तीसरा गुण न्याय
।। न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य ।।
न्याय की देवी राजा भोज से कहती है में इस सिंहासन में न्याय की प्रतिक हूँ और में आपका उद्देश्य जानती हूँ किंतु आप अपने उद्देश्य में कभी सफल नही हो पाएगें , तभी राजा भोज कहते हैं क्यों देवी में इस सिंहासन बत्तीसी को प्रजा के हित के लिए प्राप्त करना चाहता हूँ । तो सुनिए आपको सबसे पहले चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के न्याय के विषय में जान ना होगा , राजा भोज - अवश्य जान ना चाहुंगा देवी । तो सुनिए चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य इस धरती पर एक अकेले न्यायप्रिय राजा थे उनके समान न्यायप्रिय राजा इस संसार में आज तक नही हुआ । एक समय की बात है जब चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में आधी रात को एक महिला न्याय मांगने आई ।
महिला - न्याय किजिये महाराज न्याय किजिये ।
सम्राट विक्रमादित्य - शांत बताईये देवी क्या हुआ है आपके साथ ।
महिला - मेरे पति की हत्या हुई है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - किसने की है आपके पति की हत्या ।
वराहमिहिर जी - क्षमा करे चक्रवर्ती सम्राट में देवी से कुछ पूछना चाहता हूँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य ।
वराहमिहिर जी - देवी अगर में भूल नही कर रहा हूँ तो आप इस राज्य की नही है ।
महिला - हाँ में पडोसी राज्य की हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी फिर तो आपको सबसे पहले अपने राज्य के राजा के पास जाना चाहिए अगर वो न्याय नही कर पाए तो हम करेंगे ।
महिला - क्योंकि सम्राट जिस तीर से मेरे पति की हत्या हुई है वो तीर आपके राज्य का है ।
सम्राट विक्रमादित्य तीर को अपने हाथ में लेते हैं और कहते हैं यह तो राजकीय तीर है इसे रखने का अधिकार तो केवल मंत्री गण को है । देवी न्याय निष्पक्ष होगा उज्जैनी इस संसार में न्याय की नगरी है , आप न्याय के मंदिर से खाली हाथ नहीं जाएगीं ।
सम्राट विक्रमादित्य - अपने मंत्रियों से कहते हैं बताइये यह किसका तीर है ।
मंत्रीगण - नही सम्राट यह तीर हम में से किसी का नही है ।
सम्राट विक्रमादित्य तीर बनाने वाले लोहार के पास जाते हैं और उस से पूछते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - बताओ लोहार किसके लिए बनाया है आपने यह तीर ।
लोहार -सम्राट यह तीर तो मैनें महारानी जी के लिए बनाया था ।
सम्राट विक्रमादित्य महारानी चित्रलेखा के पास जाते हैं जहाँ वे शस्त्रा अभ्यास कर रही थी ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप यहाँ , आने का कोई विशेष कारण ।
सम्राट विक्रमादित्य - अत्यंत विशेष कारण है ।इस तीर को पहचानती है आप ।
महारनी चित्रलेखा - हा हा यह तीर तो हम ने ही बनवाया था दो दीन पहले हम अभ्यास के लिए शिकार पर गये थे वहीं यह तीर हमने एक जंगली पशु पर चलाया था , किंतु आश्चर्य की बात है कि ना हमें वहाँ कोई पशु मिला ना हमारा तीर परंतु आपको यह तीर दो दिन बाद कैसे मिल गया ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी जब तक तीर का निशाना अचूक ना हो तब तक इस जहरीले तीर का उपयोग नही कर ना चाहिए ।
महारानी चित्रलेखा - क्यों ऐसा क्या हुआ तीर चलाने से ।
सम्राट विक्रमादित्य - बंदी बना लिया जाए इन्हें । हत्यारी है आप ।
महारानी चित्रलेखा - किंतु हमने किया क्या है ?
सम्राट विक्रमादित्य - आपने एक मनुष्य की हत्या की है ।
न्याय की देवी राजा भोज से कहती है ।
देवी - राजन सम्राट विक्रमादित्य ने जो किया वो सही था या गलत और बिना कोई सबूत के उन्हें बंदी बना लेना क्या उचित है ।
राजा भोज - सम्राट विक्रमादित्य ने सही किया देवी । न्याय का सिद्धांत यही कहता है जिस पर भी शक हो उसे बंदी बनाया जाए । और महारानी के विषय में तो यह और भी जरूरी हो जाता है ।
देवी - क्यों ?
राजा भोज - क्योंकि अगर वो उन्हें बंदी बनाए बिना जांच करते तो भी निष्पक्ष जांच के बाद भी जनता पुरी तरह संतुष्ट नही होती ।
देवी - हमें खुशी है आपके और सम्राट विक्रमादित्य के विचार मिलते जुलते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य कारागृह में जाते हैं महारानी से मिलने ।
सम्राट विक्रमादित्य - पुरी घटना बताए हमें ?
महारानी चित्रलेखा - रात्री का समय था जब हम शिविर में सो रहे थे तभी कुछ आवाज आई हमनें सोटा कि कोई पशु होगा , हमनें आवाज की और तीर छोड दिया मगर जब हम ने देखा तब ना हमें हमारा तीर मिला ना ही कोई पशु ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर आपने मकरंद को मार दिया जो कि एक मनुष्य था ।
महारानी चित्रलेखा - हमसे भूल हो गई सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपसे भूल नही आपसे अपराध हुआ है ।
महारानी चित्रलेखा -स्वामि ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस समय हम आपके स्वामि नही एक राज धर्म से बंधा राज्य का सम्राट खडा है । बोलिए क्या कहना चाहती है आप ।
महारानी चित्रलेखा - हम बस यह कहना चाहते हैं कि न्याय करते समय हमारे महाराज का हृदय कही कोमल ना पड जाए । महाराज आप न्याय पुरा कीजियेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य दरबार बुलाते हैं और कुमार की पत्नी और पिता और बच्चे को बुलाते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी आपके पति का हत्यारा मिल चुका है अब आपको न्याय मिलने में देरी नही लगेगी ।
देवी - कौन है वो निर्दयी, सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - सेनापति पेश किया जाए हत्यारे को ।
देवी - धन्यवाद सम्राट । एक नारी होकर तुमने मेरा सुखी जीवन क्यों उजाडा क्या पाया तुमने उन्हें मार कर ।
महारानी चित्रलेखा - बहन आज तक दुनिया में किसी को भी किसी को मार कर कुछ हासिल नही हुआ ।
देवी - झूठ बोलती हो तुम हत्यारी ।
महारानी चित्रलेखा - अगर झूठ ही बोलना होता तो कभी सच ना बोलती । मैं ही हूँ आपकी हत्यारी जिसने आपके सुखी जीवन में आग लगाई । सम्राट मुझे कठोर से कठोर दंड दिजिये ।
देवी - सम्राट इसे दंड देकर मेरे साथ न्याय करिए सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - बोलिये क्या न्याय चाहिए आपको इस हत्यारी को आजीवन कारावास दे या मृत्यु दंड ।
देवी - नही सम्राट मृत्यु दंड तो इस हत्यारी के लिए बहुत छोटा दंड होगा में चाहती हूँ आप इसे आजीवन विधवा होने का दंड दे ताकि इसे पता चले ।
महारानी चित्रलेखा - नही बहन ऐसा मत कहिए हमे दंड दिजिए हमारे पति को नही ।
और महारानी चित्रलेखा बेहोश हो जाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको अवश्य न्याय मिलेगा आपके हाथों में वही तीर होगा और आपके सामने इनका पति होगा ।
मगर आज यह इस कथा से यह बात पता चलती है कि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य कितने सच्चे थे उन्होंने निष्पक्ष न्याय किया वही महारानी चित्रलेखा भी धर्म की रक्षिका थी जिन्होंने सत्य का साथ दिया वही आज के नेता या आज का समाज होते तो कभी निष्पक्ष न्याय नही होता ।
सम्राट विक्रमादित्य - इन्हें न्याय के लिए धनुष और वहीं बाण दिया जाए ।
देवी - सम्राट बताए मेरा अपराधी कौन है में अभी उसे मारना चाहती हूँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी देवी !
सम्राट विक्रमादित्य सिंहासन से उठते हैं और कुमारनी के सामने जाते हैं और कहते हैं आपका अपराधी आपके सामने खडा है देवी अपना न्याय पुरा किजिये ।
कुमारनी चोक जाती है और बाण उठाती है और सम्राट विक्रमादित्य की जगह उपर छत पर बाण छोड देती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या किया देवी आपने ।
देवी - सम्राट में आपकी पत्नी के अपराध का दंड इस उज्जैनी की प्रजा को नही दे सकती ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर देवी आपके न्याय का क्या होगा । और हमारे न्याय दिलाने के वचन का क्या होगा ।
देवी - सम्राट हमारा न्याय आप पर ऋण रहा और आपकी इस पुरी उज्जैनी पर हमारा न्याय ऋण रहा । अब हम चलते हैं अपने राज्य ।
।। न्याय की देवी राजा भोज से ।।
न्याय की देवी - तो देखा आपने राजन चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की न्यायशीलता को, न्याय कलंकित ना हो इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी तक को बंदी बना लिया , अपने बहुमुल्य जीवन तक की परवाह नही कि वह समस्त उज्जैनी के भविष्य को दाव पर लगा दिया । ऐसा न्याय केवल वो ही कर सकते हैं दूसरा कोई नही ।
राजा भोज - क्षमा कीजिएगा देवी जिसे आप न्याय कह रही है वो न्याय नही है , न्याय का मतलब होता है न्याय मांगने वाले का भला । मगर इस न्याय से तो सुनंदा का कोई भला हुआ ही नही । उल्टा उसने तो सम्राट के साथ साथ पुरी उज्जैनी का भला कर दिया ।
ऐसी परिस्थिति में तो उन्हें राजमुकुट उतारने को मजबूर कर दिया होगा ।
न्याय की देवी - सही कहा आपने मगर गंभीरता को सहजता में बदलना सम्राट भली भांति जानते थे ।
वापस कथा की और लौटते हैं
सम्राट विक्रमादित्य राजमुकुट उतार कर सिंहासन पर रखते हैं और सिंहासन बत्तीसी को हाथ जोडते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी आज से हम उज्जैनी के सम्राट नहीं रहे आज से आपके हाथों में होगी इस राज्य की भागडोर आप संभालेंगे ।
वराहमिहिर जी - नही सम्राट नही यह संभव नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी इस संसार में कुछ भी असंभव नही है बस मन में संकल्प होना चाहिए उसे पुरा करने का ।
वराहमिहिर जी - में आपका स्थान कैसे ले सकता हूँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपने सही कहा क्योंकि अब हम साधारण प्रजा है और तब तक रहेगें जब तक उस स्त्री के ऋण को चुका ना ले । अब आज्ञा चाहते हैं हम ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी पत्नी महारानी चित्रलेखा से मिलने जाते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट यह सब आप क्या कर रहे हैं । जब से हमें यह सब पता चला है तब से हम आपकी प्रतिक्षा कर रहे हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब से इस राज्य के सम्राट नही है हम महारानी । हम ने वही किया जो एक राजा को करना चाहिए ।
महालानी चित्रलेखा - मगर हमारी गलती की सजा आप खुद को क्यों दे रहे हैं आप हमें सजा दिजिये।
सम्राट विक्रमादित्य - अब आप इस अपराध से मुक्त हो चुकी है महारानी अब जो भी करना है हमें करना है । हमें मकरंद बन कर उस परिवार की सहायता करनी होगी वह उन्हें न्याय दिलाना होगा ।
महारानी चित्रलेखा - महाराज आप एक आदर्श पति है ।
सम्राट विक्रमादित्य - चलते हैं ।
तभी महारानी चित्रलेखा उन्हें गले लगा लेती है तब सम्राट विक्रमादित्य कहते हैं आपका सुख हमारा सुख आपका दुख हमारा दुख आपकी अच्छाई हमारी अच्छाई आपकी आपका अपराध हमारा अपराध । महारानी अब हम तभी आएगें जब उन्हें न्याय दिला देंगे ।
वही कुमार मकरं के घर में उसकी बहन का ससुर आता है वह सबंध तोड देता है और कहता है आपकी और हमारी कोई बराबरी नही आपका बेटा मकरंद मर गया है अब कौन है आपके यहाँ कमाने वाला हम तुम्हारी बेटी से रिश्ता तोड ते हैं । दुख का अंबार कुमारनी के घर में आ गया था जहाँ एक और उसका पति मकरंद मर गये था वही दूसरी और उसकी ननद का रिश्ता भी टूट चुका था । तभी वहा पर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आते हैं ।
कुमारनी सुनंदा - आपने मेरी चौखट पर पैर रखने का साहस भी कैसे किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपका ऋण चुकाने आए हैं आपकी सहायता करने आए हैं ।
कुमारनी सुनंदा - पहले घाव देते है फिर मरहम लगाने आते हैं नही चाहिए हमे आपकी सहायता । आपकी पत्नी ने जो घाव दिया है आप उस पर नमक छिडकने आए हैं चले जाइए आप यहाँ से ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी हम आप से हाथ जोड कर कहते हैं हमें आपकी सहायता करने दिजिये ।
कुमारनी सुनंदा - अगर आपको सच में हमारी सहायता करनी है तो लौटा दिजिये मुझे मेरा पति और अगर आप नहो लौटा सकते तो चले जाइये यहां से ।
तभी सम्राट बाहर आते हैं गांव के लोग सम्राट से कहते हैं भाइयों यही है वो आदमी जिसने एक नौजवान युवक की हत्या की और हत्या का बदला मृत्यु दंड है । इसलिए हमें इसे मारना होगा ।
न्याय की देवी राजा भोज से कहती है ।
राजन् यह कैसा न्याय था जिसने सम्राट को अपराधी बना दिया । विक्रमादित्य ने त्यागा अपना राजपाट मगर मुझे सम्राट का न्याय का यह तरीका पंसद नही आया । वे चाहते तो उस परिवार को अपार धन दे सकते थे उस परिवार में धन कमाने वाला मरा था तो उसे धन दे सकते थे सम्राट ।
राजा भोज - देवी वे धन नहीं दे सकते थे ।
देवी - क्यों उनके पास अपार धन था वे सम्राट थे ।
राजा भोज -परंतु वह धन नहीं दे सकते थे क्योंकि वह धन उनका नही था उज्जैनी की प्रजा का था और वे ऋणि केवल खुद थे इसलिए वे खुद सहायता करने गये ।
देवी - मगर उन्हें भीड को अपना परिचय दे देना था ।
राजा भोज - क्या परिचय देते की वो चक्रवर्ती सम्राट थे नही देवी वे राजपाट छोड कर आए थे । और क्रोधित भीड किसी को नही छोडती ।
भीड सम्राट विक्रमादित्य पर पथराव कर देती है । तभी सुनंदा का बेटा आता है घर पर और कहता है माँ लोग सम्राट जो पर पथराव कर रहे हैं और सुनंदा और उसका ससुर आते हैं और कहते हैं कोई नही मारेगा इन्हें अगर मदद नही कर सकते तो झूठी सहानुभूति तो ना दिखाओ और सभी चले जाते हैं ।
प्रजापति - सम्राट हम पहले से ही बहुत दुखी हैं हमारे दुख को ओर मत बडाइए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम यहाँ आपके दुख को बडाने नही कम करने आए हैं ।
प्रजापति - सम्राट आप यहाँ से चले जाइये ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें क्षमा करना मगर हम जब तक आपके परिवार के हर सदस्य के चहरे पर सुख नही देख लेते हम यहाँ से नहीं जाएगें ।
सम्राट विक्रमादित्य मिट्टी लेते हैं मेहनत करते हैं घडे बनाते हैं तभी वहाँ प्रजापति जी का पौता परम आता है और सम्राट को देखता है तभी वहाँ पर उसकी माँ सुनंदा आ जाती है और कहती है ।
सुनंदा - यह क्या है यह करके आप दुनिया को क्या दिखाना चाहते हैं कि आप न्यायप्रिय है क्या सिद्ध करना चाहते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही चाहिए हमें आपकी सहायता ।
तभी एक दिन सम्राट विक्रमादित्य गांव में घडे बेच रहे होते हैं और कहते हैं घडे ले लो घडे तभी जनता कहती हैं हमें सिर्फ मकरंद के घडों पर ही विश्वास है तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते हैं सभी को मकरंद के घडो पर विश्वास है यही कारण है कि हमारे घडे नही बिक रहे मगर हमें किसी भी हाल में घडे बेचने ही होंगे और इस परिवार के नुकसान की भरपाई करनी ही होगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - काका घडे ले लो ।
काका - हम सिर्फ मकरंद के ही घडे लेते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - काकी घडे ले लो इस से सस्ते और मजबूत घडे आपको कही नही मिलेंगे ।
काकी - घडे और मजबूत ।
सम्राट विक्रमादित्य - हाँ यह गिरने पर भी नही टूट ते ।
सम्राट विक्रमादित्य ने ऐसे घडे बनाए की सारे बिक गये और इतने पैसे आए कि बहुत सारा अनाज आ गया ।
ऐसा ठीक एक वर्ष तक सम्राट विक्रमादित्य ने किया । मगर सुनंदा ने सम्राट की सहायता नही ली और उनके लाए हुए अनाज को लेने से मना कर दिया । और कहा आप चले जाइये । तभी सम्राट कहते हैं । परम अगर इस धान की आवश्यकता होते तो इसे ले लेना ।
तभी वहाँ पर प्रजापति जी के समधी जी आ जाते हैं ।
प्रजापति - समधी जी आप मगर आप कैसे आ गये ।
समधी - उस झूठे दिखावे के लिए क्षमा करिएगा ।
प्रजापति - मगर आप तो रिश्ता तोड चुके हैं फिर बिदाई ।
समधी - हाँ । भला हो उस व्यक्ति का जिस दिन उसने हमें आग से बचाया में आग में घीर चुका था सभी से सहायता मांगी मगर उन्होंने नही की तभी वो तेजस्वी युवक आया और हमे बचा लिया । तभ मेने उसे कहा बेटा तुम ने मेरी जान बचा कर मुझ पर बहुत बडा उपकार किया । तभी उन्होंने कहा ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही काका मानव धर्म का पालन करने में उपकार कैसा । मगर हमें एक बात समझ नही आई काका यह सब गांव वाले तो आपके अपने है फिर आपको कोई बचाने क्यों नही आया ।
काका - यह सब स्वार्थी है नैकी को भूल जाते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही काका नैकी को नही भूलते मगर नैकी करने वाले को भूल जाते हैं । जैसे आपने सभी रिशते तोड दिये अपनी बहु से । एक लडकी का घर शादी के बाद ससुराल होता है आप अपनी बहु को वापस लेकर आओ ।
काका - बेटा तुम कौन हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - में उसका भाई हूँ काका । आप उसे अपने घर लेकर आओ ।
और समधी जी प्रजापति को पुरी बात बताते हैं ।
प्रजापति - कौन है वो देवता । जिसने हमारे उपर इतना बडा उपकार किया ।
समधी - वही व्यक्ति जो अभी अभी आपके यहाँ से गया । चलो बेटी अपने घर चलने की तैयारी करो ।
सुंदरी - भाभी उस व्यक्ति ने अपराध किया मगर उसने अपने सच्चे भाई का कर्तव्य निभाया ।
सुनंदा - हा सच्चे भाई का धर्म निभाया है सम्राट ने ।
न्याय की देवी राजा भोज से कहती है । सम्राट ने अपने कठीन परिश्रम से सुंदरी की डोली तो उठ गयी मगर अभी परिवार के उपर दुर्भाग्य बना हुआ था मुसीबत बरकरार थी ।
उसी रात सभी गांव वासी प्रजापति के घर आते हैं । प्रजापति याद है ना आज ब्रहम दत्त के यहाँ भोजन बन ने की बारी आपके घर से है , जी सरपंच जी में चलता हूँ आपके साथ ।
सरपंच- नही प्रजापति अगर तुम्हें ले जाएंगे तो ब्रहम दत्त हम सबको मार डालेगा उसे नौजवान युवक चाहिए आपके पौते को ले जाएंगे ।
प्रजापति - नही मैं इस बच्चे को नही दूंगा ।
सरपंच - इस बार बलिदान देने में आपकी बारी है ।
तभी प्रजापति का पौता चलने के लिए तैयार होता है और आगे बढता है उसकी माँ सुनंदा उसे रोकती है मगर फिर वो जाता है । गांव वासी उसे राक्षस के यहाँ छोड आते हैं । परम की माँ और उसका दादा बाहर रोते हैं सभी गांव वासी भी वही रहते हैं ।
गुफा में राक्षस को देख कर परम डर जाता है तभी वहाँ पर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आ जाते हैं फरसा लेकर और कुछ देर युद्ध के बाद सम्राट विक्रमादित्य उस राक्षस को मार देते हैं । परम गुफा से सही सलामत वापस बाहर आता है सभी चौक जाते हैं और आश्चर्य करने लगते हैं । तभी सुनंदा पूछती है बेटा तुझे किसने बचाया , परम कहता है उनहोंने , उनहोंने मुझे तो बचाया ही साथ ही पुरे गांव वालो को भी बचा लिया हमेशा के लिए उस राक्षस से ।
तभी सम्राट विक्रमादित्य आते हैं । सुनंदा हाथ जोड कर सुनंदा कहती हैं ।
सुनंदा - अब तो मैं आपसे क्षमा माँगने योग्य भी नही रही , घृणा का यह उपकार आप सच में महान है सम्राट , यह जानते हुए भी मेरे हृदय में आपके लिए कितना क्रोध है फिर भी आपने मेरे बच्चे की रक्षा की । में आपकी ऋणी हो गयी आपने सच में हमें न्याय दे दिया सम्राट । अब मुझे यह कहने में तनिक भी शंका नही है कि आपके जैसा सम्राट ना कभी हुआ है ना कभी होगा । आप इस संसार में एक अकेले न्यायप्रिय राजा है । आपके सच्चे न्याय पर इस संसार में कोई सवाल नही उठा सकता ।
।। क्या कभी देखा है ऐसा कोई भी राजा जो न्याय दिलाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सके , इस संसार के सर्वश्रेष्ठ राजा थे इसमें तनीक भी शंका नही है , सम्राट विक्रमादित्य को अपने जीवन में उतारना चाहिए ।।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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