सातवा गुण उत्तरदायित्व
।। सातवा गुण उत्तरदायित्व ।।
उत्तरदायित्व के गुण की देवी राजा भोज को चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की कथा सुनाती है । एक समय की बात है जब सम्राट विक्रमादित्य के राज्य पर भीलों का आक्रमण बढने लग गए थे प्रजा डर रही थी और सम्राट चिंतित थे । राजा भोज - सम्राट विक्रमादित्य चिंतित थे । देवी - सम्राट के सामने यू तो कोई भी योद्धा नही जीत सकता था मगर भीलों के आक्रमण करने का तरीका अलग था वे केवल भालों से आक्रमण करते थे सम्राट ने उन्हें कहा भी समझाया भी की युद्ध ना करे आपस में चर्चा करके युद्ध रोका जा सकता है किंतु भील सरदार विक्रमादित्य से युद्ध करना चाहता था वही सम्राट विक्रमादित्य भी युद्ध अभ्यास कर रहे थे ।
सेनापति - सम्राट विक्रमादित्य छोटा मुह बड़ी बात आप जिस प्रकार से भालों से शब्दभेदी युद्ध कर रहे है ऐसा तो भील भी नही कर सकते पानी मांगेंगे रणभूमि में वो ।
सम्राट विक्रमादित्य - सेनापति यदि हमारी पुरी सेना इसी तरह युद्ध करे तो हमारा जितना तय है ।
सैनिक - सम्राट एक ब्राह्मण आपके दर्शन करना चाहता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - सुबह सुबह एक ब्राह्मण का हमारे महल आना यह तो सुख योग है शुभ संकेत है हम अकेले नही महारानी के साथ उनका दर्शन करेंगे आप ब्राह्मण देवता को आसन दिजिए हम अभी आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा दोनों ब्राह्मण देव और उनकी पत्नी का स्वागत करने जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम ब्राह्मण देवता कृपया आसन गृहण करे ।
ब्राह्मण देव - सम्राट विक्रमादित्य राजा तो प्रजा का पालक होता है प्रजा के सुख दूख का साथी होता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - बिल्कुल होता है ।
ब्राह्मण देव - सम्राट एक समस्या है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसी समस्या ।
ब्राह्मण देव - सम्राट में एक महत्वपूर्ण यज्ञ में हिस्सा लेने के लिए बद्रीनाथ धाम जा रहा हूं में अपने परिवार में अकेला हूं मेरे यात्रा पर जाने के पश्चात मेरी पत्नी का ध्यान रखने के लिए कोई नही है कृपया आप इनका ख्याल रखे ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी आप नही जा रही तीर्थ यात्रा पर ।
ब्राह्मण देव - सम्राट विक्रमादित्य मेरी पत्नी का स्वास्थ्य खराब है इसलिए वे हमारे साथ नही जा रही । मेरे जाने के बाद इनका ध्यान कौन रखेगा ।
महारानी चित्रलेखा - आप निश्चिंत होकर जाए हम ध्यान रखेंगे देवी का । ब्राह्मणी की सेवा करना हमारे लिए गर्व और सौभाग्य की बात है माताजी हमारी विशेष अतिथि होंगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - जी ब्राह्मण देव हम देवी का ध्यान रखेंगे , सैनिक देवी के ठहरने की उचित व्यवस्था करे महल में ।
देवी - नहीं सम्राट हम महल में निवास नही कर सकते आप हमारे रहने की व्यवस्था किसी कुटिया में करवा दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - दास देवी के रहने के लिए किसी शांत स्थान पर सर्वसुविधा युक्त कुटीया तैयार करवाए । ब्राह्मण देव आपको यात्रा के लिए कब जाना है ।
ब्राह्मण देव - सम्राट कल ।
सम्राट विक्रमादित्य - इतने समय में कुटीया तैयार हो जाएगी आप स्वंय देवी के रहने की व्यवस्था देख कर जाइएगा, और आप दोनों अभी भोजन ग्रहण करे ।
ब्राह्मण देव - आपका कल्याण हो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
अगले दिन सम्राट विक्रमादित्य - और यह रही ब्राह्मण देवी नंदिनी की कुटीया इस कुटीया को इस शांत जगह पर इसलिए बनाई ताकि देवी की पूजा अर्चना में कोई विघ्न ना आए और यह रहे देवी के सेवक तोताराम और मंगला । ब्राह्मण देव अब आप देख लिजिए कुछ भी कमी हो तो अभी बता दे ताकि हम उसे पूरा कर सके ।
ब्राह्मण देव - नहीं सम्राट आपकी व्यवस्था तो अती उत्तम है बिल्कुल आपकी तरह सब कुछ अच्छा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ब्राह्मण देव अब आप निश्चिंत होकर अपनी धार्मिक यात्रा पर जाए देवी की सुविधा का ध्यान हम रखेंगे ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् कर्तव्य और उत्तरदायित्व में अंतर क्या है सम्राट विक्रमादित्य बार बार ब्राह्मण देव से उत्तरदायित्व शब्द का प्रयोग करते है , राजा भोज - देवी आपकी जिज्ञासा का उत्तर बहुत सटीक है सुनिए कर्तव्य हम किसी से भी पूरा करवा सकते है किंतु उत्तरदायित्व केवल हमें ही पूरा करना होता है । देवी - आपने सही कहा हम जानते थे केवल आपकी परीक्षा ले रहे थे । राजा भोज - परीक्षार्थी को बिना बताए परीक्षा । देवी - राजन् बिना बताए परीक्षा लेने में ही वास्तविक ज्ञान पता चलता है जो आप में है राजन् ।
राजा भोज - जी देवी यह तो महाकाल और माँ सरस्वती का आशीर्वाद है और बाकी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की कथा से प्रेरणा मिलती है ।
राजा भोज देवी से कहते है उत्तरदायित्व एक ऐसा गुण है जिसके अनेक उदाहरण है जैसे पति-पत्नी का रिश्ता माँ बेटे का रिश्ता जो किसी भी परिस्थिति में निभाया जाता है । देवी - आपने सही कहा राजन् यह बात सम्राट विक्रमादित्य जानते थे इसलिए युद्ध का माहौल होते हुए भी सम्राट देवी नंदिनी की सारी व्यवस्थाएं स्वंय देखते थे प्रतिदिन उनके लिए भोजन लेकर जाते थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी यह रही आपके भोजन की सामग्री ।
देवी नंदिनी - सम्राट लेकिन कष्ट क्यों किया आप सारी धरती के चक्रवर्ती सम्राट होते हुए भी मेरे जैसी एक साधारण साध्वी के लिए भोजन स्वंय लेकर आते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी इस संसार में साधारण कोई नही है और आप तो हमारी अतिथि वह पूजनीय साध्वी है आपकी सेवा करना हमारा सौभाग्य है ।
सैनिक - सम्राट सम्राट !!
सम्राट विक्रमादित्य - क्या हुआ सैनिक किसने की आपकी ऐसी अवस्था ।
सैनिक - सम्राट भीलों ने दक्षिणी सीमा पर हमला कर दिया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - सैनिक इनका प्राथमिक उपचार करवाओ । देवी नंदिनी हमें इस अकासमिक आपधा से निपटने के लिए तुरंत प्रस्थान करना होगा ।
देवी नंदिनी - सम्राट विक्रमादित्य आप निश्चिंत होकर प्रस्थान करे राज्य की सुरक्षा सबसे पहले है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद देवी । तोताराम अब देवी का उत्तरदायित्व हम तुम्हारे उपर छोड़ कर जा रहे है इनका ख्याल रखना और किसी भी चीज की कभी हो तो हमारे महल से ले आना किंतु देवी की सुविधा में कोई कमी ना हो इसका विशेष ध्यान रखना ।
तोताराम - जी सम्राट में पूरा ख्याल रखूंगा ।
महल में सम्राट विक्रमादित्य महारानी चित्रलेखा को योद्धा के भेस में देख कर चौक जाते है वह कहते है महारानी आप योद्धा के वस्त्र में क्यों आई है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट भील छापा मार और भालों में निपुण है और हमारी सेना अभी इतनी तैयार नहीं है आपको अधिक से अधिक योद्धा वह कुशल नेतृत्व की जरूरत होगी इसलिए हम भी युद्ध में आपके साथ चलेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी उज्जैनी की माटी सदैव आप जैसी वीरांगनाओं को याद करेगी चलिए महारानी चित्रलेखा ।
सम्राट और महारानी के जाते ही तोताराम और मंगला दोनों कहते है कि अब ब्राह्मणी के नाम पर हम राजकोष से धन और अन्ना दोनें लेंगे ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन्एक प्रश्न है एक राजा अथवा एक व्यक्ति में कितने उत्तरदायित्व होने चाहिए । राजा भोज - एक व्यक्ति के अनेक उत्तरदायित्व होते है किंतु एक राजा का केवल एक ।
देवी - रोचक तथ्य क्या । राजा भोज - एक सामान्य व्यक्ति के लिए पुत्र से लेकर पिता और पति तक के उत्तरदायित्व होते है पर एक राजा का केवल एक पिता का प्रजा के पालन से लेकर रक्षा तक वह शिक्षा से लेकर न्याय तक सबके लिए राजा अकेला उत्तरदायी होता है । देवी - बहुत अच्छा विश्लेषण किया है आपने राजन् । सम्राट विक्रमादित्य अपना उत्तरदायित्व निभाने ही गए थे प्रजा की रक्षा करने और वे देवी नंदिनी का भी उत्तरदायित्व तोताराम और मंगला पर छोड कर गए थे किंतु यह अधर्मी लोग खुद तो डूब ते ही है अपितु धर्मात्मा व्यक्ति को भी लेकर डूबते है । और यही उन दोनों ने स्वार्थ पूर्ण होकर सम्राट के साथ भी धोखा किया वह देवी के प्राण भी संकट में डाले ।
देवी नंदिनी - आज क्या बात हुई भोजन अब तक नहीं आया सम्राट जब यहाँ थे तब तो वे स्वंय भोजन समय से पहले ले आते थे , तोताराम और मंगला से ही पूछ लेती हूं । तोताराम मंगला तुम भोजन कर रहे हो ।
तोताराम - देवी जी हाँ वो सम्राट और महारानी नही है ना इसलिए भोजन नही आया ।
देवी नंदिनी - कोई बात नही इश्वर का उपवास हो जाएगा ।
तोताराम देवी के जाने के बाद कहता है आपके हिस्से का भोजन तो हम ले आए है और उसे बेच कर हम धन कमाएंगे ।
कथा में देवी कहती है राजन् यदि कर्मचारी भ्रष्ट हो जाए तो राजा के द्वारा दिया हुआ धन भी प्रजा तक पहुंच नही पाता है ।
राजा भोज - ऐसे भ्रष्ट कर्मचारीयों को राजा को कठोर से कठोर दण्ड देना चाहिए । देवी - किंतु उसके लिए सबूत होने चाहिए । राजा भोज - फिर क्या हुआ देवी । देवी - क्योंकि वराहमिहिर जी महामंत्री के पद पर थे तो देवी की सारी जिम्मेदारी का निरिक्षण का उत्तरदायित्व उनका था ।
वराहमिहिर जी - तोताराम सम्राट का संदेश आया है उन्होंने ब्राह्मणी के भोजन आदि की जानकारी मांगी है ।
तोताराम - सबकुछ ठीक है आचार्य जी ।
मंगला - आचार्य जी एक समस्या है देवी चाहती है कि वे रोज अन्न और धन का दान करना चाहती है ।
वराहमिहिर जी - तो इसमें समस्या क्या है देवी जितना अन्न और धन चाहती है राजकौष और राज भण्डार से ले जाओ ।
स्वार्थी मंगला और तोताराम के कारण देवी नंदिनी के दिन उपवास में बीतने लग गए ।
वहाँ सम्राट विक्रमादित्य को जानकरी तो मिल रही थी परंतु गलत जानकारी मिल रही थी । वहीं देवी नंदिनी की हालत बिगड़ रही थी देवी नंदिनी तोताराम और मंगला के पास जाकर कहती है भोजन आया । तोताराम - अरे क्या तुम हर बार भोजन का पूछती हो तुम्हारे लिए राज महल से भोजन आना बंद हो गया है जाओ भिक्षा मांग कर खा लो ।
देवी नंदिनी - क्या उत्तरदायित्व के पुजारी महान सम्राट विक्रमादित्य के राज्य में साध्वी भिक्षा मांगे ऐसा नही हो सकता हम स्वंय राजमहल जाकर भोजन ले आते है किंतु देवी नंदिनी बेहोश हो जाती है वह अपने पति को याद करती है ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् दुखी देवी नंदिनी अपने पति के दर्शन की आस करती है वही सम्राट युद्ध समाप्त होने की आस में परंतु युद्ध था कि समाप्त ही नही हो रहा था । राजा भोज - कयों देवी । देवी - क्योंकि उन भीलों का सेनानायक बहुत मायावी था और बार बार वो बच कर निकल जाता था किंतु इस बार चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने उसे धरदबोचा ।
सम्राट विक्रमादित्य - भील सेनानायक अब नही बच पाओगे ।
भील योद्धा - सम्राट भ्रम एक बहुत बुरी चीज है और ऐसा कह कर वो बार बार गायब हो जाता है तभी सम्राट विक्रमादित्य अपना चमत्कारी धनुष लेते है और उस पर बाण चढा कर यह कह कर छोड़ते है अब तुम नहीं बचोगे इस बाण के अंदर से हजारों बाण निकलेंगे तुम जा हां कहीं भी भाग जाओ तुम नही बचोगे और तुंरत बाण के जाते ही भील योद्धा गायब होते हुए भी शरीर में आकर घायल पढा होता है सम्राट के पैरों में वह तुरंत मृत्यु के घाट उतर जाता है । युद्ध समाप्त होते ही सम्राट विक्रमादित्य उज्जैनी की ओर निकल जाते है सम्राट विक्रमादित्य को बार बार गलत जानकारी मिलती है की देवी स्वस्थ है किंतु फिर भी वह महल जाने से पहले देवी की कुटीया में जाते है उन्हें देखने ।
सम्राट विक्रमादित्य कुटिया के द्वारा पर जाकर देवी देवी कहते है किंतु कुटिया में से कोई नही आता सम्राट यह सोच वहाँ से निकल जाते है कि देवी विश्राम कर रही होगी । महल में सम्राट विक्रमादित्य के पहुंचते ही सम्राट विक्रमादित्य की जय के नारे गुंजते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी हमारे जाने के बाद देवी नंदिनी को कोई कष्ट तो नहीं हुआ ।
वराहमिहिर जी - सम्राट सबकुछ ठीक है बस में ही राज्य के काम की वजह से देवीमिलने नही जा सका परंतु तोताराम और मंगला से देवी का समाचार लेता रहा ।
तभी ब्राह्मण देव आ जाते है और कहते है सम्राट लगता है में किसी कुशल समय पर आया हूं चारों और हर्षोल्लास है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां आप सही कह रहे है ब्राह्मण देव हमने अपनी प्रजा की रक्षा का उत्तरदायित्व निभा लिया है ।
ब्राह्मण देव - बहुत अच्छी बात है सम्राट, और हमारी पत्नी कैसी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी बहुत अच्छी है खुश है सकुशल है और आपका यज्ञ कैसा रहा ।
ब्राह्मण देव - आपकी वजह से अच्छा रहा यदि आप हमारी पत्नी का उत्तरदायित्व नही लेते तो हम यज्ञ में जाने का भी नही सोच सकते थे हम आश्रम जाते है उन से मिलने फिर हम दोनों पति-पत्नी आपसे आज्ञा लेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - अवश्य ब्राह्मण देव ।
ब्राह्मण देव आश्रम जाते है वह कुटीया के बाहर कहते है देवी द्वार खोलिए हम आ गए और आपको अत्यंत खुशी होगी की हमारा यज्ञ सफल रहा देवी द्वार तो खोलिए तभी ब्राह्मण देव देखते है की देवी बेहोश पढी रहती है ब्राह्मण देव तुरंत वहाँ जाते है । ब्राह्मण देव रोते हुए देवी की हाथों की नस देखते है और वे देखते है की देवी की मृत्यु हो गई है तथा उन्हें ढाई माह से खाना ना मिला हो । तभी वो कहते है की हम जिस स्थान पर देवी को छोड कर गए थे वो कोई दरिद्र स्थान नही है अपितु यह तो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का स्थान है फिर भी आपको ढाई माह से खाना नहीं मिला इसका मतलब है कि हमारे साथ छल हुआ है ।
ब्राह्मण देव अपनी पत्नी की लाश को उठाए महल जाते है और कहते जोर जोर से सम्राट विक्रमादित्य सम्राट सामने आइए हमारे तभी सम्राट आ जाते है ।
ब्राह्मण देव - न्याय किजिए सम्राट न्याय किजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - ब्राह्मण देव क्या हुआ देवी को ।
ब्राह्मण देव - हत्या हुई है हमारी पत्नी की ।
सम्राट विक्रमादित्य - किसने की इनकी हत्या ।
ब्राह्मण देव - आपने की है मेरी पत्नी की हत्या आपने तीन माह तक भूखा रहा इन्हें । क्या आपका राज्य इतना दरिद्र है कि एक ब्राह्मणी को एक दिन का भोजन भी नही दे सका । हमें नही पता था कि आप हमारी पत्नी की ऐसी अवस्था करेंगे वरना में कभी उन्हें आपके उत्तरदायित्व में छोड कर नही जाता क्या यही है महान पराक्रमी दानवीर परोपकारी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का असली चरित्र ।
वराहमिहिर जी - ब्राह्मण देव आपको गलत फेमी हो रही होगी आपकीपत्नी की हत्या किसी और कारण से हुई होगी ।
ब्राह्मण देव - नही आचार्य जी इस ब्राह्मण में इतनी शक्ति है जो पता लगा सके मेरी पत्नी की हत्या अन्न के अभाव में हुई है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी ब्राह्मण देव सही कह रहे है देवी की अवस्था साफ तौर पर बता रही है कि उन्हें भोजन नही मिला है ।
ब्राह्मण देव - भूख से मरी है मेरी पत्नी और इसके उत्तरदायी ये है ।
वराहमिहिर जी - ब्राह्मण देव !!
सम्राट विक्रमादित्य -वराहमिहिर जी मत रोकिए इन्हें ।
ब्राह्मण देव - सम्राट कयों किया आपने ऐसा अगर आप इन्हें भोजन नही दे सकते थे तो मुझे कह देते में पति था इनका कुछ ना कुछ तो कर ही लेता ।
सम्राट विक्रमादित्य - ब्राह्मण देव अब बात साफ सफाई की नही न्याय की है सेनापति तोताराम और मंगला को पेश करो हमारे सामने ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह क्या चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के राज्य में जहां कोई अकाल मौत नही मरता वहाँ एक ब्राह्मणी की अकाल मौत वो भी उसकी जिसका उत्तरदायित्व रक्षा स्वंय सम्राट विक्रमादित्य पर थी यह तो घोर अमंगल है । देवी - होनी तो होकर रहती है । राजा भोज - लेकिन सम्राट इसके लिए दोषी नही है क्योंकि उन्होंने तो प्रजा की रक्षा के लिए अपना उत्तरदायित्व उन सेवकों पर छोड़ा था वो सेवक दोशी है सम्राट नहीं क्योंकि राजा केवल निर्णय देता है उसे पूरा कर्मचारी करते है । देवी - किंतु राजा पर ही बात आती है और सम्राट पर ब्रह्म हत्या का कलंक चढ चुका था और अगर वे कुछ ना कर पाए तो उनका सबकुछ समाप्त हो जाएगा । राजा भोज - वो तो है ही देवी ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय है आज में कहता पुरे इतिहास को की जहां ब्राहमणों का अपमान होगा वहां से सुख सम्पति सब समाप्त हो जाएगा ।
तोताराम और मंगला सम्राट के पैरों में पढ कर कहते है सम्राट हम देवी को भोजन देते थे पर देवी व्रत करती थी ।
ब्राह्मण देव - झूठ कह रहे है ये दोनों मेरी पत्नी मुझ से बिना पूछे कोई व्रत नही करती थी ।
वराहमिहिर जी - तोताराम तुमने इसकी सुचना मुझे क्यों नही दी तुम्हें इसके लिए कठोर से कठोर दण्ड मिलेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही वराहमिहिर जी ये दोनों सच कह रहे है या झूठ इसका प्रमाण हमारे पास नही है किंतु हम यह प्राथना करते है इश्वर से की यह दोनों अपने कर्म यही भूगतेंगे । और असली गुनहगार तो हम है हमने लिया था देवी का उत्तरदायित्व हमने लिया था चूक हमसे हुई है इसकी भरपाई हम ही करेंगे । ब्राह्मण देव आप हमें दण्ड दिजिए हमें आपका हर दण्ड मंजूर है ।
ब्राह्मण देव - सम्राट हम आपको क्या दण्ड देंगे आपको तो विधाता दण्ड देगा । हम अपने आप को दण्ड देंगे आपने मुझे मेरी पत्नी के सामने अयोग्य साबित कर दिया । मेरे जिने की केवल एक वजह थी मेरी पत्नी अब वो भी नहीं रही में आपके राजमहल के सामने अन्न जल त्यागकर अपने प्राण दे दूंगा यही मेरा सच्चा प्रायश्चित होगा मेरी पत्नी चे लिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही आप ऐसा मत किजिए हम अपने प्राण त्याग देंगे पर आप अपने प्राण मत त्यागिए ।
ब्राह्मण देव - नहीं सम्राट आपका जीवन इसी योग्य है कि एक ब्राह्मण आपके महल के समाने भूखा प्यासा मरे आपके उपर ब्रह्म हत्या का पाप चढेगा ब्रह्म हत्या का ।
यह कह कर ब्राह्मण देव रोते हुए अपनी पत्नी की लाश लेकर चले जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य को दुखी देख महारानी उनके पास जाती है और कहती है सम्राट । तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते है यह सत्य है महारानी की एक ब्राह्मणी की हत्या हमारे राज्य में भूखे प्यासे हो गई हमें समझ नही आ रहा है कि हम यह सब कैसे ठीक करे ब्राह्मण देव के जीवन में इस विपत्ति को हम कैसे दूर करे हम किस मुह से ब्रहमा विष्णु शिव त्रिदेव के सामने जाएंगे कि हम एक ब्राह्मण देव को नहीं बचा सके ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप निराश मत होना धीरज रखे जरूर कुछ ना कुछ मार्ग निकलेगा ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है विडंबना देखिए राजन् सच्चे मन से प्रायश्चित करने वाले सम्राट विक्रमादित्य को प्रायश्चित का मार्ग ही नही मिल रहा था जीवन में पहली बार सम्राट किसी घठना से इतनेटूटे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य ब्राह्मण देव के पास जाते है ।
ब्राह्मण देव - सम्राट सच्चे मन से अगर आपको हमसे सहानुभूति है तो जीवित कर दिजिए हमारी पत्नी को नहीं कर सकते ना तो हमारा पास भी एक ही मार्ग है मृत्यु का । हे संसार के समस्त देवता गण में आप सब को साक्षी मान कर यह प्रण लेता हूं कि जब तक मेरे प्राण ना निकल जाए तब तक अन्न जल गृहण नहीं करूंगा ।
ब्राह्मण देव की यह बात सुनकर सम्राट विक्रमादित्य चिंतित हो जाते है।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् ब्राह्मण देव ने एक असंभव शर्त रख दी थी सम्राट के सामने । राजा भोज - देवी पहली बात तो यह की सम्राट विक्रमादित्य कोई साधारण मनुष्य नही थे वे असाधारण मनुष्य थे उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था और जहा तक बात है सब मार्ग बंद होने की तब मनुष्य भक्ति मार्ग में जाता है और तब उसे जो रास्ता दिखता है वो महाकाल स्वंय दिखाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य भगवान विष्णु के मंदिर जाते है और कहते हे विधाता हमें बताए हम किस तरह से ब्राह्मण देवी को जिंदा करे बताए इश्वर । इस समस्या में भगवान विष्णु आप ही हमारी सहायता कर सकते है । इस समस्या से केवल आप ही हमें मुक्त कर सकते है और आप जब तक हमें इस समस्या से मुक्त नहीं कर देते तब तक हम इस मंदिर की घंटी बजाते रहेंगे और मंदिर की घंठीयों की आवाज ब्रह्माण्ड में गूंजती रहेंगी ।
उधर बेंकुणड धाम में नारदजी जाते है प्रणाम माँ लक्ष्मी ।
लक्ष्मी माँ - कल्याण हो आपका ।
नारदजी - माता आज प्रभु कहां ध्यान मग्न है कि अपने सबसे सच्चे भक्त की पुकार तक नही सुन पा रहे है ।
लक्ष्मी माँ - किस भक्त की बात कर रहे है आप ।
नारदजी - वहीं जिन्हें इस समस्त संसार में धर्म के प्रतीक माने जाते है वहीं जो देवताओं के प्रतिनिधित्व के लिए धरती पर स्थापित परम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ।
लक्ष्मी माँ - तब तो यह भारी अनर्थ है ।
माँ लक्ष्मी भगवान श्री हरि से कहती है प्रभु आज आपको क्या हो गया है आपने सम्राट विक्रमादित्य की पुकार सुनने में इतनी देर क्यों कर रहे है , सम्राट विक्रमादित्य ने ना जाने कितने लोगों के जीवन सुधारे समस्त ब्रह्मांड को बचाया उनके पुण्य से धरती चमक रही है ।
भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जाग जाते है और कहते है देवी लक्ष्मी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की समस्या का निवारण तो देवर्षि नारद के पास ही है जाईये नारद मुनि सम्राट की समस्या को दूर करे ।
नारद जी - जो आज्ञा प्रभु ।
नारद जी मंदिर पहुंच जाते है और कहते है नारायण नारायण ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रणाम देवर्षि नारद आप ।
नारद जी - हां सम्राट में बताइए क्या कष्ट है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को जो प्रभु को मंदिर की घंठीया बजा कर बुला रहे हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब आप आगए है तो हमारी समस्या का निवारण निश्चित है ।
नारद जी - वो कैसे सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें विश्वास है कि भगवान विष्णु ने ही आपको भेजा है हमारी समस्या का निवारण करने के लिए ।
नारद जी - धन्य है आप और धन्य है आपका विश्वास । सम्राट उस ब्राह्मण देवी के बाद यदि ब्राह्मण देव की भी हत्या हो गई तो आप इस जन्में तो क्या आने वाले सैकड़ो जन्म तक ब्रह्म हत्या के पाप से ग्रसित रहेंगे आपका कोई भी पुण्य कर्म शेष नहीं रह जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसलिए तो आप हमें मार्ग बताए कि हम इस पाप से कैसे बचे ।
नारद जी - मार्ग यह है कि आप सूर्यलोक जाकर वहां रखे अमृत कलश की कुछ बुंद देवी को पिला दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - यदि ऐसा है तो हम जाएंगे सूर्य लोक ।
नारद जी - सम्राट वो सूर्य लोक है इंद्र लोक नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो क्या हुआ आप हमें वहां जाने का मार्ग बताएं ।
नारद जी - एक ही मार्ग है सम्राट समुद्र के तल पर सूर्योदय से ठीक कुछ क्षण पहले एक स्तंभ आता है जिसमें वरूण देव स्वंय संसार में सबसे पहले सूर्यदेव को अर्ध देने जाते है । सम्राट यदि आप उस स्तंभ के माध्यम से सूर्यदेव तक जा सके और अमृत कलश ला सके तो आप उस ब्राह्मण की रक्षा करके ब्रह्म हत्या के पाप से बच सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम सूर्य लोक अवश्य जाएंगे आप हमें आशीर्वाद दिजिए ।
नारद जी - आपकी विजय हो सम्राट विक्रमादित्य । आप की महानता और आपके अच्छे कर्म आपको विजय बनाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य समुद्र की ओर निकल जाते है वह पहुंच कर वरूण देव को याद करते है उनका आव्हान करते है वह कहते है वरूण देव हमें दर्शन दे हमारे जीवन पर लगे झूठे कलंक को हम खत्म करना चाहते है हमारी सहायता करिए ।वरूण देव - आखें खोलिए चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य कहिए में आपकी किस प्रकार से सहायता कर सकता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - वरूण देव कृप्या हमें आपका जल स्तंभ का उपयोग करने दे हमें सूर्य लोक जाना है ।
वरूण देव - सम्राट विक्रमादित्य आप हम देवताओं के प्रतिनिधि है धरती पर आपका जीवन लोक कल्याण के लिए है आपके लिए काम आना हमारा सौभाग्य है सम्राट । मगर आज तक कोई भी प्राणी कोई भी मनुष्य सूर्य लोक पर सशरीर नही जा सका है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम जाएंगे वरूण देव हम कल सुबह आते है ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् कोशिश एक पूंजी है कोशिश करने वालों की हार नहीं होती । राजा भोज - हां देवी कोशिश करने वालो की कभी हार नही होती । देवी - इसलिए तो सम्राट सूर्य लोक गए और वहां जाकर उन्होंने अमृत कलश लिया और देवी को जीवित कर दिया । राजा भोज - इतनी सहजता से नही देवी यह सब इतना आसान नहीं है । देवी - क्यों राजन् । राजा भोज - क्योंकि विधि का विधान बिच में आ रहा है ब्राह्मणी को जीवित करना मतलब किसी ना किसी के प्राण संकट में पढने वालें है कुछ ऐसा घठने वाला है जो संसार में किसी ने सोचा नहीं होगा । देवी - किसके प्राण । राजा भोज - सम्राट विक्रमादित्य के प्राण संकट में पढ जाएगें ।
वहीं सम्राट विक्रमादित्य उज्जैनी में तैयार होते है सूर्य लोक जाने के लिए ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आप सूर्यलोक मत जाइए वहां जाने का अर्थ है जल कर भस्म हो जाना ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी जलना वहां पर भी है और यहां पर भी तो क्यों ना वहां पर जल जाए हमारा उत्तरदायित्व तो पुरा हो जाएगा जिस प्रकार दान में कन्या दान बढा होता है उसी तरह धर्म में उत्तरदायित्व का धर्म सर्वश्रेष्ठ है ।
वहीं महारानी चित्रलेखा हाथों में आरती की थाल लेकर खड़ी रहती है । वराहमिहिर जी उन से कहते है महारानी सम्राट का निर्णय गलत है तभी महारानी कहती है सम्राट का निर्णय बिल्कुल सही है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आपकी यात्रा शुभ हो आपका उद्देश्य पूरा हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम सौभाग्यशाली है महारानी की आप जैसी वीरांगना हमारे जीवन में है ।
महारानी चित्रलेखा - हमें भी तो गर्व है कि हमारे जीवन में आप जैसा पति है जो धर्म पर जीता मरता है हमारी शुभकामनाये सदा आपके साथ है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें नही पता कि हम वापस लौटेंगे या नही मगर हम इतनाअवश्य कहेंगे की अपने जीवन से यह कलंक समाप्त कर देंगे । और हम ना लौटे तो चिंता मत करना हम उपर मिलेंगे मगर जब तक आप पृथ्वी पर रहे तब तक हमारे जाने के दुख में बेहाल होकर आँसुओं से हमारी छवि को कभी मिटने मत देना ।
महारानी चित्रलेखा - कभी नहीं सम्राट ।
महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य की आरती उतारती है और सम्राट महल से निकल कर ब्राह्मण देवता के पास जाते ।
सम्राट विक्रमादित्य ब्राह्मणी की लाश को दूर से हाथ जोड़ कर कहते है देवी आपकी मृत्यु यानी हमारा लक्ष्य पुरा ना होना होगा हम आपको आपका जीवन लोटाएंगे यह संकल्प है हमारा ।
वहीं महारानी चित्रलेखा महाकाल के मंदिर जाती है और कहती है हे महादेव हमनें सम्राट को वहाँ भेजा है जहां मौत है मन पर पत्थर रख कर हे महादेव आज हम अपने पति के प्राणों के लिए नहीं आए है आज हम सम्राट पर लगे कलंक को दूर करने की विनती लेकर आए है ।
वहीं कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी महारानी चित्रलेखा कितनी महान स्त्री थी शायद इसलिए स्त्री को महान कहां गया है । देवी - हां राजन् ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य वरूण देवता का मंत्र उपचार करके उन्हें बुलाते है और कहते है हे वरूण देव यदि हमेरा जीवन निष्कलंक और निष्पाप है तो हमें सूर्य देव तक जाने का मार्ग बताएं । तभी वरूण देव का स्तंभ आ जाता है और सम्राट उसके उपर सवार होकर सूर्य लोक की ओर बढते है ।
सम्राट विक्रमादित्य सूर्य लोक की ओर बढ़ते है तभी सभी देवता उन्हें देखते है बृहस्पति देव कहते है हे इश्वर यह तो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है मगर ये सूर्यलोक क्यों जा रबे है हमें इन्द्र देव को सूचित करना होगा ।
बृहस्पति देव - देवराज इंद्र ।
इन्द्र देव - आइए गुरूदेव बृहस्पति मगर आप इतने चिंतित क्यों है ।
बृहस्पति देव - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य सूर्य देव से मिलने जा रहे है ।
इंद्र देव - यह तो बहुत अच्छी बात है कि एक पृथ्वी वासी सूर्य देव से मिलने जा रहा है वहीं सूर्य देव के लिए भी गौरव की बात होगी कि स्वंय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य उनसे मिलने आ रहे है ।
बृहस्पति देव - बात यही नही है देवेंद्र बात यह है कि सम्राट वरूण देव के स्तंभ पर बैठ कर जा रहे है ।
देवराज इंद्र - क्या फिर तो हमें रोकना होगा सम्राट को वरना अनर्थ हो जाएगा सम्राट जल कर भस्म हो जाएगें ।
सम्राट विक्रमादित्य सूर्य लोक के करीब पहुंच जाते है ।
देवराज इंद्र - हमें सम्राट को रोकना होगा हम अपने वज्रासन से स्तंभ तोड़ देंगे ।
बृहस्पति देव - नहीं देवराज ऐसा मत किजिए ।
देवराज इंद्र - आप हमें क्यों रोक रहे है ।
बृहस्पति देव - क्योंकि ऐसा करने से सम्राट विक्रमादित्य अपने उद्देश्य से दूर हो जाएंगे । सम्राट के इस कार्य के पीछे भी किसी ना किसी कीसहायता अवश्य होगी सम्राट विक्रमादित्य हमेशा दूसरों के लिए कार्य करते है ।
वराहमिहिर जी - सूर्य देव प्रकट हो रहे है यानि हमारे सम्राट किसी भी पल सूर्य देव के सामने होंगे ।
सूर्य देव वरूण स्तंभ को देख प्रकट होते है मगर वे आश्चर्यचकित हो जाते है कि एक मनुष्य उनके सामने कैसे आ गया फिर वे देखते है कि यह तो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ।
कथा सुनाते हुए देवी चुप हो जाती है राजा भोज उन्हें कहते है देवी क्या हुआ । देवी - महान सम्राट विक्रमादित्य का अन्त हो गया उनकी मृत्यु हो गई । राजा भोज - क्षमा करिएगा देवी मगथ ऐसा नहीं हुआ होगा । देवी - क्यों नहीं हुआ होगा सम्राट का शरीर भी आम आदमी की तरह पंच तत्वों से ही बना है । राजा भोज - हां यह तो है किंतु हर आम आदमी प्रलय से धरती नहीं बचा पाते सम्राट विक्रमादित्य का अंत होना मतलब धरती से धर्म का समाप्त होना है यदी एक शब्द में कहूं तो सम्राट विक्रमादित्य का अंत यानि संसार के सभी सद्गुणों का अंत । देवी - राजन् सद्गुण कभी समाप्त नहीं होते । राजा भोज - जानता हूं देवी मगर सम्राट विक्रमादित्य ही सभी सद्गुणों के स्वामी है ना सद्गुण समाप्त होंगे ना सम्राट विक्रमादित्य का जीवन । देवी - आपने सही कहा ।
सूर्य देव - यह क्या हो गया हमसे सम्राट विक्रमादित्य आखें खोलिए मेरा असहनीय ताप से आप असहाय हो सकते है मगर मर नही सकते सम्राट उठीए ।
सम्राट विक्रमादित्य उठ खडें होते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - सूर्यदेव ।
सूर्यदेव - कहीए सम्राट विक्रमादित्य आपने यहां आने का कष्ट क्यों किया क्या चाहिए आपको हमसे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमनें अपने कंधो पर एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व लिया था ।
सूर्यदेव - कैसा उत्तरदायित्व ।
सम्राट विक्रमादित्य पुरी कहानी सूर्यदेव को बताते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम अपना उत्तरदायित्व नहीं निभा पाए ओर हम पर कलंक लग गया हमें इसे समाप्त करना है।
सूर्यदेव - और यह कलंक ब्राह्मणी को जीवित करने के बाद ही होगा । लेकिन सम्राट जो मनुष्य मर गया है उसे जिंदा नही किया जा सकता यह जानते हुए भी आप यहां तक आए यह प्रशंसनीय है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप हमारी सहायता करे सूर्यदेव ।
सूर्यदेव - अवश्य सम्राट हम आपकी सहायता जरूर करेंगे हम अपना अमृत कलश आपको देंगे । मगर आप एक निर्णय लेना होगा सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - कैसा निर्णय ।
सूर्यदेव - इस अमृत कलश से केवल एक का ही जीवन बचेगा यां तो आपका या उस ब्राह्मणी का आपको निर्णय लेना होगा सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें अपने जीवन से कोई मोह नहीं है सूर्यदेव हमारा जीवन निष्कलंक हो हम यह चाहते है आप उन ब्राह्मण देवी को जीवित कर दिजिए ।
अमृत की बूंद ब्राह्मणी को जीवित कर देती है ब्राह्मणी देव से कहती है आखें खोलिए स्वामी ।
वहीं सूर्यदेव सम्राट विक्रमादित्य से कहते है सम्राट आपके कहें अनुसार हमने देवी को जीवित कर दिया है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद सूर्यदेव आपकी वजह से हमारा जीवन निष्कलंक हो गया अब मौत भी सुखदायी होगी ।
सूर्य देव - सम्राट विक्रमादित्य यह आपकी महानता है कि आपको अपने जीवन से अधिक दूसरों का जीवन प्रिय है यह संसार कभी आपकी महानता को नहीं भुला पाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - सूर्य देव हम मरने से पहले आपसे ज्ञान के भण्डार से ज्ञान प्राप्त करना चाहते है ।
सूर्यदेव - सम्राट हम आपको क्या ज्ञान देंगे इस संसार में आपसे ज्यादा महान ज्ञानी परोपकार और नयाप्रिय दूसरा कोई नहीं है ।फिर भी बताए क्या जान ना चाहते है आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - सूर्यदेव मृत्यु क्या है यह जान ना चाहते है हम ।
सूर्यदेव - मृत्यु एक परिवर्तन है आत्मा शरीर रूप वस्त्र को बदलती है यही है मृत्यु , मृत्यु लक्ष्य प्राप्ति के लिए किया जाने वाला कर्म है इसके बाददूसरा जीवन मिलना यह है मृत्यु । मृत्यु और जीवन मरण के चक्र के परे जाना वह है जिसकी परिभाषा स्वंय आप है संसार में मोक्ष मोक्ष ही जीवन का अंतिम पडाव है जिसे पाकर मनुष्य जीवन मरण के खेल से हमेशा के लिए छूट सकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद सूर्यदेव । सूर्यदेव आपकी आखों में आँसू ।
सूर्यदेव - सम्राट विक्रमादित्य आपका जीवन आज समाप्त हो रहा है मगर यह संसार आपको कभी नहीं भूला पाएगा आपके सद्गुण हम देवताओं और मनुष्ययों को हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे आपकी जय हो उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपकी सदा जय हो ।
उधर ब्राह्मणी से ब्राह्मण देव कहते है आप जीवित हो गए यह इश्वर की कृपा है ।
ब्राह्मणी - हां स्वामी इश्वर की कृपा रही । स्वामी आप नही जानते है आपके जाने के बाद हमें कितना कष्ट हुआ ।
ब्राह्मण देव - हम जानते है देवी वो तथाकथित न्यायप्रिय परोपकारी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ही है आपकी मौत का कारण ।
ब्राह्मणी - नहीं स्वामी हमारी मौत का वजह कदापि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य नहीं है ।
उधर देवी राजा भोज से कहती है सम्राट विक्रमादित्य की मौत ना केवल मनुष्य अपितु देवताओं भी दुखी थी ऐसा लग रहा था मानों जैसे प्रजा के साथ साथ धर्म भी अनाथ हो गया था सारा संसार उनकी मौत पर दुखी था पुरे संसार में शोक था । राजा भोज - हां देवी में यह सोच रहा हूं कि सम्राट की पत्नी महारानी का क्या हाल हुआ होगा ।
उधर सैनिक आकर कहता है महारानी ब्राह्मणी जीवित हो गई है ।
महारानी चित्रलेखा - इसका अर्थ है सम्राट अपने कार्य में सफल हुए ।
स्तंभ निचे आता है किंतु उस पर सम्राट की लाश होती है महारानी जैसे ही जाती देवर्षि नारद उन्हें रोक देते है देवी वे समुद्र में चले गए है । देवर्षि नारद - महारानी क्षमा किजिए मगर सम्राट इस लोक से चले गए है । महारानी - नहीं सम्राट नही मर सकते और यह कैसी विडंबना है कि एक स्त्री अपने पति के अंतिम दर्शन भी नही कर सकती ।
संपूर्ण प्रजा महारानी चित्रलेखा, वराहमिहिर जी, सेनापति सभी सम्राट विक्रमादित्य के लिए रोते है ।
उधर ब्राह्मणी कहती है हमारी मौत के जिम्मेदार सम्राट नहीं है हमारे दोषी तो वो लोभी सेवक है तोताराम और मंगला । सम्राट तो इतने उत्तरदायित्व के पुजारी थे कि सारी धरती के चक्रवर्ती सम्राट होते हुए भी स्वंय हमारे लिए भोजन लेकर आते थे यह तो तब हुआ जब सम्राट प्रजा की रक्षा के लिए युद्ध करने गए उसके उपरांत ।
ब्राह्मण देव - हे इश्वर यह हमसे क्या हो गया ।
उधर महारानी चित्रलेखा को आते देख ब्राह्मण देव कहते है देखिए महारानी मेरी पत्नी जीवित हो गई और मुझे सच्चाई का पता चल गया सम्राट कहां है में उनसे क्षमा माँगना चाहता हूं ।
महारानी चित्रलेखा - उन्होंने आपको क्षमा दान दे दिया है ।
ब्राह्मण देव - नही महारानी हम स्वंय सम्राट के मुख से सुन ना चाहते है ।
महारानी चित्रलेखा - अब वो आपके सामने कभी नहीं आएंगे ।
ब्राह्मण देव - क्यों महारानी क्या सम्राट हम से अब तक रुष्ट है ।
महारानी चित्रलेखा - नहीं ब्राह्मण देव वो आपसे रुष्ट नहीं है वो ब्राह्मण वंश से कभी रुष्ट नहीं होते ।
ब्राह्मण देव - तो फिर क्यों नही आ रहे है वो हमारे सामने ।
महारानी चित्रलेखा - क्योंकि सम्राट अब इस जीवन को त्याग चुके है उनकी मृत्यु हो गई है ।
वराहमिहिर जी - हां ब्राह्मण देव आपकी पत्नी की रक्षा के लिए वह उत्तरदायित्व की रक्षा के लिए सम्राट ने अपना जीवन त्याग दिया ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है इसमें गलती तोताराम और मंगला की है उन्हें दण्ड अवश्य देंगे सम्राट ।
वराहमिहिर जी नारद जी से पूछते है कि बिना शरीर के अंतिम संस्कार कैसे करे ।
नारद जी - वराहमिहिर जी इसके लिए भी शास्त्र में विधि बताई गई है ।
तभी महारानी चित्रलेखा आ जाती है और कहती है सम्राट का अंतिम संस्कार नहीं होगा । वराहमिहिर जी - मगर महारानी क्यों । महारानी चित्रलेखा - क्योंकि सम्राट आप लोंगो के लिए मरे है हमारे लिए तो वे अभी भी उत्तरदायित्व को निभाने गए है और हम अपने वचन निभाएंगे । वराहमिहिर जी - इसका मतलब आप भी । महारानी चित्रलेखा - नहीं हम अपने प्राण नहीं त्यागेंगे अपितु हमारे पति के प्राण लाएंगे उन्हे जीवित करके । वराहमिहिर जी - महर महारानी यह असंभव है । महारानी चित्रलेखा - आचार्य जी हम उसचक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की पत्नी है जिन्होंने धर्म के लिए सदैव अपने प्राणों तक की फिक्र नहीं करी जिन्होंने धर्म के लिए असंभव कार्य को भी सम्भव कर दिखाया । देवर्षि नारद क्या आप हमारा मार्गदर्शन करेगें ।
देवर्षि नारद - अवश्य देवी आप जैसी कर्तव्यपरायण और पतिव्रता नारी की सहायता करके हमें अति प्रसन्नता होगी। नारायण नारायण ।
उधर ब्राह्मण देव पूजा कर बैठते है भस्म लगा कर तभी ब्राह्मणी कहती है स्वामी यह आप क्या कर रहे है । ब्राह्मण देव - उन्हें दण्ड दूंगा जिनकी वजह से आपको कष्ट हुआ जिनकी वजह से मेरे महाराज की मृत्यु हुई ।
ब्राह्मण देव पूजा करते हुए जिस अंधकार में तोता और मंगला जी रहे है उसके लिए दोनों को दृष्टि की जरूरत ही नहीं है दोनों दृष्टि हीन हो जाओ और चाह कर भी अपने पापों को नहीं धो पाओगे पुरा जीवन नर्क की तरह बीतेगा नर्क में पढोगे दोनों जने अपने कर्मो का दण्ड भूगतोगे यह एक ब्राह्मण का श्राप है और वहीं तुरंत तोताराम और मंगला दृष्टि हीन हो जाते है और भूगत ते है ।
उधर नारद जी कहते है महारानी चित्रलेखा एक ही उपाय है ।
महारानी चित्रलेखा - क्या देवर्षि नारद ।
नारद जी - महारानी सम्राट के सारे पुण्य कर्म को संजोया जाए और विधाता के पास जाया जाए पुण्य कर्म में बहुत शक्ति होती है महारानी । और सम्राट विक्रमादित्य ने आजीवन पुण्य कर्म किया है बिना फल की इच्छा किए सम्राट ने कभी विधाता से कुछ नहीं माँगा इसलिए उनके पुण्य कर्म बहुतहै कुछ का हिसाब विधाता से लेकर उन्हें जीवित कर सकते है उसके बाद भी संसार में सबसे ज्यादा पुण्य कर्म उनके ही पास रहेंगे ।
महारानी चित्रलेखा - देवर्षि सम्राट के पुण्य कर्म सम्पूर्ण धरती पर बिखरे पढें है उन्होंने धरती के हर कण पर पुण्य किया है किंतु हम इन्हे संजोए कैसे ।
नारद जी - महारानी यह लिजिए अमृत कलश इसे आप निराहार रहकर सारे धरती पर छिड़क कर सम्राट के सारे पुण्य एकत्रित कर लिजिए ।
महारानी चित्रलेखा - हम रहेंगे अपने सम्राट के लिए निराहार और निर्जला और संजोएगें उनके सारे पुण्य धरती पर से । मगर देवर्षि विधाता के पास जाने का मार्ग क्या है ।
देवर्षि नारद - वो तो आपको स्वंय खोजना होगा ।
महारानी चित्रलेखा - स्वंय कैसे ।
देवर्षि नारद - आपके सतीत्व में जितनी शक्ति होंगी विधाता आपको अवश्य मार्ग दिखाएंगे ।
महारानी चित्रलेखा पुरे राज्य को जल से सिंचती है ।
उधर कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् महारानी चित्रलेखा अपने पति को बचा रही थी उनके प्राण वापस ला रही थी , रक्षा करना केवल पति का कर्तव्य नहीं पत्नी का भी होता है । महारानी ने सम्पूर्ण धरती को सिंच दिया जल से लेकिन अब बारी थी विधाता के पास जाने कि क्या महारानी चित्रलेखा पुरा कर सकेंगी अपना उत्तरदायित्व क्या महारानी संसार में अपने पतिव्रता का धर्म निभा पाएंगी प्रश्न बहुत है । आइए आगे देखते है ।
महारानी चित्रलेखा - हे परम पिता परमेश्वर अगर हमने सच्चे मन से अपने पति की सेवा की है तो हमें अपने पास बुलाएं यदि हमारा पत्नी धर्म पवित्र है तो हमें अपने पास आने का मार्ग दिखाए ।
तभी ब्रहमा जी प्रकट हो जाते है और कहते है पुत्री तुम पतिव्रता के धर्म के शिखर पर हो आओ हम आपको मार्ग देते है ।
महारानी चित्रलेखा भगवान ब्रह्मा के धाम जाती है ।
महारानी चित्रलेखा - हे विधाता हमें दर्शन दिजिए ।
भगवान ब्रह्माजी - देवी आपका स्वागत है ।
महारानी चित्रलेखा - परम पिता परमात्मा आज आपकी यह पुत्री आपसे कुछ मांगना चाहती है हम अपने पति का जीवन अपने आंचल में मागनें आए है आप हमें हमारे पति का जीवन लौटा दिजिए ।
भगवान ब्रह्माजी - पुत्री जो व्यक्ति मर गया हो उसे जीवित नहीं किया जा सकता ।
महारानी चित्रलेखा - परम पिता परमात्मा लेकिन यह भी तो आपका ही आदेश है कि इंसान के पुण्य कर्म का फल आप उसे इसी जन्म में देते है हम अपने पति के निस्वार्थ कर्म लाए है ।
भगवान ब्रह्माजी - इसके लिए हमें चित्रगुप्त को बुलाना पढेगा उनके ही पास है हर मनुष्य के कर्म का हिसाब उनके द्वारा ही पता चलेगा की चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के कर्म उस योग्य है या नहीं कि उन्हें जीवित किया जा सके या नहीं ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् एक पतिव्रता के सतीत्व में बहुत ताकत होती है उसके सतीत्व से भगवान के द्वार तक खुल जाते है और जो पापी होता है उसका संसार भस्म हो जाता है । राजा भोज - सहीं कहां आपने देवी । देवी - राजन् कर्म क्या है । राजा भोज - कर्म ही जीवन का आधार है जैसे कर्म वैसा जीवन कर्म भाग्य को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है इसलिए कहते है जितना सुन्दर कर्म उतना सुंदर जीवन । देवी - सही कहां आपने ।
भगवान ब्रह्माजीचित्रगुप्त जी से कहते है महाराज चित्रगुप्त मनुष्य के उत्तरदायित्व में वो कौन से पुण्य होने चाहिए जिस से उसे पुन जीवन दान दिया जा सके ।
चित्रगुप्त जी - परम पिता परमात्मा मनुष्य के जीवन में पांच प्रमुख पुण्यों की आवश्यकता होती है धर्म, सुविचार से जीवन यापन , भोजन, आयु और प्राण यदि मनुष्य ने यह सभी पुण्य कर्म किये हो अपने उत्तरदायित्व को निभाते हुए तो उसे उसके पुण्य कर्म का फल देकर उसे उसका जीवन लौटाया जा सकता है ।
भगवान ब्रह्माजी - आप यह देख कर बताएं की क्या सम्राट विक्रमादित्य ने कभी धर्म की रक्षा के लिए कुछ किया है ।
चित्रगुप्त जी सम्राट विक्रमादित्य के धर्म की रक्षा के उधारण में सम्राट विक्रमादित्य राऊ देव से संसार की रक्षा करने का प्रसंग सुनाते है ।
चित्रगुप्त जी - परम पिता उसी सम्राट विक्रमादित्य ने संसार की रक्षा की थी राऊ देव से वो एक ऐसा कर्म था परम पिता जिसे करने में समस्त देवता भी असमर्थ थे ।
भगवान ब्रह्माजी - हम सम्राट विक्रमादित्य को उनके धर्म का पुण्य लौटाते है ।
कथा में देवी कहती है राजन् क्या मनुष्य के जीवन में धर्म का इतना महत्व है । राजा भोज - हां देवी जब तक धर्म है मनुष्य सुखी जहां उसके जीवन में धर्म घठा अधर्म प्रवेश कर लेता है । देवी - सही कहां अब उनके दूसरे पुण्य की यह प्रसंग उनके शिक्षा काल का है जब उनके गुरु उन्हें ओषधी लाने के हिम प्रदेश भेज देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य अकेले एक कुटिया में थे वे कहते है इस आंधी तुफान में हमें कुटिया में ही रहना चाहिए हम सुबह निकलेंगे ओषधी के लिए तभी उन्हें कुछ आवाज आती है वे सोचते है कोई मुसीबत में होगा हमें उसकी रक्षा करनी चाहिए । सम्राट बाहर आते है तो देखते है एक समूह को वे कहते है आप सभी कुशल तो है । समूह - नहीं बन्धु इस तुफान में कुशल कैसे हम मुसीबत में है ठण्ड के मारे सभी ठिठुर रहे है विक्रमादित्य उन सभी को अपनी कुटिया में ले आते है । कुटिया को भरा देख विक्रमादित्य कहते है आप सभी विश्राम करिए हम बाहर होकर आते है । समूह - मित्र आप बाहर मत जाइए ठण्ड बहुत है बर्फीला तुफान है । विक्रमादित्य - नहीं तुफान के वक्त जंगली जानवर आ जाते है हम निगरानी रखेंगे ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी सम्राट कितने महान थे यह जानते हुए भी कि बाहर मौत है फिर भी वे बाहर चले गए । देवी - हां राजन् क्योंकि सम्राट विक्रमादित्यजानते थे परहित का सच्चा अर्थ । राजा भोज - देवी सम्राट स्वंय कहां रहे रात भर । देवी - वहीं बाहर बर्फीले तुफान में आगे देखिए राजन् ।
सुबह होते ही समूह के सभी लोग आते मगर वे कोई आम मनुष्य नहीं थे । सम्राट विक्रमादित्य उठते ही कहते है आप कौन है हमनें तो अपनी कुटिया पर कुछ लोगों को रूकने के लिए जगह दी थी । हम सभी वहीं है विक्रमादित्य हम सभी गंधर्व है और आपकी परीक्षा लेने आए थे ऐसे तुफान में आपने हमारी रक्षा के लिए स्वंय आप बाहर सो गए आप हमारी परिक्षा में सफल रहे है आप महान है विक्रमादित्य और आपके विचार भी आप में सच्चा परहित है ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् गंधर्वों ने सम्राट को आशीर्वाद दिया कि उनके जीवन में कभी कोई कमी नहीं होगी । उत्तरदायित्व के सभी गुण संसार ने सम्राट विक्रमादित्य से जाने । राजा भोज - हां देवी जीवन यापन के लिए सम्राट विक्रमादित्य का जीवन सर्वश्रेष्ठ उधारण है ।
राजा भोज - देवी सम्राट को भोजन का पुण्य कैसे प्राप्त हुआ । देवी - एक समय की बात है जब सम्राट को उनके गुरु ने सच्चे ज्ञान की खोज के लिए भेजा लौटते वक्त सम्राट जंगल में मार्ग भटक गए 15 दिन तक बिना कुछ खाए वें मार्ग खोजते है तभी उन्हें एक शिवलिंग दिखता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या शिवजी का मंदिर हो सकता है हमें यहां कुछ खाने को मिल जाए ।
राजा भोज देवी से कहते है देवी सम्राट ने किस प्रकार मुठ्ठी भर चावल से भोजन का उत्तरदायित्व निभाया होगा । देवी - उन्हें पकाकर सम्राट पहले जंगल से लकडीया लेके आए फिर लगे चावल पकाने ।
चावल के पकते ही सम्राट विक्रमादित्य उसे पत्ते में परोसते है तभी एक स्त्री पुरुष आते है और कहते है मित्र हमें कुछ खाने को मिलेगा हमने 3 दिन से कुछ नहीं खाया सम्राट अपनी 15 दिनों की भूख को छोड़कर सारे चावल उस दंपति को दे देते है । वह दंपति सम्राट से कहता है आपका बहुत बहुत धन्यवाद हमारा पैठ भर गया इश्वर आपको सदा खुश रखे ।
देवी राजा भोज से कहती है भिख में भी जो भिख दे उसने जीत लिए तीनों लोक सम्राट के इस पुण्य कर्म को भी ब्रह्म देव लौटा देते है । राजा भोज - तब तो सम्राट जीवित हो गए होंगे उन्हें जीवन का सबसे प्रमुख स्त्रोत प्राप्त हो चुका था । देवी - अभी कहां अभी तो प्राण और आयु बाकि थी । एक समय की बात है जब सम्राट अपने राज्य में अकेले भ्रमण पर निकले थे । तभी वे देखते एक लाश रहती है किंतू चिता चार लोंगो की होती है सम्राट कहते है बाबा यह क्या मृत एक है किंतु चिता चार क्यों है आप सब तो जीवित है फिर ऐसा क्यों ।
बाबा - हम सब भी जिंदा लाश के समान है में कमा नहीं सकता मेरा पुत्र अकेला कमाने वाला था घर में अब जब वो ही इस दुनिया में जीवित नहीं है तो हम सब कैसे जीवित रहेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - किंतु यह आत्महत्या है जो आप सभी कर रहे है मृत्यु एक की हुई है और आप सभी आत्महत्या का पाप क्यों लेकर जाना चाहते है आत्महत्या पाप है विधाता की इच्छा के बगैर हम नहीं मर सकते ।
बाबा - विधाता हमारे लिए नहीं है यदि होता तो हमारे बुढापे का सहारा नही छिनता ।
सम्राट विक्रमादित्य - विधाता क्रूर नहीं है वो तो कृपालु है ।
बाबा - हम आपकी किसी भी बात को नहीं सुनेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी यौगशक्ति से अपनी आधी उम्र उसनौजवान को दान कर देते है जिस से वह नौजवान फिर से उठ खड़ा होता है ।
उसकी माँ कहती है यह तो इश्वर का चमत्कार हो गया । बाबा - इश्वर का नहीं उनका चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का जिन्होंने हमारे पुत्र को जीवित किया जो हमारे लिए देवता बन कर आए सम्राट विक्रमादित्य आपकी सदा जय हो आपके ऋणि हो गए हम ।
और इसी तरह सम्राट को उनकी आयु दान का पुण्य भी मिल जाता है ।
चित्रगुप्त जी भगवान ब्रह्माजी से कहते है परम पिता सम्राट विक्रमादित्य ने अगर उस दिन अपनी आयु दान ना कि होती तो सम्राट आज जीवित होते ।
महारानी चित्रलेखा - तो क्या सम्राट के सारे पुण्य कर्म समाप्त हो जाएगें ।
चित्रगुप्त जी - नही देवी कर्म पुण्य के हो या पाप के कभी समाप्त नहीं होते ।
भगवान ब्रह्माजी - महाराज चित्रगुप्त तो सम्राट विक्रमादित्य को इसका क्या पुण्य दिया जाए ।
चित्रगुप्त जी - परम पिता सम्राट ने उस दिन तीन व्यक्तियों के प्राण बचाए इसलिए वे तीन गुणा आयु पाने के हकदार है ।
भगवान ब्रह्माजी - सत्य कहां आपने ऐसे निस्वार्थ कर्मो से ही विधि के विधान बदने जा सकते है । देवी हम सम्राट को तीन गुणा आयु प्रदान करते है । चित्रगुप्त जी अब आप देखकर बताए की सबसे अंतिम और प्रमुख क्या सम्राट विक्रमादित्य ने किसी के प्राण लौटाए है ।
भगवान ब्रह्माजी - चित्रगुप्त जी अब यह बताए क्या सम्राट ने कभी किसी के प्राण बचाएं है ।
चित्रगुप्त जी - परम पिता यह कर्म केवल संसार में उनके ही नाम है एक बार की बात है जब सम्राट धर्म यात्रा से लौट रहे थे तभी उन्होंने गिरती हुई बिजली को अपने उपर लिया था यह संसार में एक अकेला उधारण था जब किसी ने किसी की मृत्यु को अपने उपर लेकर किसी के प्राण बचाएं ।
महारानी चित्रलेखा - महाराज चित्रगुप्त इस कर्म से किस पुण्य की प्राप्ति होगी ।
चित्रगुप्त जी - देवी इस कर्म से सम्राट को उनका जीवन प्राप्त हो जाएगा ।
भगवान ब्रह्माजी - हां देवी निस्वार्थ पुण्य कर्म से सम्राट ने इतिहास रच दिया है अब तो विधि का विधान ही बोलता है कि सम्राट विक्रमादित्य को जीवॅ दान दिया जाएगा ।
भगवान ब्रह्माजी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को उनके प्राण लौटा देते है
भगवान ब्रह्माजी - पुत्री आप धरती लौक लोट जाइए सम्राट विक्रमादित्य जीवित हो चुके हे उनके जीवन का स्वागत करे आप ।
महारानी चित्रलेखा - धन्यवाद परम पिता परमात्मा भगवान ब्रह्माजी आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
महारानी चित्रलेखा धरती पर आती सम्पूर्ण प्रजा सहीत सभी लोग उपस्थित रहते है सम्पूर्ण प्रजा चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की जय के नारे लगाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य सबसे पहले ब्राह्मण देव और ब्राह्मणी के पास जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें खुशी है की देवी जीवित हो गई हमारा उत्तरदायित्व पुरा हो गया ।
ब्राह्मण देव - आपने तो अपना उत्तरदायित्व निभा लिया मगर बिना कुछ जाने सम्राट आपसे जिद करने लग गए हमें ऐसा नही कहना था ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं ब्राह्मण देव आपके कटू वचन भी हमारे लिए आशीर्वाद की तरह रहे अगर आप ऐसा नही कहते तो हम देवी को जीवित कैसे करते अपना उत्तरदायित्व कैसे पुरा करते ।
सम्राट विक्रमादित्य कहते है किंतु हम तो मर चुके थे हम जीवित कैसे हुए ।
नारद जी - नारायण नारायण सम्राट जिसकी पत्नी महारानी चित्रलेखा की तरह हो भला उसकी भी मृत्यु हो सकती है , महारानी चित्रलेखा विधाता से आपके प्राण लौट आई सतीत्व का परिचय दिया है महारानी ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी चित्रलेखा हमें गर्व है आपके उपर ।
कथा समाप्त करते हुए देवी कहती है तो ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जो कभी पीछेनहीं हटते थे उनके लिए सबसे उपर धर्म था । राजा भोज - बिल्कुल सही देवी तर यह सम्राट विक्रमादित्य की कथा सुनने का ही असर है कि में दोगुनी तेजी से आगे बढ रहा हूं वरना मनुष्य तो कठिनाईयों से घबराता है किंतु सम्राट विक्रमादित्य की कथा ही आगे बढने का बल देती है सम्राट विक्रमादित्य मेरे प्रेरणास्रोत है । तभी महामाया देवी प्रकट होती है और कहती है केवल आपके नहीं सम्पूर्ण संसार के लिए चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य प्ररेणा है , सम्राट विक्रमादित्य ने संसार को यह बता दिया था कि मनुष्य के द्वारा किया हुआ दान और पुण्य कभी व्यर्थ नहीं होता । राजा भोज - बिल्कुल सही कहा आपने देवी महामाया कभी कभी ऐसा लगता है जैसे सम्राट विक्रमादित्य कोई मनुष्य विकारों से परे हो जो इतना निस्वार्थ हो । वास्तव में सम्राट विक्रमादित्य एक असाधारण मनुष्य थे ।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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