दूसरा गुण त्याग
।। दूसरा गुण त्याग ।।
सम्राट विक्रमादित्य की पत्नी महारानी चित्रलेखा महाराज का चित्र बना रही होती है तभी वे देखती है महाराज का मन और कही है तभी वे कहती हैं महाराज आप विश्राम के समय में भी हमें समय नही दे रहे , क्या आप नही चाहते हम आपका यादगार एक और अमर चित्र बनाएं ?
महाराज विक्रमादित्य - महारानी चित्रलेखा यह आप क्या कह रही है कि हम आपको समय नही दे रहे हम तो पिछले एक पहर से आपके साथ हैं ।
महारानी चित्रलेखा - हाँ पर आपका मन तो यहा नही है ।
महाराज - आप तो जानती है महारानी हमें किस बात की चिंता रहती है कहीं हमारी प्रजा को कोई नुकसान ना हो जाए ।
महारानी - महाराज आप चिंता ना करे पुरे राज्य में शांति है किसी को कोई भी चीज की कमी नही है ।
तभी वहा पक्षियों की आवाज आती है ।
महारानी - क्या हुआ महाराज ।
महाराज - क्या आपको कोई आवाज सुनाई दे रही है ।
महारानी - नहीं महाराज ।
महाराज - हमें किसी के रोने की आवाज आ रही है पक्षियों के विलाप का स्वर ।
और विक्रमादित्य निकल पडते है । वे जंगल में पहुंच कर पक्षियों से कहते हैं । हे पक्षियों आप क्यों रो रहे हो हमारे राज्य में किसी भी चीज की कमी नही है पक्षी से लेकर मनुष्य तक सभी खुश हैं संतुष्ट हैं । तभी सभी पक्षी अपने असली रूप में आते हैं दरअसल वे सभी ऋषि मुनि रहते हैं।
महाराज विक्रमादित्य - प्रणाम ! ऋषिवर ।
ऋषि मुनि - प्रणाम महाराज ।
महाराज - आप सभी की आखों में आसूं और स्वर में उठे दर्द का कारण क्या है ।
ऋषि - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हमारे आसूं की वजह है महादानी ऋत्विक ध्वज उनकी कल मृत्यु होने वाली है ।
महाराज विक्रमादित्य - मृत्यु तो अटल सत्य है फिर सत्य का विलाप क्यों ।
ऋषि - महाराज ऋत्विक ध्वज की मृत्यु साधारण मृत्यु नही है उनकी मृत्यु का कारण दान है वे लहू बहा कर धन अर्जित कर दान कर देते हैं ।
महाराज - किंतु ऋषि गण वे इतने कष्ट सहन कर धन को दान क्यों कर देते हैं ।
ऋषि - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप ही उन्हें बचा सकते हैं ।
महाराज विक्रमादित्य - हम बचाएंगे ऋत्विक ध्वज को ।
सम्राट विक्रमादित्य महल लोट कर आचार्य वराहमिहिर जी से पूछते हैं ऐस विषय पर वे कहते हैं महाराज आपके कथन अनुसार मैंने एक प्रश्न कुंडली तैयार की है जिसके अनुसार ऋत्विक ध्वज पिछले जन्म में गरीबों पर अत्याचार करता था । मगर आचार्य जी ऋत्विक ध्वज इस जन्म में इतना दानी कैसे ? सम्राट इश्वर सभी को अपनी गलती सुधारने का मौका अवश्य देता है और ऋत्विक ध्वज ने इस मौके का फायदा उठाया और परिणाम आपके सामने है । उसके निच कर्मों के बावजूद इश्वर ने उसे मनुष्य जन्म दिया मोक्ष प्राप्त करने के लिए । इसलिए वो प्रत्येक पूरण मासी को 10 हजार सवर्ण मुद्राएँ दान करता है ताकि वह अपने पिछले जन्म के पापों से मुक्त हो जाए ।
महाराजा विक्रमादित्य - मगर प्रश्न यह उठता है कि वो 10 हजार सवर्ण मुद्राएं लाता कहा से है ।
सेनापति - सम्राट आपकी आज्ञा अनुसार जब मैनें ऋत्विक ध्वज के बारे में पता किया तो पता चला कि उसने माँ काली की जोगनियो को सिद्ध कर रखा है जो उसे भयंकर यातनाओं के बदले में 10 हजार सवर्ण मुद्राएँ देती है ।
अगली पोस्ट में सम्राट विक्रमादित्य ऋत्विक ध्वज को बचाने निकलते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य ऋत्विक ध्वज को ढूंढने निकलते है । वही ऋत्विक ध्वज माँ काली की जोगनियों को जगाते है , जोगनिया प्रकट होती है ।
ऋत्विक ध्वज - प्रणाम देवी हमें धन दिजिये ।
जोगनियां - ऋत्विज ध्वज हम ने तुम्हें मना किया था कि धन के लिए यहाँ मत आना यह जानते हुए की तुम्हारा जीवन संकट में पड सकता है ।
ऋत्विक ध्वज - देवी में धन के लोभ में नही आया हूँ मैं धन प्राप्त कर लोगों के संकट दूर करना चाहता हूँ ।
जोगनियां - तुम धन प्राप्ति की शर्त जानते हो ऋत्विक ध्वज तुम 100 कोडे नही सह पाओगे तुम निर्बल हो चुके हो ।
ऋत्विज ध्वज - केवल शरीर से मन से नही देवियों आप प्रांरभ किजिये ।
वही सम्राट विक्रमादित्य ऋत्विक ध्वज को खोजते हुए आते हैं ।
ऋत्विक ध्वज 100 कोडे खाते ही घायल हो जाते हैं वहीं धन की देवी धन को पोठली ले आती है मगर ऋत्विक ध्वज बिल्कुल चल नही पाते और देवी चली जाती है । वही सम्राट विक्रमादित्य पहुंच जाते हैं ऋत्विक ध्वज से कहते हैं।
सम्राट विक्रमादित्य - मित्र ऋत्विक ध्वज चिंता मत करो हम आ गये हैं आपको मुक्ति अवश्य मिलेगी ।
" राजा भोज राजा विक्रमादित्य की कहानी सुनते हुए त्याग की देवी से कहते हैं , देवी ऋत्विक ध्वज दुर्भाग्य शाली रहा इस जन्म में भी उसकी मुक्ति नही हो पाई , ऐसा मत कहिए राजन् ऋत्विक ध्वज सौभाग्यशाली है जिसे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जैसा मित्र मिला अब वह स्वंय उसे मुक्ति दिलवाएंगे "
ऋत्विज ध्वज - सम्राट मेरे प्रशाचित अधूरा रह गया ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही मित्र हम है ना हम लांएगे आपके लिए स्वर्ण पोठली , लेकिन इसके बदले में आपको हमें वचन देना होगा हमारे लोटने तक आप जीवित रहेंगे, हम अवश्य लोट कर आएंगे ।
ऋत्विक ध्वज - दिया वचन सम्राट ।
जोगनियां - रूक जाओ मत जाओ उस अग्नि कुंड में , वापस नही लोट पाओगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - जाना अनिवार्य है देवी । और लोटना के बारे में प्रवेश के बाद सोंचेगे ।
जोगनियां - इतनी प्रिय है मृत्यु ।
सम्राट - मृत्यु प्रिय नही है देवी प्रिय है मित्र का जीवन और उन्हें दिया हुआ वचन , आपसे एक विनती है देवी हमारे लोटने तक आप ऋत्विक ध्वज के जीवन की रक्षा करिएगा ।
जोगनिंया - किंतु एक बात ध्यान रखिएगा की ऋत्विक ध्वज का जीवन कल के सूर्यास्त तक का है । सम्राट विक्रमादित्य - सूर्य देव अस्त नही होंगे जब तक हम लौट कर नही आ जाते यह हमारा संकल्प है । और सम्राट विक्रमादित्य अग्नि कुंड में प्रवेश करते हैं ।
एक जोगिनी दूसरी जोगिनी से कहती है क्या सम्राट इतने महान है कि सूर्य भी उनके ही आदेश पर चलते हैं , दूसरी जोगिनी हाँ विक्रमादित्य इतने महान है और इतने धर्मात्मा कि देवता भी उनकी बातों को अपने मन से मानते हैं विक्रमादित्य संसार के सबसे महान राजा थे ।
" कहानी सुनते हुए राजा भोज को त्याग की देवी कहती हैं क्षत्रिय वही जिसमें हो निर्भयता की आग राजा सबसे श्रेष्ठ वहीं जिसमें हो तप और त्याग और वैसें राजा इस संसार में सिर्फ एक है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य , राजा भोज कहते हैं उनके यही गुण उन्हें संसार में अमर बनाते हैं "
सम्राट विक्रमादित्य के अग्नि कुंड में प्रवेश करते ही एक राक्षस उनके सामने आता है कई देर तक युद्ध करने के बाद सम्राट विक्रमादित्य उस राक्षस को मार गिराते है दरअसल वह राक्षस स्वर्ण लोक का द्वारपाल होता है वह कहता है आपका स्वागत है पराक्रमी राजन् । लोक के अंदर प्रवेश करते ही सम्राट विक्रमादित्य कहते हैं यह आप हमें कहा ले आए यह तो इतना क्रूर लोक हैं यहाँ तो लोगों को पीटा जा रहा है क्या यही स्वर्ण लोक है , हाँ राजन् सोने की चमक और लालच इन्हे यहाँ लेके आए और यह सब अब यक्ष राज के अधीन है आप भी अब इन्हीं के साथ रहेंगे और ऐसा कहते ही विक्रमादित्य के हाथों को हथकडी से बांध देते हैं और कहते हैं सम्राट यहाँ आपके काम , क्रोध , लोभ , मोह सब कि परीक्षा होगी , और यक्ष राज के सामने सम्राट विक्रमादित्य को लाया जाता है ।
यक्ष राज - आज हमें अति प्रसन्नता है यह देख कर की आज हमारा वाहन होगा प्रथ्वी लोक का एकलौता चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । राजन् बदले में तुम्हे अताह धन दूंगा । रथ खींचो हमारा ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम यहां धन के लालच में नहीं आए हैं यक्षराज ।
यक्षराज - प्रत्येक लोभी यही कहता है सम्राट आओ रथ खींचो हमारा तभी तुम्हारी मुक्ती होगी ।
सम्राट विक्रमादित्य मन में यह सोचते हैं हमें ऋत्विक ध्वज के मोक्ष के लिए यह करना ही होगा । और सम्राट विक्रमादित्य यक्षराज का रथ खींचते हैं तभी रथ में आग लग जाती है और यक्ष राज चिलाते है सम्राट हमारी रक्षा किजिये और सम्राट उन्हें बचा लेते हैं ।
यक्षराज - हमें क्षमा कर दिजिये चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हमसे गलती हो गई महाराज । मैं जान गया हूँ सम्राट आपको धन का लोभ नही है क्योंकि धन का देवता तो उसी की सवारी कर सकता है जिसे धन का लोभ हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - यक्षराज हम तो यहाँ अपना वचन पुरा करने आए हैं वह किसी के प्राणों की रक्षा करने आए हैं । हम यहाँ स्वर्ण पोटली लेने आए हैं ।
यक्षराज - जी सम्राट हम आपका उद्देश्य समझ गये हैं बडते जाइये राजन् आपको आपका मार्ग स्वयं मिलेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपका बहुत बहुत धन्यवाद यक्षराज ।
इधर ऋत्विक ध्वज की हालात खराब होती जा रही थी । वही सम्राट विक्रमादित्य स्वर्ण पोटली के करीब पहुंच रहे थे । यक्षराज के दिखाए मार्ग पर पहुंच ते ही सम्राट विक्रमादित्य को एक तीतली दिखती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कही यह तितली ही तो नहीं जो हमें मार्ग दिखाएगी ।
सम्राट उस तितली के पीछे जाते हैं तभी वह तितली अति सुन्दर काम वासना की देवी कामिनी होती है ।
त्याग की देवी राजा भोज से कहती है - राजन् बताइये यह कौन सी माया थी ।
राजा भोज - देवी यह उनके काम वासना की परीक्षा थी , काम से तो बडे बडे देवता और ऋषि मुनि तक पराजित हो गये , मनुष्य किसी भी बाधा को जीत सकता है किन्तु काम को जितना असंभव है काम को केवल चरित्र वान पुरुष ही जीत सकता है । और यदि सम्राट विक्रमादित्य का मन त्यागि होगा तो वे अवश्य जीतेंगे ।
काम की देवी कामिनी - आपका स्वागत है विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप हमें कैसे जानती है देवी ?
कामिनी - आपको कौन नही जानता में बरसों से आप जैसे पराक्रमी की प्रतिक्षा की है । क्या आप सब कुछ त्याग कर मुझे अपनाएंगे विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी त्याग केवल अपनी खुशी नही होती हजारों की खुशीयां वह समाज का कल्याण छुपा होता है ।
कामिनी - ऐसी बाते कर के मेरा हृदय ना दुखाए विक्रमादित्य , मुझे अपनाकर मेरी बरसों की ख्वाहिश पुरा कीजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - असंभव है यह ।
कामिनी - किंतु क्यों विक्रमादित्य क्या मैं सुंदर नही हूँ ? मुझ में क्या कमी है ?
सम्राट विक्रमादित्य - देवी आप बहुत सुन्दर है और कमी वो देखते हैं जिनसे जिनका स्वार्थ होता है हमारा स्वार्थ आपसे नही हमारे उद्देश्य से जुडा हैं देवी ।
कामिनी - में आपका उद्देश्य जानती हूँ आप यहाँ स्वर्ण पोटली के लिए आए हैं । आप हम से विवाह कर लिजिए में आपको स्वर्ण पोटली दूँगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें स्वर्ण पोटली आपकी कृपा से नहीं अपने पराक्रम से प्राप्त करनी है ।
और सम्राट विक्रमादित्य वहाँ से चले जाते हैं तभी वहाँ देवी कामिनी आकर पुष्पों की वर्षा करती है सम्राट विक्रमादित्य पर , तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते हैं - देवी क्षमा करो पर ऐसा व्यवहार करके हमें लज्जित ना करो ।
कामिनी - में आपको लज्जित नही कर रही में तो आपसे विनती कर रही हूँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपकी विनती बेकार जाएगी । हम विवाहित है और हम प्रेम केवल अपनी पत्नी से करते हैं ।
तभी वहाँ पर कुछ सैनिक आकर देवी कामिनी को घेर लेते हैं । सम्राट विक्रमादित्य आपनी तलवार निकाल लेते हैं वह सभी को मार गिरा ते हैं और देवी की रक्षा करते हैं ।
त्याग की देवी राजा भोज से कहती है लगता है सम्राट विक्रमादित्य उस देवी की और आकर्षित हो गए रूप ने अपना काम कर दिया था ।
राजा भोज - नही देवी ऐसे त्यागी पुरूष के बारे में ऐसा ना कहे , सम्राट विक्रमादित्य ने अपना धर्म निभाया ।
त्याग की देवी - धर्म कैसा धर्म ।
राजा भोज - हाँ देवी धर्म उन्होंने स्त्री रक्षा कर अपने धर्म का पालन किया । और स्त्री रक्षा करना हर किसी के बस की बात नही है स्त्री रक्षा वही कर सकता है जिसकी अपनी इंद्रियों पर वश हो ।
वही काम की देवी विक्रमादित्य को कहती है - सम्राट आपका धन्यवाद ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी आप हमें मार्ग दिखाए स्वर्ण पोटली प्राप्त करने का ।
कामिनी अवश्य सम्राट किंतु वहा आपके जीवन पर संकट भी हो सकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें अपने प्राणों की चिंता नही है देवी हमें महान दानी ऋत्विक ध्वज के प्राणों की चिंता है ।
कामिनी - मगर सम्राट ऋत्विक ध्वज से बडे त्यागी तो आप है । इसलिए आपके गुणों ने आपका मार्ग प्रशस्त किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी देवी ।
कामिनी -जहाँ बंद हो रास्ता वही से मिलेगा आपको मार्ग ।
सम्राट विक्रमादित्य -धन्यवाद देवी ।
सम्राट विक्रमादित्य आगे बडते चले जाते हैं तभी वहाँ उन्हें मार्ग बंद दिखता है उन्हें देवी की बात का स्मरण होता है कि उन्होंने कहा था जहाँ मार्ग बंद होगा वही पर उन्हें रास्ता मिलेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - स्वर्ण लोक का रास्ता इस झरने के भीतर है । सम्राट उस झरने में जैसे ही प्रवेश करते हैं झरने में प्रवेश करते ही बंजर भूमि उन्हें दिखती है वहा एक सुखे वृक्ष पर स्वर्ण पोटली नजर आती है सम्राट उस वृक्ष की और दोडे चले जाते हैं । तभी वहां भूकंप आता है और भूमि अंदर चले जाते हैं ।
त्याग की देवी राजा भोज से कहती है सम्राट विक्रमादित्य असफल रहे राजा भोज ।
राजा भोज - नही देवी यह उनकी आखिरी परीक्षा थी जिस व्यक्ति ने हमेशा दूसरों की रक्षा की हो औस व्यक्ति पर संदेह निराधार है । देवी जिस व्यक्ति में दूसरों के लिए प्राण त्याग ने की हिम्मत होती है वो कभी मरता नही अमर हो जाता है उसका नाम ।
और सम्राट विक्रमादित्य मृत्यु से भी जीत कर आ जाते हैं और स्वर्ण पोटली को अपने हाथ में ले लेते हैं ।
तभी वहां स्वर्ण लोक की राजकुमारी यक्षिणी आ जाती है और कहती है -सम्राट इस स्वर्ण पोटली को रख दिजिये यह पोटली इस लोक का आधार है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्षमा करिएगा देवी हम स्वर्ण पोटली को नही दे पाएंगे यह पोटली किसी के जीवन का आधार है, आप हमें ऐसा मार्ग दिखाए जिस से यह स्वर्ण पोटली भी हम लेजा सके और इस स्वर्ण लोक का भी अंत ना हो ।
देवी यक्षिणी - तो आप अपना शीश स्वर्ण पोटली के स्थान पर रख दिजिये । क्योंकि जिस प्रकार शीश शरीर आधार होता है उसी तरह पोटली इस लोक का आधार है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी यह लिजिए स्वर्ण पोटली इसे आप हमारे मित्र को दीजिएगा हम स्वर्ण लोक और हमारे मित्र की रक्षा के लिए अपना जीवन त्यागेएंगे ।
देवी यक्षिणी - अवश्य सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे परम पिता परमात्मा आप साक्षी है हमारे प्राणों के त्याग के ।
सम्राट अपनी तलवार निकालकर अपने मस्तक पर रखते हैं तभी देवी उन्हें रोकती है सम्राट रुकिये यह तो आपकी परीक्षा थी आप सफल हुए लेजाईये स्वर्ण पोटली । सम्राट आप संसार के सर्वश्रेष्ठ त्यागी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद देवी ।
महराजा विक्रमादित्य तुरंत अग्नि में से प्रकट होकर लौटते हैं स्वर्ण पोटली के साथ ।
सम्राट विक्रमादित्य ऋत्विक ध्वज से कहते हैं ।
सम्राट विक्रमादित्य - मित्र आखे खोलिए , हमने कहा था हम आएगें ।
तभी ऋत्विक ध्वज जाग जाते हैं और ऋत्विक ध्वज कहते हैं धन्यवाद मित्र में लोगों दान देता हूँ और मुझे आपने जीवन दान दिया ।
माँ काली की जोगनीया कहती हैं चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप संसार के सर्वश्रेष्ठ त्यागी है आपसे बडा तयागी धरती पर आज तक कोई नही हुआ ना भविष्य में होगा । जिस तरह देवों में देवेंद्र श्रेष्ठ है उसी प्रकार मनुष्यों में आप नरेंद्र होंगे अर्थात मनुष्यों में इंद्र ।
त्याग की देवी राजा भोज से कहती है - तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जो दूसरों के सुख के लिए अपने प्राणों के त्याग करने में भी पीछे नही हटते थे ।
अगली पोस्ट में तीसरा गुण
।। जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।।
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