छठा गुण परोपकार
।। छठा गुण परोपकार ।।
राजा भोज छठी सीडी की ओर आगे बढते है तभी परोपकार की देवी उन्हें रोकती है और कहती है राजन् परोपकार और त्याग में अंतर है त्याग स्वंय की खुशी के लिए भी होता है किंतु परोपकार सदैव दूसरों के लिए निस्वार्थ होता है । और राजा भोज यह सिंहासन हमारे महान परोपकारी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का सिंहासन है । उनके जैसा कोई नही आप उनका यह सिंहासन कभी प्राप्त नही कर पाएंगे । राजा भोज - देवी में अपनी तुलना चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के सामने नही कर रहा मैं केवल उनकी कथा सुनना चाहता हूँ । देवी - ठीक है राजन् में आपको चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के परोपकार की कथा सुनाती हूँ । एक समय की बात है जब सम्राट विक्रमादित्य आधी रात को अपने महल के परकोटे से अपने राज्य को देख रहे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हर घर में प्रकाश फैलाने वाली हे बातीयों आप हर घर की खबर रखती है हम नही रख पाते ।
तभी कुछ बातीयों के रोने की आवाज आती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह बातीया रो क्यों रही है लगता है या तो किसी घर में कोई संकट है या कोई संकट आने वाला है हमें तुरंत पता लगाना होगा ।
कथा सुनते वक्त राजा भोज कहते है देवी बातीया कैसे कह सकती है , देवी - राजन् जब राजा सम्राट विक्रमादित्य जैसा हो तो बातीया भी बोलने लगती है यह संसार में पहला ऐसा वाक्या था जब बातीया भी अपना दुख किसी को बता सकती थी । देवी - राजन् बातीया हर घर की कहानी जानती सुख दुख सब । देवी - राजन् एक बात का उत्तर दिजिएगा । राजा भोज - कहीए देवी । देवी - मनुष्य क्या है । राजा भोज - गलतियों का पुतला । देवी - सही कहा आपने मगर इस धरती पर सिर्फ चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ही ऐसे मनुष्य थे जिन्होंने आजीवन कोई गलती नही की ना किसी के साथ गलत होने दिया । राजा भोज - देवी आपने सही कहा मैनें भी जितनी उनका कथा सुनी सब में वे अलग ही नजर आए । देवी - सदगुणों के तो जैसे भंडार थे वे हमें उनके दरबार में अत्यंत गर्व महसूस होता था ।
राजा भोज - देवी जिसकी कथनी और करनी एक जैसी हो जो सदैव जागरूक हो उसके साथ रहने में आनंद महसूस होगा ही ।
देवी - और उस बात का संतोष केवल हमें नही दूसरे राज्यों की बातीयों तक को था वे अपना दुख सुनाने सम्राट की शरण में आती थी ।
राजा भोज - देवी क्या बातीयों का भी शरीर होता है । देवी - नही राजन् बातीयों का कोई शरीर नही होता उन्हें केवल धर्म , वचन , और कर्म से पवित्र व्यक्ति ही देख सकता है जो संसार में केवल चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य में ही था ।
राजा भोज - देवी जब तो सम्राट में उनकी भावनाओं को समझने की भी ताकत होगी और वे अपने स्वभाव अनुसार उनकी मदद जरूर करेंगे ।
देवी - इसलिए तो संसार के अंत तक सम्राट विक्रमादित्य का नाम अमर रहेगा और उनका परोपकार आज भी एक उदाहरण है ।
बातीयों के रोने की आवाज के पीछे विक्रमादित्य जाते है ।
तबी एक बाती दूसरी बाती से कहती है बहन क्या हुआ तुम रो क्यों रही हो । बहन में जिस घर में रहती हूँ वहाँ दो लोग रहते है एक अंध वृद्ध महिला और उसका बेटा किंतु उसके बेटे की कल मृत्यु होने वाली है वही दूसरी बाती कहती है मेरे राज्य के राजा कल एक बेकसूर व्यक्ति को मारने वाले है ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवियों ।
बातीया - प्रणाम सम्राट । आप यहाँ ।
सम्राट विक्रमादित्य - हाँ आप हमें यह बताए कि वो व्यक्ति कौन है जिसकी कल मृत्यु होने वाली है और उसे मारने कौन वाला है ।
बातीया - आप यह जानकर क्या करेंगे सम्राट अमीरों का सदैव गरीबों पर अत्याचार होता ही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऐसा ना कहे देवी व्यक्ति विशेष की सोच अलग हो सकती है हम अमीर है किंतु हमारे यहाँ सभी प्रसन्न है । और जहाँ समस्या है वही समाधान भी है ।
बातीया - किंतु इस समस्या का समाधान नही है चक्रवर्ती सम्राट , क्योंकि जो व्यक्ति मरेगा वो बेकसूर है और उसके भाग्य के साथ मेरा भी भाग्य जुडा है । दूसरी बाती सम्राट लेकिन में तो जलुगी किंतु इस अफसोस के साथ की जिस राजा के यहाँ में जल रही हूँ वहा एक गरीब अभागा मरने वाला है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप अचिंतित रहिए हम वचन देते है कि यह अन्याय नही होगा कभी नही । आप बस हमें यह बताए कि वो युवक कौन है और वो राजा कहा का है ।
बातीया - सम्राट उस युवक का नाम है नामदेव , और उस राज्य का नाम है भद्रपुर वह उस राज्य के राजा का नाम है रूद्रप्रताप । इस से अधिक हम आपको कुछ नही बता पाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसका मतलब है कि इस से अधिक जानकारी हमें वराहमिहिर जी ही दे पाएंगे ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आपने हमें बुलाया इतनी रात को सब ठीक तो है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही वराहमिहिर जी एक समस्या है भद्रपुर के राजा रूद्र प्रताप नामदेव नाम के युवक को मृत्यु दंड दे रहे है हम जान ना चाहता है कि वो व्यक्ति बेकसूर है या दोषी ।
वराहमिहिर जी - सम्राट इसका पता तो उस युवक की कुंडली बनाने से ही मिलेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप उस युवक की कुंडली बनाए और हमें बताए ।
वराहमिहिर जी - अवश्य सम्राट आइए हमारे साथ । उस युवक का नाम ? उस युवक का जन्म समय और स्थान ? ।
सम्राट विक्रमादित्य - उसका नाम है नामदेव , क्षमा किजिएगा वराहमिहिर जी हमें ना समय पता है ना स्थान ।
वराहमिहिर जी - कोई बात नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या हुआ वराहमिहिर जी आप चुप हो गए ।
वराहमिहिर जी - तो क्या कहूं सम्राट उस युवक के उपर काल मंडरा रहा है उसकी मृत्यु होने वाली है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इतका मतलब ।
वराहमिहिर जी - मतलब यह कि सम्राट उसके उपर मृत्यु योग चल रहा है उसका बचना नामुमकिन है ।
उधर वो युवक अपनी वृद्ध माँ की सेवा करता है ।
सम्राट विक्रमादित्य -वराहमिहिर जी आप हमें यह बताए कि काल के आने की दिशा क्या होगी ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आप अटल सत्य को रोकना चाहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही हम अन्याय को रोकना चाहते । आप हमें यह बताए कि काल के आने की दिशा क्या होगी और उसे हम पहचानेंगे कैसे ।
वराहमिहिर जी - सम्राट काल के आने की दिशा तो दक्षिण है किंतु उसकी पहचान बताना असंभव है वो किसी भी रूप में आ सकता है ।
कथा सुनते वक्त राजा भोज कहते है देवी हमें एक बात समझ नही आई कि नामदेव के भाग्य में मौत लिखी थी यह तो विधी का विधान है त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश के अतिरिक्त इसे कोई नही बदल सकता । देवी - राजन् मनुष्य अपने कर्मों से भाग्य बदल सकता है और सम्राट इस बात को समझते थे उनके जीवन का यही मूल मंत्र था वे कभी झूकते नही थे और वे तो निस्वार्थ परोपकार करने जा रहे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य तैयार होकर निकलते है तभी महारानी चित्रलेखा आ जाती है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट क्षमा करे किंतु आज हम आपका मार्ग रोकेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या कह रही है आप ।
महारानी चित्रलेखा-वही जो हर सुहागन स्त्री कहती है सम्राट हम आपको काल को रोकने नही जाने देंगे। सम्राट विक्रमादित्य - हम आपकी भावनाओं का और आपके प्रेम का सम्मान करते है महारानी जी । परंतु हमें काल को रोकने जाना ही होगा अगर नही गए तो एक वृद्ध के जीवन का आश्रय समाप्त हो जाएगा ना केवल एक बेकसूर युवक मरेगा अपितु वह अंधी माता भी मर जाएगी जिसकी सारी भावनाएं उसके पुत्र के साथ जुडी है ।
महारानी चित्रलेखा - किंतु हम आप पर भी तो कोई संकट नही आने देना चाहते ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारे साथ क्या होगा क्या नही यह तो भविष्य है किंतु उस युवक के साथ जो हो रहा है वो वर्तमान है अब आप ही बताए महारानी जी हम क्या करे ।
महारानी चित्रलेखा - हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है आपके आराध्य महाकाल और आपके आदर्श और मार्गदर्शक भगवान परशुराम आपको विजय करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस सहयोग के लिए धन्यवाद महारानी जी जय महाकाल जय परशुराम ।
युवक - माँ यह रहा भोजन आप समय से भोजन कर लिजिएगा मैं शाम को आता हूँ राजमहल में नौकरी करके ।
वृद्धा - पुत्र तु मत जा ।
युवक - माँ तुम रो रही हो मगर क्यों ।
वृद्धा - पुत्र कल रात को मुझे सपना आया की नौकरी करने जा रहा है पर वापस नही लौटेगा ।
युवक - पर माँ सपने सच नही होते है ।
वृद्धा - फिर भी पुत्र तू मतजा एक दिन नही जाएगा तो महाराज तुझे डाटेगे क्या पुत्र ।
युवक - नही माँ कोई बात आज में नही जाता नौकरी पर आज मे आपके ही साथ रहूँगा ।
सम्राट विक्रमादित्य काल को रोकने जाते है । यह क्या दिन में कुत्ते और सियांर के रोने की आवाज इसका अर्थ है काल आ चुका है काल कि अनुभूति होने पर ही यह होता है । सम्राट विक्रमादित्य अपने घोडे पर विराजमान होकर सिंयार के रोने की दिशा में जाते है तभी सामने से काला घोडा आता है। सम्राट समझ जाते हैं यही काल है वे उसे रोकते है मगर घोडे उनके पकडने पर भी उनके भीतर से चला जाता है। यह क्या काल के शरीर का तो केवल भ्रम हुआ ।
कथा सुनते वक्त राजा भोज कहते है देवी यह क्या सम्राट काल को नही रोक पाए क्योंकि उसका तो शरीर ही नही है । देवी - हाँ राजा भोज काल हवा की तरह है जो कभी किसी को नही दिखता किंतु संसार में पहली बार काल शरीर में नजर आएगा ।
सम्राट काल की आवाज के पीछे जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे संसार में विराजमान पंच तत्व पवित्र जल , वायु, अग्नि , पृथ्वी और आकाश यदि हमनें अपने जीवन में सदा ही सच्चे मन से मानवता की सेवा की है और जगत के कल्याण के लिए अपना जीवन अर्पित किया है तो हमारी सहायता करिए और काल को एक शरीर प्रदान करे ताकि हम उसे रोक सके ।
तभी अचानक तुफान आता है और सम्राट विक्रमादित्य को काल शरीर के रूप में नजर आता है और सम्राट विक्रमादित्य उसके पास जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - काल हम कभी भी किसी के साथ अन्याय नही होना देगे कहा तक भागोगे अब तुम हमसे नही बच पाओगें ।
महारानी चित्रलेखा - आचार्य वराहमिहिर जी हम यह अब तक समझ नही पा रहे कि सम्राट काल को क्यों रोक रहे है ।
वराहमिहिर जी - महारानी जी सम्राट ने एक चक्रवर्ती सम्राट होने का दायित्व निभाया है किंतु यह भी सत्य है कि काल को रोकना कभी भी शुभ नही होता । यदि कोई अपने तेज से उसे रोक भी ले तो काल उसके जीवन में प्रवेश कर लेता है ।
महारानी चित्रलेखा - हम आपकी बात समझ चुके है आचार्यश्री ।
वराहमिहिर जी - आप चिंता ना करे महारानी सम्राट विक्रमादित्य का तेज और शक्ति काल पर विजय प्राप्त कर लेगें ।
सम्राट विक्रमादित्य काल को रोक लेते है ।
काल - तुम्हारा यह दुस्साहस तुने मुझे रोका में तुम्हे समाप्त कर दूंगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - काल हम उज्जैन नरेश है यह भली भांति समझ लो युद्ध करोगे हारेंगे नही हम । हम किसी भी कीमत में एक बेकसूर को नही मनरे देंगे ।
काल - विक्रमादित्य तुम विधी के विधान में बाधा डाल रहे हो , परोपकार के हटा में तुम अपनी मृत्यु को बुलावा दे रहे हो मरना चाहते हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - मृत्यु का भय नही है हमें काल हम मरने से नही डरते हम उस युवक को इसलिए बचाना चाहते है क्योंकि वो निर्दोष है वो अपनी माँ का सहारा है ।
विक्रमादित्य और काल का युद्ध शुरू हो जाता है ।
युवक अपनी माँ से कहता है माँ हम चलते है नौकरी नर महारानी को मंदिर जाने में विलम हो रहा है तुम अब सो जाओ में जल्दी आऊंगा ।
काल - विक्रमादित्य और करोगे परोपकार हो गए तृप्त ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही काल एक परोपकारी का मन तब तक तृप्त नही होता जब तक वो अपने परोपकार का परिणाम नही देख लेता ।
विक्रमादित्य अपनी शक्तियों से काल को रोक लेते है और उसे बंदी बना देते है ।
काल - नही विक्रमादित्य तुम ऐसा नही कर सकते और काल हसने लग जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - काल हसो लेकिन आज दुनिया पहली बार देखेगी क्रूर काल को रोते हुए ।
काल - तु रोएगा विक्रमादित्य जिस व्यक्ति को तू बचाने जा रहा है वो खुद मौत के मूह में जा रहा है ।
उधर युवक नौकरी के लिए निकलता ही है तभी राज्य के सैनिक आ जाते है उसे बंदी बनाने के लिए । वृद्धा- नामदेव , मेरे बेटे को कहा ले जा रहे हो । सैनिक - हटो माता राजा का आदेश हे आपके बेटे को मृत्यु दंड मिला है ।
वही कहानी सुनाते हुए देवी कहती है काल की दृष्टि काल की चाल रोक ना पाए जिसे ब्रहमा विष्णु और महाकाल क्या रोक पाएंगे उसे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । राजा भोज - हाँ देवी अवश्य रोक पाएंगे सम्राट । देवी - क्या सम्राट के पास त्रिदेव से अधिक ताकत है । राजा भोज - देवी इश्वर ने कहा है मनुष्य अगर धर्म की रक्षा करता है तो वो किसी को भी पराजित कर सकता है । देवी - किंतु काल क्रोध में है । राजा भोज - उन जैसा व्यक्तिव उस क्रोध को समाप्त कर देगा , सम्राट जरूर बचाएंगे नामदेव को और त्रिदेव भी उनकी महानता पर फूलों से स्वागत करेंगे उनका ।
काल - विक्रमादित्य हमें छोडो बहुत हठी हो तुम विधी का विधान पुरा होने से रोक रहे हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - अगर ऐसा है तो हम विधी का विधान बदल देंगे ।
महारानी चित्रलेखा युद्ध के लिए तैयार होकर आती है ।
वराहमिहिर जी - महारानी जी यह क्या कर रही आप रूकिए ।
महारानी - हम काल से लडने जा रहे है अब यह क्षत्राणी तभी रूकेगी जब उसके सुहाग को सुरक्षित देखेगी ।
वराहमिहिर जी -महारानी आप चिंता ना करे सम्राट को कुछ नही होगा और आप काल से युद्ध करने मत जाइए एक और तरीका है आप महाकाल की पूजा करे । किंतु अभी नही जब काल सम्राट के जीवन मे प्रत्यक्ष रूप से दिखने लगे तब ।
महारानी - आप हमें बता दिजिएगा उस समय ।
उधर महाराज रूद्र प्रताप नामदेव को पकड लेते है ओर कहते है दुस्साहसी ।
नामदेव - महाराज पूछने की क्षमा चाहता हूँ मगर क्या आप मुझे बताएंगे मेरा अपराध क्या है में इस बोज तले मरना नही चाहता ।
रूद्रप्रताप - बताता हू तुमने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया हमने तुम्हे महारानी की सुरक्षा के लिए रखा था और तुमने उनका ही अपहरण किया ।
नामदेव - मगर में ऐसा क्यो करूंगा मैने यह नही किया ।
रूद्र प्रताप - सैनिकों इसे तीरों से छलनी कर दो और तब तक करना जब तक यह मर ना जाए ।
सम्राट विक्रमादित्य नामदेव के घर पहुंचते है और उसकी माँ से कहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या हुआ माई ।
वृद्धा - मेरे बेटे को सैनिक पकड कर ले गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप चिंता ना करे यह हमारा एक माँ को वचन है हम आपके बेटे को कुछ नही होने देंगे ।
वृद्धा - इश्वर करे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज सफल हो ।
उधर सैनिक नामदेव को पेड से बांद कर उसे मारने वाले होते है तभी उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हवा की तरह घोड़े पर आकर नामदेव को बचा लेते है वही सैनिक उन का पीछा करते है नामदेव पर चलने वाले सभी तीर विक्रमादित्य खुद पर ले लेते है।
।। वही कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह क्या सम्राट का संकल्प अधूरा रह गया । देवी - इतनी जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुचे राजन् हम जिसकी अमर गाथा सुना रहे है वो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है संसार के एक एकेले सर्वश्रेष्ठ सर्वगुण सम्पन्न मनुष्य । राजा भोज - जी देवी । देवी - किंतु राजा भोज सम्राट घायल हो जाते है उनके भाग्य में मृत्यु प्रवेश कर चुकी है । राजा भोज - किंतु ऐसा नही होगा सम्राट विक्रमादित्य ने जीवन भर लोगों की सहायता की वे अपने कर्मो से भाग्य की रेखा बदल देंगे । ।।
सम्राट विक्रमादित्य नामदेव को बचा लेते है किंतु खुद बहुत बुरी तरह घायल हो जाते है।
नामदेव - देवदूत आप कुछ बोल क्यों नही रहे देवदूत आपको तो कई तीर लगे है में तीर निकाल देता हूं आपके लिए जल लेकर आता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - नामदेव हमारी चिंता मत करो जाओ अपनी माँ को लेकर किसी सुरक्षित स्थान पर जाओ ।
नामदेव - नही देवदूत यू घायल अवस्था में आपको छोड कर चला जाऊ नही ।
सम्राट विक्रमादित्य - हठ मत करो नामदेव ।
नामदेव - किंतु देवदूत एक बात समझ नहीआई आपने मुझ जैसे साधारण इंसान की जान बचाने के लिए अपने प्राण संकट में डाले ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्योंकि तुम निर्दोष हो दोषी नही हो तुम और एक निर्दोष को दंड मिलना पुरे दंड विधान पर कलंक है और हम ऐसा कभी नहीं होने देंगे ।
नामदेव - काश सभी राजाओं की सोच आपकी तरह होती देवदूत ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम कोई देवदूत नही है हम एक साधारण मनुष्य है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ।
नामदेव - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य उज्जैनी नरेश । हमारे प्राण ही कयों ना चले जाए पर हम सम्राट को कुछ नही होनें देंगे हम अभी वेद जी को लेकर आते है ।
उधर महारानी चित्रलेखा चिंता में व्याकुल कहती है हे परमात्मा हमारे महाराज की रक्षा करना हमारे सुहाग को कुछ नही हो सकता ।
वराहमिहिर जी - महारानी हम आपको कुछ बताना चाहते है सम्राट की कुंडली में राऊ दोष शुरू हो चुका है जो हे तो एक केवल आज रात तक का और कल कोई अमंगल नहीं होगा परंतु आज की रात चिंता जनक है ।
महारानी चित्रलेखा - तो हम उस चिंता की चिता जला देंगे यह संकल्प है एक उज्जैन की स्त्री का और चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की पत्नी का ।
वैद्य जी नामदेव से कहते है हमने इनका हर संभव इलाज कर दिया लेकिन अब सिर्फ इश्वर का सहारा है अगर कल सुबह तक इन्हे होश ना आए तो इनके सगे संबंधी को सूचित कर दिजिएगा ।
।। उधर कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजा भोज सम्राट विक्रमादित्य का परोपकार तो उनके लिए काल बन गया है , राजा भोज - नहीं देवी विवाह के बाद इंसान का भाग्य उसका खुद का नही होता उनकी पत्नी महारानी चित्रलेखा एक पतिव्रता स्त्री थी और एक पतिव्रता स्त्री में बहुत शक्ति होती जो काल को भी पराजित कर देती है ।।
महारानी चित्रलेखा महाकाल की पुजा कर रही होती है ।
महारानी चित्रलेखा - हे महाकाल जीवन मृत्यु सब को वश में करने वाले महाकाल सम्राट को कुछ ना होने दे हमारे हाथ में दिये तब तक जलते रहेगे जब तक सम्राट वापस नही आ जाते और महारानी महामृत्युंजय मंत्र जपने लग जाती है ।
वही नामदेव कहता है नहीं सम्राट आप को कुछ नही हो सकता हे ईश्वर मेरे जीवन की रक्षा करने वाले देवदूत की रक्षा करे हे ईश्वर महाराज ने तो यह संसार बचाया सब की खुशीयों का ध्यान रखा इनकी रक्षा करे आप ।
महारानी चित्रलेखा की भक्ति सफल होती है
वराहमिहिर जी - महारानी सम्राट का जीवन सुरक्षित है राऊ काल टल गया है ।
नामदेव - वैद्य जी सम्राट को होश आ गया
वैद्य जी- सम्राट अवश्य ही आपके उपर ईश्वर की असीम कृपा है आपने मृत्यु को पराजित कर दिया अवश्य ही यह अराधना का फल है ।
सम्राट विक्रमादित्य अपने अंतर मन से देख लेते है की महारानी ने उनके लिए अराधना की , कहना तो नही चाहिए मगर हम आपके प्रेम को समर्पण के ऋणि है ।
नामदेव - सम्राट आपका बहुत बहुत धन्यवाद मेरे प्राणो की रक्षा करने के लिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं नामदेव ऋणि तो हम आपके हो गए आपने हमारे प्राणों की रक्षा की । किंतु नामदेव आपके मृत्यु दंड का कारण क्या था क्या अपराध किया था आपने ।
नामदेव - हमें ठीक से तो पता नही किंतु हां वे लोग मुझे विश्वास घाती कह रहे थे रानी को छुपाने की बात कर रहे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठीक है आप व्यास नदी की ओर जाइए आपकी माता वहीं पर है ।
नामदेव - जो आज्ञा उज्जैनी नरेश ।
रूद्रप्रताप - सैनिकों कैसे बच कर गया वो घुड़सवार अगर तुम सभी उस का पता लगा लेते तो हम उस षड्यंत्र का पता लगा लेते ।
तभी सम्राट विक्रमादित्य आ जाते है । - महाराज हमनेही बचाया था नामदेव को ।
रूद्रप्रताप - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप आपके जैसा न्यायप्रिय, परोपकारी , उदार, धर्मनिष्ठ राजा और आपने किया ऐसा षड्यंत्र।
सम्राट विक्रमादित्य - षड्यंत्र नही मानवता हमने एक बेकसूर को मरने से बचाया और हमने दंड विधान को भी कलंकित होने से बचाया है । अब हम एक चक्रवर्ती सम्राट होने के नाते एक राजा से प्रश्न करना चाहेंगे ।
रूद्रप्रताप - आदेश किजिये महाराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - नामदेव को मृत्युदंड देने का कारण क्या था ।
रूद्रप्रताप - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य नामदेव ने हमारी रानी का अपहरण किया है विश्वास घात किया है उसने ।
।। कथा सुनाते हुए देवी राजा भोज से कहती है परोपकार का धर्म है जग में अति महान कोई जाने इसे कोई रहे अंजान जो जान जाए यह धर्म हो गया जिसको यह दिव्य ज्ञान वो बन जाए भगवान । राजा भोज - आपने सही कहा देवी जैसे नामदेव और उसकी माता के लिए सम्राट विक्रमादित्य भगवान थे । ।
सम्राट विक्रमादित्य - किंतु महाराज रूद्रप्रताप आपके पास क्या ठोस सबूत है कि नामदेव ने ही आपकी रानी का अपहरण किया ।
रूद्रप्रताप - सम्राट नामदेव हमारी रानी का निजी सैनिक था जो उनकी सुरक्षा के लिए था। और एक दिन की बात है जो आपको बताने में हमें शर्म आती है नामदेव ने सबके सामने हमारी रानी का अपहरण किया था । यह हमारे विश्वास पात्र सैनिक है इन सबसे पूछ लिजिए ।
सैनिक - सम्राट उस में अचानक उस दिन इतनी ताकत आ गई कि उसके सामने हम सब बेबस थे ।
रूद्रप्रताप - देखिए चक्रवर्ती सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - महाराज हर बार देखी हुए बात सच नही होती । नामदेव के समर्पण को आप जान भी नही पा रहे । महाराज आपसे एक विनती है हमारे आने तक आप नामदेव को नही पकड़ेगे और महारानी के स्वागत की तैयारी किजिये आप ।
रूद्रप्रताप - ठीक है आपके आने तक हभ प्रतिश्रा करेगें ।
काल कहते है विक्रमादित्य काल को रोकना असम्भव है इस से नुकसान विक्रमादित्य को खुद को होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य नामदेव और उसकी माता से मिलने जाते है ।
नामदेव - आइए सम्राट कहा से आ रहे है आप।
सम्राट विक्रमादित्य - तुम्हारे राजा रूद्रप्रताप से मिलकर आ रहा हूं ।
नामदेव - क्या कहा उन्होंने मेरे बारे में ।
सम्राट विक्रमादित्य - यही की तुम अपराधी हो तुमने महारानी राजेश्वरी का अपहरण किया है ।
नामदेव - नही सम्राट कल तो में राजमहल ही नही गया तो अपहरण का तो सवाल ही पैदा नही होता ।
नामदेव की माँ - हाँ सम्राट कल नामदेव नंकरी करने गया ही नही था ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो कौन गया था तुम्हारा रूप लेकर रानी के पास । क्या तुम कुछ जानते हो कोई ऐसी घटना जिस से अपहरण का पता चल सके ।
नामदेव - हाँ सम्राट मुझे कुछ कुछ याद आ रहा है , सम्राट विक्रमादित्य महारानी जब नाग देवता की पुजा करती थी तब एक नाग आकर एक टक उन्हें देखता था पहले मुझे लगा यह साधारण है किंतु जब वो प्रतिदिन आने लगा तो मैनें उसे रोका तो उसने मुझे कहा युवक में तक्षक नाग हूं मेरा मार्ग रोकना तुम्हे बहुत महंगा पड़ेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस का अर्थ है की तक्षक नाग के साथ तुम्हारी बहस हुई है हम सारा खेल समझ गए सबकुछ समझ गए है हम ।
नामदेव - किंतु चक्रवर्ती सम्राट हम कुछ नही समझे ना तब ना अब ।
सम्राट विक्रमादित्य - नामदेव वास्तविकता यह है की तक्षक नाग शुरू से ही मनुष्य का वैरी रहा है । महारानी का अपहरण उसी ने किया है तुम से बदला लेने के लिए लेकिन तुम चिंता मत करो तुम गलत नही हो और हमारे होते हुए संसार में कभी किसी के साथ गलत नही होगा । तुम यही पर रहना हम अभी सबकुछ ठीक करके आते है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है यदि सम्राट ना होते तो एक बेकसूर मारा गया होता । राजा भोज - देवी मनुष्य के जजीवन में केवल इस जन्म नही अपितु नियती के पास मनुष्य के सौ जन्मो का हिसाब होता है जीवन की प्रत्येक घटना मनुष्य के कर्म के अनुसार होती है । राजा भोज - देवी तक्षक तो बहुत मायावी नाग है । देवी - हा राजन् राजा परिक्षित्र को भी उसने ही डसा था । राजा भोज - तो क्या सम्राट विक्रमादित्य कुछ कर पाएंगे । देवी - राजन् चुनौतीपूर्ण कार्य को निष्कर्ष तक पहुँचाने का नाम ही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है। ।।सम्राट विक्रमादित्य - हे नाग देव सदियों से मनुष्य आपकी पूजा करते आ रहा है लेकिन अब यह पूजा संकट में पढ रही है तक्षक की वजह से ।
नाग देवता - ऐसा क्या किया उसने चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - उसने पूजा में बैठी रानी रागेश्वरी का अपहरण किया है और आपके नाग लोक को कलंकित किया है आपके भक्तो की आस्था को क्षति पहुंचाई है कृपया हमें मार्ग दे तक्षक तक पहुंचने का ।
सम्राट विक्रमादित्य नाग लोक पहुंच जाते है।
वहाँ उन्हे कुछ नाग रोकने की कोशिश करते है किंतु चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपनी दैविक शक्तियों से उन सभी नागों को भगा देते है ।
नाग देवता - क्षमा करिए सम्राट विक्रमादित्य नाग राजा का प्रणाम स्वीकार करे आप ।
सम्राट विक्रमादित्य - नाग राज हम तक्षक ने मिलना चाहते है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी को राजा भोज कहते है देवी परोपकार था सम्राट विक्रमादित्य में । देवी - हा राजन् सम्राट विक्रमादित्य एक साधारण मनुष्य की रक्षा के लिए नाग लोक तक चले गए ।
तक्षक - यहा में महारानी रागेश्वरी से विवाह करूंगा और वही में सर्वशक्तिमान बन जाऊगा क्योंकि मेअअं उसके सतीत्व का हरण कर पाऊंगा ।
नागराज - तक्षक ।
तक्षक - पधारिए नागराज आपका स्वागत है हमारे विवाह में ।
नागराज - स्वागत सत्कार बाद में पहले तुम सम्राट विक्रमादित्य के मन में बैठे संशय को दूर करो ।
सम्राट विक्रमादित्य - तक्षक क्या यह सच नही कि तुमने महारानी रागेश्वरी का अपहरण किया है ।
तक्षक - अपहरण नही हमने ऐसा कुछ नही किया ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो फिर सच क्या है ।
तक्षक - नागराज सच तो यह है कि यह हमारे विवाह के पावन अवसर पर हमारा अहित करने आया है । मनुष्य जाती सदैव से हम से नफरत करती आ रही है ।
नागराज - तक्षक संभल कर बात करो क्या तुम जानते नही यह चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज है जिन्होंने संसार की रक्षा की थी इनके रक्षा करने की वजह से ही हम नाग भी जीवित बचे सम्पूर्ण संसार इनका ऋणि है । और आरोप का उत्तर प्रत्यारोप नही होता यदी तुम सत्य हो तो यह सिद्ध करो ।
तक्षक - आप कहते है तो अभी सिध्द कर देता हूं । देवी रागेश्वरी को बुलाया जाए ।
तक्षक सम्राट से कहता है सम्राट भाग्य
।। मनाओं की तुम नागराज के साथ हो वरना सारा संसार जानता है कि में कौन हूं । सम्राट विक्रमादित्य - तक्षक यह तो वक्त बताएगा तुम्हे कि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य किसे कहते है ।।
महारानी रागेश्वरी - आपने बुलाया स्वामि ।
तक्षक - आओ महारानी देखो हमारे विवाह पर हमें उपहार देने खुद पृथ्वी के एकलौते परोपकारी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आए है किंतु ये उपहार में आरोप लेकर आए है कि हमने आपका अपहरण किया ।
महारानी रागेश्वरी - नही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हम अपनी इच्छा से स्वामि तक्षक के साथ आए है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या कह रही है आप आप राजा रूद्रप्रताप की पत्नी है विवाहित है आप ।
महारानी रागेश्वरी - होंगे कभी अब हम केवल इनसे प्यार करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर यह सत्य नही है देवी ।
तक्षक - बस सम्राट बस आपके प्रत्यारोप का उत्तर आपको मिल गया है अब आपकी भलाई इसी में है कि आप यहा से चले जाए ।
सम्राट विक्रमादित्य खुद से कहते है महारानी रागेश्वरी ने तो हमे दुविधा में डाल दिया इस कथन से तच हमारे वचन का क्या होगा हम किस मुह से जाएगें सबके सामने ।हमारी आत्मा कहती है कि अपराधी तक्षक ही है ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जानते थे कि नागों में सम्मोहन की शक्ति होती है इसलिए वे बिना देर किए विवाह मंडप में पहुंच गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवी रागेश्वरी पुरी तरह सम्मोहन में है तभी बिना पलक झपकाए वे बैठी है पत्थर की तरह ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् सम्मोहन को कैसे तोड़गे सम्राट , देवी यह बात तो आम जन मानस भी जानता है कि तांबे के बर्तन या किसी धातु में खुद को देख लेने से सम्मोहन टुट जाता है तो महाज्ञानी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को कैसे यह पता नही होगा उन्होंने अवश्य यही किया होगा ।।
सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी दैविक शक्ति का प्रयोग करके देवी रागेश्वरी का सम्मोहन तोड़ दिया ।
देवी रागेश्वरी - तक्षक से कौन हो तुम हम यहा कैसे ।
तक्षक - देवी आप हमारी पत्नी होने वाली है ।
देवी रागेश्वरी - यह क्या कह रहे हो हमारी मांग में पहले से ही हमारे पति के नाम का सिंदूर चमक रहा है अधर्मी हो तुम ।
तक्षक - यह क्या कह रही है आप ऐसे शुभ अवसर पर चलो हमारे साथ हम फेरे लेते है ।
नागराज - यह क्या कह रहे हो तक्षक यह सब क्या है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नागराज यही सत्य है इसका इसने नामदेव से बदला लेने के लिए उसका रूप धरा और अपहरण किया इनका ।
नागराज - बहुत बहुत धन्यवाद चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपने हमारे नाग लोक को कलंकित होने से बचा लिया आपकी सदा जय होगी चक्रवर्ती सम्राट महाराज विक्रमादित्य ।
।। कथा सुनाते हुए देवी राजा भोज से कहती है सम्राट विक्रमादित्य ने केवल जीवन ही नही एक स्त्री के सतीत्व की भी रक्षा की , राजा भोज - हा देवी जब मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है तो वो जाने अन जाने धर्म ही करता है । देवी - राजन् तक्षक भगवान राम के कुल का वंशज और इंद्र देव का परम मित्र था ऐसे उच्च कुल और उच्च संस्कृति में रहकर तक्षक ऐसा कैसे हो गया । राजा भोज - देवी मनुष्य के जीवन में जब कुछ गठीत हो जाता है तो वह ऐसा करता है जैसे महाभारत काल में पाण्डवों के लाकशागृह में आग लगने से पुरा जंगल जल उठा था तब उसी जंगल में तक्षक की माँ की भी मृत्यु हो गई थी तब से तक्षक मनुष्य जाती का विरोधी है जिसे आप और हम अधर्म कहते है तक्षक के लिए वो बदले का कारण है । देवी - किंतु राजन् पाप और अधर्म की आयु कभी ज्यादा नही होती किसी युग में नही और अब तक्षक केकर्मो का न्याय स्वंय नयायशील परोपकारी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य खुद करेंगे उसके कर्मो का निष्पक्ष न्याय ।
नागराज - तक्षक तुमने अपराध किया है।
सम्राट विक्रमादित्य - नागराज तक्षक का पाप क्षमा के योग्य नही है ।
नागराज - सम्राट विक्रमादित्य आपका न्याय संसार में सर्वश्रेष्ठ है सर्वमान्य है आप ही देंड दे तक्षक को ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और तक्षक में युद्ध शुरू हो जाता है तभी तक्षक छल करके सम्राट विक्रमादित्य के उपर जहर से हमला कर देता है तक्षक के जहर से सम्राट विक्रमादित्य का शरीर जल कर राख हो जाता है ।
तक्षक - विक्रमादित्य के साथ साथ पुरी दुनिया यह सुन ले की तक्षक को कोई नही मार सकता को दंड नही दे सकता जो तक्षक से लडेगा उसका विक्रमादित्य जैसा हाल होगा ।
तभी अचानक चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जीवित हो जाते है क्योंकि उनके पास सभी दैविक शक्तियाँ थी वे जैसे ही जीवित होते है तक्षक चोक जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य और तक्षक में फिर युद्ध शुरू हो जाता है सम्राट विक्रमादित्य भारी पढते है यह देख तक्षक घबरा कर अपना नाग रूप धारण कर अनेक फनों से सम्राट विक्रमादित्य पर हमला करता है । सम्राट विक्रमादित्य तलवार लेकर तक्षक के सभी फन काट देते है । तक्षक फिर इंसान के रूप में आ जाता है । सम्राट विक्रमादित्य तक्षक को बंदी बना लेते है ।
तक्षक - नही ऐसा नही हो सकता में मुझे कोई भी नही हरा सकता एक मानव मुझे कैसे पराजित कर सकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - तक्षक तुम्हारी हार का मुख्य कारण तुम्हारा पाप है तक्षक तुम ने हमेशा मनुष्य जाती के साथ छल किया है इसलिए आज एक मानव ने ही तुम्हे तुम्हारे कर्मो का दण्ड दिया है ।
उधर रूद्रप्रताप के पास रानी रागेश्वरी लौट आती है ।
रूद्रप्रताप - आइए सम्राट आप शुम समय पर आए देखिए महारानी आ गई ।
रानी रागेश्वरी - नही महाराज हम एकेले अपने दम पर नही आए हमे लाने वाले यही है सम्राट विक्रमादित्य ।
रूद्रप्रताप - सम्राट विक्रमादित्य आप बहुत महान है आपने तो हमे अपना ऋणि बना दिया ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही महाराज रूद्रप्रताप मनुष्य कभी मनुष्य का ऋणि नही होता अगर आपको ऋणि होना है तो परम पिता परमात्मा का होना चाहिए जिन्होंने हमें यह महान कार्य करने में सहयोग किया ।
तक्षक - मुझे क्षमा कर दिजिए महाराज ।
रूद्रप्रताप - क्षमा मुझ से नही उस अंगरक्षक से माँगो उसकी अंधी माँ से माँग , सम्राट विक्रमादित्य ना जाने वो कहा होंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - चिंता मत करो महाराज वे आ गए ।
रूद्रप्रताप - मुझे माँफ कर दो नामदेव ।
तक्षक - मुझे क्षमा कर दो अंगरक्षक ।
रूद्रप्रताप - नाग राज आप तक्षक को लेजाइए यहाँ से । नामदेव तुम हमारे साथ हीरहो तभी में समझूंगा की तुम ने मुझे माँफ कर दिया ।
नामदेव - कोई बात नही महाराज ।
रूद्रप्रताप - धन्यवाद चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी इतने खुशी के अवसर पर आपकी आंखो में आंसू क्यों ।
रानी रागेश्वरी - सम्राट हमारा अनुष्ठान अधूरा ही रह गया ।
सम्राट विक्रमादित्य वहाँ से निकल कर काल के पास पहुंच जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - काल हमें क्षमा करे अगर संसार हित का कार्य ना होता तो कभी आपको बंदी नही बनाते ।
काल - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपने आपकी समस्या का निवारण कर दिया पर हमारी समस्या का क्या ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या है आपकी समस्या ।
काल - हम बिना किसी को साथ ले जाए यह संभव नही आप न्यायप्रिय उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है ना करिए हमारी समस्या का निवारण दिजिए हमें न्याय किसे साथ ले जाए हम कौन है वो जो अपनी इच्छा से हमारे साथ चलेगा और विधि के विधान को पुरा करेगा । हमें किसी का जीवन दिजिए विक्रमादित्य और हमारा आना सार्थक किजिये ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजा भोज बताइए अब क्या होगा । राजे भोज - देवी यह तो सत्य है कि काल आता अकेले है किंतु किसी को साथ लिए बगैर नही जाता और जहाँ तक बात है सम्राट विक्रमादित्य की तो वे किसी के साथ अन्याय नही होने देंगे काल के साथ भी नहीं ।
काल - बोलिए सम्राट आपने विधि के विधान को बदल दिया है समय के चक्र को बदल दिया है समय यही थम गया है आपने विधि के विधान में बाधा उत्पन्न की है आप उत्तरदायी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम विधि के विधान में बाधा उत्पन्न नही होने देंगे आपको केवल एक आत्मा ही चाहिए ना काल देव।
काल - हाँ सम्राट विक्रमादित्य मगर कौन अपनी मर्जी से अपनी आत्मा देकर जीवन का त्याग करेगा कौन है वो जीव ।
सम्राट विक्रमादित्य - वो जीव आपके सामने खड़ा है कालदेव हम चलेंगे आपके साथ ।
काल देव - नही सम्राट विक्रमादित्य यह क्या कह रहे है आप में आपको नही लेजा सकता आपका मरना मतलब संसार का विनाश धरती पर धर्म का खत्म और पाप का उदय नही सम्राट जब तक आप धरती पर है तब तक ही धरती पर ब्राह्मणों , गाय , संतो , महिलाओं का सम्मान है आपके जाने का मतलब धरती पर अंधकार कभी ना खत्म होने वाला अंधकार आ जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही काल देव समय ने बड़े से बड़े घाव भर दिये है यह भी भर जाएगा ।
कालदेव - नही सम्राट आपके जैसा आज तक कोई मनुष्य नही हुआ आपके जाने का घाव संसार में कोई समय कोई सदी कोई युग नही भर पाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - कालदेव हम खुद मर जाएगें पर कभी किसी को मरने नही देंगे आप हमे ले चलिए ।
काल देव - न्यायप्रिय परोपकारी चरित्रवान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का आदेश हमें स्वीकार है ।
काल देव - सम्राट विक्रमादित्य हमें आदेश दिजिए की हम आपकी आत्मा को आपके शरीर से दूर कर सके हम जानते है कि आप सशरीर हमारे साथ चल सकते है परंतु काल के यहाँ यह व्यवस्था नही है आप हमें अनुमति दे की हम आपकी आत्मा को आपके शरीर से अलग कर सके ।
सम्राट विक्रमादित्य - अनुमति है आपको ।
काल सम्राट विक्रमादित्य को यम लोक लेकर जाते है
यमराज - काल इतने समय तक कहा थे तुम जबकि तुम बिजली की गति से जाते हो ।
काल - प्रणाम यमदेव पृथ्वी लोक पर एक सत्य पुरूष ने मुझे रोक लिया था इस वजह से में जिसे लेने गया था उसकी जगह उन्हें लेकर आया हूं ।
यमदेव - किसे लेकर आएहो ।
काल - इन्हे ।
यमदेव - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को लेकर आए हो तुम मगर क्यों ।
कालदेव - क्योंकि इन्होंने मुझे उचित समय पर जीव तक पहुंचने से रोक दिया था ।
तभी स्वर्ग के राजा और सम्राट विक्रमादित्य के परम मित्र देवराज इंद्र आ जाते है ।
देवराज इंद्र - यमराज यह क्या किया है काल ने इसने सम्राट विक्रमादित्य को अकाल मौत दी है ।
सम्राट विक्रमादित्य - नही इंद्र देव हम अपनी इच्छा से आए है ।
इंद्र देव - सम्राट विक्रमादित्य आपकी इच्छा आपके जीवन पर है मृत्यु पर नहीं अभी आपको जीना है सम्राट विक्रमादित्य संसार को आपकी जरूरत है हम देवताओं को आपकी जरूरत है । यमराज सम्राट विक्रमादित्य के प्राण लौटा दिजिए ।
यमराज - यह संभव नही है इंद्र देव क्योंकि जिस नामदेव की मृत्यु होने वाली थी वो ही नामदेव रूद्रप्रताप के यहाँ संतान के रूप में जन्म लेने वाला था पुरी व्यवस्था रूक चुकी है ।
इंद्र देव - इसका कुछ उपाय ।
यमराज - केवल एक देवराज यदी सम्राट विक्रमादित्य अपने पुण्य कर्म से संतान की व्यवस्था कर सके एक सप्ताह में तो यह व्यवस्था फिर से शुरू हो जाएगी ।
इंद्र देव - तो लौटा दिजिए सम्राट विक्रमादित्य का जीवन यमराज सम्राट विक्रमादित्य एक प्रतापी सम्राट है वो एक सप्ताह के अंदर संतान की व्यवस्था कर देंगे ।
देवराज इंद्र के आदेश पर सम्राट विक्रमादित्य को फिर से जीवन मिल जाता है ।
सम्राट विक्रमादित्य जीवित होते ही कहते है अब इस कार्य में विधाता ब्रह्म देव ही हमारी सहायता कर सकते है । सम्राट विक्रमादित्य भगवान ब्रह्मा का यज्ञ करते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे परम पिता परमात्मा विधाता भगवान ब्रह्मा आप हमें दर्शन दे हम मुसीबत के दलदल में फस गए है हमारा मार्गदर्शन करे प्रभु हमारे सम्मुख उपस्थित होए ।
भगवान ब्रह्माजी - परम प्रतापी उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अपनी आँखें खोलिए और बताए क्या समस्या है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे ब्रह्मदेव मार्ग बताए कि हम कैसे संतान दे उन्हें ।
भगवान ब्रह्माजी - सम्राट विक्रमादित्य इसका एक उपाय है संतान दान ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे विधाता हम अपनी संतान दान करते है उन्हें ।
भगवान ब्रह्माजी - नही सम्राट यह निर्णय केवल आपका नही आपकी पत्नी से भी एक बार पूछना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम जानते है अपनी पत्नी को वे मना नही करेगी ।
भगवान ब्रह्माजी - फिर भी वो एक स्त्री है स्त्री के जीवन का सबसे बड़ा सुख ही मातृत्व होता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम उन्हें मना लेंगे ब्रह्मदेव ।
भगवान ब्रह्माजी - और यह भी जान लिजिए कि आपके जीवन में केवल एक ही संतान का सुख है यह दान करने के बाद आपकी कोई संतान नहीं होगी आपकी पत्नी कभी माँ नही बन पाएगी आप अपनी संतान का मुख कभी नही देख पाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने निर्णय ले लिया है ब्रह्मदेव अगर हमारे परोपकार से किसी का भला होता है तो हम यह परोपकार करेंगे ।
भगवान ब्रह्माजी - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप बहुत महान है संसार में आपके जैसा व्यक्ति मैनें कभी नही देखा ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी सम्राट विक्रमादित्य ने ना दान करने वाली वस्तु को भी दान कर दिया नमन है सम्राट विक्रमादित्य को । देवी - किंतु राजन् कभी निर्णायक घड़ी बाकी थी सम्राट विक्रमादित्य ने पुरूष होने के नाते यह निर्णय ले लिया किंतु महारानी चित्रलेखा के लिए यह फैसला कठीन है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट इस बार आपने बहुत प्रतिक्षा करवाई किसकी परीक्षा ले रहे थे हमारे धैर्य की ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी चित्रलेखा जब तक आप हमारी सांसो में है तब तक हमें कुछ नही हो सकता ।
महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य को प्रणाम करती है और कहती है सम्राट हमें आशीर्वाद दिजिए की हमारी सांसो में आपकी भक्ति सदैव रहे । सम्राट आप जिस कार्य को पुरा करने गए थे वो पुरा तो हो गया ना ।
सम्राट विक्रमादित्य - कार्य तो पुरा हो गया किंतु एक काम अधूरा रह गया उसे केवल आप ही पुरा कर सकती है आइए हमारे साथ हम आपको पुरी बात बताते है ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट उनके भाग्य में संतान नही है किंतु आप दुखी ना होए आप किसी का भाग्य तो नही बदल सकते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम एकेले नही किंतु मिलकर कर सकते है ।
महारानी चित्रलेखा - कैसे सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - यदि हम और आप मिलकर अपने भाग्य की संतान दान करदे तो यह अवश्य हो सकता है । महारानी महारानी ।
महारानी चित्रलेखा - आप हम से हमारा सबकुछ मांग लिजिए किंतु हमारे कुल के दिपक को हम किसी के सुख के लिए दान नही दान करेंगे सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऐसा नही है कि हम कठोर है और आपकी भावनाओं को समझ नही पा रहे किंतु कुल का सम्मान संतान से नही धर्म से चलता है जीवन का सच्चा सुख परोपकार में है । महारानी आपका मुह फेर लेना मतलब आपका निर्णय मना है किंतुकोई बात नही हम आपके उपर कोई दबाव नही डालेंगे आप अफना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है ।
महारानी चित्रलेखा - हे महादेव यह आपने हमें किस धर्म संकट में डाल दिया एक और पति धर्म तो एक और स्त्री धर्म और तीसरी और मातृ धर्म एक ओर पति धर्म नही निभाएंगे तो पाप के भागी बनेंगे तो वही स्त्री धर्म नही निभाया तो बांज का कलंक रहेगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी चित्रलेखा आंसू पोछे ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट आप हो बताए हम किस और जाए ।सम्राट विक्रमादित्य - आप किसी और ना जाए अपने फैसले पर अड़ीग रहे संतान दान करने का संकल्प हमारा है आपका नही किंतु हम आपसे बस यही कहेंगे की आप कोई भी निर्णय लेने से पहले एक बार हमारे साथ चले हम आपको कुछ दिखाना चाहते है फिर निर्णय ले आप ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा भेस बदल कर रूद्रप्रताप के दरबार में जाते है तभी रूद्रप्रताप अपनी प्रजा को संबोधित करते है प्रजाजनों हमने निर्णय लिया है कि हम आज रात्री के समय जल समाधी लेंगे हम अपने राज्य को उसका कुल दिपक नही दे पाएं हम अपने राज्य की परम्परा के अनुसार जल समाधी लेंगे ।
महारानी चित्रलेखा वहाँ से चली जाती है सम्राट विक्रमादित्य उनसे कहते है क्या हुआ महारानी ।
महारानी चित्रलेखा - हम अपना कार्य पुरा करने जा रहे है हम राजा रूद्रप्रताप और रानी रागेश्वरी के दुख नही देख सकते हमारे अजन्मे शिशु को दान करने से यदी रूद्रप्रताप के पुरे राज्य की प्रजा का भला होता है सुख के पल आते है तो हम अपना मातृत्व सुख को दान कर देंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह क्या कह रही है आप महारानी ।
महारानी चित्रलेखा - हम सही कह रहे है सम्राट और यही हमारा अंतिम और अटल निर्णय है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको पाकर धन्य हो गए हम महारानी चित्रलेखा आप ही हमारी प्रेरणा हो ।
देवी राजा भोज से कहती है राजन् किन विचारो में खो गए आप । राजा भोज - देवी महारानी चित्रलेखा कितनी महान थी एक तरफ जिस दान का वे तीव्र विरोध कर रही थी वहीं दूसरी तरफ किसी का दुख देखकर वे सहज ही तैयार हो गई । देवी - यही विशेषता थी उनकी उन्हें दूसरो को जीवन देना आता था संसार की समस्त स्त्रियों के लिए वे प्रेरणा थी उनके जीतना बड़ा त्याग तो किसी ने किया ही नही था । राजा भोज - हां देवी और सम्राट विक्रमादित्य बहुत सौभाग्यशाली थे जिन्हे संसार की सर्वश्रेष्ठ महिला पत्नी के रूप में मिली , चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा सम्पूर्ण मानव जाती के लिए माता पिता की तरह है ।
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा तप में बैठ जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हे परम पिता परमात्मा हम सच्चे मन से आपकी प्रार्थना करते है ।
महारानी चित्रलेखा - की हमारी भाग्य की संतान हम राजा रूद्रप्रताप और रानी रागेश्वरी को दान करते है ।
उधर रूद्रप्रताप और रागेश्वरी जैसे ही पानी में समाधी लेते है तुरंत रागेश्वरी को अहसास होता है कि उनके गर्भ में संतान है तभी रूद्रप्रताप वैद्य को बुलाते है ।
वैद्य - महाराज महारानी गर्भवती है चमत्कार हो गया महाराज ।
राजा रूद्रप्रताप - हे प्रभु आपने हमें संतान दे दी ।
तभी भगवान ब्रह्माजी प्रकट होते है और कहते है रूद्रप्रताप यह उपहार प्रभु ने नही परोपकारी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने दिया है । तभी रूद्रप्रताप और रागेश्वरी सहीत पुरी प्रजा उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की जय जयकार के नारे लगाती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी चित्रलेखा आपने जो महान कार्य किया है इसे संसार हमेशा याद रखेगा ।
तभी देवराज इंद्र और काल उपस्थित हो जाते है ।
देवराज इंद्र - सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा आज आप दोनों ने परोपकार का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है वो संसार में ध्रुव तारे की तरह चमकेगा आपके जैसा परोपकार ना संसार में कभी किसी ने किया है ना कभी कोई कर पाएगा सच में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य इस संसार में आप धर्म के सच्चे प्रतिनिधी है । सम्राट कहा जाता है मनुष्य को इश्वर या देवता के दर्शन वह भारत भूमि पर जन्म मिलना सौभाग्य की बात होती है किंतु सम्राट विक्रमादित्य आपको पाकर तो देवताभगवान और भारतवर्ष धन्य हो गया जहा के राजा आप है सम्राट में आपको वरदान देता हूं की आपकी ख्याति जगत में ब्रहमा विष्णु शिव की तरह अमर रहेगी और आपको संतान सुख मिलेगा आप भविष्य की प्रतिक्षा करे ।
सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा - धन्यवाद देवराज इंद्र ।
काल - सम्राट विक्रमादित्य आज पहली बार ऐसा हुआ है और आपको धन्यवाद आपने विधि के विधान को बचा लिया में आपको आपका जीवन सदैव के लिए लौटाता हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवराज इंद्र और कालदेव आप दोनों को बहुत बहुत धन्यवाद ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट क्या जो हमने काल के मुख से सुना वो सच है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां महारानी चित्रलेखा ।
महारानी चित्रलेखा - आपने हमें इतनी बड़ी बात क्यों नही बताई सम्राट अगर आज हम कहीं परोपकार नही करते तो हम सबकुछ खो देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी चित्रलेखा हम चाहते थे की आप स्वेच्छा से परोपकार करे ।
महारानी चित्रलेखा - आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने हमें परोपकार से परिचित करवाया ।
सम्राट विक्रमादित्य - सच्चा परोपकार कभी व्यर्थ नही होता महारानी आप देखना आपको इसका पुण्य मिलेगा ।
कथा समाप्त करते हुए देवी कहती है - ऐसे थे हमारे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जिनके लिए परोपकार पुजा के समान था । राजा भोज - जी देवी ।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य
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