भविष्य पुराण और बेताल कथाएं

भविष्य पुराण और बेताल कथाएं

भूमिका

लोक कथाएं किसी भी समाज की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा होती हैं। ये संसार को उस समाज के बारे में बताती हैं जिसकी वे लोक कथाएं हैं। आज से बहुत साल पहले, करीब 100 साल पहले, ये लोक कथाएं केवल जबानी ही कही जातीं थीं और कह सुन कर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती थीं इसलिये किसी भी लोक कथा का मूल रूप क्या रहा होगा यह कहना मुश्किल है।


विक्रम बेताल का परिचय

विक्रम वेताल की जो कहानियाँ' भारत में प्रचलित हैं और बच्चे जिन को बड़े शौक से सुनते हैं वे कहानियाँ -

1 क्योंकि वे 25 कहानियाँ हैं इसलिये वे वेताल पच्चीसी के नाम से मशहूर हैं ।

2 ये सब कहानियाँ एक बड़े ही तनाव भरे वातावरण में कही गयीं हैं और ये सव कहानियाँ रास्ता काटने के लिये सुनायी गयीं हैं । 

3 इन कहानियों को कहने से पहले बेताल विक्रम से दो शर्ते रखता है - एक तो यह कि वह रास्ते में कुछ बोलेगा नहीं और अगर वह बोला तो उसका सिर टुकड़े टुकड़े हो कर बिखर जायेगा। दूसरी शर्त यह कि किसी भी वात का अगर वह जानते बूझते भी जवाव नहीं देगा तो विक्रम वेताल को जहाँ से लाया है बेताल फिर से वहीं चला जायेगा ।

4 बेताल चालाक है | वह विकम को हर बार एक ऐसी कहानी सुनाता है जिसमें वह उससे न्याय करवाता है या फिर कोई पहेली सुलझवाता है । अव विक्रम क्योंकि अक्लमन्द है और अपने न्याय के लिये मशहूर है इसलिये वह चुप नहीं रह सकता।

क्योंकि अगर वह उसके किसी सवाल का जानते वूझते जवाव नहीं देगा तो उसके सिर के टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे इसलिये उसको वेताल के सवालों का जवाब देना ही पड़ता है और जैसे ही वह बोलता है तो बेताल उसके कन्धे से उतर कर अपने पेड़ पर चला जाता है।

बेचारे विक्रम को उसे लाने के लिये फिर जाना पड़ता है और इन कहानियों का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता है।

इस तरह से वेताल विकम को 24 बार चक्कर कटवाता है पर 25वीं वार की कहानी में विक्रम उसकी कहानी का जवाब नहीं दे पाता ।

इसके अलावा जहाँ विक्रम को बेताल को ले जाना है वह जगह भी आ जाती है सो 25वीं कहानी पर ये कहानियाँ खत्म हो जाती हैं ।

विक्रम बेताल की कहानियां
विक्रम वेताल की कहानियाँ बहुत पुरानी हैं और हमारे भारतीय समाज में बहुत ही लोकप्रिय हैं। इन कहानियों को कहने वाले लोग बहुत ही कम है। परंतु सुनने में ये इतनी ज्यादा लोकप्रिय हुई है  कि आज भी हर बच्चा और हर बड़ा इनको पढ़ना और सुनना पसन्द करता है। विक्रम वेताल की जो कहानियाँ पत्रिकाओं और पुस्तकों की सहायता से भारत में बच्चों में प्रचलित हैं। उनका वातावरण उन कहानियों से कुछ दूसरा ही है जो कहानियाँ हम उनकी यहाँ देने जा रहे हैं। हालाँकि दोनों ही कहानियाँ

उज्जयिनी के राजा विक्रम और एक बेताल के बीच में कही सुनी कहानियाँ हैं फिर भी...।

लोकप्रिय वातावरण

इन कहानियों का लोकप्रिय वातावरण कुछ इस प्रकार है। एक बार उज्जैन के राजा विक्रमदित्य के सोने के कमरे में एक देव प्रगट हुआ और उसको बताया – “में यहाँ तुम्हारी जान बचाने आया हूँ।" फिर उसने राजा को यह भी बताया कि “एक राजा था चन्द्रभान । तुम्हारे पूर्वजों ने यह राज्य उसी राजा चन्द्रभान से लिया था। एक दिन वह राजा जंगल में गया वहाँ उसने एक आदमी देखा जो एक पेड़ से उलटा लटका धुंआ पी कर रह रहा था। वह राजा उससे बहुत प्रभावित हुआ और आ कर यह सब अपने दरबार में बताया तो एक राज नर्तकी बहुत हँसी ।

वजह पूछने पर वह बोली कि वह कोई ढोंगी था। साबित करने के लिये वह कुछ समय बाद उसको और उसके और अपने चार महीने के बच्चे को लेकर दरवार में आयी। जब उस आदमी को सच्चाई का पता चला तो वह योगी बहुत गुस्सा हुआ। उसने उस बच्चे को मार दिया और राजा चन्द्रभान को भी मार दिया।

फिर एक ही मुहूर्त में उसने तीन योगी पैदा किये। एक योगी राजा के घर पैदा हुआ, दूसरा देवी के घर में पैदा हुआ और तीसरा एक कुम्हार के घर पैदा हुआ। राजा योगी पाताल लोक में राज कर रहा है। देवी के घर वाले योगी ने कुम्हार वाले योगी का मार दिया और अब वह देवी वाला योगी तुम्हें मारने वाला है सो होशियार रहना। मैं इसी लिये यहाँ आया था।

कुछ दिन बाद राजा विक्रमदित्य के दरवार में एक साधु आया और उसको एक फल दे कर चला गया। वह और भी कई मौकों पर आया और हर बार वैसा ही एक फल दे कर चला गया। राजा ने कोई फल नहीं खाया सब फल एक कोठरी में रखवा दिये। उसको लगा कि यह वही योगी था जो उसे मारना चाहता था। एक दिन उसने वे सब फल काटे तो उन सब में एक एक लाल निकला। जब अगली बार योगी आया तो राजा ने उसको लाल के बारे में बताया तो उसने कहा कि वह उसके योग की ताकत का नतीजा है।

राजा ने पूछा कि उसने उसे ये फल क्यों दिये तो वह बोला कि अगर तुम मेरी सहायता करो तो मैं तुम्हें बहुत बड़ा खजाना दे सकता हूँ। राजा ने पूछा वह कैसे। वह साधु बोला - • "तुम एक रात मेरे पास रहो और जो मैं तुमसे करने के लिये कहूँ वह तुम करो। " “ठीक है।” कह कर राजा उसके बताये दिन उसके पास पहुँच गया। योगी ने कहा – “यहाँ से लगभग साढ़े चार मील की दूरी पर एक पेड़ से एक लाश लटकी हुई है। तुम मुझे वह ला दो। "

विक्रम उसे लेने चला गया। पर जब वह उसको ले जाने लगा तो उस लाश ने कहा कि "मैं तुम्हारे साथ एक शर्त पर जा सकता हूँ। मैं तुमको रास्ते भर कहानी सुनाता जाऊँगा ताकि हमारा तुम्हारा रास्ता आराम से कट जाये। पर तुम बीच में नहीं बोलोगे। अगर तुम बीच में बोलोगे तो मैं भाग कर फिर यहीं पेड़ पर वापस आ जाऊँगा। पर हर कहानी के बाद मैं तुमसे एक दो सवाल पूछूंगा। अगर तुमने जानते बूझते उन सवालों का जवाब नहीं दिया तो तुम्हारा सिर फट कर इधर उधर बिखर जायेगा।

राजा ने उसकी यह शर्त स्वीकार कर ली और उसको कन्धे पर लाद कर ले चला।

इस आने जाने के बीच उस बेताल ने राजा को 25 कहानियाँ सुनायीं और जैसे ही राजा कहानी के बाद के सवाल का जवाब देता था वह बेताल वापस जा कर पेड़ पर लटक जाता था। विक्रम उसको फिर लेने जाता था और फिर एक कहानी सुनता था। 24 कहानियों के सवालों के जवाब तो विकम ने दे दिये पर 25वीं कहानी के सवाल का जवाब वह नहीं दे सका। उसके बाद ही विक्रम उसको उस योगी के पास ले जा सका।

पर इन कहानियों का वातावरण उन लोकप्रिय कहानियों के वातावरण से बिल्कुल अलग है। ये कहानियाँ इतने तनाव के वातावरण में नहीं कही गयी हैं।

भविष्य पुराण की कहानियाँ

विकम बेताल की कहानियाँ भविष्य पुराण में भी दी हुई हैं। पर वे उस लोकप्रिय वातावरण वाली कहानियाँ नहीं हैं और ना ही उस बेताल ने सुनायी हैं जिसने लोकप्रिय वातावरण में सुनायी हैं ।

भविष्य पुराण की विक्रम वेताल की कहानियों का वातावरण इन लोकप्रिय कहानियों से विल्कुल ही अलग है । इनमें वेताल कोई मरा हुआ भूत आदि नहीं है बल्कि इस नाम का एक देवता है जो शिव जी के कहने पर विक्रम के राजा बनने के बाद उसका इम्तिहान यह जाँचने के लिये लेने के लिये आता है कि वह न्यायपूर्वक राज करने के लायक है भी या नहीं ।

और यह काम वह अलग अलग तरीके की कहानियाँ सुना कर करता है । कहानियों का ढंग वही है - उसका विक्रम को कहानी सुनाना और कहानी सुनाने के बाद उस कहानी पर एक सवाल पूछना ।

पर न तो उनमें कोई शर्त है और न ही कोई तनाव का वातावरण है और न ही विक्रम बेताल को ले कर कहीं जाता है। ये सब कहानियाँ दरबार में बैठ कर शान्ति से कही सुनी गयी हैं । ये केवल 9 कहानियाँ हैं ।

जव कलियुग को शुरू हुए 3000 साल बीत गये तो शक लोगों को मारने और आर्य धर्म को स्थापित करने के लिये एक ब्राह्मण ने शिव के लिये तप किया। बाद में वह अपने तप करने की वजह से भगवान शिव जैसा बन गया और फिर उसने भगवान शिव की आज्ञा से धरती पर विक्रमदित्य के नाम से जन्म लिया ।

यह विक्रमदित्य अपने बचपन से ही बहुत होशियार था | जब वह 5 साल का हुआ तो वह तप करने चला गया और उसने 12 साल तक तप किया। उस तप के बाद वह बहुत धनवान हो गया ।

उसने अपने लिये एक ऐसा दैवीय सिंहासन बनवाया जिसमें 32 मूर्तियाँ" लगी हुई थीं। भगवान शिव उस सिंहासन की खुद रक्षा करते थे। विकम उज्जैन में महाकालेश्वर में भगवान शिव की पूजा किया करता था ।

विक्रम ने मन्दिर के आँगन में ऐसे कई खम्भे लगवाये हुए थे जो कई धातुओं के बने हुए थे और उनमें कई प्रकार के रत्न जड़े हुए थे। उसने अपना सिंहासन एक ऐसी जगह लगवा रखा था जहाँ बहुत सारी लताएँ और फूल थे ।

वही राजा विक्रमदित्य एक बहुत ही मशहूर दानी और दूसरों की भलाई करने वाला राजा हो गया है। इसकी कथाएँ स्कन्द पुराण आदि, वृहत कथा, सिंहासन बत्तीसी, कथा सरित् सागर, पुरुष परीक्षा आदि पुस्तकों में भी मिलतीं हैं ।

कई लोगों ने विक्रमादित्य नाम के राजा का वर्णन किया है पर यह विक्रमादित्य जिसकी कहानियाँ हम यहाॅ दे रहे हैं उज्जैन का राजा था जिसके दरबार में महाकवि कालीदास, अमर सिंह, एक बहुत बड़े ज्योतिषी वराह मिहिर, वैद्यराज धन्वन्तरि, घटकरपर आदि नव रत्न थे। इन नव रत्नों के जैसा न तो अभी तक कोई हुआ है और न ही आगे कभी होगा ।

उसके बाद राजा भोज से ले कर सम्राट अकबर तक सभी राजाओं ने अपने अपने दरवारों में नव रत्न रखने की कोशिश की । विकम अपने दरवार में बहुत ऊँचे ऊँचे ब्राह्मणों को बुलाता था और उनसे धार्मिक कथाएँ सुनता था ।

एक बार वह अपने दरवार में बैठा किसी ब्राह्मण से कोई कथा सुन रहा था कि उसी समय बेताल नाम का एक देवता एक ब्राह्मण का रूप रख कर उसके दरबार में आया |

वह आ कर बोला " आपकी जय हो राजन। " और एक आसन पर बैठ कर बोला – “हे राजन, अगर आपकी इच्छा हो तो

मैं भी आपको कुछ इतिहास सुनाऊँ?”

तो बच्चो, उस वेताल देवता ने राजा विक्रम को इतिहास की जो कहानियाँ सुनायीं आज हम यहाॅ वही विकम बेताल की कहानियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं । तुमने विक्रम बेताल की कहानियाँ तो बहुत पढ़ी होंगी और सुनी भी होंगी पर ये कहानियाँ उन पुस्तकों से नहीं ली गयीं हैं। इसी लिये ये उनसे विल्कुल अलग हैं।

विकम वेताल की ये कहानियाँ हमारे 18 महापुराणों में से एक भविष्य पुराण' का एक हिस्सा हैं और ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गयीं हैं। इसलिये ये कहानियाँ शायद तुमको कुछ अलग सी लगें और नयी भी ।

तो लो पढ़ो विकम बेताल की ये नयी कहानियाँ हिन्दू धर्मग्रन्थ भविष्य पुराण से....


1 एक मालिक और उसके नौकर की वफादारी की कहानी

सो भगवान शिव के दास बेताल ने भगवान शिव का ध्यान किया और राजा विक्रमादित्य से बोला मजेदार कहानी सुनाता हूँ। सुनो। “आज मैं तुमको एक बहुत ही

बहुत पुराने समय की बात है कि वर्धमान नाम का एक बहुत ही खुशहाल शहर था । उसमें एक बहुत ही धार्मिक राजा राज करता था जिस का नाम था रूपसेन । उसकी एक बहुत ही पतिव्रता पत्नी थी विद्वन्माला |

एक दिन वीरवर नाम का एक क्षत्रिय अपनी पत्नी, एक बेटे और एक बेटी के साथ राजा के दरबार में रोजी रोटी कमाने के लिये आया। उसकी समस्या सुन कर राजा ने उसको 1000 सोने के सिक्के रोज की तनख्वाह पर अपने सिंह द्वार का चौकीदार रख लिया |

कुछ दिनों के बाद राजा ने अपने दूसरे नौकरों से उसकी पैसों की स्थिति के बारे में पूछा तो उन्होंने राजा को बताया कि वह अपनी तनख्वाह का काफी हिस्सा यज्ञ, तीर्थ, मन्दिरों में पूजा और संतों आदि पर खर्च कर देता था । अपने और अपने परिवार के लिये तो वह बहुत ही कम बचा कर रखता था

राजा यह सुन कर बहुत खुश हुआ और उसने उसको पक्के तरीके से अपने यहाॅ नौकर रख लिया ।

अव एक दिन ऐसा हुआ कि आधी रात में बहुत ज़ोर की वारिश हो रही थी कि राजा ने शमशान भूमि से एक स्त्री के रोने की आवाज सुनी। तो राजा ने वीरवर को यह पता करने के लिये भेजा कि वह स्त्री क्यों रो रही थी ।

वीरवर अपनी तलवार ले कर शमशान भूमि की तरफ उस रोती हुई स्त्री से यह पूछने के लिये चला कि वह क्यों रो रही थी । राजा भी छिपे तौर पर उसके पीछे पीछे चला ताकि कहीं ऐसा न हो कि वह किसी परेशानी में फॅस जाये ।

शमशान भूमि पहुँच कर वीरवर ने इधर उधर देखा तो एक स्त्री उसको रोती हुई दिखायी दे गयी। वह उसके पास पहुँचा और उससे पूछा कि वह क्यों रो रही थी ।

वह स्त्री रोते रोते वोली - " मैं इस राज्य की राज्य लक्ष्मी' हूँ । इस महीने के आखीर में राजा रूपसेन मर जायेगा । उसके मरने के बाद मैं अनाथ हो जाऊँगी। फिर मैं कहाँ जाऊँगी इसी लिये मैं रोती हूँ "

वीरवर राजा का बहुत ही वफादार था इसलिये उसने उससे पूछा कि क्या कोई ऐसा तरीका था जिससे राजा न मरे और वह

बहुत दिनों तक राज करे ।

वह स्त्री बोली . " अगर तुम चंडिका के मन्दिर में अपने बेटे की बलि चढ़ाओ तब यह राजा वच सकता है । '

यह सुन कर वीरवर तुरन्त ही घर आया। उसने अपने परिवार को जगाया और उनको सब कुछ बता कर सव लोगों को साथ ले कर वह चंडिका के मन्दिर में आया। राजा अभी भी छिपे तौर पर वीरवर का पीछा कर रहा था ।

मन्दिर आ कर वीरवर ने राजा की लम्बी उम्र की प्रार्थना की और अपने बेटे की बलि चढ़ा दी। अपने भाई का कटा सिर देख कर उसकी वहिन दुख के मारे वहीं मर गयी। अपने दोनों बच्चों को मरा देख कर उनकी माँ भी मर गयी ।

वीरवर ने तीनों का अन्तिम संस्कार किया और फिर राजा की लम्बी उम्र के लिये खुद की भी बलि चढ़ा दी ।

राजा अभी भी यह सब छिप कर देख रहा था । यह सब देख कर राजा को अपनी ज़िन्दगी बिल्कुल ही वेकार लगी सो उसने भी अपने आपको मारने के लिये अपनी तलवार निकाल ली।

जैसे ही उसने अपने आपको मारने के लिये तलवार उठायी कि देवी ने प्रगट हो कर राजा का हाथ पकड़ लिया और बोली “राजन, मैं तुमसे बहुत खुश हूँ। तुम्हारी ज़िन्दगी को अब कोई खतरा नहीं है। तुम मुझसे कोई भी वर माँग लो |

राजा बोला " अगर आप मुझे वर देना ही चाहती हैं तो वीरवर और उसके सारे परिवार को जिन्दा कर दीजिये । "

"ऐसा ही हो । ” कह कर देवी चली गयी। राजा चुपचाप घर " वापस चला आया और आ कर अपने बिस्तर पर लेट गया । उधर वीरवर अपने पूरे परिवार को ज़िन्दा देख कर बहुत खुश हुआ। वह अपनी पत्नी और बच्चों को घर ले गया और अपना चौकीदारी का काम करने के लिये महल वापस चला गया। कुछ समय बाद राजा ने उसे बुलाया और उससे उस स्त्री के

रोने का कारण पूछा कि वह क्यों रो रही थी तो उसने कहा “हे राजन, वह तो कोई चुड़ैल थी। जैसे ही मैं वहाँ पहुँचा तो वह गायव हो गयी । आप बिल्कुल चिन्ता मत करिये उसके बारे में। आप आराम से सोइये ।'

राजा वीरवर की वफादारी से बहुत खुश हुआ और उसने उस से दोस्ती कर ली । "

यह कहने के बाद वेताल चुप हो गया पर फिर बोला "हे राजन, इस कहानी में सबने एक दूसरे के प्यार के लिये त्याग किया पर इन सबमें सबसे ज़्यादा प्रेम और सबसे बड़ा त्याग किसका था?"

राजा बोला “हालाँकि इस कहानी में सबने एक दूसरे के लिये त्याग किया और एक दूसरे के लिये अपना अपना कर्तव्य निभाया फिर भी इस कहानी में राजा का त्याग सबसे बड़ा है। क्यों? क्योंकि वीरवर उसका नौकर था और वह अपनी सेवाओं के लिये राजा से पैसे लेता था । सो उस पैसे की वजह से उसने अपनी बलि चढ़ायी ।

वीरवर की पत्नी पतिव्रता थी और अपने धर्म का पालन करने वाली थी । उसने इसलिये बलिदान दिया । बहिन अपने भाई को प्यार करती थी और लड़का अपने पिता को । उन्होंने इसलिये अपने अपने बलिदान दिये ।

पर राजा रूपसेन का उदाहरण सबसे अच्छा उदाहरण है जिसमें वह एक मामूली से नौकर के लिये अपना वलिदान देता है । इस वजह से केवल उसी का बलिदान इन सब बलिदानों में सबसे बड़ा है । "


2 महादेवी की कहानी'

बेताल फिर बोला “राजन, एक कहानी और सुनिये। एक बार - उज्जयिनी में चन्द्र वंश का महावल नाम का एक राजा राज करता था। उसका एक बहुत ही वफादार नौकर था हरिदास |

हरिदास की पत्नी भक्तिमाला बहुत ही धार्मिक थी और हर समय साधु संतों की सहायता करने के लिये तैयार रहती थी। उनके एक सुन्दर सी बेटी थी महादेवी ।

एक दिन महादेवी ने अपने पिता से कहा - “पिता जी, आप मेरे लिये कोई ऐसा दुलहा ढूँढना जो मुझसे ज़्यादा होशियार हो, और किसी भी तरह का नहीं । "

हरिदास अपनी बेटी की बात सुन कर बहुत खुश हुआ और अपनी बेटी से बोला कि वह ऐसा ही करेगा। यह कह कर वह अपने काम पर शाही दरबार चला गया और वहाँ जा कर राजा को सिर झुकाया ।

राजा ने उसको अपने ससुर के घर उनका हाल चाल जानने के लिये भेजा कि वह वहाँ जा कर उसकी ससुराल का हालचाल पता करके आये ।

राजा का ससुर हरिश्चन्द्र तैलंग देश का राजा था। सो हरिदास तैलंग देश चल दिया और वहाँ जा कर अपने राजा का हाल चाल बताया | राजा हरिश्चन्द्र अपने दामाद का हाल सुन कर बहुत खुश हुआ ।

फिर उसने हरिदास से कहा - "तुम मुझे बड़े विद्वान वाह्मण लगते हो। तुम मुझे यह बताओ कि मुझे कैसे पता चलेगा कि कलियुग आ गया है?”

हरिदास बोला “जब लोग वेदों द्वारा लगायी गयी हदें पार कर जायें, जब धर्म दुनियाँ से गायब होने लगे तब जानो कि कलि युग आ गया है। इसके अलावा कलि म्लेच्छ लोगों को बहुत प्यार करता है और देवताओं का अपमान करता है । तब जानो कि कलि युग आ गया है |

हे राजन, पाप की पत्नी का नाम मृषा " है और उनके बेटे का 10 नाम है दुख" । दुख की पत्नी का नाम है दुर्गति" । जब कलि युग आयेगा तो ये सब सब घरों में रहेंगे ।

सारे राजा बहुत गुस्सा करेंगे, सारे ब्राह्मणों की इच्छाएँ बढ़ जायेंगी और वे उनके गुलाम हो जायेंगे। अमीर लोग और लालची हो जायेंगे । शूद्रों को समाज में ऊँचा दरजा दिया जायेगा । स्त्रियों में शरम जाती रहेगी और नौकर लोग अपने मालिकों की हत्या कर देंगे |

जब ऐसी स्थिति आ जाये तव यह समझना चाहिये कि कि युग आ गया है। पर जो कोई भी भगवान के चरणों में शरण लेगा उस समय केवल वही सुखी रहेगा । "

यह सब सुन कर राजा हरिश्चन्द्र बहुत खुश हुए। उन्होंने उस ब्राह्मण को बहुत सारी दक्षिणा दी, अपनी कुशल वतायी और विदा किया । वह ब्राह्मण भी राजा के ससुर ओर उने परिवार की कुशल जान कर अपने घर वापस आ गया।

उसी समय बुद्धिकोविद नाम का एक विद्वान ब्राह्मण हरिदास से मिलने आया और उसको अपनी एक खास विद्या का परिचय दिया । उसने देवी के एक मन्त्र का जाप किया और उसके असर से हरिदास को शीघ्रग नाम का एक हवाई जहाज दिखाया ।

हरिदास उसकी इस होशियारी से बहुत प्रभवित अपनी बेटी की शादी उस विद्वान ब्राह्मण से करने का विचार बना लिया । हुआ। उसने

हरिदास के एक बेटा भी था जिस का नाम था मुकुन्द । उस समय वह अपने गुरू के पास पढ़ने के लिये गया हुआ था। जब उस की पढ़ाई खत्म हो गयी तो उसने अपने गुरू से गुरु दक्षिणा " माँगने के लिये कहा ।

उसके गुरू ने कहा तुम अपनी बहिन महादेवी की शादी मेरे विद्वान बेटे धीमान से कर दो। "

मुकुन्द ने हाँ कर दी और अपने घर वापस आ गया । इधर भक्तिमाला ने भी अपनी बेटी के लिये एक विद्वान लड़का

देख रखा था। उसका नाम वामन था और वह गुरू द्रोण का शिष्य था। वह तीर कमान चलाने और दूसरे हथियारों को इस्तेमाल करने में बहुत होशियार था । इस शादी की बात को पक्का करने के लिये भक्तिमाला ने उसको दक्षिणा और पान भी दे रखे थे ।

अब जब समय आया तो वे तीनों लड़के महादेवी से शादी करने की इच्छा से हरिदास के घर आये। इस बीच एक राक्षस महादेवी को उठा कर विन्ध्य पहाड़ पर ले गया। महादेवी का अपहरण सुन कर तीनों लड़के रोने लगे ।

गुरू के बेटे धीमान ने पूछा कि महादेवी कहाँ है तो मुकुन्द चुने हुए ब्राह्मण ने उसको बताया कि एक राक्षस उसको विन्ध्य पहाड़ पर ले गया है ।

इस पर बुद्धिकोविद ब्राह्मण ने एक खास हवाई जहाज बनाया

और दूसरे दोनों लड़कों को साथ ले कर विन्ध्य पहाड़ की तरफ चल

दिया। तो तीसरे ब्राह्मण ने जिसको भक्तिमाला ने अपनी बेटी

महादेवी के लिये चुना था वहाँ से एक तीर चलाया और उस राक्षस

को मार दिया ।

इस तरह तीनों के सहायता से महादेवी वहाँ से घर लायी गयी । जब वे सब घर आ गये तो तीनों अपनी अपनी महानता बताने लगे कि उन्होंने ही महादेवी को उस राक्षस से बचाया है और उनसे ही उसकी शादी होनी चाहिये |

पर उनमें से यह कोई नहीं बता सका कि उनमें से किसकी शादी महादेवी से होनी चहिये । "

यह कहानी सुनाने के बाद वेताल ने पूछा . "हे राजन, अव तुम मुझे यह बताओ कि महादेवी के लिये उन तीनों में से कौन सा लड़का सबसे ज़्यादा ठीक है जिससे महादेवी की शादी की जाये ?"

राजा बोला “जिस लड़के ने उस लड़की का पता बताया कि उसको कोई राक्षस उठा कर ले गया था वह तो उसके पिता के समान है।

दूसरा ब्राह्मण बुद्धिकोविद जो केवल अपनी मन्त्र की ताकत से उन सबको वहाँ ले कर गया जहाँ वह लड़की थी वह उसके भाई के समान है। 

पर तीसरा ब्राह्मण जो उस राक्षस को मार कर उस लड़की को वहाँ से बचा कर लाया वही उसके लिये सबसे ज़्यादा ठीक वर है ।"



3 त्रिलोकसुन्दरी की कहानी

बेताल आगे बोला “अब मैं तुमको एक और कहानी सुनाता हूँ । ध्यान से सुनो। एक शहर था चम्पापुरी"। उसका राजा चम्पकेश एक बहुत ही बलवान राजा था। उसकी पत्नी का नाम था सुलोचना । उन दोनों के एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी उसका नाम था त्रिलोकसुन्दरी ।

त्रिलोकसुन्दरी इतनी सुन्दर थी कि देवता भी उससे शादी की इच्छा रखते थे । सो जब उसका स्वयंवर रचा गया तो यम, इन्द, वरुण, कुबेर आदि देवता भी उसके स्वयंवर में आये ।

आये हुए लड़कों में से इन्द्रदत्त बोला – “राजन, मैं शास्त्रों में होशियार हूँ और मैं सुन्दर भी हूँ सो आप अपनी बेटी की शादी मुझसे कर दीजिये । "

धर्मदत्त बोला "हे राजन, मुझे तीर कमान चलाना बहुत अच्छा आता है और मैं भी सुन्दर हूँ तो आप अपनी बेटी की शादी आप मुझसे कर दें । "

तीसरा लड़का बोला " राजन मेरा नाम धनपाल है। मैं सारे -- जीवों की भाषा जानता हूँ। मैं सुन्दर हूँ और गुणवान हूँ । आप अपनी बेटी की शादी मुझसे कर दीजिये और खुश रहिये ।' " चौथा लड़का बोला “ मैं बहुत प्रकार की कलाएँ जानता हूँ। मैं अपनी मेहनत से पाँच प्रकार के रत्न रोज कमाता हूँ मेरा पहला रत्न है पुण्य के लिये और मेरा दूसरा रत्न है यज्ञ के लिये । मेरा तीसरा रत्न है मेरी आत्मा के लिये और मेरा चौथा रत्न है मेरी पत्नी के लिये | और अपना अखिरी रत्न में अपने खाने पर खर्च करता हॅू। इसलिये आप अपनी बेटी मुझको दे दीजिये । "

यह सब सुन कर तो राजा सोच में पड़ गया कि वह इनमें से किसको अपनी वेटी दे। सभी बहुत अच्छे थे। वह यह निश्चय ही नहीं कर सका कि इन सबमें से कौन सा लड़का उसकी बेटी के लिये ठीक रहेगा ।

इसी पशोपेश में वह अपनी बेटी के पास गया और यह सब उसको बता कर उससे पूछा कि वह इनमें से किससे शादी करना चाहती थी। पर लड़की बहुत शर्मीली थी सो कुछ नहीं बोली।

यह कहानी सुना कर वेताल ने विक्रम से पूछा- - - "राजन अव तुम ही बताओ कि इनमें से कौन सा लड़का राजा की बेटी के लिये ठीक है?"

विक्रम बोल "हे -- रुद्र के नौकर, उस सुन्दर लड़की को धर्मदत्त से शादी करनी चाहिये। क्योंकि इन्द्रदत्त तो वेद जानता है इसलिये वह ब्राह्मणों की गिनती में आता है |

जो लड़का बहुत सारी भाषाएँ जानता है और अपनी सम्पत्ति बढ़ाने में लगा हुआ है उसकी गिनती वैश्यों में की जा सकती है । तीसरा जो कई कलाएँ जानता है और रत्नों का व्यापार करता है वह शूद्र है।

सो हे बेताल, लड़की को अपने वर्ण के परिवार में ही व्याहा जाना चाहिये। इसलिये इस लड़की को धर्मदत्त से ही शादी करनी चाहिये जो तीर कमान चलाने में बहुत अच्छा है |

क्योंकि वह अपने कर्मों से क्षत्रिय है और एक क्षत्रिय को क्षत्रिय से ही शादी करने में भलाई है इसलिये राजा को अपनी बेटी को उसको ही दे देनी चाहिये । " 


4 एक राजा जिसने अपनी इच्छाओं की वजह से अपनी जनता का नाश किया 17

बेताल फिर बोला – “राजन अव एक कहानी और सुनो। बहुत

पुराने समय में धर्मवल्लभ नाम का एक राजा था जो पुण्यपुर 18 में

राज करता था। उसका एक मन्त्री था जिसका नाम था सत्य

प्रकाश | सत्य प्रकाश की पत्नी का नाम लक्ष्मी था ।

एक बार राजा धर्मवल्लभ ने अपने मन्त्री सत्य प्रकाश से पूछा “बताओ सत्य प्रकाश, खुशी कितने प्रकार की होती हैं?" -

सत्य प्रकाश ने आदरपूर्वक जवाब दिया – “खुशी चार प्रकार की होती हैं महाराज | पहली खुशी तो ब्रह्मचर्य आश्रम में रहने की होती है। इसको ब्रह्मानन्द कहते हैं और यह सबसे अच्छी होती है । दूसरी खुशी गृहस्थ में रहने की होती है जिसको गृहस्थ का सुख वोलते हैं । यह बीच के किस्म का होता है। तीसरी खुशी वानप्रस्थ आश्रम में रहने की होती है। इसको धर्म आनन्द कहते हैं और यह बहुत ही मामूली किस्म का आनन्द होता है ।

चौथा आनन्द सन्यास आश्रम में मिलता है इसको शिव आनन्द कहते हैं। यह सबसे अच्छा और ऊँचे किस्म का आनन्द होता है ।

इनमें से गृहस्थानन्द मुख्यतया स्त्रियों की वजह से होता है क्योंकि इस आश्रम में उनके विना यह आनन्द नहीं मिल पाता । ' उस राजा की अभी तक शादी नहीं हुई थी इसलिये वह अपने लिये पत्नी ढूँढने के लिये दूसरे देशों की यात्रा के लिये चल दिया पर उसको अपनी पसन्द की कोई लड़की ही नहीं मिली । ".

फिर उसने अपने मन्त्री को अपने लिये कोई लड़की देखने के लिये भेजा जिससे कि वह उससे शादी कर सके और गृहस्थानन्द उठा सके।

सो राजा का मन्त्री दूसरे देशों में गया। वह भी वहाँ पर राजा की पसन्द की लड़की न पा सका तो फिर वह सिन्धु देश जा पहुँचा । वह सिन्धु देश जैसी जगह को देख कर बहुत खुश हुआ।

वहाँ वह समुद्र के किनारे गया और प्रार्थना की . "मैं आपको प्रणाम करता हूँ । ओ सारे रत्नों के भंडार, मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप सारी नदियों के मालिक हैं ।

मेहरबानी करके मेरे राजा के लिये उसकी पसन्द की एक लड़की दे दीजिये जिससे वे उससे शादी करके गृहस्थानन्द उठा सकें। अगर आपने मुझे ऐसी लड़की नहीं दी तो मैं यहीं मर जाऊँगा । '

समुद्र उसकी यह प्रार्थना सुन कर बहुत खुश हुआ। उसने उस मन्त्री को एक पेड़ दिखाया जिसमें फलों की जगह मोती लगे हुए थे । एक बहुत ही सुन्दर लड़की उस पेड़ पर बैठी हुई थी । पर कुछ ही पलों में वह लड़की पेड़ सहित गायब हो गयी ।

यह देख कर मन्त्री को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह घर वापस आ गया और आ कर राजा से सारा हाल कहा। यह सुन कर अवकी वार राजा भी मन्त्री के साथ साथ सिन्धु देश में आया और किनारे आया। समुद्र के

राजा ने भी देखा कि एक बहुत ही सुन्दर लड़की उस पेड़ पर बैठी हुई थी। पर उस बार भी कुछ ही पलों में वह लड़की पेड़ सहित समुद्र में ही गायब हो गयी ।

यह आश्चर्यजनक चीज़ देख कर राजा खुद भी उस लड़की के पीछे पीछे समुद्र में कूद गया। वहाँ से वह उस लड़की का पीछा करते करते पाताल लोक में चला गया और मन्त्री शहर वापस आ गया।

राजा ने उस लड़की से कहा “ओ सुन्दर लड़की, मैं तो यहाँ केवल तुम्हारे लिये ही आया हूँ। तुम मुझसे गांधर्व तरीके से शादी कर लो । "

वह लड़की हॅसी और बोली – मैं तुमसे कृष्ण पक्ष की 14वीं - रात को देवी के मन्दिर में मिलूँगी । "

राजा उस समय तो वहाँ से वापस चला आया पर कृष्ण पक्ष की 14वीं रात को वह अपनी तलवार ले कर देवी के मन्दिर में पहुँच गया। वह लड़की वहाँ पहले से ही मौजूद थी ।

तभी उस लड़की को वकवाहन नाम के एक राक्षस ने छुआ यह देख कर राजा बहुत नाराज हुआ और उसने तुरन्त ही अपनी तलवार से उस राक्षस का सिर काट डाला ।

फिर उसने उस लड़की से पूछा – “मुझे सच सच बताओ कि यह कौन था और यह यहाँ कैसे आया?” वह लड़की बोली – “राजन, में एक विद्याधर 20 की बेटी हूँ ।

मेरा नाम मदवती है। मेरे पिता मुझे बहुत प्यार करते हैं। एक बार मैं जंगल गयी तो शाम को घर समय पर खाने के लिये नहीं पहुँच सकी।

मेरे पिता ने अपनी योग की ताकत से मेरे बारे में सब कुछ जान लिया और मुझे शाप दिया कि “एक राक्षस तुझे कृष्ण पक्ष की 14वीं रात को उठा कर ले जायेगा । "

जब मुझे इस शाप के बारे में पता चला तो मैंने अपने पिता से कि मैं इस शाप से कैसे आजाद होऊँगी । तो उन्होंने कहा कि पूछा जव कृष्ण पक्ष की 14वीं रात को कोई राजा तुझसे शादी करेगा तब तू इस शाप से आजाद हो जायेगी ।

आपकी मेहरबानी से आज मैं उस शाप से आजाद हो गयी । अब मैं आपकी आज्ञा से अपने पिता के घर जाना चाहती हूँ।

राजा बोला “अभी तुम मेरे साथ मेरे घर चलो फिर मैं तुमको तुम्हारे पिता के घर छोड़ दूँगा । "

लड़की राजी हो गयी और वह राजा के साथ उसके महल चली आयी । वहाँ आ कर राजा ने उससे शादी कर ली। पूरे शहर में शादी की खुशियाँ मनायीं गयीं ।

मन्त्री ने देखा कि राजा के साथ तो एक दैवीय लड़की आ गयी है और वह तो उसी में खोया रहता है। राज काज की तरफ तो वह ध्यान ही नहीं देता । अचानक कुछ दिन बाद ही मन्त्री मर गया । "

यह कहानी सुना कर बेताल बोला- - "राजन, क्या तुम वता सकते हो कि उस मन्त्री के अचानक मरने की क्या वजह थी ? और इसमें क्या भेद छिपा है?"

राजा बोला - " वह मन्त्री राजा का दोस्त था और राजा की जनता का भला चाहने वाला था । केवल उसी की वजह से राजा को विद्याधर की बेटी मदवती मिली थी ।

पर उसने देखा कि उस लड़की के मिलने के बाद तो राजा दिनों दिन उसी में खोया रहता था । उसको लगा कि इस तरह से तो बहुत जल्दी ही यह देश नष्ट हो जायेगा क्योंकि राजा फिर अपने देश की तरफ ध्यान ही नहीं दे पायेगा ।

और इस हालत में कोई सलाह भी काम नहीं करेगी। वह राज्य को नष्ट होते नहीं देख सकता था । सो हे बेताल, उसने अपनी जान देने की सोची और फिर उसने अपनी जान दे ही दी । "







5 सबको अपने कर्मों का फल भुगतना हरिस्वामी की कहानी है

वेताल फिर बोला – “हे राजन, एक कहानी और सुनो। चूड़ापुर शहर का एक राजा था चूड़ामणि । उसकी पत्नी का नाम था विशालाक्षी । रानी एक बेटे को पाने के लिये भगवान शिव की बहुत पूजा करती थी ।

कुछ समय बाद उसको काम देव जैसा सुन्दर एक बेटा पैदा हुआ । उसका वह बेटा देवता का एक हिस्सा था। उन्होंने उसका नाम हरिस्वामी रख दिया । हरिस्वामी ने इस धरती पर मिलने वाले सभी सुखों को भोगना शुरू कर दिया ।

अव हुआ यह कि देवल मुनि के शाप से शापित एक स्त्री से हरिस्वामी की शादी हो गयी। एक बार वह अपने महल में अपने विस्तर पर सो रही थी कि सुकल नाम का एक गन्धर्व" वहाँ आया और सोती हुई रानी को उठा कर ले गया ।

जव हरिस्वामी जागा तो उसको अपनी पत्नी नहीं मिली । वह अपनी पत्नी को ढूँढने लगा पर जब वह उसको कहीं नहीं मिली तो वह बहुत दुखी हो गया और शहर छोड़ कर जंगल चला गया। वहाँ जा कर वह भगवान की पूजा करने लगा ।

एक दिन हरिस्वामी भिक्षा माँगने के लिये एक ब्राह्मण के घर गया। ब्राह्मण ने खुशी खुशी खीर बनायी और उसको खाने के लिये दी। खीर का बरतन ले कर वह यह सोच कर नहाने के लिये एक नदी किनारे आया कि वह उस खीर को नहा कर खायेगा ।

सो खीर का बरतन तो उसने एक बरगद के पेड़ के नीचे रख दिया और नहाने के लिये उस नदी में घुस गया। उसी समय एक साँप वहाँ आया और उस खीर के बरतन में अपना जहर उगल कर वहाँ से चला गया।

हरिस्वामी नदी में से जब नहा धो कर आया तो अपनी खीर खाने बैठा । खीर खाते खाते ही उसको बेहोशी आने लगी क्योंकि उस खीर में तो साँप का जहर था ।

हरिस्वामी उस ब्राह्मण के घर वापस गया और बोला "ओ नीच ब्राह्मण, मैं तेरी खीर खा कर मर रहा हूँ इसलिये तुझे ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा ।" इतना कह कर वह मर गया और शिव लोक पहुँच गया । "

इतनी कहानी सुना कर बेताल ने राजा से पूछा- "हे राजन, बताओ कि इसमें किसको लगा ब्रह्म हत्या का पाप ब्राह्मण को या सॉप को ?" 

राजा बोला “सॉप ने तो अनजाने में उस खीर में अपना जहर डाला था इसलिये वह इस हत्या का जिम्मेदार नहीं है ।

और ब्राह्मण के लिये तो सन्यासी देवता के बराबर था। उस ब्राह्मण ने तो अपना कर्तव्य निभाया कि उसने श्रद्धा के साथ वह खीर बनायी और उस ब्राह्मण को खाने के लिये दी ।

अगर वह खीर उसको अपमान के साथ देता तभी भी वह ब्रह्म हत्या का भागी हो सकता था। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।

और फिर जो खीर उस ब्राह्मण ने उस सन्यासी को खाने के लिये दी थी उसमें तो कोई जहर था ही नहीं। अगर जो खीर वह उसको खाने के लिये देता और उसमें जहर होता तब उसको पाप लगता । सो किसी भी हालत में उसको तो ब्रह्म हत्या का पाप लग ही नहीं सकता ।

अव वचता है सन्यासी । इस दुनियाँ में हर एक को अपने अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। वह केवल अपने ही किसी पुराने कर्म के फल से अपनी ही मौत ही मरा। उसकी मौत में न तो किसी का दोष है और न ही किसी का हाथ है।

खीर खाना तो उसकी मौत का केवल बहाना बन गया । इसलिये इस हालत में उसकी हत्या का कोई जिम्मेदार नहीं है ।"




6 जान देने का उदाहरण जीमूतवाहन और शंखचूड़ की कहानी

वेताल विक्रम से फिर बोला – “लो एक कहानी ओर सुनो। एक वार कान्यकुब्ज क्षेत्र में एक ब्राह्मण रहता था । वह बहुत धार्मिक था। वह जो कुछ भी घरों से दान में इकट्ठा करता था वह सब दान में दे देता था ।

एक बार नवरात्रि के व्रतों के दिनों में उसको किसी घर से कुछ नहीं मिला तो उसे चिन्ता हुई। उसने सोचा " मैंने तो घर में कन्याएँ वुलायी हुई हैं27 अब मैं उनको कैसे खिलाऊँगा । "

वह ऐसा सोच ही रहा था कि देवी की कृपा से उसको 5 सोने के सिक्के मिल गये । उस दिन का व्रत उसने उन्हीं सिक्कों से खत्म किया ।

क्योंकि उसने खुद ने 9 दिन तक कुछ नहीं खाया पिया था 28 तो उस व्रत के असर से वह देवता रूप हो गया । वह जीमूतकेतु यानी विद्याधरों का सरदार बन गया। वह हिमालय पहाड़ पर एक बहुत बड़े से महल में रहने लगा और वहाँ रह कर भक्ति के साथ कल्प वृक्ष की पूजा करने लगा |

इस कल्प वृक्ष की पूजा के फल से उसके एक बेटा हुआ जिसका नाम उसने जीमूतवाहन रखा ।

अब अपने पिछले जन्म में यह जीमूतवाहन मध्य भारत के एक देश का राजा था - राजा शूरसेन। एक बार यह राजा शूरसेन शिकार खेलते खेलते वाल्मीकि ऋषि के आश्रम की तरफ आ निकला जो उत्पलावर्त में था ।

वहाँ उसने चैत्र मास की नवमी को राम का जन्म दिन मनाया। रात भर जागा तो उसी पुन्य के असर से वह विद्याधर वन कर एक विद्याधर के घर में पैदा हुआ ।

उस घर में पैदा होने के बाद जीमूतवाहन खुद भी कल्प वृक्ष की पूजा करने लगा। एक साल के अन्दर अन्दर ही कल्प वृक्ष ने उससे कहा कि वह उससे कोई भी वर माँग ले । जीमूतवाहन बोला कि " मेरा शहर सब तरह से फला फूला हो जाये । "

यह सुन कर वह कल्प वृक्ष उसके शहर की जमीन में घुस गया और उस शहर को खुशहाल और फला फूला बना दिया। अब वहाँ कोई ऐसा नहीं था जो राजा के बराबर न हो। सभी राजा की तरह सुखी और खुशहाल थे |

बाद में पिता और बेटा दोनों मलयाचल के जंगल में तप के लिये चले गये और वहाँ जा कर घोर तप किया ।

एक दिन राजा मलयध्वज की बेटी कमलाक्षी अपनी सहेलियों के साथ शिव की पूजा करने के लिये शिव के मन्दिर गयी । इत्तफाक से उसी समय जीमूतवाहन भी वहाँ पूजा करने के लिये आया |

जैसे ही उसने राजकुमारी कमलाक्षी को देखा तो वह उसके प्रेम में पड़ गया और उसको पाने की इच्छा उसके मन में जाग उठी । उसने अपने मन की बात उससे कह दी। राजकुमारी भी उसको चाहने लगी थी तो राजा मलयध्वज ने अपनी बेटी की शादी जीमूतवाहन से कर दी |

एक दिन मलयध्वज का बेटा विश्वावसु यानी कमलाक्षी का भाई जीमूतवाहन के साथ गन्धमादन पहाड़ पर गया । वहाँ उसने नर और नारायण के दर्शन किये और उनको प्रणाम कया । तभी वहाँ पर विष्णु जी की सवारी गरुड़ जी आ गये ।

जहाँ जीमूतवाहन था वहीं शंखचूड़ नाग की माँ बैठी हुई रो रही

थी। जीमूतवाहन ने उसको रोते देखा तो वह उसके पास गया और उससे पूछा – “तुम क्यों रो रही हो? तुम्हें क्या दुख है?" शंखचूड़ नाग की माँ बोली आज गरूड मेरे बेटे को खा लेगा। मैं इसी लिये रोती हूँ । ' "

यह सुन कर जीमूतवाहन जहाँ गरुड़ जी थे उनके पास गया तो गरुड़ जी ने सोचा कि आज यही मेरा खाना है सो उन्होंने उसको अपने पंजों में पकड़ लिया और आसमान में उड़ गये ।

जव कमलाक्षी ने देखा कि गरुड़ जी उसके पति को खा रहे हैं तो उसने रोना शुरू कर दिया। पर गरुड़ जी ने देखा कि वह जब जीमूतवाहन को खा रहे थे तो जीमूतवाहन को कोई दर्द नहीं हो रहा था ।

गरुड़ जी भी उसको आदमी की शक्ल में देख कर डर गये क्योंकि वह तो नाग को खाने आये थे और यह तो एक आदमी था। उन्होंने जीमूतवाहन से पूछा – “तुम मेरा खाना क्यों बने ? "

जीमूतवाहन वोला – “क्योंकि शंखचूड़ नाग की माँ बहुत दुखी थी सो उसके बेटे को बचाने के लिये मैं तुम्हारे पास आया । "

जब शंखचूड़ नाग को इस बात का पता चला तो वह भी गड़ जी के पास आया और बोला "मैं हूँ तुम्हारा खाना । तुम इस दैवीय आदमी को छोड़ दो और मुझे खा लो । '

जीमूतवाहन की दूसरे की भलाई करने की भावना को देख कर गरुड़ जी को बहुत खुशी हुई। उन्होंने उसको तीन वरदान दिये ।

एक तो "मैं शंखचूड़ की सन्तान को कभी नहीं खाऊँगा । " दूसरे “विद्याधरों के राज्य में तुमको बहुत ऊँचा पद मिलेगा | तीसरे “एक लाख साल जीने के बाद तुमको वैकुंठ मिलेगा । इतना कहने के बाद गरुड़ जी वहाँ से चले गये ।

अपने पिता के वाद जीमूतवाहन को उनका राज्य मिल गया और एक लाख साल धरती पर सुख भोगने के बाद वह वैकुंठ चला गया। ”

कहानी सुनाने के बाद वेताल विक्रम से वोला “अब तुम यह बताओ राजन कि इनमें से ज़्यादा साहसी कौन था - जीमूतवाहन या शंखचूड़ नाग? और इन दोनों में से किसको ज़्यादा अच्छा फल मिला?”

राजा वोले - “हे वेताल | इसमें शंखचूड़ नाग को राजा जीमूतवाहन से ज़्यादा अच्छा फल मिला क्योंकि दूसरों की भलाई करना तो राजा का कर्तव्य है। हालांकि जीमूतवाहन ने अपनी ज़िन्दगी उसको दे कर एक तरह से शंखचूड़ की तरफदारी ही की ।

हालाँकि उसी की वजह से गरुड़ जी ने उसको एक लाख साल की ज़िन्दगी दी और बाद में वैकुंठ में वास दिया पर फिर भी यह राजा के कर्तव्यों में ही आता है। इसलिये जीमूतवाहन का बलिदान शंखचूड़ के साहस से ज़्यादा बड़ा नहीं है ।

वल्कि शंखचूड़ नाग ने अपनी ज़िन्दगी अपने दुश्मन गरुड़ जी को दे कर राजा जीमूतवाहन की ज़िन्दगी बचायी। इसलिये शंखचूड़ नाग ही अच्छे फलों का हकदार है। "

बेताल राजा के इस जवाब से बहुत सन्तुष्ट हुआ ।




7 सबको अपने कर्मों का फल भुगतना है गुणाकर की कहानी

बेताल फिर से बोला, “लो अब यह कहानी सुनो। एक वार उज्जयिनी में एक राजा राज करते थे। उनका नाम था महासेन । उनके राज्य में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम था देवशर्मा । देवशर्मा का एक बेटा था जिसका नाम था गुणाकर ।

गुणाकर को शराब पीने और जुआ खेलने दोनों की बहुत ही बुरी लत थीं । उसने अपने पिता का बहुत सारा पैसा शराव और जुए में ही उड़ा दिया था |

जव उसके पास पास पैसा नहीं रहा तो उसके दोस्तों ने भी उसको छोड़ दिया। अब वह इधर उधर घूमने लगा। अपनी अच्छी किस्मत से एक दिन वह एक सिद्ध मुनि के आश्रम में आ निकला ।

वहाँ कपर्दी नाम के एक योगी ने उसको कुछ खाने के लिये दिया पर उसने उसे यह सोच कर नहीं खाया कि कहीं ऐसा न हो कि वह किसी पिशाच का खराव किया हुआ हो ।

तव उस योगी ने एक यक्षिणी को उसको लुभाने के लिये बुलाया और उस यक्षिणी ने जा कर गुणाकर को कुछ दिन के लिये लुभाया। उसके बाद वह कैलाश पहाड़ पर चली गयी |

गुणाकर उसका विरह नहीं सह सका सो वह फिर उसी योगी के पास गया और उस यक्षिणी के बारे में पूछा तो योगी ने उसको उस यक्षिणी को लुभाने का तरीका बताया ।

उसने उसको एक मन्त्र दिया और कहा कि वह उस मन्त्र का आधी रात को पानी में खड़ा रह कर 40 दिन तक जाप करे । और कहा कि अगर यह मन्त्र तुमको सिद्ध हो गया तो वह यक्षिणी तुम्हारे पास आ जायेगी ।

गुणाकर ने यह सब किया पर वह यक्षिणी को नहीं लुभा सका । आखिर योगी की सलाह मान कर वह घर वापस चला गया। वहाँ जा कर उसने अपने माता पिता को प्रणाम किया और सोने चला गया।

अगले दिन वह सन्यासियों के मठ में गया और वहाँ उनका शिष्य बन कर रहने लगा। वहाँ उसने पाँच आग 2 के बीच में बैठ कर अपने आपको साफ किया और फिर से उसी मन्त्र का जाप किया जो उसको उस कपर्दी ने दिया था |

पर वह यक्षिणी फिर भी नहीं आयी। इससे वह बहुत उदास हो गया। ”

कहानी सुनाने के बाद बेताल बोला "राजन, अब तुम यह बताओ कि उस योगी के बताये अनुसार मन्त्र का जाप करने के बाद भी वह यक्षिणी उसके पास क्यों नहीं आयी?”

राजा बोला - “ओ रुद्र के दास, किसी भी साधक को अपनी साधना करने के लिये तीन गुणों की जरूरत होती हैं - दिल, बोली और शरीर |

जो भी काम दिल से और बोलने से किया जाता है वह काम उस आदमी को दूसरी दुनिया में सुख पहुँचाता है । है जो काम केवल शरीर से और बोलने से किया जाता है। वह काम सुन्दर है । वह काम थोड़ा सा इस दुनियाँ में फल देता है और ज़्यादा फल दूसरी दुनियाँ में देता है । और जो काम शरीर से और दिल से किया जाता है वह केवल दूसरी दुनियाँ में ही फल देता है ।

पर जो काम तीनों से किया जाता है यानी दिल से, बोलने से और शरीर से उस काम का फल इसी दुनियाँ में मिल जाता है और जल्दी मिलता है । बाद में यह मोक्ष भी देता है।

इसलिये अगर किसी भी साधक को कोई भी चीज़ अभी इसी दुनियाँ में चाहिये तो उसको वह काम दिल से, बोलने से और शरीर से तीनों से करना चाहिये ।

कहानी सुनाने के बाद बेताल बोला – “राजन, अव तुम यह बताओ कि उस योगी के बताये अनुसार मन्त्र का जाप करने के बाद भी वह यक्षिणी उसके पास क्यों नहीं आयी ?"

राजा बोला – “ओ रुद्र के दास, किसी भी साधक को अपनी साधना करने के लिये तीन गुणों की जरूरत होती हैं - दिल, बोली और शरीर ।

जो भी काम दिल से और बोलने से किया जाता है वह काम उस आदमी को दूसरी दुनियाँ में सुख पहुँचाता है।

जो काम केवल शरीर से और बोलने से किया जाता है। वह काम सुन्दर है । वह काम थोड़ा सा इस दुनिया में फल देता है और ज़्यादा फल दूसरी दुनियाँ में देता है ।

और जो काम शरीर से और दिल से किया जाता है वह केवल दूसरी दुनियाँ में ही फल देता है ।

पर जो काम तीनों से किया जाता है यानी दिल से, बोलने से और शरीर से उस काम का फल इसी दुनियाँ में मिल जाता है और जल्दी मिलता है । बाद में यह मोक्ष भी देता है ।

इसलिये अगर किसी भी साधक को कोई भी चीज़ अभी इस दुनियाँ में चाहिये तो उसको वह काम दिल से, बोलने से और शरीर से तीनों से करना चाहिये ।

हालाँकि गुणाकर ने बड़ी मेहनत से उस मन्त्र का दो बार जाप किया पर दोनों बार ही उसका दिल उसमें नहीं था। जब वह पानी में था या पॉच आगों के बीच में बैठा था उस समय उसका केवल शरीर ही वहाँ था, और थी उसकी बोली । पर गुणाकर का दिल उस मन्त्र में नहीं था । वह तो यक्षिणी में लगा था |

इसी वजह से उसको मन्त्र में विश्वास भी नहीं था और इसलिये शरीर और बोली के होते हुए भी, क्योंकि उसका वहाँ दिल नहीं था उसकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी ।

पर क्योंकि उसने कर्म किया था इस लिये वह अपने दूसरे जन्म में यक्ष के रूप में पैदा हुआ और यक्षिणी को भी पाया ।

यह सावित करता है कि किसी भी काम को पूरा करने के लिये दिल, बोली और शरीर तीनों की जरूरत होती है । और इन तीनों में भी दिल सबसे ज्यादा जरूरी है । "

8 सव बच्चों को एक सा समझो एक मॅझले बेटे की कहानी

वेताल ने आगे कहना शुरू किया • " राजन एक और कहानी | - एक वार चित्रकूट में एक बड़ा मशहूर राजा रहता था जिसका नाम था रूपदत्त |

एक बार वह शिकार खेलने के लिये गया तो एक हिरन का पीछा करते करते एक जंगल में निकल गया ।

दोपहर होते होते वह एक तालाब के किनारे आ पहुँचा। वहाँ उसने एक ऋषि की बेटी को अपनी सहेलियों के साथ तालाब में से कमल के फूल चुनते हुए देखा |

उसको देख कर राजा ने सोचा कि वह उसको अपनी रानी बनायेगा। वह लड़की भी राजा को देख कर बहुत खुश हुई और दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया ।

राजा ने उसकी एक सहेली से उसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह एक ऋषि की बेटी थी। तभी उसके पिता भी वहाँ आ गये।

राजा ने उनको प्रणाम किया और उनसे पूछा – “हे मुनि, सबसे ऊँचा धर्म क्या है?"

मुनि ने जवाब दिया – “हे राजन किसी वेसहारे का पालन पोषण करना, शरण में आये हुए की रक्षा करना, और सब पर दया करना - ये ही सबसे ऊचे धर्म हैं ।

अगर जो डरा हुआ हो तो उसके डर को भगाने से बड़ा और कोई दूसरा धर्म नहीं है। बुरे लोगों को सजा दो और आदरणीय लोगों का, ब्राह्मणों का और गाय का आदर करो ।

जब तुम सजा दो तो सबको एक सा समझो, किसी की तरफदारी मत करो। और जब तुम किसी देवता की पूजा करो तो हमेशा उसकी भक्ति से पूजा करो, उसको धोखा मत दो |

जव तुम दान करो तो हमेशा उसके साथ नम्रता और मीठा वरताव करो। कभी कोई तुमसे कोई छोटा सा भी गलत काम हो जाये तो उसको बहुत बड़ा समझ कर उससे बचने की कोशिश करो । ' "

इसके बाद उन ऋषि ने अपनी बेटी की शादी उस राजा से कर दी। शादी के बाद राजा उस लड़की को अपनी राजधानी ले गया । रास्ते में वे एक बरगद के पेड़ के नीचे रुके ।

एक राक्षस उसकी पत्नी को खाने के इरादे से वहाँ आया और बोला – “ तुमने मेरी जगह को गन्दा किया है इसलिये मैं तुमको खाऊँगा।”

राजा ने उससे माफी माँगी पर वह राक्षस बोला "अगर तुम मुझको एक सात साल का ब्राह्मण बच्चा दो तो मैं तुम्हें आजाद कर दूँगा । ' "

राजा ने उसको वह बच्चा देने का वायदा किया और अपनी पत्नी के साथ अपने घर चला गया। अगले दिन उसने अपने मन्त्रियों को पिछले दिन का हाल बताया।

मन्त्रियों की सलाह पर राजा ने 100,000 सोने के सिक्कों के बदले में एक ब्राह्मण का मॅझला बेटा उस राक्षस को देने के लिये ले लिया । वह बच्चा भी अपने पिता के लिये अपने आपकी बलि देने के लिये तैयार हो गया ।

सारे लोग ठीक समय पर राक्षस के पास आये। जब उस बच्चे की बलि चढ़ाने का समय आया तो वह बच्चा पहले तो बहुत ज़ोर

से हँसा और फिर बहुत ज़ोर ज़ोर से रोने लगा । " इतनी कहानी सुना कर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा -

"राजन, यह बताओ कि ब्राह्मण का वह लड़का पहले हँसा क्यों और फिर रोया क्यों ?"

राजा बोले - " सबसे बड़ा बेटा पिता को सबसे ज़्यादा प्यारा होता है और सबसे छोटा बेटा माता को सबसे ज़्यादा प्यारा होता है । और वह क्यों कि मॅझला था इसी से वह अपने आपको अपने घर में बेकार समझ रहा था ।

इसी लिये उसने बड़ी उम्मीदों के साथ राजा के पास शरण ली । पर उस बेरहम राजा के हाथ में तलवार देख कर जो अपनी पत्नी को खुश करना चाहता था पहले तो वह हँसा पर फिर ज़ोर से रो पड़ा। उसको लगा कि उसका यह भला शरीर केवल राक्षस के ही लायक था । "

वेताल राजा का यह जवाब सुन कर बहुत खुश हुआ ।



9 पढो कम और समझो ज्यादा चार वेवकूफों की कहानी

बेताल फिर बोला " राजन वस यह आखिरी कहानी । एक बार - जयपुर में एक राजा राज्य करता था। उसका नाम था वर्धमान | उसके राज्य के एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम था विष्णुस्वामी । उसके चार बेटे थे ।

उसके पहले बेटे का नाम था द्यूतकर्मा यानी जुआ खेलने वाला | उसके दूसरे बेटे का नाम था व्यभिचारी यानी वह हमेशा लड़कियों के पीछे भागता रहता था ।

उसके तीसरे बेटे का नाम था विषयी | वह हमेशा ही आनन्द भोगता रहता था । और चौथे का नाम था नास्तिक । वह भगवान में बिल्कुल ही विश्वास नहीं करता था ।

इस तरह से उनके गुण उनके नाम के ही अनुसार थे । एक समय उनके ऊपर ऐसा खराब आया कि बदकिस्मती से वे सब गरीब हो गये ।

सो एक बार वे सब अपने पिता के पास गये और उनको प्रणाम करके उन्होंने उनसे पूछा – “पिता जी, हम लोग गरीब कैसे हो गये?”

पिता वोला – “द्यूतकर्मा ने जुए में पैसे खो दिये। यह पाप की जड़ है। यह बुरी आदतों को पैदा करता है जैसे चोरी, बेरहमी आदि । इन सबके नतीजे बुरे ही होते हैं । इसलिये तुमने अपना पैसा खो दिया । "

वह लड़का गिड़गिड़ा कर बोला “पिता जी तो फिर मुझे बताइये कि पैसा कमाने का सही तरीका क्या है?"

पिता ने कहा, " अगर - तुम तीर्थ जाओगे और वहाँ जा कर व्रत आदि करोगे तो तुम्हारे सारे पाप धुल जायेंगे। फिर माता पिता का कहना मानना । तुम अपने

पिता ने अपने दूसरे बेटे से कहा - "बेटे तुम व्यभिचारी हो । वेश्याओं की संगत बहुत बुरी होती है। तुम अपनी यह आदत छोड़ दो। तुम ब्रह्मचर्य का पालन करो और भगवान का ध्यान करो । भगवान तुम्हें सुखी रखेंगे | "

उसने अपने तीसरे बेटे विषयी से जो हमेशा आनन्द भोगने में ही लगा रहता था कहा " मॉस खाना और शराब पीने से हमेशा ही पाप बढ़ते हैं। ऐसा करके तुम चोरी को बढ़ावा दोगे और फिर नरक में जाओगे। इसलिये तुम विष्णु की हर चीज़ से पूजा और अपना खाना शान्ति से खाओ । " करो

“वेटा, उसने अपने चौथे बेटे नास्तिक से कहा तुम अपनी यह भगवान को न मानने वाली आदत छोड़ दो और भगवान को मानने का रास्ता अपनाओ । आत्मा शुद्ध है, विद्वान है, अमर है और महादेवी चंडिका बहुत बड़ी शक्ति हैं ।

देवता जो हर आदमी के दिल में रहते हैं भगवान का ही एक हिस्सा हैं। उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करो और अपने पापों की शान्ति के लिये उनकी पूजा करो । "

यह सुन कर चारों बेटों ने उसका कहना मान कर वैसा ही करना शुरू कर दिया जैसा कि उनके पिता ने उनसे कहा था। उन सवने ज्ञान प्राप्त करने के लिये शिव की पूजा करनी भी शुरू कर दी। एक साल के बाद शिव जी ने उन सबको संजीवनी विद्या 7 दे दी |

संजीवनी विद्या पाने के बाद उसको जाँचने के लिये वे जंगल की तरफ चल दिये। जंगल में उनको कुछ हड्डियाँ पड़ी मिलीं तो सबसे बड़े बेटे ने उनको इकठ्ठा करके कहा - "मैं अपने ज्ञान से यह बता सकता हॅू कि ये हड्डियाँ एक मरे हुए शेर की हैं। "

ऐसा कह कर उसने उनके ऊपर मन्त्र पढ़ा हुआ जल छिड़का तो वे सारी हड्डियाँ अपने आप ही तरतीववार लग कर एक शेर के ढाँचे में बदल गयीं । 

ब्राह्मण के दूसरे बेटे व्यभिचारी ने अपना मन्त्र पढ़ा जल उसके ऊपर छिड़का तो उस ढाँचे पर मॉस चढ़ गया और उसके शरीर में

खून बहने लगा | तीसरे बेटे विषयी ने अपना मन्त्र पढ़ा जल उसके ऊपर छिड़का तो उस पर खाल चढ़ गयी और उसमें जान पड़ गयी ।

अव चौथे वेटे नास्तिक ने उस सोते हुए शेर को जगाने के लिये अपना मन्त्र पढ़ा जल उसके शरीर पर छिड़क दिया ।

देखते ही देखते सोये हुए शेर ने एक अॅगड़ाई ली और उठ कर उन चारों बेटों को खा गया । '

यह कहानी सुना कर बेताल ने विक्रम से पूछा “विकम, अव तुम यह बताओ कि इन चारों में से सबसे बड़ा बेवकूफ कौन था ?” राजा बोला – “इनमें सबसे बड़ा बेवकूफ तो उस ब्राह्मण का वह चौथा बेटा था जिसने उस शेर के सोये हुए शरीर में जान डाली। अगर वह उसमें जान न डालता तो उन सबकी जान बची रहती । उसके शेर के शरीर में जान डालते ही वह शेर ज़िन्दा हो कर उठ गया और चारों को खा गया ।' "

कहानियाँ सुनाने के बाद

बेताल बोला – “राजन तुम ठीक कहते हो। मैं तुम्हारे पास शिव जी की आज्ञा से आया था। मैंने तुमसे कई तरह के सवाल पूछ पूछ कर तुम्हारा इम्तिहान ले लिया और तुमने मेरे सब सवालों का बड़ी अक्लमन्दी के साथ सही सही जवाब दिया ।

मैं तुमसे बहुत खुश हूँ। मैं तुम्हारी बाहों में रहूँगा जिससे तुम इस धरती पर अपने सारे दुश्मनों को जीत पाओगे । हमारे दासों ने यहाॅ के सारे शहर नष्ट कर दिये हैं सो शास्त्र के अनुसार नाप कर तुम उनको फिर से बसाओ और इस धरती का न्यायपूर्वक पालन करो । धर्म तुम्हारे राज्य में फिर से फले फूलेगा । "

इतना कह कर वेताल राजा को देवी की पूजा करने की सलाह दे कर वहाँ से गायब हो गया। उसके बाद राजा विक्रम ने अश्वमेध यज्ञ किया और चक्रवर्ती राजा वन गया। बाद में वह स्वर्ग चला गया।

इसी विकमदित्य ने विक्रम संवत शुरू किया था जो आजकल सारे भारत में प्रचलित है ।


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