाथ छोडी मातृणड हमें कही नही जाना आपके साथ हम सम्राट को अपना पति मान चुके हैं ।
तभी तूफान आ जाता है । मातृणड - सैनिकों यह कोई तूफान नही यह कोई अडचन है देवी चित्रलेखा की रक्षा करना हम देख कर आते है किसने किया है यह ।
मातृणड अपनी यौगशक्ति से देख लेता है कि यह सब सम्राट विक्रमादित्य कर रहे हैं ।
मातृणड - सम्राट विक्रमादित्य तुम यह नही कर सकते चित्रलेखा अब हमारी पत्नी है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - मत कहो हमें अपना पति हम तुम्हारी नही सम्राट विक्रमादित्य की पत्नी है जो दूर से भी हमारी रक्षा कर रहे है हम जा रहे है अब उनके पास ।
मातृणड - राजकुमारी चित्रलेखा को वही रोक देता है शक्ति से ।
मातृणड सम्राट विक्रमादित्य से युद्ध करने जाता है । विक्रमादित्य का यौग का दिव्य रूप आ जाता है ।
मातृणड जैसे ही सम्राट के पास जाता है वह दूर फिका जाता है सम्राट विक्रमादित्य का दिव्य रूप मातृणठ से युद्ध करता है ।
मातृणड - विक्रमादित्य तुम गलत कर रहे हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - बिल्कुल उचित कर रहा हूँ तुम अब अधर्म पर चल रहे हो अधर्मी हो तुम । हमने वचन एक धर्म संगत व्यक्ति को दिया था ।
मातृणड और सम्राट विक्रमादित्य का भीषण युद्ध होता है ।
मातृणड - विक्रमादित्य यदि तुम यौग शक्ति के उपासक हो तो में भी तंत्र शक्ति का उपासक हूँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - लगा लो अपनी पुरी ताकत हमारे पास धर्म की ताकत है ।
सम्राट विक्रमादित्य मातृणड को युद्ध में हरा देते है तभी मातृणड छल से भाग कर राजकुमारी चित्रलेखा को लेकर खाई में कूद जाता है सम्राट विक्रमादित्य का यौग रूप राजकुमारी चित्रलेखा को बचा लेता है और मातृणड की मौत हो जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य का वास्तविक सुंदर रूप आ जाता है ।
राजकुमारी चित्रलेखा - सम्राट आपके दो दो रूप ।
सम्राट - आपकी रक्षा के लिए हमने अपना यौग रूप बनाया ।
राजकुमारी चित्रलेखा - आपने हमारी रक्षा करके हमें ऋणि बना दिया ।
सम्राट - नहीँ ऋणि तो हम हे आपके प्रेम के ।
राजकुमारी - आपने हमारे प्रेम को स्वीकार करके हम जैसे प्रेमियों को सम्मान दिया है ।
सम्राट विक्रमादित्य और राजकुमारी चित्रलेखा का विवाह होता है देवता भी फूल बरसाते है ।
इसी के साथ सम्राट विक्रमादित्य की यह यौगशक्ति की कथा पूर्ण हुई अगली पोस्ट में अगला गुण ।
।। जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जय मालवा ।।
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