विक्रम बैताल || कहानी 601 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 1] प्रथम आठ कहानियां
विक्रम बैताल || कहानी 601 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 1] प्रथम आठ कहानियां
सिंहासन बत्तीसी की कहानी / The Thirty Two Tales of THE THRONE
पहला भाग में आप सुनेंगे विक्रमादित्य के सिंहासन से संबंधित आठ कहानी।
1. विक्रमादित्य की उदार दानवृत्ति
जैसे ही राजा भोज सिंहासन पर आरूढ़ होने को बढ़ा, तभी पहली पुतली ने कहा :-
हे राजन ! यह दानवीर राजा विक्रमादित्य का सिंहासन है। जिन्होंने अपने खजांची को निर्देशित किया था कि यदि मैं किसी भिक्षुक को देखभर लूं तो एक हजार (1,000) निष्क (सर्वण मुद्रा), जिसके साथ 'शब्दभर वार्तालाप कर लूं उसे दस हजार (10,000) निष्क, जिसकी तरफ मुस्कुराऊं उसे एक लाख (1,00,000) निष्क और जिस पर प्रसन्न हो जाऊं उसे एक करोड़ (1,00,00,000) निष्क दान दिये जाएं।
हे राजा भोज ! यदि ऐसी दानवृत्ति आप में है तो आप इस सिंहासन का आरोहण कर सकते हैं।
2. परोपकारी राजा विक्रमादित्य
जैसे ही राजा भोज ने विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने की कोशिश की तो दूसरी पुतली ने उनसे कहा कि वही इस सिंहासन पर बैठ सकता है। जिसमें विक्रमादिला जैसा साहस व उदारता हो।
दूसरी पुतली ने कहा, "जो भी व्यक्ति राजा विक्रमादित्य को एक अद्भुत कहानी सुनाता था उसे राजा की ओर से एक हजार निष्क दिया जाता था। तब एक परदेशी ने राजा को चित्रकुट पर्वत पर स्थित लोगों की मनोकामनाओं को पूरा करने वाली देवी की कहानी सुनाई। उस उपवन में एक ब्राह्मण लम्बे समय से यज्ञ व त्याग कर रहा था। लेकिन उसकी मनोकामना पूर्ण नहीं हुई। उसी उपवन में एक झरना था जिसमें स्नान करने से व्यक्ति को सही व गलत का बोध हो जाता था।
इतनी कहानी सुनकर राजा विक्रमादित्य ने नंगे पैर इस तीर्थ स्थान पर पहुँचकर पवित्र झरने के जल से स्नान कर ब्राह्मण से पूछा कि "तुम कितने समय से यज्ञ व त्याग कर रहे हो ? ब्राह्मण ने जवाब दिया कि "एक सौ वर्षो से त्याग करने के बाद भी देवी प्रसन्न नही हुई।
" इतना सुनकर कर सम्राट विक्रमादित्य ने भी आहुति दी लेकिन देवी प्रसन्न नहीं हुई। इसे देखकर कर राजा ने देवी के चरणों में अपना शीश चढ़ाने के लिए तलवार उठाई ही थी कि देवी ने प्रकट होकर उनसे उनकी मनोकामना पूछी। इस पर राजा ने देवी से पूछा की "देवी आप इस ब्राह्मण के इतने समर्पण व त्याग के बाद भी क्यों प्रसन्न नहीं हैं ?
देवी ने उत्तर दिया कि "ब्राह्मण के विचार पवित्र नही हैं" उन्होनें कहा कि जो प्रार्थना पूरे मन व विश्वास के साथ नहीं की जाती ऐसी प्रार्थना कभी स्वीकार्य नहीं होती है। "
"ईश्वर किसी वस्तु में नहीं अपितु पवित्र हृदय में निवास करता है। विक्रमादित्य ने कहा कि यदि देवी यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो आप ब्राह्मण की मनोकामना पूरी कर दें। देवी ने ऐसा ही किया।
3. दानवीर विक्रमादित्य
उपयुक्त समय देखकर राजा भोज पुनः विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने पहुँचे तो तीसरी पुतली ने उन्हें सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा, 'राजन वही व्यक्ति इस सिंहासन पर बैठ सकता है जो विक्रमादित्य जैसा विशाल हृदय हो।
पुतली ने कहा सुनिए राजन, "विक्रमादित्य के शासन में किसी वस्तु की कमी न थी। लेकिन विक्रमादित्य के मन में विचार आया कि उनका महान शासन वर्तमान में तो सम्पन्न है लेकिन भविष्य के संबंध में कुछ नही कर रहा है। अतः उन्होने परमेश्वर शिव की आराधना करने की सोची क्योकि शिव ही दोनों लोकों की प्राप्ति करा सकते है। राजा ने विचार किया कि उनकी धन दौलत उन्हें लम्बी आयु प्रदान करेंगी, यदि उसे ईश्वर, श्रद्धेय व्यक्तियों व ब्राह्मणों को अर्पण किया जाए, क्योंकि धन की दिशा कोई नही जानता ।
इस प्रकार विक्रमादित्य ने यज्ञ (अर्पण) करने के लिए समस्त वस्तुओं की व्यवस्था कि और इस अवसर पर श्रेष्ठ मनीषियों, गंधवों, ब्राह्मणों व चारों वेदों में पारंगत पुजारियों को बुलावा भेजा राजा ने यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए समुद्र देवताओं को आमंत्रित करने के लिए एक ब्राह्मण को भेजा ब्राह्मणों ने समुद्र का आव्हान किया कि वे "विक्रमादित्य के यज्ञ में सपरिवार सम्मिलित हों"।
समुद्र ने राजा के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित की और आ पाने में असमर्थता व्यक्त की। किन्तु उन्होने ब्राह्मण को चार रत्न दिये और कहा की इन्हें विक्रमादित्य को भेंट किया जाए। चारों रत्नों की शक्तियों का वर्णन करते हुए समुद्र देवता ने कहा कि पहले रत्न से व्यक्ति जितना धन चाहे प्राप्त कर सकता है। दूसरे रत्न से मनचाहा भोजन प्राप्त कर सकता है। तीसरे रत्न से व्यक्ति पूर्ण सेना तैयार कर दुश्मनों को पराजित कर सकता है और चौथा रत्न व्यक्ति को मणि व जवाहरात दे सकता है।
ब्राह्मण रत्नों को लेकर विक्रमादित्य के पास पहुँचा और राजा को उनकी शक्तियाँ बतलाई। ब्राह्मण की बात सुनकर विक्रमादित्य ने उससे कहा " चारों रत्नों में जो रत्न तुम्हे पसन्द हो उसे ले लो"।
ब्राह्मण ने राजा से कहा कि "मैं अपना निर्णय घर जाकर लूंगा"। घर पहुँचकर ब्राह्मण का अपनी पत्नी बेटे और बहू के साथ रत्न के चयन को लेकर झगड़ा हो गया। इस बात से व्यथित होकर ब्राह्मण ने चारों रत्नों को विक्रमादित्य को लौटाते हुए कहा कि " राजन इन रत्नों के कारण मेरा अपने परिवार में झगड़ा हो गया। अतः इन रत्नों को आप ही रख लें"
विक्रमादित्य ने ब्राह्मण की बातों को धैर्य से सुनकर चारों रत्नों को उसे सौंप दिया। ब्राह्मण पुजारी खुश होकर अपने घर लौट गया।
कहानी समाप्त कर पुतली ने राजा भोज से कहा "राजन यदि विक्रमादित्य जैसी विशालहृदयता आप में है तो ही आप सिंहासन पर बैठ सकते हैं"।
4. कृतज्ञ विक्रमादित्य
राजा भोज एक बार पुनः सिंहासन पर बैठने लगे तो चौथी पुतली ने उनसे कहा कि " राजन ! यदि आप में सम्राट विक्रमादित्य जैसी कृतज्ञता है तो ही आप सिंहासन पर बैठ सकते है"
राजा भोज ने पूछा "कैसी कृतज्ञता”।
इस पर पुतली ने कहा, " एक बार राजा विक्रमादित्य शिकार करते हुए जंगल में रास्ता भटक गए। तभी एक ब्राह्मण ने उनकी मदद की।
ब्राह्मण से प्रसन्न होकर राजा ने उसे अत्यधिक धन देकर सम्मानित किया और कहा, " ब्राह्मण ! मैं तुम्हारी सहायता का ऋण पूर्ण रूप से नहीं चुका पाया हूँ।" राजा की भावना की सत्यता जाँचने के लिए ब्राह्मण ने राजा के बेटे का अपहरण कर लिया । दुःखी राजा ने अपने पुत्र की खोज के लिए सैनिकों को पूरे राज्य में भेजा लेकिन पुत्र नहीं मिला।
एक दिन ब्राह्मण राजा के पुत्र का एक आभूषण बेचते हुए पकड़ा गया और सुरक्षा अधिकारी ने उसे राजा के समक्ष प्रस्तुत किया।
राजा ने ब्राह्मण से पुछा “सम्माननीय ब्राह्मण ! आपने ऐसा क्यों किया ?" ब्राहम्ण ने उत्तर दिया “राजन ! एक बार एक मनोवृत्ति मेरे अंदर विकसित हुई जिसने प्रेरित किया कि वही करो जो परिस्थिति के अनुसार हो।”
राजा ने अपराध के दंड स्वरूप ब्राह्मण को मृत्युदंड दिया। जब ब्राह्मण को मृत्युदंड दिया जाने लगा तो राजा ने विचार किया कि "इस ब्राह्मण की हत्या से क्या लाभ ?"
अतः उसे प्राणदान देते हुए उन्होंने कहा कि ब्राह्मण तुमने मुझे सही मार्ग दिखाया है और तुम्हारे उपकार का ऋण चुकाने का यही सही समय है।”
राजा से प्राणदान पाकर ब्राह्मण ने उनके पुत्र को लौटा दिया और पुत्र के अपहरण का प्रायोजन बताया कि वह राजा की परीक्षा ले रहा था। यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित रह गए।
पुतली ने कहानी समाप्त करते हुए राजा से कहा कि राजन यदि आपमें राजा विक्रमादित्य जैसी कृतज्ञता है तो आप इस सिंहासन पर बैठ सकते हैं। "
5. उदार विक्रमादित्य
राजा भोज ने जैसे ही पवित्र सिंहासन पर बैठने की तैयारी की उसी समय पाँचवी पुतली ने उन्हें विक्रमादित्य की उदारता की कहानी सुनाई:
एक बार विक्रमादित्य के पास रत्नों का पारखी आया । जिससे राजा ने अमूल्य रत्नों को खरीद लिया। इन रत्नों के अतिरिक्त उस रत्नों के पारखी ने राजा को एक अद्भुत रत्न दिया जिसे देखकर राजा ने पूछा क्या तुम्हारे पास ऐसे और रत्न है।"
इस पर उस रत्नों के पारखी ने कहा की उसके नगर में इस प्रकार के दस रत्न हैं और प्रत्येक की कीमत सवा करोड़ है। इसे सुनकर राजा ने उसे साढ़े बारह करोड़ धन देकर अपने सेवक को उसके साथ भेजते हुए कहा कि “जाओ और रत्न लेकर आओ" ।
सेवक ने आज्ञा का पालन करते हुए कहा "राजन ! मैं चार दिनों में रत्नों को लेकर आपके चरणों में उपस्थित हो जाऊँगा।"
चौथे दिन जब सेवक रत्नों को लेकर राजा के पास आ रहा था तब रास्ते में नदी बाढ़ से उफन रही थी ऐसे में सेवक के सामने नदी पार करने में सहायता करने के लिए एक व्यक्ति आया उस व्यक्ति ने सेवक से नदी पार करने की शीघ्रता का कारण पूछा तब सेवक ने उस व्यक्ति को पूरी कहानी सुनाई।
इस पर उस व्यक्ति ने सेवक से कहा कि यदि वह उसे पाँच रत्न दे तो वह उसकी नदी पार करने में सहायता करेगा। इस शर्त को सुनकर सेवक ने कुछ विचार कर उस व्यक्ति को पाँच रत्न दे दिए और नदी पार कर राजा के पास बचे पाँच रत्नों को लेकर उपस्थित हो गया।
राजा ने उससे कारण पूछा तो सेवक ने उत्तर दिया, "हे राजन! मैंने आपके आदेश का उल्लंघन नहीं किया। "
ऐसा कहा जाता है कि ऐसे राजा पर विश्वास नही करना चाहिए जिसमें इन छः गुणों का अभाव हो प्रभुत्व, गौरव, ब्राह्मणों की रक्षा, उदारता, वस्तुओं का उपभोग और मित्रों की सुरक्षा। इसी प्रकार राजा के आदेश की अवहेलना और ब्राह्मणों को उनका नियत सम्मान न देना बिना हथियार के हत्या करने के समान है।
अतः राजन मैंने आपके आदेश का पालन करने के लिये ऐसा किया। सेवक की इस बात को सुनकर राजा ने प्रसन्न होकर कहा तुमने मेरे आदेश का पालन किया अतः इन पाँच रत्नों को मैं तुम्हे प्रदान करता हूँ।"
कहानी सुनाकर पाँचवीं पुतली ने राजा भोज से कहा कि जिसमें राजा विक्रमादित्य जैसी उदारता है। वही इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है।"
6. विक्रमादित्य की दयालुता
छठवीं पुतली ने राजा भोज को विक्रमादित्य सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा जिस व्यक्ति में विक्रमादित्य जैसी दूसरों की सहायता करने जैसी महानता हो वही इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है। इस पर राजा भोज के कहने पर पुतली ने विक्रमादित्य की महानता की कहानी शुरू की:
एक बार अपने विजयी अभियान के दौरान राजा विक्रमादित्य ने देवी चण्डी के पवित्र मंदिर के समीप स्थित आम के उपवन में पड़ाव डाला।
उस स्थान पर देवी के एक भक्त ने राजा विक्रम से कहा, "हे राजन ! मैं पचास वर्षों से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए देवी चण्डी की उपासना कर रहा हूँ। देवी ने प्रसन्न होकर मुझसे कहा कि "तुम राजा विक्रमादित्य के पास जाओ। वे तुम्हारी इच्छा पूरी करेगें, मैंने उन्हें तुम्हारी मनोकामना पूरी करने का आदेश दिया है। इसलिए हे राजन! मैं आपके पास आया हूँ।"
विक्रमादित्य के मन में यह विचार आया कि " देवी ने तो ऐसा कोई आदेश नहीं दिया फिर भी यह व्यक्ति दुःखी है। इसकी मदद मैं करूंगा।” विक्रमादित्य ने उस स्थान पर एक नगर का निर्माण किया और उस झूठे व्यक्ति को वहाँ का राजा नियुक्त कर उसे चौहरी सेना, धन व स्वर्ण के साथ एक हजार शोड़षी कन्याएँ भेंट की।
पुतली ने कहानी समाप्त करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति में विक्रमादित्य जैसी असीमित दयालुता हो जो झूठे व्यक्ति की मदद करने में भी पीछे न हटता हो ऐसा व्यक्ति ही इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है।
7. त्यागी विक्रमादित्य
सातवीं पुतली ने राजा भोज को सिंहासन पर बैठने से पूर्व कहा कि वही व्यक्ति इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है जिसमें विक्रमादित्य जैसा दूसरों के कल्याण के लिये स्वयं का बलिदान देने का साहस हो ।
एक बार राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक व्यक्ति जोकि बाहर के राज्यों में साहसिक यात्राएँ कर लौटा था। उसने राजा को बताया कि अपनी यात्रा के दौरान वह समुद्र के बीचो बीच एक द्वीप पर पहुँचा। जहाँ पर देवी चण्डी का पवित्र मंदिर हैं। इस मंदिर के पास एक अत्यन्त सुन्दर युगल के शरीर निष्प्राण पड़े हुए हैं और दीवाल पर लिखा है कि "जब कोई व्यक्ति अपना शीश देवी चण्डी के चरणों में अर्पित करेगा उसी पल निष्प्राण युगल के शरीरों में जीवन लौट आएगा।"
यह सुनकर विक्रमादित्य देवी के मंदिर पहुँचे और निष्प्राण पड़े युगल को देखकर अपनी तलवार से शीश समर्पित करने के लिए जैसे ही अपनी तलवार अपने शीश पर रखी देवी प्रसन्न होकर प्रकट हुई और विक्रमादित्य से कहा "है राजन ! मैं आपसे प्रसन्न हूँ । अपनी इच्छा बताएँ।"
राजा ने कहा "हे देवी अपनी कृपा से इस युगल के प्राण लौटा दिजिए।" इस प्रकार युगल ने पुनः जीवन प्राप्त किया।
इस प्रकार त्यागी विक्रमादित्य के समान गुण वाला व्यक्ति ही इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है।
8. वीर विक्रमादित्य
एक बार पुनः जब राजा भोज विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगे तब आठवीं पुतली ने उन्हें रोकते हुए विक्रमादित्य की वीरता की कहानी सुनाई:
एक बार जब विक्रमादित्य अपने भ्रमण के दौरान एक नगर में पहुँचे। इस नगर का एक व्यापारी अत्याधिक दुःखी था क्योंकि उसने जो तालाब बनवाया था उसमें पानी नही आ रहा था । दुःखी व्यापारी ने देवी की उपासना की जिससे एक आकाशवाणी हुई कि “जब एक 32 उच्च चिन्हों को धारण करने वाले व्यक्ति का बलिदान दिया जाए तो तालाब पानी से भर जाएगा।"
यह सुनकर व्यापारी ने एक स्वर्ण की भारी मानव मूर्ति बनवाई और शर्त रखी कि जो भी अपना बलिदान देगा वह इस स्वर्ण मूर्ति पाने का अधिकारी होगा। किन्तु कोई व्यक्ति सामने नही आया।
इस शर्त को सुनकर विक्रमादित्य रात को उस सुन्दर तालाब के निकट पहुँचे और अपने शीश पर तलवार रखते हुए उन्होंने कहा कि "मेरे बलिदान से इस स्थान के देव प्रसन्न हों।"
इससे पहले कि विक्रमादित्य अपना शीश काटते उन्हें रोकते हुए देव ने कहा " राजन ! मैं आपसे प्रसन्न हूँ । अपनी इच्छा बतायें।”
राजा ने कहा, "इस निर्जल तालाब को जल से भर दीजिए"।
इस प्रकार तालाब जल से भर गया। कहानी पूर्ण करते हुए पुतली ने कहा ऐसे वीर विक्रमादित्य जो जन कल्याण के लिए आत्म बलिदान करने को तत्पर रहते थे । उस जैसा ही कोई व्यक्ति उनके सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है।
आगे की कहानियां भाग 2 में पढ़े।
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