आंठवा गुण पुरूषार्थ
।। आंठवा गुण पुरूषार्थ ।।
राजा भोज जैसे ही आगे बढते है एक देवी प्रकट होती है वह उनका रास्ता रोक देती है । देवी - राजन् में पुरूषार्थ की देवी हूं और आप यहाँ तक पहुचें अर्थात् आप में भी कुछ मात्रा में पुरूषार्थ है लेकिन इस संसार में केवल एक ही पुरूषार्थी है । राजा भोज - कौन चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । देवी - हां उनके समान पुरे संसार में दूसरा कोई पुरूषार्थी नहीं है । राजा भोज - तब तो उनके पुरूषार्थ की कथा सुनना चाहिए । देवी - राजन् एक समय की बात है जब सम्राट विक्रमादित्य अपनी पत्नी महारानी चित्रलेखा के साथ सिंह लग्न के शुभ मुहूर्त में अपनी प्रजा की खुशहाली के लिए माँ लक्ष्मी की पूजा कर रहे थे ।
महारानी चित्रलेखा - क्या हुआ सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी क्या आप कुछ सुनाई दे रहा है ।
महारानी चित्रलेखा - नहीं सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें सियारों के रोने की आवाज आ रही है ।
महारानी चित्रलेखा - इस शुभ घड़ी में उनका रौना तो किसी अपशगुन का प्रतित होना है ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी इसका अर्थ है कोई अप्रिय घटना घठने वाली है कुछ अनर्थ होने वाला है हमें तुरंत इस विषय में जान ना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य माँ लक्ष्मी को हाथ जोड़ कर अपने अश्व पर सवार होकर निकल जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुत्तो के रोने का अर्थ है कि धर्म पर संकट आने वाला है मगर हमारे राज्य में क्या संकट आ सकता है हमें पता लगाना होगा इसी दिशा से रोने की आवाज आ रही है हमें यही आगे बढना चाहिए । कुछ दूर जाने पर सम्राट विक्रमादित्य देखते है शिव जी का मंदिर , यह मंदिर इतना गंदा क्यों हो रहा है और गांव के लोग कहां है सुनो यहां आओ ।
गाँव वासी - सम्राट विक्रमादित्य की जय हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस मंदिर के पंडित जी कहां है ।
गाँव वासी - सम्राट यहाँ किसी के पास समय नहीं है मंदिर में आकर हाथ जोडना तो दूर कोई दिया बाती भी नहीं करता ।
सम्राट विक्रमादित्य - ऐसा क्या हुआ यहाँ पर ।
गाँव वासी - सम्राट यहाँ के सभी लोग आश्रम में है आप वहाँ जाकर देखे इसके आगे हम कुछ नहीं बता पाएंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद हम जाकर देखते है ।
सम्राट विक्रमादित्य आश्रम पहुंच जाते है और देखते है कि वहाँ एक सुंदर नर्तकी के नृत्य में सभी लोग व्यस्त है सम्राट विक्रमादित्य कहते है यह क्या हो रहा है सुबह सुबह हमारे राज्य की प्रजा पूजा अर्चना की जगह विलासिता में डूबी है जहां भजन और कीर्तन की ध्वनी आनी चाहिए वहां से नृतकी के घुंघरू की आवाज आ रही है कैसा अधर्म हो रहा है धर्म के रक्षक ब्राह्मण और ऋषि भी विलासिता में डूबे है पहले तो ऐसा कुछ नहीं था नहीं यह कोई साधारण बात नहीं है जरूर यह कोई माया है ।
सैनिक - सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - सैनिक यह स्त्री कौन है ।
सैनिक - सम्राट यह स्त्री हमारे राज्य की नहीं है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इस अधर्म में इसी ठगनी का हाथ है हमें इस स्त्री का भेद खोलना ही होगा ।
सैनिक - सम्राट यह अनर्थ केवल यहीं नहीं हो रहा है सम्पूर्ण राज्य में यहीं हो रहा है केवल आश्रम हीं नही हमारे क्षत्रिय योद्धा और आम जन मानस के साथ भी अनर्थ हो रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या हमें राज्य की रक्षा के लिए कुछ करना ही होगा हमारा राज्य धर्म का प्रतिक था हमें इसे पुणः धर्म के मार्ग पर लाना होगा ।
राज्य में दूसरी ओर एक व्यक्ति स्वर्ण लेकर घूमता है और कहता है भाईयों यह वेद पुराण छोड़ो जो इश्वर दिखता ही नहीं उसकी पूजा छोड़ो और इस धन को गृहण करो । इश्वर की निर्जीव मूर्तियों का त्याग करे आपके सुख दूख में इश्वर काम नहीं आता काम केवल धन आता है । तभी सभी लोग मूर्तियों का त्याग करके धन ले जाते है ।
सम्राट विक्रमादित्य आ जाते है - रूकिए सभी । सम्राट विक्रमादित्य उस व्यक्ति से कहते है महाशय आप क्यों लोंगो को धन का लालच देकर इश्वर से दूर कर रहे है ।
वह व्यक्ति - सम्राट किस इश्वर की बात कर रहे है आप वो जो किसी को दिखाई नहीं देता ।
सम्राट विक्रमादित्य - महाशय धन जरूरत की पूर्ति करता है किंतु इश्वर सबसे उपर है ।
महाशय - सम्राट धन मनुष्य से लेकर देवता तक को प्रसन्न कर देता है अगर धन नहीं होगा तो यज्ञ नही होगा , तर्पण नहीं होगा पूजा नहीं होगी, सबकुछ धन से ही सम्भव है इसकी सत्ता के सामने सबके सर झूकेंगे यहीं है भविष्य का ईश्वर आइए सम्राट ।
तभी सेनापति तलवार उठा लेते है किंतु सम्राट उन्हें रोक लेते है । सम्राट विक्रमादित्य - सेनापति इश्वर की सभी मूर्तियां हमारे राजमहल लेकर चलिए हम इश्वर का अपमान नहीं सह सकते ।
कथा सुनाते हुए देवी राजा भोज से कहती है राजन् सम्राट विक्रमादित्य के राज्य में अधर्म बढ रहा था पुरूषार्थ समाप्त हो रहा था । राजा भोज - देवी सम्राट विक्रमादित्य जैसे धर्मनिष्ठ राजा के राज में यह अधर्म कर कौन रहा था । देवी - यही प्रश्न तो सम्राट विक्रमादित्य के मन में भी था मगर वे यह पता नही लगा पा रहे थे । राजा भोज - क्या चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य पता नही लगा पा रहे थे । देवी - हां क्योंकि यह घटना केवल उनके राज्य नहीं अपितु पूरी पृथ्वी पर ऐसी घटनाएं सामने आ रही थी । राजा भोज - जब तो वो निराश होंगे हार कर बैठ गए होंगे । देवी - राजन् वो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य थे उन्होंने हारना तो कभी सिखा ही नही वे सम्पूर्ण जीवन अजय रहे । थक कर और हार कर बैठने वालो में से वे नहीं थे जहां भी ऐसी घठना की सूचना उन्हें मिलती वे वहां जाकर देखते और समस्या का निवारण खोजते ऐसी ही एक जगह वे गए ।
राज्य के एक कौने में एक स्त्री सब को बुलाती है और कहती है सुनो जहां तक नजर जा रही हो वो जमीन तुम सभी की ।
प्रजा - मगर मुल्य क्या चुकाना होगा ।
स्त्री - कोई मुल्य नहीं यह जमीन मेरी थी में यहां से जा रही हूं तो सोचा आप सब में जमीन बाट लू ।
प्रजा - तो दिजिए ।
स्त्री - ऐसे नहीं जो व्यक्ति जहां तक दोड कर जाएगा वहां तक धरती उसकी यह स्वर्ण अवसर है राजा बनने का जाओ और राजा बनो आप लोग अपना अलग अलग राज्य बसा सकते हो यह राजा बनने का अवसर है ।
सम्राट विक्रमादित्य मन में कहते है हे परमात्मा यह क्या हो रहा है ऐसे तो जन मानस में ऐकता समाप्त हो जाएगी ।
लोग दोड दोड कर पागल होने लगते है भटक जाते है तभी उसे एक व्यक्ति दिखता है वे स्वंय सम्राट विक्रमादित्य होते है ।
स्त्री - अरे भाई तुमको नहीं चाहिए क्या धरती तुम्हे नहीं बन ना राजा ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें राजा बनने की जरूरत नहीं हम खुद चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है और हम किसी के सहयोग से नही अपने दम पर बने है । आप ऐसा क्यों कर रही है लोगों के मन में क्यों मोह पैदा कर रही है ।
स्त्री - मोह नहीं सम्राट मुझे यह जमीन नहीं चाहिए इसलिए इन्हें दे रही हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप असत्य कह रही है यह धरती आपकी नहीं है उज्जैनी राज्य की है आप लोगों को धर्म से भटका रही है । कल यही मोह इसी धरती पर इनकेरक्त से रंग जाएगी , तुम कौन हो और कहां से आई हो हम नहीं जानते मगर तुम जहां इन्हें ले जाना चाहती हो वहां हम तुम्हे इन्हें नही ले जाने देंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य प्रजा को रोकते है किंतु प्रजा उनके खिलाफ होकर उनकी हत्या की बात करती है उनकी बात नही सुनती है । प्रजा धरती का बटवारा उस स्त्री से करने को कहती है और कहते है देवी अब आप ही तय करे धरती किसकी है ।
स्त्री - यह धरती आप सब की है ।
प्रजा एक दूसरे से लड़ने लग जाती है धरती के नाम पर ।
सम्राट विक्रमादित्य देवी आप देख रही है ना यह लोग एक दूसरे के खुन के प्यासे हो गए है ।
स्त्री - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य जोरू और जमीन तो लेती ही है बलिदान इसमें कौन सी बढी बात है में दोषी थोडी हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप दोषी है इस सब में ।
सम्राट विक्रमादित्य प्रजा के हाल देख कर कहते है यह कैसा मोह है जीवन की कोई कीमत ही नहीं ।
वहीं दूसरी और एक आश्रम में ऋषि क्रोध ना करे यह ज्ञान अपने भक्तो को देते है उन भक्तो के समूह में एक अलग व्यक्ति होता है वह कहता है महाराज जब हमारा कोई अहित चरे तब तो क्रोध आएगा ही महाराज कहते है वत्स क्रोध को काबु में करना सिखना होगा आओ हम सभी ॐ मंत्र का जप करे । उस जप के समय वह अधर्मी व्यक्ति ऋषि को पत्थर मारता है तभी महाराज पत्थर मारने लग जाते है सभी को । उसी वक्त सम्राट विक्रमादित्य आ जाते है और ऋषि को काबू में कर कहते है । महाराज जी यह क्या कर रहे है आप आप अपने स्वभाव के विपरीत कार्य कर रहे है इतना क्रोध क्यों ।
महाराज - सम्राट इन लोगो ने मुझे क्रोध दिलाया ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप चलिए हमारे साथ ।
वह अधर्मी व्यक्ति सोचता है कि यदी एक सन्यासी क्रोध की अग्नि में जल रहा है तो संसार का क्या होगा पुरा संसार जलेगा क्रोध में हम पुरूषार्थ खत्म कर देंगे ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् संसार में अधर्म बढ रहा था व्यभिचार अनाचार बढ रहा था और यह सब कर कौन रहा है इसका केंद्र पता नहीं चल पा रहा था ।
देवी - राजन् संसार में पुरूषार्थी तो केवल एक ही थे चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और उनके ही उपर यह जिम्मेदारी थी वह अब उस केंद्र को ढूंढ रहे थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी आप अपने ज्योतिष ज्ञान से पता करे की यह सब कर कौन रहा है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट में इसमें आपकी कोई सहायता नहीं कर सकता यह ज्योतिष ज्ञान के बाहर का विषय है ।
सम्राट विक्रमादित्य - तो क्या हम इस समस्या का निवारण नही कर पाएंगे ।
वराहमिहिर जी - ज्योतिष के अलावा एक और सूत्र है हमारे पास है ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या विस्तार से बताए आप ।
वराहमिहिर जी - यह देखिए सम्राट जब वो धनी व्यक्ति यह धन बाट रहा था तब हमने इसकी जांच की तो पता लगा की यह धन पृथ्वी का है ही नहीं क्योंकि पृथ्वी पर आपके चित्र के सिक्के की स्वर्ण मुद्रा चलती है यह किसी और लोक की है यह में अभी आपको नहीं बता पाऊंगा । सम्राट याद करिए जब वो स्त्री बिना वजह धन बांट रही थी भूमि दे रही थी जिस से मनुष्य आलसी बन जाए यह और कोई नही मोह का संचार था । सम्राट इस समय संसार में जो घटना घट रही है यह संकेत है संसार में काम , क्रोध, लोभ, मोह अपने पेर पसार रहा है यह मनुष्य को इश्वर और धर्म से दूर कर रहा है जिस प्रकार से आपने सम्पूर्ण धरती पर धर्म की स्थापना है उसे खत्म करने का यह षडयंत्र है । यह चारौ पुरूषार्थ के कट्टर शत्रु है इन सबका उद्देश्य केवल एक है पुरूषार्थ को खत्म करना और सबसे बढी बात यह है कि यह सभी इस वक्त सशरीर उपस्थित है ।
वहीं दूसरी ओर वे चारो काम क्रोध लोभ मोह कहते हम सभी इस संसार से धर्म और पुरूषार्थ का अंत कर देंगे और फिर राज होगा केवल एक का ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है यह क्या देवी वे चारो सशरीर उपस्थित थे , देवी - हां राजन् जो चार विकार मनुष्य के अन्दर रहते है वे सशरीर उपस्थित थे , राजा भोज - देवी यह चारो विकार जब मनुष्य के अंदर होते है तब इन्हे रोकना आसान नही होता तो जब यह सशरीर है इन्हें रोकना बहुत मुश्किल है , देवी - हां राजन् इन सबको केवल वो ही रोक सकता है जो इनके अधीन कभी ना हुआ हो और जो पुरूषार्थी हो और ऐसे संसार में केवल एक ही व्यक्ति है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य । लेकिन सम्राट के लिए भी यह एक बढी चुनौती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी इन चारो ने शरीर धारण नही किया है ।
वराहमिहिर जी - आपके कहने का तात्पर्य क्या है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी इन चारो को कोई अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए उपयोग कर रहा है ।
वराहमिहिर जी - आप बिल्कुल सच कह रहे है सम्राट क्योंकि यह ही वो चार विकार है जिनसे मनुष्य चाह कर भी जीत नहीं सकता । वो जो कोई भी है हे बढा चतुर ।
सम्राट विक्रमादित्य - हां वराहमिहिर जी और वो अब भी यही कर रहे होंगे हमें उन्हें खोजना होगा ।
सम्राट विक्रमादित्य उन चारो की खोज में निकल जाते है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् यह चारो किसके प्रतिक है , राजा भोज - अधर्म के , देवी - सही तो फिर विधाता ने इनकी रचना क्यों की , राजा भोज -विधाता ने किसी की भी रचना बिना उद्देश्य के नहीं की है पहला काम है तो सृष्टि में विस्तार है और दूसरा है क्रोध में कहता हूं क्रोध होना चाहिए, देवी - राजन् में आप पर दया करू या क्रोध , राजा भोज - देवी आपको स्वतंत्रता है अभिव्यक्ति की मगर में चाहता हूं आप मेरी पुरी बात सुने फिर तय करे देवी क्रोध होना चाहिए मगर अधर्म को रोकने के लिए और तीसरा मोह मोह होना चाहिए देवी किंतु धन का नहीं धर्म का मोक्ष का इश्वर प्राप्ति का और चौथा है लोभ लोभ यदि मोक्ष सद्भावना का हो तो उस से अच्छा तो कुछ हो ही नही सकता आपको क्या लगता है मैने गलत कहा है , देवी - नही राजन् आपने बिल्कुल सच कहा है एक पुरूषार्थी में यह चारों गुण इसी रूप में होने चाहिए । राजा भोज - और सम्राट विक्रमादित्य में यह चारो गुण इसी प्रकार थे इसलिए उनकी विजय निश्चित थी । देवी - हां राजन् किंतु उन्हें यह चारो कहीं मिले ही नहीं ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी हमने हर जगह उन्हें ढूंढा किंतु वे चारो हमें कहीं नहीं मिले हमें उन चारो को यहां बुलाने का उपाय खोजना होगा ।
वराहमिहिर जी - सम्राट केवल एक ही उपाय है आप स्वंय धर्म का प्रचार करे धर्म का मार्ग दिखाए प्रजा को वे अपने आप आ जाएंगे अपने विकार फैलाने । आप प्रजा को भक्ति के मार्ग पर ले जाए प्रजा में धर्म का प्रचार करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - जो आज्ञा वराहमिहिर जी वास्तव में सच है ब्राह्मण ऋषि साथें रहने चाहिए ताकि हमेशा राजा को सही मार्ग सिखाते रहे ।
वराहमिहिर जी - धन्यवाद सम्राट । अब आप करे धर्म का प्रचार प्रजा के बीच ।
सम्राट विक्रमादित्य महारानी चित्रलेखा वराहमिहिर जी और सेनापति चारो उज्जैनी में निकलते है प्रजा को धर्म के बारे में बताते है मानो सम्राट विक्रमादित्य की धर्म की बाते सुन सभी लोग काम क्रोध लोभ मोह सब छोड कर सम्राट विक्रमादित्य की धर्म यात्रा में शामिल हो जाते है सम्राट विक्रमादित्य की धर्म यात्रा मानो इस प्रकार नजर आ रही थी कि धरती पर इश्वर आ गए । वे चारो कहते है एक दुसरे से हमें रोकना होगा पुरूषार्थी वह धर्म के प्रतीक सम्राट विक्रमादित्य को , सम्राट की धर्म यात्रा को बहुत समर्थन मिल रहा है अगर सम्राट विक्रमादित्य ऐसे ही आगे बढते रहे तो सभी लोग धर्म के कवच में बंध जाएंगे ।
सम्पूर्ण प्रजा हाथ जोड कर सम्राट का संबोधन सुनती है ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रजा जनों काम क्रोध लोभ और मोह ये विकार दिमग की तरह है एक बार लग जाए तो खत्म कर देते है इन सभी अवगुणों को त्याग दो यह हमारे व्यवहार और चरित्र को खत्म कर देते है इन सभी को त्याग कर धर्म पर लौट आओ ।
प्रजा - सम्राट आपका कोटी कोटी धन्यवाद आपने ना केवल अपना राज धर्म निभाया अपितु सम्राट आप तो हमारे पालक की तरह में सत्य का मार्ग बताने आए आपका धन्यवाद सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद किस बात का राजा का तो कर्तव्य ही है प्रजा की रक्षा करना ।
प्रजा - सम्राट विक्रमादित्य की जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज की जय ।
प्रजा के जाते ही सम्राट भी वहा से निकलते ही है वैसे ही वे उन चारो को देखते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम पहचान गए है तुम सभी को काम क्रोध लोभ और मोह ।
चारो - विक्रमादित्य हम ही है वे चारो और तुम्हे क्या लगता है तुम धर्म का प्रचार कर बचा लोगे लोगों को । हम हर मनुष्य के भीतर रहते है हम जिसे चाहे उसे अपना दास बना सकते है और इसकी शुरुआत हम तुम से करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - सेनापति आप महारानी और वराहमिहिर जी को पीछे ले जाए और स्वंय भी वही रहे है हम देखते है इनको ।
चारो की शक्तिया भी सम्राट को कुछ नही कर पाती सम्राट विक्रमादित्य कहते है हम अंतिम बार पूछ रहे है बताओं कौन है वो जिसने तुम्हें यहाँ भेजा है रस्सी जल गई पर बल नही गया उत्तर जानने के हमारे पास और भी तरीके है । सम्राट विक्रमादित्य अपनी शक्ति से चारो को बंदी बना लेते है । सम्राट विक्रमादित्यफिर पूछते है बताओं उसका नाम यह हमारी अंतिम चेतावनी है मिटा देंगे हम तुम सभी का अस्तित्व । तभी वे कहते है सम्राट विक्रमादित्य हमारा स्वामी वो है जिसका वाहन मनुष्य है विक्रमादित्य हमारे स्वामी वो है जो मनुष्यों की सवारी करते है हमारा स्वामी वो है जो धन का देवता है हमारा स्वामी कुबेर है ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी वे तो कुबेर देव है जो धन के देवता है वो क्यो ऐसा कर रहे थे , देवी - राजन् क्या आप बताएंगे धनवान व्यक्ति में क्या बुराई होती है , राजा भोज - काम क्रोध लोभ और मोह सबसे पहले धनवान को ही होता है , देवी - हां राजन् जब माँ लक्ष्मी ने कुबेर देव को धन का देवता बनाया और जब उन्होंने देखा की धन से ही सम्पूर्ण संसार चलता है तब उनमें भी इश्वर बनने का मोह जाग गया ।।
कुबेर देव कहते है देवी पिंगला अब हम किसी को धन नहीं देंगे ।
देवी पिंगला - मगर इसी लिए तो हम है हमारा कर्तव्य है की हम मनुष्य को उसके कर्म अनुसार धन दे यदि धन नहीं देंगे तो संसार थम जाएगा ।
कुबेर देव - हम जानते है कि सारे संसार की व्यवस्था हमसे ही चहली है इसका मतलब कर्म हो हमारे माध्यम से और पूजा हो इश्वर की अब धन उसी को दिया जाएगा जो हमें इश्वर मानेगा जो हमारी पूजा करेगा ।
देवी पिंगला - आपकी सोच उचित नहीं है कुबेर देव यह संसार धर्म से चलता है धन तो एक माध्यम है संसार में मोक्ष ही सबकुछ है जिसके स्वामी इश्वर है ।
कुबेर देव - में संसार से पुरूषार्थ समाप्त कर दूंगा ।
देवी पिंगला - मगर कैसे ।
कुबेर देव - आज तक संसार में काम क्रोध लोभ और मोह से संसार में कोई नही जीत पाया है पहले यह मनुष्य के हृदय में रहते थे अब मैनें इन सभी को शरीर प्रदान कर दिया है जिस से यह काम बहुत जल्दी हो जाएगा ।
देवी पिंगला - यह आपने क्या कर दिया कुबेर देव इस से तो अधर्म का अंधकार छा जाएगा संसार में ।
कुबेर देव - वहीं तो में चाहता हूं तभी हमें सत्ता प्राप्त होगी और में इश्वर बनूँगा ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् अब संसार के सामने समस्या थी उन चार की नही कुबेर की अब देखना होगा जीत किसकी होती है कुबेर देव की या चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की ।
वे चारो कहते है खोलो हमें विक्रमादित्य वरना पछताओगे तुम ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारा बैर तुम लोगो से नही है तुम रहो मनुष्य के अंदर विकार बन कर हम कुछ नही कहेंगे मगर ऐसे खुले आम तुम्हें यह अधर्म नही करने देंगे ।
चारो - विक्रमादित्य तुम हमे नही रोक पाओगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम विक्रमादित्य है हमारे लिए नामुमकिन कुछ नही ।
चारो - हम जल्द मुक्त हो जाएगें और फिर इस संसार पर हमारे स्वामी कुबेर देव का आधिपत्य हो जाएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमारे होते हुए ऐसा कभी नहीं होगा हम इस संसार के चक्रवर्ती सम्राट है धर्म के रक्षक है अगर कुबेर तुम चारों को शरीर दे सकता है तो हम यह तुम सभी का शरीर नष्ट भी कर सकते है ।
चारो - तुम ऐसा कभी नही कर पाओगे विक्रमादित्य यह केवल देवता या भगवान ही कर सकते है यह तुम्हारा स्वपन है ।
सम्राट विक्रमादित्य - स्वपन और सत्य का अंतर अभी तुम्हे बताते है हम अब यही मार्ग है इस अधर्म को रोकने का ।
सम्राट विक्रमादित्य अपनी शक्ति से चारो के शरीर नष्ट कर देते है और धर्म की रक्षा करते है ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् यह संसार में पहली बेर हुआ था जब संसार में भगवान का कार्य किसी मनुष्य ने कर दिखाया ।।
उधर कुबेर देव क्रोधित होकर कहते है कौन है वो मनुष्य जिसने मेरे दिये हुए शरीर को नष्ट कर दिया कौन बै वो तभी देवी पिंगला उन से कहती है वो कोई दुस्साहसी नही है वो धरती पर देवताओं के प्रतिनिधि उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है वो पुरूषार्थी है उन्होंने आपके गणों के शरीर इसलिए छीने ताकि धर्म की रक्षा हो सके कहते है मनुष्य में देवताओं जैसी ताकत नहीं होती मगर कुबेर देव चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य वो है जिनमें देवताओं से अधिक और भगवान के बरोबर शक्ति है विक्रमादित्य संसार के रक्षक है वे अजय है संसार में मनुष्य उन्हें उनके कर्मो को वजह से धरती का भगवान मानते है । उनके होते हुए आप संसार को कभी नही जीत सकते वे धर्म के रक्षक है उनके होते हुए धरती पर धर्म की ध्वजा कभी नही झुक सकती । जाइए सम्राट विक्रमादित्य से माफी मांगलिजिए ।
कुबेर देव - उस तुच्छ मनुष्य से माफी जीकरता है उस से पहले में तुम्हे समाप्त कर दूं मगर तुम इंद्र देव का उपहार हो हमारे लिए तुम्हे नष्ट करके हम उनका अपमान नही कर सकते ।
देवी पिंगला - आप देवराज इंद्र के अपमान का सोच रहे है पर में यह चाहती हूं आपका अपमान ना हो संसार में इसलिए कह रही हूं क्षमा मांग लिजिए उन से ।
कुबेर देव - क्षमा हम नही तुम्हारा वो सम्राट विक्रमादित्य मांगेगा जब वो देखेगा की संसार से मेरी कृपा हट गई तो संसार रूक जाएगा फिर वो अपने आप हमारे चरणों में गिड गिडाएगा देखना पिंगला ।
कुबेर देव निकल पढते है और कहते है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अब तुम देखोगे हम तुम्हारी व्यवस्था को अपंग बना देंगे ।
कुबेर देव अपनी शक्ती से संसार के सभी गहने समाप्त कर देते है ।
धरती पर प्रजा में संकट हो जाता है सभी कहते है हमारे गहने कहा चले गए ।
कुबेर देव फिर शक्ति का प्रयोग करते है सम्राट विक्रमादित्य के राज्य का सारा खजाना जल कर राख हो जाता है ।
कुबेर देव कहते है खुद से चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य में तुम्हारे राज्य का सारा स्वर्ण नष्ट कर चुका हूं ।
उधर महारानी चित्रलेखा सम्राट विक्रमादित्य के पास आती है और कहती है सम्राट यह देखिए हमारे सारे गहने जल कर राख हो गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह कैसे हो गये महारानी ।
वराहमिहिर जी - महारानी सच कह रही है सम्राट सारे राज्य का स्वर्ण समाप्त हो गया सारी प्रजा आपके सामने है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी बताए क्या हुआ ।
प्रजा - सम्राट हमारा सारा स्वर्ण समाप्त हो गया हमारे जीवन की सारी जमा पूंजी खत्म हो गई हम बरबाद हो गए ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर यह सब हुआ कैसे ।
प्रजा - पता नही सम्राट सारे राज्य के स्वर्ण और धन के साथ यही हो रहा है । हम जीवन कैसे जीएंगे सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रिय प्रजाजनों में आप सबके दुख का साथी हूं यह कोई बड़ी विपदा नही है सुख और दुख तो छाव की तरह है में कल सुबह तक इस समस्या का समाधान निकाल कर रहूँगा आप चिंता ना करे ।
प्रजा - सम्राट विक्रमादित्य की जय सम्राट विक्रमादित्य की जय ।
सम्राट विक्रमादित्य मन में सोचते है अवश्य ही यह कुबेर देव ने किया है काम क्रोध लोभ और मोह के पराजित होने का प्रतिशोध लिया है उसने ।
उधर स्वर्ग लोक में देवराज इंद्र कहते है गुरूदेव बृहस्पति क्या हो गया है कुबेर देव को ।
बृहस्पति देव - वे गलत रास्ते पर चल रहे है ।
देवराज इंद्र - में नमन करता हूं सम्राट विक्रमादित्य को जिन्होंने ब्रह्म देव की रचना को अपमानित होने से बचा लिया ।
बृहस्पति देव - बिल्कुल सत्य कहा देवराज सम्राट विक्रमादित्य ने अगर काम क्रोध लोभ और मोह को खत्म ना किया होता तो अब तक धरती से धर्म का मूल समाप्त हो जाता ।
देवराज इंद्र - मुझे तो डर है कि कुबेर देव क्रोध में आकर कोई और अनर्थ ना कर बैठे ।
नारद जी - नारायण नारायण ।
देवराज इंद्र - क्या हुआ देवर्षि ।
नारद जी - देवराज कुबेर देव ने अनर्थ कर दिया उन्होंने संसार की व्यवस्था बिगाड़ दी मनुष्य कर्म के द्वारा धन अर्जित करता है मगर कुबेर देव ने धन ही छीन लिया ।
देवराज इंद्र - मुझे किसी भी परिस्थिति में कुबेर देव को रोकना होगा अगर इसके लिए हमें शस्त्र भी उठाना पढे तो वो भी उठाएंगे ।
बृहस्पति देव - नहीं देवराज यह धर्म के विरूद्ध है आपस में लडना असुरों का लक्षण है देवताओं का नहीं । आप चिंता ना करे अभी धरती पर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है वे जरूर कुछ ना कुछ उपाय निकालेंगे संसार और देवताओं के हीत में ।
सम्राट विक्रमादित्य दरबार में अकेले सोच रहे होते है तभी वराहमिहिर जी आते और कहते है प्रजा समाधान के लिए आपकी और आशा भरी दृष्टि से देख रही है सम्राट अपना मौन तोड़ीए सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - क्या करू वराहमिहिर जी ।
तभी जोर से आवाज आती है सम्राट तभी वराहमिहिर जी और सम्राट विक्रमादित्य पीछे देखते है वह कुबेर देव होते है ।
कुबेर देव - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आप चिंता ना करे में कुबेर में कहूंगा आपको क्या करना है आप चिंता मुक्त हो जाइए विक्रमादित्य मुझे इश्वर मान लो और अपनी सारी प्रजा को भी मुझे इश्वर मानने का कह दो यदि आप यह करे तो में कुबेर आपकी सब विपदा हर लूंगा और में आपको अपने परम भक्त स्वीकार करके आपको अमर कर दूंगा और मेरी कृपा आप पर सदैव बनी रहेगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमें आपकी कृपा नहीं चाहिए कुबेर देव हम आपको इश्वर नहीं मानेंगे और नाही अपना धर्म बदलेंगे धन को धर्म नहीं बनाएंगे आप केवल धन के देवता है परम पिता परमेश्वर नही ।
कुबेर देव - तो ठीक है विक्रमादित्य हम भी देखते है कि हमारी कृपा के बिना आप अपने राज्य की व्यवस्था कैसे चलाते है । विक्रमादित्य आज यह संसार देखेगा कि पुरूषार्थ को कैसे हम खत्म कर सकते है आपकी विवशता देखेगा यह संसार ।
कुबेर देव के जाने के बाद वराहमिहिर जी कहते है सम्राट जब तक समस्या का समाधान नही निकलेगा तब तक हम प्रजा को क्या कहेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी समस्या का समाधान जरूर निकलेगा हम निकालेंगे आप सारी प्रजा को कल खेतों मे इकट्ठा होने को कहीए ।
सम्पूर्ण प्रजा चैन से सो जाती है कि सम्राट समस्या हल करेंगे वहीं दूसरी तरफ चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य चिंतित रहते है समस्या को दूर करने के लिए वे अकेले अपने दरबार में सोचते है सिंहासन बत्तीसी के सामने खडे होकर । तभी अचानक सम्राट विक्रमादित्य के गहने भी गायब हो जाते है सम्राट कहते है अवश्य ही यह कुबेर देव ने किया है ।
सुबह होते ही सम्राट विक्रमादित्य प्रजा को संबोधित करते है प्रजा जनों जीवन जीने के लिए धन की नहीं अन्न की जरूरत होती है गहने धन इन सब से हम केवल कुछ समय तक जीवन यापन कर सकते है मगर यदि हमारे पास अन्न रूपी धन है तो हम तब तक जी सकते है जब तक आयु है । प्रजा जनों आओ प्रतिज्ञा करे कि हम परिश्रम से अन्न रूपी धन उगाएंगे अधिक मात्रा में ।
प्रजा - मगर सम्राट हम व्यापार कैसे करेंगे बिना धन के ।
सम्राट विक्रमादित्य - पहले हम धन से वस्तु खरीदते थे अब वस्तु रूपी धन से वस्तु खरीदेंगे ।
महिलाएं - सम्राट हम श्रृंगार कैसे करेंगी ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप सभी अपने भगवान का श्रृंगार कैसे करती है ।
महिलाएं - पुष्पों से ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप भी फूलों से अपना श्रृंगार करे वास्तव में असली सुंदरता प्रकृति में ही है आओ प्रजा जनों श्रम करे और जीवन यापन करे ।
कुबेर देव मन में कहते है सम्राट विक्रमादित्य तुम कभी धन की कमी पुरी नही कर पाओगे श्रम से विक्रमादित्य स्वीकार कर लो मुझे अपना भगवान ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् कुबेर देव के कार्यो से देवता गण तक चिंतित था और विचार कर रहा था कि कैसे छुटकारा पाए इस चीज से मगर सम्राट विक्रमादित्य के गुण और कर्मो से सिद्ध कर दिया था कि मनुष्य अपने पुरूषार्थ से कुछ भी कर सकता है । राजा भोज - नमन है सम्राट विक्रमादित्य को । देवी - मगर सम्राट विक्रमादित्य के लिए अभी भी संकट था ।
उधर कुबेर देव से देवराज इंद्र और सभी देवता कहते है ।
इंद्र देव - कुबेर देव आप यह सब बंद करिए यह देवता नही असुर करते है यह छोडिए आप और संसार के लोंगो को लौटा दिजिए उनका धन ।
कुबेर देव - देवराज इंद्र आप अपने मित्र की पैरवी करने और मुझे समझाने आए है अगर समझाना है तो अपने मित्र को समझाए की मेरी शरण में आ जाए और हर मंदिर में मेरी पूजा करवाए अब में ही संसार में इश्वर बनूँगा ।
देवराज इंद्र - कुबेर देव संसार में पूजा केवल इश्वर की होती है कृपा पात्र देवता की नहीं और आप तो केवल माँ लक्ष्मी की कृपा पात्र से धन के देवता है ।
कुबेर देव - बस इंद्र देव बस मेरा अस्तित्व किसी की कृपा से नहीं है मेरा अस्तित्व खुद से है मेरी शक्ति के सामने आप भी कुनहीं है देवराज आपके स्वर्ग को में मिट्टी में बदल सकता हूं ।
देवराज इंद्र - कुबेर देव आप पछताएंगे अपने कृत्यों पर तब आप सम्राट से क्षमा मांगेगे ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य राज्य का दौरा करते है और देखते है सभी राज्य वासी व्यापार करते है सम्राट विक्रमादित्य बहुत खुश होते है सभी प्रजाजन उनसे मिलते है वह कहते है ।
प्रजाजन - महान चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य आपको हम सभी का प्रणाम महाराज हमने तो कभी सोचा भी नहीं था कि बिना धन के भी व्यापार हो सकता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यहीं तो वस्तु विनिमय प्रणाली है जिससे मनुष्य बिना धन के भी सुख से व्यापार कर सकता है ।
प्रजाजन - सम्राट विक्रमादित्य आप इस संसार के अब तक के सबसे बुद्धिमान सम्राट है जो हर परिस्थिति में प्रजा के साथ रह कर हर संकट से उन्हें बचा लेते है धन्य है हम संसार वासी जो आपके शासन में रह रहे है आप भगवान है सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह तो आप सभी का प्रेम हैप्रजाजनों ।
महिलाएं - सम्राट विक्रमादित्य आपने हमें सही राह दिखाई ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने तो केवल राह दिखाई देवी यह तो आप सब है जिन्होंने मेरी बात मानी आप सब का धन्यवाद । प्रजाजनों आज हम मनुष्यों ने सिद्ध कर दिया की यदि हम श्रम करे धर्म का साथ सदैव दे तो उस मनुष्य का अहित कोई नहीं कर सकता ना कोई देवता ना इंसान ना भगवान ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी प्रतिभा से अपने सद्गुणों से पासा ही पलट दिया उन्होंने संसार में एक नई प्रणाली स्थापित की एक नई परम्परा की स्थापना की अन्न की महत्ता बताई । राजे भोज - इसका मतलब की सम्राट विक्रमादित्य ने ही अन्न को देवता की उपाधी दिलवाई । ।।
उधर सम्राट विक्रमादित्य अन्न देव से कहते है आज हम सभी आपकी पूजा करेंगे ।
उधर कुबेर देव सम्राट विक्रमादित्य की महानता से चौक जाते है उनके कर्मो को देख कहते है विक्रमादित्य तुम मुझे नही हरा सकते तभी देवी पिंगला कहती है कुबेर देव आपका सामना पहली बार किसी पुरूषार्थी से हुआ है इसलिए आप नही जीत सकते उन से ।
नारद जी आ जाते है और कहते है देवी पिंगला आप सही कह रही है देवताओं को हराने आसान है किंतु चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य को हराना असंभव है वे पुरूषार्थी है कुबेर देव आपको एक राय देता हूं में क्षमा के रास्ते पर चल पढीए वरना स्थान और सम्मान दोनों से हाथ धोना पढेगा ।
कुबेर देव - देवर्षि नारद एक बार लंकापति रावन ने मुझे हराया था मगर अब नहीं अब झुकना होगा इस संसार को मेरे चरणों मे और उस विक्रमादित्य को भी ।
नारद जी - कुबेर देव लंकापति रावन के बाद अब सम्राट विक्रमादित्य से भी आपको हारना पढेगा ।
कुबेर देव - सब जगह में ही में रहूंगा ।
नारद जी - कुबेर देव सम्राट विक्रमादित्य के महानता तो देखते जाइए कैसे उन्होंने अन्न की महानता बताई संसार को उसके अस्तित्व को बचाया ।
उधर कुबेर देव क्रोध में आकर कहते है में अन्न को भी समाप्त कर दूंगा और कुबेर देव अन्न को जला देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य सभी प्रजा जनों को भोजन करवाते है तभी अचानक भोजन जल कर राख हो जाता है सभी लोग चिंतित हो जाते है घबरा जाते है ।
उधर कुबेर देव कहते है विक्रमादित्य में सबकुछ खत्म कर दूँगा ।
।। कथा सुनाते हुए देवी कहती है राजन् किसी की महात्वाकांक्षा उसे कितना गिरा सकती है देव कुबेर इसके उधारण थे , वे देवत्व पद अपनी लोक कल्याणकारी शक्तियों का दुरूपयोग कर रहे थे । राजा भोज - देवी यदी स्वार्थ के लिए देवता ऐसा कर सकता है तो मनुष्य क्या क्या करेगा ।
कुछ लोग पलायन कर रहे थे सम्राट विक्रमादित्य उन्हें रोकते है किंतु हर जगह अन्न नहीं था सम्पूर्ण धरती पर अन्न खत्म हो गया था । लोग वनों में रह कर पत्ते खा कर अपना पेट भर रहे थे ।
वराहमिहिर जी - सम्राट यह क्या हो रहा है पिडा असहनीय है कुछ किजिए सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - सोचा था कुबेर देवता है समझ जाएंगे किंतु हमारी सोच हमारी भूल निकली अब एक मात्र विकल्प है दण्ड अब हम दण्ड देंगे कुबेर देव को ।
सहनशील न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य चल पढे कुबेर लोक ।
वे जैसै ही जाते है गिर जाते तभी सम्राट विक्रमादित्य कहते है हम गिर कैसे सकते है ।
कुबेर देव आ जाते है और कहते है विक्रमादित्य तुमसे मैने ब्रह्मांड में जाने की शक्ति छीन ली है अब तुम किसी भी लोक में नहीं जा सकते । अब तुम्हारे पास केवल एक ही विकल्प है मुझे इश्वर मान लो और अपनी प्रजा से कहो मेरी पूजा करो । तुम और तुम्हारी प्रजा जब मुझे भगवान मान लोगे तभी में सबकुछ ठीक करूंगा मंदिरों मे हमारी स्थापना करो और हमारी आराधना करो ।
सम्राट विक्रमादित्य - असंभव है यह कुबेर देव ।
कुबेर देव - तो तुम और तुम्हारी प्रजा भुख से मरने के लिए तैयार हो जाओ ।
सम्राट विक्रमादित्य - मारने और बचाने वाला हमारा परम पिता परमात्मा है कुबेर देव हमारे भगवान हमारे साथ है मेरी विजय निश्चित है ।
कुबेर देव - भ्रम में जी रहे हो तुम ।
सम्राट विक्रमादित्य - भ्रम में हम नहीं आप जी रहे है आप नही जानते इश्वर और मुझे में चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य धर्म पर अडीग रहने वाला मनुष्य हूँ ।
यह कह कर सम्राट वहां से चले जाते है उनके जाने के बाद कुबेर देव कहते है विक्रमादित्य तुम्हे झुकना होगा इन चरणों में ।
कथा सुनाते हुए देवी कहती हैराजन् सम्राट विक्रमादित्य की प्रजा चिंतित थी कि वो सम्राट के साथ जाए या मन के साथ । राजा भोज - हां देवी क्योंकि सम्राट विक्रमादित्य की प्रजा की हालत अब खराब हो चुकी थी जनता भूखी थी ।
उधर सम्पूर्ण प्रजा महारानी चित्रलेखा से कहते है महारानी अब भुख सहन नहीं हो रही हमारे प्राण निकल जाएंगे ।
महारानी चित्रलेखा - आपके प्राण नहीं अब समस्या का हल निकलेगा सम्राट इस समस्या का समाधान की खोजने गए है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आ गए ।
प्रजा - सम्राट हमें बचाईए हमारे छोटे छोटे बचे भुख से तडप रहे है हमारे प्राण निकल जाएंगे ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आपके चेहरे पर इतनी उदासी क्यों क्या हुआ सम्राट क्या कहां कुबेर देव ने ।
सम्राट विक्रमादित्य - यही की हम उन्हें अपना इश्वर मान ले ।
महारानी चित्रलेखा - तो अब आप क्या करेंगे सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब हम कुछ नही करेंगे महारानी अब जो भी करना है इन्हें करना है । प्रजा जनों हमें दुख है कि हम कुबेर लोक नहीं जा सके किंतु हमारी उनसे अवश्य हो गई ।
प्रजा जन - क्या बात हुई आपकी सम्राट उन से ।
सम्राट विक्रमादित्य - उन्होंने मुझे से कहा कि हम उन्हें इश्वर मान ले हमारे मंदिर में परमात्मा की मूर्ति को हटा कर हम उनकी मूर्ति स्थापित कर ले ।
प्रजा जन - तो आपने क्या कहां सम्राट ।
सम्राट विक्रमादित्य - हमने मना कर दिया क्योंकि हमारा धर्म और पुरूषार्थ हमें यह करने की आज्ञा नही देता । परन्तु आपका निर्णय हमारे निर्णय से बंधा हुआ नहीं है आप अपना निर्णय स्वंय ले सकते है यह आपको तय करना है कि आपको धर्म का कठिन मार्ग चुनना है या कुबेर देव को इश्वर मान कर सब प्राप्त करना है ।
प्रजाजन - सम्राट विक्रमादित्य हम आपके साथ है हम कुबेर देव को भगवान नहीं मान सकते ।
सम्राट विक्रमादित्य - यह विश्वास सौपने के लिए धन्यवाद प्रजा जनों आत्मा की आवाज कभी गलत नहीं कहती हमारी आत्मा कहती है कि धर्म के रास्ते पर चल कर हम इस मुश्किल समय से निकल जाएंगे । आप सभी से आज्ञा चाहते है फिर मिलते है ।
महारानी चित्रलेखा - प्रिय प्रजा जनों आप सभी कभी भी अपने आपको अकेला मत समझिएगा हम सभी आपके साथ है ।
सम्राट विक्रमादित्य - वराहमिहिर जी हमें समझ नहीं आ रहा कि हम क्या करे क्या यही दुख भोगने होंगे मेरी प्रजा को धर्म पर चलने के बदले में खुद पर हजार दुख सहन कर सकता हूं किंतु प्रजा पर नहीं ।वराहमिहिर जी - सम्राट धर्म के मार्ग पर परीक्षा तो होती ही है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इतनी कठीन परीक्षा वराहमिहिर जी ।
वराहमिहिर जी - तभी तो वो अधर्म को पराजित कर पाएंगे सम्राट धर्म के मार्ग पर चलने वालों की रक्षा स्वंय धर्म करता है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट आप चिंतित क्यों होते है ऋषि मुनियों का ध्यान किजिए वे भी तो भुखे प्यासे रहते थे ।
सम्राट विक्रमादित्य - किंतु वे सभी सिध्द पुरूष है ।
वराहमिहिर जी - कोई भी बिना परिश्रम के सिद्ध पुरूष नहीं होता यह केवल एक उपवास का परिणाम नहीं है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इसका मतलब हम अपनी प्रजा पर दबाव डाले ।
वराहमिहिर जी - दबाव नहीं आप उन्हें जीवन दर्शन करवाएं ।
सम्राट विक्रमादित्य - नहीं वराहमिहिर जी भूखे पेट भजन ना होए गोपाला भुखे पेट तो भजन भी नहीं होता और आप जीवन दर्शन की बात कर रहे है ।
वराहमिहिर जी - सम्राट जीवन दर्शन को एक औषधी की तरह काम में ले कुबेर देव की वजह से हमारी प्रजा पहले से ही अन्न से दूर हो गई है पीडा की सारी सीमा पार हो गई तो क्यों ना वे सभी मन से अन्न छोडे और जो भी साफ पत्ते हो उन्हें हम भोजन की जगह उपयोग करे यही एकमात्र मार्ग है सम्राट उन सभी का जीवन बचाने का ।
तभी वहां पर एक सैनिक आता है वह कहता है सम्राट हमारी प्रजा भुख से बेहोश हो रही है ।
महारानी चित्रलेखा - प्रजा जनों यह लिजिए आप पानी गृहण करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - महारानी पानी से कुछ नहीं होगा इन सभी का पेट भोजन से ही भर पाएगा ।
महारानी चित्रलेखा - सम्राट कुछ व्यवस्था हुई कोई मार्ग निकला ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रजा जनों जो शक्ति अन्न में होती है वहीं शक्ति वनस्पति में भी होती है जब पशु पक्षी इसे खा कर जी सकते है तो हम मनुष्य क्यों नहीं हमें धर्म के मार्ग पर चलकर यदि अपना जीवन बचाना है तो हमें यह करना ही होगा । तो क्या आप वनस्पति खाएँगे ।
प्रजा जन - सम्राट विक्रमादित्य अधर्म के अन्न से कई गुणा स्वादिष्ट है वनस्पति , सम्राट हमें दिजिए हम खाएंगे ।
उधर कुबेर देव स्वंय से कहते है विक्रमादित्य देखो यह है हमारी शक्ति जो सम्राट पहले स्वर्ण दान करता था वो अब घास दान कर रहा है मैने तुम्हे किस हद तक ला दिया है में अब तुम्हारे राज्य में लाशे बीछा दूंगा फिर पालना उन लाशों को ।
वहीं स्वर्ग लोक में देवराज इंद्र बृहस्पति देव से कहते है कुबेर देव तो पुरे अधर्मी बन चुके है इस तरह तो धरती से सत्य धर्म सबकुछ समाप्त हो जाएगा हम देवताओं का अस्तित्व खतरे में पड जाएगा ।
बृहस्पति देव - हम कर भी क्या सकते है देवराज हम सभी देवता है हम तो उन्हेदण्ड भी नहीं दे सकते है क्योंकि हम देवता है ।
देवराज इंद्र - हम उन्हें दण्ड नहीं दे सकते मगर सम्राट विक्रमादित्य तो उन्हें दण्ड दे सकते है ना बृहस्पति देव ।
बृहस्पति देव - आप कहना क्या चाहते है देवराज इंद्र ।
देवराज इंद्र - यहीं की इसी तरह तो धरती मनुष्य विहीन हो जाएगी और मनुष्य जो पुण्य कर्म वह यज्ञ करता है उस से जो हमें शक्ति प्रदान होती है वो भी हमें मिलना बंद हो जाएगी इस से पहले की ऐसी स्थिति आए हमें कुछ मार्ग निकालना होगा ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य अपने महल में स्थित विष्णु भगवान के मंदिर में भगवान श्री हरि से कहते है । हे प्रभु आप ही इस संसार के पालन कर्ता है फिर इस धरती पर इतने अधर्म क्यों धर्म के मार्ग पर चलने वाले के जीवन पर गृहण क्यों प्रभु हमें कुछ मार्ग दिखाए हम किस तरह प्रजा के पालन का कर्तव्य निभाएं हमारी सहायता करे हमें शक्ति दे ।
उधर वैकुण्ठ लोक में माँ लक्ष्मी कहती है उठीए प्रभु योग निद्रा से जागीएं ।
भगवान विष्णु - क्या हुआ देवी ।
माँ लक्ष्मी - प्रभु पृथ्वी वासी संकट में है मेरे भक्त कुबेर देव की वजह से संकट में है कुबेर देव ने धरती से धन अन्न सबकुछ छीन लिया में नहीं देख सकती यह सब मुझे तो कहीं ना कहीं मेरी गलती लगती है ना में कुबेर को धन का देवता बनाती ना वो ऐसा करते ।
भगवान विष्णु - इसमें आपकी कोई गलती नहीं है आपने तो अपना धर्म निभाया कुबेर को भक्ति का फल दिया है आपने ।
माँ लक्ष्मी - मगर हमारे धर्म पालन से धरती वासी दुखी है ।
भगवान विष्णु - देवी सुख और दुख तो छाव जैसा है यदि दुख नहीं होगा तो मनुष्य सुख सुविधा का दास हो जाएगा दुख ही मनुष्य को संबल बनाता है ।
माँ लक्ष्मी - किंतु प्रभु यहां तो संकट की सारी सीमाएं पार हो गई है और सीमा सारी चीज में मना है ।
भगवान विष्णु - आप चिंता ना करे जब अति होती है तो हम भक्तो की सहायता अवश्य करते है आप चिंता ना करे ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य और महारानी चित्रलेखा पूजा समाप्त करते है और देवराज इंद्र आ जाते है ।
देवराज इंद्र - चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - इंद्र देव आप यहां ।
देवराज इंद्र - हां मित्र में यहां आपको कुबेर देव से युद्ध करने के लिए कहने आया हूं हम देवता उन से इसलिए युद्ध नहीं कर सकते क्योंकि यह अधर्म होगा किंतु आप उन से युद्ध करे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम आपकी विवशता को समझसकते है किंतु हम भी उन हे युद्ध नहीं कर सकते ।
देवराज इंद्र - यह आप कह रहे है आप जैसा पुरूषार्थी यह कह रहा है ।
सम्राट विक्रमादित्य - इंद्र देव हमारी किसी भी लोक में जाने की शक्ति कुबेर देव ने नष्ट कर दी है ।
कुबेर देव - बस यहीं कारण है सम्राट तो आप जाएंगे अवश्य जाएंगे उस अधर्मी कुबेर के पास ।
सम्राट विक्रमादित्य - मगर कैसे हमारी सारी शक्तिया नष्ट हो गई है ।
देवराज इंद्र - आप अपने पुरूषार्थ के बल पर जाएंगे ।
देवराज इंद्र - सम्राट विक्रमादित्य इस संसार में केवल आप ही है जिसने भगवान के पद चिन्हों का अनुसरण किया है आप ही है संसार में जो विष्णु भगवान की तरह है आप में उन जितनी शक्ति है आप में भगवान की तरह चार पुरूषार्थ है अर्थात धर्म अर्थ सत्य एवं मोक्ष की साधना की वह रक्षा की इन चारो पुरूषार्थ के वाहक गरूड देव है जो विष्णु भगवान के भी वाहक है आप गरूड अनुष्ठान करे गरूड देव आप जैसे पुरूषार्थी की सहायता अवश्य करेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - इंद्र देव अगर यह करने से हमारी प्रजा सुखी होती है तो हम यह अवश्य करेंगे ।
उधर कुबेर देव कहते है इंद्र देव ने विक्रमादित्य को मुझे पराजित करने का मार्ग बता दिया है किंतु में गरूड को विक्रमादित्य के पास जाने ही नहीं दूंगा ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी पुरूषार्थ केवल भगवान विष्णु और चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य में ही है । देवी - राजन् पुरूषार्थ सब में है किंतु दूसरे देवताओं मे अलग अलग गुण में है और विष्णु भगवान और सम्राट विक्रमादित्य में सम्पूर्ण रूप में है । राजा भोज - इसलिए भगवान विष्णु देवताओं और इश्वर में अधिपति है और चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य धरती पर सब के अधिपति है । देवी - इतना ही नहीं राजन् सम्राट विक्रमादित्य धरती पर देवताओं के प्रतिनिधि ही थे इसलिए इंद्र देव ने सम्राट को कुबेर देव के खिलाफ युद्ध करने का आग्रह किया । राजा भोज - इतना विश्वास था इंद्र देव को सम्राट विक्रमादित्य पर । देवी - होना स्वाभाविक था क्योंकि जिस प्रकार भगवान विष्णु सम्पूर्ण पुरूषार्थी थे उसी प्रकार सम्राट विक्रमादित्य भी सम्पूर्ण पुरूषार्थी थे और कुबेर को धर्म के मार्ग पर लाने का विकल्प केवल सम्राट विक्रमादित्य ही थे ।
वहीं सम्राट विक्रमादित्य अपनी धर्म पत्नी के साथ गरूड अनुष्ठान करते है ।
उधर वैकुण्ठ लोक में गरूड देव देखते ही कि मेरा अनुष्ठान कौन कर रहा है कौन है वो जो मुझे अपना वाहन बनाना चाहता है हे इश्वर यह तो चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य है मगर वे हमें क्यों अपना वाहन बनाना चाहते है जबकि में भगवान विष्णु का वाहन हूं इसचा हल अब भगवान विष्णु ही निकाल सकते है ।
गरूड देव - भगवान मेरी रक्षा करिए ।
भगवान विष्णु - क्या हुआ गरूड देव ।
गरूड देव - भगवान में धर्म संकट मे फस गया हूं मेंआपके वाहन हूं में उनका वाहन कैसे बन सकता हूं ।
भगवान विष्णु - क्यों अगर कोई जन हित में आपको वाहन बनाना चाहता है तो इसमें समस्या क्या है में भी आप पर जब जब बैठा हूं जगत हित में बैठा हूं वैसे ही चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य भी जगत हित में आपको याद कर रहे होंगे जिस प्रकार में जगत का पालन करता हूं उसी तरह चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य भी धरती के पालन कर्ता है वे महान है उनकी सहायता करना मतलब धर्म की रक्षा करना है ।
गरूड देव - यह तो आप सही कह रहे है प्रभु ।
भगवान विष्णु - किंतु सम्राट विक्रमादित्य तक पहुंचना इतना आसान नही है ।
गरूड देव - जिस पर आपकी कृपा हो उसे क्या संकट आएगा सभी मार्ग बाधा मुक्त हो जाएंगे ।
भगवान विष्णु - आपका कल्याण हो ।
गरूड देव जाते बिच में उन्हें कुबेर देव रोकते है । कुबेर देव - रूक जाओ गरूड देव आप अनर्थ करने जा रहे हो । गरूड देव - अनर्थ में नहीं आप कर रहे है आपने धरती से अन्न धन सब समाप्त कर दिया । कुबेर देव - पृथ्वी वासी बात नहीं मानेंगे तो भूगतेंगे ही । गरूड देव - आपकी बाते सुनकर आप पर दया आ रही है कि कैसे आप देवत्व भूल गए । कुबेर देव - गरूड देव उस समय यह देवता कहां थे जब रावन ने मुझ से लंके छीनी आपकी माता का अपहरण किया । गरूड देव - अतित की बात छोडे कुबेर देव । कुबेर कुबेर देव - नहीं गरूड देव आप बताए भगवान विष्णु ने आपको क्यों छोड दिया आप तो तब भी थे उनके वाहन आज भी है हम कब तक दूसरो की शक्ति पर आश्रित रहेंगे मुझे अब हुई है अपने धर्म की पहचान गरूड देव मैने स्थिति को अपने पक्ष में मोड दिया है हम अपना सम्मानित स्थान प्राप्त कर सकते है अब आप बताए आप हमारे साथ है या नहीं बोलिए गरूड देव ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है यह क्या देवी गरूड देव भी कुबेर देव की बात में आ गए । देवी - यही तो संसार है राजन् दूसरे की दुखती नस को दबाना और अपना काम निकालना । राजा भोज - फिर पृथ्वी वासीयों का क्या हुआ होगा देवी । देवी - इसी बात की चिंता तो सम्राट को भी थी क्योंकि अनुष्ठान पुरा हो चुका था और गरूड देव अब तक नहीं आए थे ।
उधर सम्राट विक्रमादित्य का गरूड यज्ञ पुरा हुआ यह सभी ऋषि मुनि कहते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - यज्ञ तो पुरा हो गया मगर गरूड देव आए नहीं हे गरूड देव हमसे आपकी पूजा में कहा चुक हो गई हम नहीं जानते किंतु हमें दर्शन दिजिए गरूड देव हम संसार के हित मेंआपके दर्शन चाहते है अब हमसे अपनी प्रजा का दुख देखा नही जाता गरूड देव अब आप हमें दर्शन दिजिए अन्यथा अपने नाम पर हमारी आहुति स्वीकार किजिए ।
गरूड देव - रूकिए चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य रूकिए में आपके जग हित के कार्यो से अति प्रसन्न हूं सम्राट आपने जिस उद्देश्य से मेरा अनुसरण किया है में आपके साथ हूं में आपका वाहन बनने के लिए तैयार हूं सम्राट । सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद गरूड देव , कुबेर देव अब आप जितनी भी शक्ति लगा लिजिए हम से नहीं बच पाएंगे ।
गरूड देव - सम्राट में आपका वाहन बनने के लिए तैयार हूं ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद गरूड देव । महारानी आप हमारी प्रजा का ध्यान रखिएगा और उनसे कहिएगा कि जहा उन्होंने हमारे कहने पर इतना धैर्य रखा वहा कुछ देर और रखे हम जल्द लौटेंगे ।
सम्राट विक्रमादित्य गरूड देव पर आसीन होकर कुबेर लोक जाते है वहा उन्हें कुबेर दे मिलते है । वहां कुबेर लोक में भी एक गरूड होता है कुबेर देव उस से कहते है गरूड देव आप यहां तो विक्रमादित्य के साथ कौन है । तभी विक्रमादित्य के साथ आए गरूड देव कहते है कुबेर देव वो गरूड बोल नही सकता यह सब भगवान विष्णु की माया है । कुबेर देव - भगवान विष्णु की माया है ।
कुबेर देव - हां भगवान विष्णु जानते थे कि आप बाधा जरूर उत्पन्न करेंगे इसलिए उन्होंने मेरा प्रतिरूप पहले ही बना दिया ।
कुबेर देव - एक बार में फिर से छला गया हूं देवता द्वारा ।
सम्राट विक्रमादित्य - देवताओं ने आपके साथ छल नही किया है छल तो आपने किया है पृथ्वी वासीयों के साथ और अपने साथ भी ।
कुबेर देव - बस विक्रमादित्य तुम यह मत सोचो की यहां आने के बाद तुम जीत जाओगे में आखिरी बार तुम से कह रहा हूं मान लो मुझे इश्वर ।
सम्राट विक्रमादित्य - मान लिया है कि आपको ज्ञान से नही समझाया जा सकता और यह सिद्ध हो चुका है कि धन के अहंकार से केवल मनुष्य नहीं देवता भी हो सकता है और यह भी जान लिया की पृथ्वी की व्यवस्था तब तक नहीं सुधर सकती जब तक हम आपको दण्ड नहीं देते और इसलिए हम आज यहाँ आपको दण्ड देने आए है ।
कुबेर देव - तुम दण्ड दोगे मुझे एक मनुष्य जिस कुबेर को इंद्र भी कुछ नही कर सकता उसे तुम दण्ड दोगे ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम आपको चुनौती देते है कि आइए हम से युद्ध करे ।
कुबेर देव - चुनौती स्वीकार है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आज आपको दोहरा दण्ड मिलेगा पहला पृथ्वी वासीयों को सताने का और दूसरा माँ लक्ष्मी के दिए हुए वरदान का अपमान करने का ।
कुबेर देव अपने लोक जाते है और माँ लक्ष्मी से प्राथना करते है वह कहते है माँ लक्ष्मी मुझे आशीर्वाद दिजिए कि में इस युद्ध में जीत सकू ।
तभी माँ लक्ष्मी प्रकट होती है कुबेर देव उनसे कहते है हे माँ में धन की महत्ता स्थापित करने के लिए युद्ध करने जा रहा हूं मुझे आशीर्वाद दिजिए की में विजय होकर आऊ ।
माँ लक्ष्मी - कुबेर तुमधन की नहीं खुद की सत्ता और महत्ता स्थापित करना चाहते हो इसलिए तुम युद्ध करने जा रहे हो पर में तुम से कहूंगी तुम युद्ध करने मत जाओ क्योंकि तुम्हारे सामने जो पुरूषार्थी है वो चाहे अकेला है पर उसमें धर्म का तेज है तुम उस से जीत नहीं पाओगे ।
कुबेर देव - उसी धर्म को नष्ट करना जरूरी है माँ आज वो तुच्छ प्राणी कुबेर लोक आया कल स्वर्ग जाएगा और फिर लक्ष्मी लोक वैकुण्ठ लोक आएगा इसलिए कहता हूं माँ इस विक्रमादित्य को हराना जरूरी है आप मुझे आशीर्वाद दिजिए ।
माँ लक्ष्मी - सत्य धर्म की विजय हो ।
कुबेर देव युद्ध करने आते है सारा जगत सारा संसार सभी देवता भगवान विष्णु माँ लक्ष्मी सब इस युद्ध को देखते है ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह संसार में पहला युद्ध था जब कोई मनुष्य और देवता की बीच हो रहा था । देवी - मगर राजन् यह युद्ध सम्राट और कुबेर देव के बीच था ही नही अगर कुबेर देव हारते है तो संसार से धन खत्म होगा और सम्राट हारते है तो संसार से सदा सदा के लिए धर्म मीट जाएगा दोनो की छोर से संसार की ही हार होगी । राजा भोज - देवी वो सम्राट विक्रमादित्य है वो सबकुछ ठीक करने की शक्ति रखते है ।।
उधर युद्ध में कुबेर देव अंतिम बार कहते है विक्रमादित्य आखिरी मौका है आ जाओ मेथी शरण में वरना तुम्हे हराकर तुम्हे दास बनाऊंगा इन सब की तरह ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुबेर देव जीतना अत्याचार और अनाचार करना था कर लिया आपने आज में आपको बताऊँगा की चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य कौन है ।
कुबेर देव - आज फैसला हो जाएगा की दोनो में से कौन जीतेगा किसमें है ज्यादा शक्ति ।
युद्ध शुरू होता है दोनों धनुष बाण से एक दूसरे पर वार करते है । कुबेर देव के हर बाण का सम्राट विक्रमादित्य उतर देते है ।
उधर नारद जी कहते है देवराज इंद्र जब तक मनुष्य सहन करता है तब तक ठीक है जब मनुष्य अपने पुरूषार्थ का बल दिखाता है सब उसके सामने झूकने लग जाते है ।
देवराज इंद्र - हाँ देवर्षि और सम्राट विक्रमादित्य ने धर्म सत्य और न्याय से शक्ति प्राप्त कि है ।
नारद जी - संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं जो पुरूषार्थ को हरा सके पुरूषार्थ तो अजय है नारायण नारायण ।
वहाँ सम्राट विक्रमादित्य और कुबेर देव गदा से भिडते है सम्राट विक्रमादित्य मात्र तो ही वार में उनकी गदा गिरा देते है फिर सम्राट विक्रमादित्य अपनी गदा भी रख देते है और दोनों अपने हाथों से पराक्रम दिखाते है सम्राट विक्रमादित्य यहाँ पर भी भारी पढते है सम्राट विक्रमादित्य उन्हे युद्ध में हरा देते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुबेर देव अब हम आपकी हर शक्ति का अंत कर देंगे जिससे आपने संसार को कष्ट पहुंचाया है ।
सम्राट विक्रमादित्य कुबेर देव की सारी शक्ति छीन लेते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुबेर देव अब आप देवता नही रहे अब आप भूगतेंगे अपने पाप अब आप भूगतेंगे धरती पर जाकर की कैसे आपने सताया था संसार वासीयों को ।
माँ लक्ष्मी सम्राट विक्रमादित्य को दर्शन देती है ।
माँ लक्ष्मी - सम्राट विक्रमादित्य आपका पुरूषार्थ अमर रहेगा जब तक संसार है तब तक संसार वासी आपके पुरूषार्थ को नहीं भूल पाएंगे । आपने एक दानवीय देवता को धर्म का मार्ग दिखाया आप महान है सम्राट विक्रमादित्य कुबेर देव ने जो भी गलत किया उसका अंत में करूंगी ।
सारे संसार में अन्न वापस आ जाता है सारा संसार देखता है सम्राट विक्रमादित्य की महानता को ।
महारानी चित्रलेखा - आचार्य वराहमिहिर जी सम्राट अपने उद्देश्य में सफल हुए ।
वराहमिहिर जी - हां महारानी ।
सम्राट विक्रमादित्य - माता लक्ष्मी आपका पुत्र विक्रमादित्य आपके चरणों मे शीश नवाता है ।
माँ लक्ष्मी - सम्राट विक्रमादित्य आपको शीश नवाने की जरूरत नहीं है आप सब की प्रेरणा है में आपको आशीर्वाद देती हूं आपके राज्य में अन्न का भण्डार हमेशा भरा रहेगा आपको धन की कमी कभी नहीं होगी ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है हे संसार वासीयों समझो पुरूषार्थ की महानता को जिसने जग में जाना पुरूषार्थ वहीं हुआ महान । देवी - क्या बात है राजन् आप भी कविता करने लग गए । राजा भोज - हाँ देवी । देवी - राजन्सम्राट विक्रमादित्य में पुरूषार्थ था इसलिए उनके साथ देवराज इंद्र और भगवान विष्णु भी हो लिए और उनकी सहायता की ।
राजा भोज - हां देवी सम्राट विक्रमादित्य अपने अच्छे गुणों से विजय हुए । देवी - सम्राट विक्रमादित्य ने धन और धर्म के युद्ध में दुष्परिणाम खत्म कर दिए इसलिए स्वंय गरूड देव सम्राट विक्रमादित्य को धरती पर छोडने आए ।
सम्राट विक्रमादित्य उज्जैनी लौट आते है । सम्राट विक्रमादित्य - आपका बहुत बहुत धन्यवाद गरूड देव मेरी सहायता के लिए ।
गरूड देव - धन्यवाद तो आपका है सम्राट विक्रमादित्य आपने आज धर्म की रक्षा की और में आपके साथ इस कार्य में शामिल रहा यह मेरे लिए गर्व की बात है यदि भविष्य में मेरी सहायता लगे तो आप मुझे अवश्य याद करिएगा ।
सम्राट विक्रमादित्य के विजय होने से राज्य और संसार से अन्न और धन का अभाव समाप्त हो गया सम्राट विक्रमादित्य का भव्य स्वागत हुआ । सम्राट विक्रमादित्य की जय सम्राट विक्रमादित्य की जय सम्राट विक्रमादित्य की जय के नारो से प्रजा ने उन्हें पुकारा ।
सम्राट विक्रमादित्य - प्रिय प्रजाजनों इस जय के हकदार आप सब है यदि आप लोग हमारे साथ नही होते तो हम यह कार्य नही कर पाते ।
प्रजा जन - नहीं सम्राट आप अगर नही होते तो हम में यह शक्ति ही नही होती आप ही हमारी शक्ति है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ।
सम्राट विक्रमादित्य - धन्यवाद प्रजा जनों । प्रजा जन - सम्राट विक्रमादित्य की जय ।
कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी कुबेर देव का क्या हुआ उनका अहंकार टूटा या नहीं । देवी - इतना जल्दी किसी का अहंकार कहां टूटता है राजन् कुबेर देव को एक साधारण मनुष्य की तरह जीवन जीना होगा उन्होंने अधर्म किया इसलिए उनका देवत्व समाप्त हो जाएगा उन्हें अब धन के लिए संघर्ष करना पढेगा इससे उन्हें धन का महत्व पता चलेगा ।
वहां पृथ्वी पर कुबेर देव कहते है में अपनी शक्तियों से पुनः कुबेर लोक जाऊंगा किंतु वे असफल रहते है । कुबेर देव को भूख लगती है वे सोचते है कि उन्हें मनुष्यों की तरह भूख क्यों लग रही है । किंतु उन्हें भोजन कही नही मिलता एक जगह उन्हें भोजन मिलता है पर वो किसी किसान का होता है वो शोर मचाता है चौर चौर चलो इसे सम्राट विक्रमादित्य के पास लेकर चलते है अब वहीं करेंगे इसका न्याय ।
सम्राट विक्रमादित्य - कौन है यह और क्या किया है इसने ।
प्रजा - सम्राट यह अन्न चौर है ।
सम्राट विक्रमादित्य कुबेर देव को देखते है मन में कहते है कुबेर देव आज आपको अन्न और धन दोनो का महत्व पता चलेगा आज ऐसा सबक सिखाऊंगा की आपको पता चलेगा की भोली भाली जनता को सताना क्या होता है ।
सम्राट विक्रमादित्य - चौरी चौरी है दण्ड नीय अपराध ।
कुबेर देव - सम्राट आपने मुझे नहीं पहचाना में धन का देवता कुबेर ।
सभी प्रजा हसने लग जाती कि धन का देवता कुबेर चौरी करता है यह कैसा झूठ है ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप चाहे जो कोई भी है आपने अपराध किया है आप हमारे सामने है आपको दण्ड मिलेगा । प्रजा जन आप पुरा घटनाक्रम बताएं ।
प्रजा - सम्राट हमसे बिना पुछे इन्होंने हमारा अन्न चौरी किया ।
कुबेर देव - असहनीय भुख सहन नही हो रही थी इसलिए अन्न सामने देख उसे खा लिया ।
कुबेर देव उस व्यक्ति से कहते है बोल दो रोटी की कीमत क्या कितना धन चाहिए में देता हूं बोल ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठहरिए बात धन की नहीं सिद्धांत की है धर्म की है आपने चौरी का अपराध किया है पहले आपको उसका दण्ड मिलेगा उसके बाद उस अन्न का मुल्य चुकाना होगा ।
कुबेर देव - अन्न का मुल्य में अभी चुकाऊंगा वो अपनी शक्ति का प्रयोग करते है किंतु धन नही आता सभी लोग उन पर हसते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - अब केवल दण्ड मिलेगा आपको सैनिको चौरी के बदले इसे कोडे मारो ले जाओ इसे ।
कुबेर देव - कुबेर देव आप ठीक नही कर रहे मेरे साथ ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपको दण्ड मिलेगा अब आपने धरती से अन्न को खत्म कर जो अधर्म किया है उसका अहसास आपको करवाएंगे ।
कुबेर देव को कोडो से पिटा जाता है सभी देवता देखते है देवराज इंद्र देवताओं हे कहते है यदि कुबेर देव ने मेरी बात मानी होती तो उनका देवत्व आज समाप्त नही होता लेकिन उनके अहंकार का पाप वे भुगत रहे है ।
बृहस्पति देव - देवराज इंद्र जैसा कर्म वैसा फल इसे ना आप बदल सकते है ना हम और ना ही स्वंय विधाता ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुबेर देव अभी तो आपने सिर्फ चौरी का दण्ड पाया है अभी तो आपको खेतों में काम करना होगा और अन्न का महत्व जानना होगा ।
।। कथा सुनते हुए राजा भोज कहते है देवी यह संसार में पहली और आखिरी घटना होगी जब किसी मनुष्य ने देवता को दण्ड दिया मगर देवी क्या कोई मनुष्य देवता को दण्ड दे सकता है । देवी - राजन् जो धर्म का प्रतिक हो वह यह कर सकता है सम्राटविक्रमादित्य धर्म के प्रतीक है वे चक्रवर्ती सम्राट है सम्राट अब कुबेर देव को अन्न का महत्व बताएंगे की उन्होंने अन्न को खत्म करके कितना बडा अपराध किया था ।।
सम्राट विक्रमादित्य - कुबेर देव अब आप खेत जोतेंगे श्रम करेंगे और अन्न का महत्व जानेंगे यह बहुमूल्य अन्न मनुष्य का जीवन है आपने जो अपराध किया है वो बहुत गलत था यह आज आप जानेंगे आप महलों में रहने वाले क्या जानेंगे श्रम की कीमत और इस अन्न के महत्व को क्या जानेंगे ।
कुबेर देव खेत जोतते हुए कहते है सम्राट जल दे दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - हम आपको जल तब तक नही दे सकते जब जक आप पुरा खेत ना जोत ले ।
कुबेर देव - सम्राट में शक्ति हीन हो गया हूं सम्राट अब मुझ में शक्ति नहीं ।
सम्राट विक्रमादित्य - जल की जगह उन्हें धन देते है ।
कुबेर देव - सम्राट जल दे दो भोजन दे दो ।
सम्राट विक्रमादित्य - आपके श्रम का हमने फल दे दिया यह धन रखो और खुद लाओ भोजन क्योंकि आपके लिए धन ही तो सबकुछ है ।
कुबेर देव जगह जगह भटक ते है धन के बदले अन्न किंतु कोई उन्हें अन्न नहीं देता सब कहते है धन से पेठ नहीं भरता अन्न से बरता है ।
देवी कहती है राजा भोज कुबेर देव समझ गए थे अन्न के महत्व को ।
कुबेर देव खुदसे कहते है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य में समझ गया अन्न के सामने धन धूल के बराबर है धन तो एकमात्र माध्यम है अन्न सबसे उपर है ।
कुबेर देव सम्राट विक्रमादित्य के महल आते है सम्राट । इतने में सैनिक उन्हें पकड लेते है ।
सम्राट विक्रमादित्य - ठहरो जोड दो इन्हें ।
कुबेर देव हाथ जोड कर सम्राट विक्रमादित्य के पैरो में पढ जाते है सम्राट उनहें खडा करते है ।
कुबेर देव - सम्राट मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है मुझे बस दो निवाला भोजन दे दिजिए ।
सम्राट विक्रमादित्य - आप हमसे अन्न क्यों मांग रहे है आपके पास दो धन है ।
कुबेर देव - सम्राट में अन्न की महत्ता को समझ गया सम्राट मैने आप सब को बहुत कष्ट दिए मुझे क्षमा कर दे ।
तभी देवराज इंद्र प्रकट होते है ।
देवराज इंद्र - कुबेर देव हमने आपको समझाया था अगर आप मेरी बात सुनते तो यह नहीं होता आपके साथ ।
कुबेर - मेरी आखों पर अहंकार का फरदा था देवराज जो मैने आपकी बात नही मानी मुझे क्षमा कर दिजिए देवराज ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुबेर देव जो इंसान सिखता है वो कभी नहीं भूलता ।
देवराज इंद्र - सत्य कहा आपने मित्र अगर आप ना होते तोयह सब ठीक नहीं होता ।
सम्राट विक्रमादित्य - मित्र में कौन होता हूं किसी को ज्ञान देने वाला मैने तो केवल अपना दायित्व निभाया है ।
कुबेर देव - तो सम्राट विक्रमादित्य मुझ जैसे अधर्मी को क्षमा करने का दायित्व निभाए आप। हे देवराज हे इंद्र देव कहीए ना अपने मित्र से ।
सम्राट विक्रमादित्य - कुबेर देव आपको किसी से कुछ कहलाने की जरूरत नहीं है हम आपसे निवेदन करते है आप धन का दुरूपयोग अब कभी ना करे एक योगी के रूप में धन की रक्षा करे ।
कुबेर देव - मुझे स्वीकार है सम्राट आपने मेरे देवत्व को बचाया पुरूषार्थी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज की अक्षय जय हो अक्षय जय हो ।
सम्राट विक्रमादित्य - इंद्र देव अब आप कुबेर देव को अपने लौक ले जाए और उन्हें उनका पद लौटा दे ।
देवराज इंद्र - जो आज्ञा सम्राट विक्रमादित्य फिर मिलते है मित्र ।
देवी कहती है राजा भोज से ऐसे थे विक्रमादित्य महाराज ।
जय चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य महाराज
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